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उनकी ज़िन्दगी के वो रूमानियत भरे दिन (3.)

मेरी अम्मा अधिक पढ़ी-लिखी नहीं थी. सिर्फ़ पाँचवाँ पास थीं. पहले लोग अपनी लड़कियों को अक्षरज्ञान करा देते थे, जिससे कि वे चिट्ठी लिख सकें. अम्मा को भी चिट्ठी लिखने भर की शिक्षा मिली थी. पिताजी जब उन्हें साथ लेकर आये तो पढ़ाना शुरू कर दिया. अम्मा का जी नहीं लगता था पढ़ने में, तो पहले उन्हें मनोरमा, गृहशोभा जैसी किताबें लाकर दीं. जब धीरे-धीरे उनका मन लगने लगा तो पिताजी ने किताबों का स्तर थोड़ा बढ़ा दिया. अब वे उन्हें सरिता और कादम्बिनी पढ़ाने लगे. उन्नाव स्टेशन पर एक जो सबसे पुराना बुकस्टाल है, उसे हमारे एक चाचा चलाते थे (हमलोग पिताजी के दोस्तों को चाचा ही कहते थे, अंकल नहीं) पिताजी उन्हीं से अपनी पसन्द की किताबें मँगा लिया करते थे. मेरी अम्मा को पढ़ने का उन्होंने जो चस्का लगाया कि वे अखबार भी पढ़ने लगीं, जो कि आमतौर पर तब औरतें पढ़ना नहीं पसन्द करती थीं. फिर तो माया, धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी किताबें अम्मा की पहली पसन्द बन गयीं. अम्मा ने ही हमलोगों को बताया था कि किस प्रकार पिताजी ने उनकी रुचि परिष्कृत की. नहीं तो गाँव-देहात में पली-बढ़ी अम्मा बेचारी क्या जानती थी इन किताबों के बारे में.

उस ज़माने में टी.वी. तो होती नहीं थी. टेप रिकार्डर बहुत ऊँची चीज़ थी. ले देकर एक रेडियो था, जिस पर विविध भारती से निश्चित समय पर प्रोग्राम आते थे. इसलिये पिताजी जब ड्यूटी पर होते थे तो अम्मा इन्हीं किताबों के सहारे अपना समय बिताती थीं. इन सबका अम्मा के व्यक्तित्त्व पर बड़ा ही सकारात्मक प्रभाव पड़ा. हमने होश सँभाला तो हमें मालूम था कि अम्मा अधिक पढ़ी-लिखी नहीं हैं, पर बाहर वाला कोई भी इस बात पर विश्वास नहीं करता था. इसका कारण यह था कि वो धड़ल्ले से किसी भी विषय में बहस कर लेती थीं. हमलोगों को हिन्दी और अन्य विषय वही पढ़ाती थीं, बस अंग्रेजी उन्हें नहीं आती थी और उन्होंने कभी कोशिश भी नहीं की सीखने की.

अम्मा को सिलाई सीखने का शौक था, तो पिताजी ने उस ज़माने में उन्हें उस सिलाई स्कूल में भर्ती करवाया, जहाँ पुरुष टीचर सिखाते थे. घरवालों ने इस बात का बुरा भी माना, पर पिताजी ने किसी की एक न सुनी. ये बात अलग थी कि अम्मा माथा ढककर ही जाती थीं स्कूल.

हमलोग जब छोटे थे, तो अम्मा अपने हाथ से सिलकर कपड़े पहनाती थीं हमें. रंग-बिरंगे, छींटदार, फूल वाले हर तरह के कपड़े, खुद ही खरीदकर लाती थीं और बड़े मन से सिलती थीं. अगर सादे कपड़े होते थे, तो उस पर फूल काढ़ती थीं. अम्मा स्वेटर बुनने में इतनी पारंगत थी कि तीन दिन में एक स्वेटर तैयार कर देती थी. हमारे स्कूल के लिये रात रात भर जागकर चार दिन में भाई-बहन दोनों के स्वेटर तैयार कर दिये थे.

