Monthly Archives: दिसम्बर 2009

अवसाद-२ (साँझ की धूप)

धान के खेतों पर दूर तक फैली, थकी, निढाल पीली-पीली साँझ की धूप, आ जाती है खिड़की से मेरे कमरे में, और भर देती है उसे रक्ताभ पीले रंग से, … … इस उदास पीले रंग की अलौकिक आभा से … Continue reading

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अवसाद-1 (अकेलापन)

अखरने लगता है अकेलापन शाम को… जब चिड़ियाँ लौटती हैं अपने घोसलों की ओर, और सूरज छिप जाता है पेड़ों की आड़ में, मैं हो जाती हूँ और भी अकेली. … … मैं अकेली हूँ… सामने पेड़ की डाल पर … Continue reading

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तुम्हारा जाना

फूल सभी मुरझा गये सूरज बुझ गया चिड़िया गूँगी हो गयी, सन्नाटा फैल गया सब ओर… दिशायें सूनी हो गयीं, रंगो से भरा ये संसार कब हो गया फीका-सा मुझे धुँधली सी भी नहीं याद, कि देखी हैं कब बहारें … Continue reading

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पसीना

आसमान की ओर देखता हुआ घुरहू केवट खुश है “गाँववालों…!! तुम भले ही मत आने दो नहर का पानी मेरे खेतों तक, पर आकाश नहीं करता पक्षपात देखो, बादल आ गये हैं… वो बरसेंगे सभी खेतों पर एक समान, तब … Continue reading

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गाँव की मिट्टी

मैं नहीं कहती कि मेरे दामन को तारों से सजा दो चाँद को तोड़कर मेरा हार बना दो मेरे लिये कुछ कर सकते हो तो इतना करो मेरे गाँव की मिट्टी की सोंधी खुशबू ला दो

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मोक्ष

मैंने जन्म लिया इसी जगह बार-बार और मरती रही तिल-तिलकर कितनी ही बार जीवन और मरण के बीच पड़ी रही कोमा में कभी महीनों तो कभी सालों फिर मरी और फिर जन्म लिया एक ही जन्म में सैकड़ों जन्म बिता … Continue reading

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मेरे जीवन में भी काश

मेरे जीवन में भी काश एक बार आता मधुमास कामदेव का बाण मुझे भी लग जाता मुझको भी हो जाती पिया मिलन की आस मेरे जीवन में… रिक्त हृदय का प्याला भर जाता मधु से मिट जाती मेरे भी हृदय … Continue reading

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