आराधना चतुर्वेदी ’मुक्ति’
कुछ यादें... कुछ बातें... कुछ अनुभव... कुछ विचार... वादों-विवादों से परे...!
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Monthly Archives: मार्च 2010
उनकी ज़िन्दगी के वो रूमानियत भरे दिन (3.)
मेरी अम्मा अधिक पढ़ी-लिखी नहीं थी. सिर्फ़ पाँचवाँ पास थीं. पहले लोग अपनी लड़कियों को अक्षरज्ञान करा देते थे, जिससे कि वे चिट्ठी लिख सकें. अम्मा को भी चिट्ठी लिखने भर की शिक्षा मिली थी. पिताजी जब उन्हें साथ लेकर … Continue reading
मैं, मेरा दोस्त, कॉफ़ी और इलाहाबादी जोड़े : दो दृश्य
जो लोग मेरा ब्लॉग पिछले कुछ दिनों से पढ़ रहे हैं, उन्हें ये टॉपिक अटपटा ज़रूर लगेगा, पर मैं उन्हें आश्वस्त कर दूँ कि अम्मा-पिताजी पर मेरी श्रृँखला आगे की पोस्ट में चलती रहेगी. ये विषय परिवर्तन दरअसल, न्यायालय के … Continue reading
उनकी ज़िंदगी के वो रूमानियत भरे दिन (2.)
हिन्दी सिनेमा का स्वर्णकाल (पचास और साठ के दशक) पिताजी के जीवन का भी स्वर्णकाल था क्योंकि वे उस समय युवा थे और नयी-नयी शादी हुयी थी. अपने खानदान क्या, पूरे गाँव में अपनी पत्नी को अपने साथ शहर लाने … Continue reading
उनकी ज़िन्दगी के वो रूमानियत भरे दिन (1.)
पिताजी ने पढ़ाई पूरी करते ही घर छोड़ दिया था. वे वहाँ से बाहर निकलकर कुछ करना चाहते थे और अपनी ज़िन्दगी अपने ढंग से जीना चाहते थे. गाँव की कुरीतियों और अन्धविश्वासों से उनका मन भी ऊबा था. फिर तब … Continue reading
पिताजी का बचपन (2)
पिताजी के बचपन में देश में विद्यालयों की संख्या बहुत कम थी. उन्हें खुद लगभग दस किलोमीटर दूर पढ़ने जाना पड़ता था. रास्ते में एक नदी और उसके किनारे श्मशान पड़ता था. वापस लौटते-लौटते अंधेरा हो जाता था. पिताजी के … Continue reading
पिताजी का बचपन (1)
मेरे पिताजी के बारे में लोग कहते थे कि वे अपने समय से पचास साल आगे की सोच रखने वाले इन्सान थे. बहुत ही खुले विचारों के, तार्किक, बुद्धिवादी, बेहद लोकतान्त्रिक, मस्तमौला और फक्कड़ किस्म के आदमी थे. वे नास्तिक … Continue reading
मेरे घर आयी एक नन्ही कली
मुझे होली में एक पामेरेनियन पपी उपहार में मिली. मैं उसकी कुछ फोटो अपलोड कर रही हूँ. मैंने उसका नाम कली रखा है. कली बहुत शैतान है. वो या तो खेलती है या फिर सोती रहती है. सोती भी है अजीब-अजीब मुद्राओं … Continue reading