अम्मा काश-बल्ले( एक प्रकार के घास जिससे औरतें पहले टोकरी वगैरह बनाती थीं) से खूब तरह-तरह की टोकरियाँ बनाती थीं. सिकहुली, कुरुई, पिटारी आदि कुछ नाम मुझे याद हैं. अफ़सोस की अम्मा के देहांत के समय मैं सिर्फ़ 13 की थी, नहीं तो कुछ सीख लेती. ये हुनर उन्हीं के साथ चला गया. अब भी गाँव की कुछ भाभियाँ ये हुनर जानती हैं, पर थोड़ा-बहुत. पर, अम्मा तो माहिर थीं ऐसे कामों में.

कहते हैं कि इन्सान जब जाता है तो अपने साथ कुछ नहीं ले जाता, पर अम्मा गईं तो अपने साथ सब कुछ ले गईं. वो अपनापन, जो हमारी फ़्राक पर काढ़ा करती थीं; वो सपने, जो वो कुरुई, पिटारी के साथ बुना करती थीं; वो प्यार की गर्मी, जो स्वेटर में डाल देती थीं; वो रिश्तों के ताने-बाने जो क्रोशिया के धागों से सजावट की झालरों में पिरो देती थीं, सब ले गईं अपने साथ और साथ ले गई वो हुनर, जो लोकसंस्कृति को संजोने के लिये एक पीढ़ी से दूसरी सीखती जाती है. लोकसंस्कृति ऐसे ही टुकड़ों-टुकड़ों में तिरोहित होती जा रही है, परलोक जाने वाली माँओं के साथ.

एक कविता उनकी याद में…


मैं, मेरा दोस्त, कॉफ़ी और इलाहाबादी जोड़े : दो दृश्य

जो लोग मेरा ब्लॉग पिछले कुछ दिनों से पढ़ रहे हैं, उन्हें ये टॉपिक अटपटा ज़रूर लगेगा, पर मैं उन्हें आश्वस्त कर दूँ कि अम्मा-पिताजी पर मेरी श्रृँखला आगे की पोस्ट में चलती रहेगी. ये विषय परिवर्तन दरअसल, न्यायालय के एक फ़ैसले और एक विवादित फ़िल्म पर आजकल चल रही बहस के कारण हुआ है. यह पोस्ट इलाहाबादी प्रेमी जोड़ों से सम्बन्धित दो दृश्यों के बारे में है. टॉपिक में लिखीं बातें दोनों दृश्यों में कॉमन हैं.

पहला दृश्य (स्थान इलाहाबाद के कॉफ़ी हाउस का फ़ैमिली कैबिन, सन २०००)

मैं और मेरा एक वामपंथी दोस्त ( वामपंथी है ये इसलिये बताया कि आप आने वाले दृश्य पर उसकी प्रतिक्रिया से चौंके ना) इलाहाबाद के सिविल लाइन्स स्थित कॉफ़ी हाउस में एक कप अच्छी कॉफ़ी की प्यास में पहुँचे. फ़ैमिली केबिन हम इसलिये चुनते थे कि एक तो वहाँ शोर कम होता है, दूसरे मेन हॉल में अक्सर मेरे एक रिश्ते के जीजाजी अपनी बैंक मण्डली के साथ पहुँच जाते थे और मैं उनका सामना नहीं करना चाहती थी. हम दोनों के वहाँ बैठने के बाद एक जोड़ा बाइक से पहुँचता है और कोने की टेबल पर कब्ज़ा जमा लेता है. उनकी टेबल ठीक मेरे सामने थी. वो दोनों आमने-सामने बैठे थे. थोड़ी देर बाद लड़का, लड़की के बगल वाली चेयर पर बैठ जाता है.

मैं और मेरा दोस्त अक्सर मार्क्सवाद, क्रान्ति, धरना, आन्दोलन, नारी-सशक्तीकरण जैसे मुद्दों पर बौद्धिक बहस करते थे, जैसा कि बुद्धिजीवी लोग कॉफ़ीहाउसों में बैठकर किया करते हैं. मैं भी वामपंथी हूँ, पर हिंसक क्रान्ति की विरोधी. मैं उससे कहती थी कि भारत में कभी क्रान्ति नहीं हो सकती क्योंकि यहाँ उस तरह का वर्ग-संघर्ष नहीं है, जैसा क्रान्ति के लिये अपेक्षित है. मेरे दोस्त के अनुसार आज नहीं तो पचास साल बाद क्रान्ति होगी ही. इधर हम दोनों के बीच गर्मागर्म बहस चल रही थी और मेरी नज़र बार-बार उस जोड़े पर जा अटकती थी और अटके भी क्यों न वो दोनों दुनिया से बेखबर चूमाचाटी में लगे हुये थे. मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि उन दोनों के दुस्साहस की प्रसंशा करूँ या बेशर्मी की निन्दा.

मेरे दोस्त ने मुझसे मेरे उधर देखने का कारण पूछा, तो मैंने उसे बता दिया और  कहा  कि सार्वजनिक स्थान पर ऐसी हरकत अच्छी लगती है क्या? उसने कहा कि “जब समाज में इन लोगों को प्रेम करने के लिये स्पेस नहीं मिलेगा तो ये ऐसी जगहों पर करेंगे. इन्हें रोका तो जा नहीं सकता. टीनएजर्स हैं. प्रेम इनकी स्वाभाविक आवश्यकता (नैचुरल नीड) है.” मैं अपने दोस्त की बात से थोड़ी तो सहमत थी, पर पूरी तरह से नहीं. उनकी हरकतें मेरा ध्यान खींच रही थीं. आखिर मेरा दोस्त झुँझला गया “क्या यार!! कुंठित लोगों की तरह बार-बार उधर देख रही हो” मैंने उससे कहा “अच्छा तुम मेरी जगह पर बैठ जाओ” जब हमने जगह बदल ली, तो जाकर मुझे चैन आया. मेरे दोस्त ने एक बार भी उधर नहीं देखा.

दूसरा दृश्य ( स्थान- आनन्द भवन के सामने स्थित चाहत रेस्टोरेंट, सन- २००४–ठीक चार साल बाद)

मेरा दोस्त एम.ए. करने के बाद जे.एन.यू. चला आया था और मैं इलाहाबाद से रिसर्च कर रही थी. उन दिनों वो इलाहाबाद आया हुआ था, तो मुझसे मिलने चला आया. हमारे पास ज्यादा समय नहीं था, इसलिये हमलोग पैदल टहलते हुये “चाहत” पहुँच गये. इलाहाबाद में सिविल लाइन्स और यूनिवर्सिटी के आस-पास के माहौल में ज़मीन-आसमान का अन्तर है. सिविल लाइन्स का माहौल महानगरीय है तो यूनिवर्सिटी के चारों ओर का कस्बाई.  हमलोग जब इलाहाबाद में नये-नये आये थे, तो किसी लड़की को लड़के के साथ देखकर सीटियाँ बजने लगती थीं.

रेस्टोरेंट में हमलोगों ने कॉफ़ी ऑर्डर की हालांकि वो बहुत बेस्वाद थी, पर हमें बात करने के लिये कुछ तो मँगाना ही था. थोड़ी देर बाद मेरे दोस्त ने मुझसे कहा कि उसे आश्चर्य हो रहा है कि इस रेस्टोरेंट में इतने प्रेमी जोड़े बैठे हैं और वो भी सटकर, कंधों पर बाँहें रखे, कोई संकोच नहीं, कोई डर नहीं. मैंने उसे बताया कि इधर चार सालों में माहौल काफी बदल गया है. अब ये जगह तो समझो इन्हीं लोगों के नाम हो गयी है-”चाहत-चाहने वालों की जगह” .

जी हाँ, माहौल बहुत बदल गया है. अपने आप या फ़िल्मों और टी.वी. के प्रभाव से, सही या गलत, कुछ नहीं कहा जा सकता. प्रेम पहले भी किशोरावस्था के लोग करते थे और अब भी. फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि वो डरते थे, आज की पीढ़ी निडर है. वो शर्माते थे, आजकल के बच्चे शान से बताते हैं कि उनके कितने ब्वॉयफ़्रैंड या गर्लफ़्रैंड रह चुकी हैं. पहले के लोग दब्बू होते थे, आज की पीढ़ी दुस्साहसी.

मेरे दोस्त ने इन दोनों दृश्यों की तुलना करते हुये अपने मन मुताबिक निष्कर्ष निकाल लिया और बोला, “याद है, एक बार कॉफ़ी हाउस में तुम्हें ऐसी ही एक घटना देखकर कोफ़्त हो रही थी. आज तुम कितनी सहज होकर बैठी हो. चार साल में इतना कुछ बदल गया है, तो आने वाले दिनों में क्रान्ति क्यों नहीं हो सकती?”… … आप चाहें तो कोई और निष्कर्ष भी निकाल सकते हैं. मैंने तो बस अपनी बात कह दी.


उनकी ज़िंदगी के वो रूमानियत भरे दिन (2.)

हिन्दी सिनेमा का स्वर्णकाल (पचास और साठ के दशक) पिताजी के जीवन का भी स्वर्णकाल था क्योंकि वे उस समय युवा थे और नयी-नयी शादी हुयी थी. अपने खानदान क्या, पूरे गाँव में अपनी पत्नी को अपने साथ शहर लाने वाले पिताजी पहले युवक थे. नहीं तो उस समय पिया लोग कमाने रंगून और कलकतवा चले जाते थे और पियानियाँ (मतलब पत्नियाँ) घर बैठकर विरह में कजरी और बिदेसिया गाती थीं–”चार रे महीना कहि के गइलैं कलकतवा बीति गइलैं बारह बरीस रे बिदेसिया” इससे ये पता चलता है कि पिया लोग बरसों घर नहीं जाते थे और पत्नियाँ सौतन की कल्पना कर-करके जल-जलकर राख होती थीं और “कोयला भई न राख” वाली गति बना लेती थीं. पिताजी ने अम्मा को बिरहगीत गाने का मौका ज्यादा नहीं दिया और शादी के लगभग तीन साल बाद(तीन साल तब भी लगा दिये) अम्मा को लेकर उन्नाव आ गये, जहाँ वे उस समय पोस्टेड थे.

दरअसल अम्मा को साथ ले जाने का एक विशेष कारण था. उन दिनों बिजली आदि से चलने वाली चक्की नहीं होती थी. औरतें घर में ही जांता (हाथ चक्की) चलाकर आटा पीसती थीं और दाल दरती थीं. इसलिये सुबह-सुबह मुँह अँधेरे उठना पड़ता था. अम्मा को ये सब करने में कोई परेशानी नहीं थी. पर भयंकर जाड़े में भी भोर में नहाकर और एक कपड़ा पहनकर ही खाना बनाना पड़ता था (जैसा कि मैं पहले बता चुकी हूँ खाना बनाते और खाते समय दर्जी का सिला कपड़ा पहनने की अनुमति नहीं थी). अम्मा का जब ब्याह हुआ था, तो वो सिर्फ़ 15 साल की थी. बेहद दुबली-पतली बेचारी अम्मा की हड्डियाँ काँप जाती थीं जाड़े में. घर की बड़ी बहू होने के कारण सारे घर की ज़िम्मेदारी भी अम्मा पर ही थी. इतना सारा काम करने के कारण अम्मा बीमार रहने लगीं. उस पर भी कोई उन पर ध्यान नहीं देता था. घर की बहुओं की औकात ही क्या होती है? उन्हीं दिनों हमारी छोटी बुआ का टी.बी. का रोग लगने से देहांत हो गया. उन दिनों ये एक घातक बीमारी थी और इसका कोई इलाज नहीं था. अम्मा ने उनकी बड़ी सेवा की थी. पिताजी को जब अम्मा की बीमारी का पता लगा, तो उन्हें लगा कि कहीं अम्मा को भी ये रोग न लग जाये. तो उन्होंने फिर से घर वालों का विरोध करते हुये अम्मा को साथ ले जाने का फ़ैसला कर लिया. ले गये थे वो अम्मा का इलाज कराने, पर वापस पहुँचाने नहीं गये.

जैसा कि मैंने पहले भी बताया है कि अम्मा-पिताजी की शादी के लगभग ग्यारह साल बाद दीदी का जन्म हुआ था. इस बीच अम्मा रह रहकर बीमार पड़ जाती थीं और उनका इलाज चलता रहता था. अम्मा-पिताजी ने बाल-बच्चे न होने का खूब फ़ायदा उठाया. खूब घूमे-फिरे, फ़िल्में देखीं, बाहर खाना खाया(अम्मा ने नहीं, वो बाहर का नहीं खाती थीं, मरते दम तक नहीं खाया) रेडियो पर खूब गाने सुने( उन दिनों किसी के पास रेडियो होना बड़ी बात थी) और खूब गप्पें हाँकीं. कुल मिलाकर वो दिन उनकी ज़िन्दगी के रूमानियत भरे दिन थे.

वो समय हिन्दी सिनेमा का ही नहीं, भोजपुरी सिनेमा का भी स्वर्णकाल था. भोजपुरी की पहली फ़िल्म थी “गंगा मैया तोहैं पियरी चढ़इबौं.” अम्मा को ये फ़िल्म बहुत पसन्द थी और इसके गाने वो अक्सर गुनगुनाया करती थीं. इसके अलावा “बिदेसिया” और “लागी नहीं छूटे रामा” फ़िल्मों की भी अम्मा बहुत प्रशंसा करती थीं. बिदेसिया का गाना “हंसि-हंसि पनवा खिअउलै बेइमनवा” अम्मा का मनपसंद गाना था. इसके अलावा जो गाना उन्हें अच्छा लगता था–”लाले-लाले ओठवा से बरसै ललइया, हो कि रस चुऐला, जइसै अमवा की डरिया से रसा चुऐला”(ये गाना तलत महमूद और लता जी ने गाया है). सब लोग बताते हैं कि जब मैं छोटी थी, तो अम्मा के गाने दोहराती थी. मेरी तोतली बोली में भोजपुरी गाने सबको बहुत अच्छे लगते थे. मज़े की बात कि मैं भोजपुरी न तब बोल पाती थी और न अब बोल पाती हूँ, पर गाने गा लेती हूँ.

अम्मा-पिताजी फ़िल्मों के इतने दीवाने थे कि कभी-कभी एक सिनेमाहाल से निकलते थे फ़िल्म देखकर और दूसरे में घुस जाते थे. लोग कहते हैं कि आजकल समाज पर फ़िल्मों का कुछ ज्यादा ही असर दिख रहा है, तो वो तब भी कम नहीं था. उसी समय देवानंद के सफेद शर्ट और काली पैंट के साथ काली कोट पहनने पर पाबंदी लग गयी थी क्योंकि कुछ लड़कियों ने उन्हें इस पोशाक में देखकर आत्महत्या कर ली थी. मेरे पिताजी भी बहुत ही हैंडसम थे. पाचँ फिट ग्यारह इंच की लम्बाई, गोरा-चिट्टा रंग और छरहरा शरीर. कोई उन्हें देवानंद कहता था, तो कोई सुनील दत्त और मेरी अम्मा पिताजी पर वारी-वारी जाती थीं.


उनकी ज़िन्दगी के वो रूमानियत भरे दिन (1.)

पिताजी ने पढ़ाई पूरी करते ही घर छोड़ दिया था. वे वहाँ से बाहर निकलकर कुछ करना चाहते थे और अपनी ज़िन्दगी अपने ढंग से जीना चाहते थे. गाँव की कुरीतियों और अन्धविश्वासों से उनका मन भी ऊबा  था. फिर तब खेती में बहुत श्रम करने पर भी कम आय होती थी और सिर्फ़ लोगों का पेट भर पाता था.

पिताजी जब अपनी युवावस्था के दिनों के बारे में बताते थे तो हमें लगता था कि हम कोई पुरानी रोमैंटिक हिन्दी फ़िल्म देख रहे हों. पिताजी की शादी उस ज़माने के और लोगों की ही तरह माता-पिता की इच्छा से हुयी थी. फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि उन दिनों शादी के पहले जब लड़की-लड़का एक-दूसरे को देखने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे, पिताजी ने अम्मा को देखकर शादी की थी. और उसकी भी एक मज़ेदार कहानी थी.

पिताजी उन दिनों रेलवे में शंटमैन थे. यद्यपि उनकी शिक्षा के हिसाब से वो नौकरी नहीं थी, पर गाँव से बाहर निकले, अपने दम पर अपनी जगह बनाने वाले लोगों को संघर्ष तो करना ही पड़ता है. उन दिनों लोग रेलवे में कच्चे में काम करने लगते थे और कुछ दिन काम करने के बाद उन्हें परमानेंट कर दिया जाता था. तो पिताजी कच्चे में लगे थे. उनकी शिक्षा और स्वभाव के कारण लोग उनका बहुत सम्मान करते थे. वे मालीपुर नाम के एक स्टेशन पर पोस्टेड थे. कच्चे कर्मचारियों को रेलवे का घर तो मिलता नहीं था. इसलिये एक जन के यहाँ किराये पर रहते थे. आस-पड़ोस के लोग उन साहब से कहने लगे कि वो अपनी लड़की का ब्याह चौबे से करा दें. अब क्या था ? पिताजी के मित्रगण उनको चिढ़ाने लगे. वो लड़की भी पिताजी से अपनी शादी के सपने सजाने लगी. पर वो लोग कान्यकुब्ज़ ब्राह्मण थे और हम सरयूपारीण. हमारे समाज में आज भी दोनों कैटेगरी के ब्राह्मण अपने आपको स्वघोषित रूप से श्रेष्ठ मानते हैं और एक-दूसरे के यहाँ शादी नहीं करते हैं, तो उस ज़माने में तो सवाल ही नहीं उठता था.

पिताजी के ममेरे भाई वहीं रहते थे. जब उन्हें पता चला तो भड़क गये. उन्हीं दिनों घर पर अम्मा का रिश्ता आया पिताजी के लिये. पिताजी के ममेरे भाई उन्हें धोखे से अम्मा के गाँव ले गये और उन्हें अम्मा के दर्शन करा दिये. तब अगर कोई लड़का, लड़की को शादी के लिये देख लेता था, तो ना नहीं कर सकता था. पिताजी को तो मालूम भी नहीं था और उनके ममेरे भाई ने ये बात फैला दी कि कृष्णदेव ने लड़की देखकर पसंद कर ली है. तो इस तरह उनको अम्मा से शादी करनी पड़ी.

पिताजी बताते थे कि उन्हें पहली नज़र में अम्मा अच्छी नहीं लगी थीं. उनकी नज़र में तो गोरी-चिट्टी मालीपुर वाली बसी थीं और अम्मा थी साँवली. पर जब पिताजी ने अम्मा को देखा था, तो नानी उनके बालों में तेल लगा रही थीं और पिताजी की नज़र उनके काले-घने और लम्बे बालों में अटक गयी थी. पिताजी अक्सर बाद में अम्मा को छेड़ते थे कि “मेरी शादी मालीपुर वाली से होती तो मेरे बच्चे गोरे-चिट्टे होते” और मैं अम्मा का बचाव करते हुये तपाक से कहती कि “इतने बुद्धिमान न होते” फिर दीदी कहती और “इतने लम्बे भी नहीं.” पिताजी कहते कि “वो सीधी-सादी थी, तुम्हारी अम्मा की तरह झगड़ालू नहीं” और हम कहते “भोदू रही होगी, इतनी तेज-तर्रार नहीं” अम्मा मुस्कुराकर रह जाती थीं.


पिताजी का बचपन (2)

पिताजी के बचपन में देश में विद्यालयों की संख्या बहुत कम थी. उन्हें खुद लगभग दस किलोमीटर दूर पढ़ने जाना पड़ता था. रास्ते में एक नदी और उसके किनारे श्मशान पड़ता था. वापस लौटते-लौटते अंधेरा हो जाता था. पिताजी के साथ के लड़के सारे रास्ते हनुमान चालीसा पढ़ते हुये आते थे और पिताजी सबसे आगे-आगे नरमुंडों को फुटबाल बनाकर खेलते हुये. कोई सोच सकता है कि एक दस-ग्यारह साल का बालक ऐसी हरकत कर सकता है? पर वे ऐसे ही थे.

एक बड़ी मज़ेदार घटना अपने बचपन की वे अक्सर सुनाते थे. हाइस्कूल की परीक्षा देने के लिये वे एक साधु बाबा की कुटिया में रुके थे. कुछ-कुछ आश्रम जैसा माहौल था वहाँ. एक पेड़ के नीचे कुछ गोल-गोल पत्थर रखकर उसे शिव-मन्दिर बना दिया गया था. वैसे तो कई मन्दिर थे ही. वहाँ बन्दर बहुत थे, जो पिताजी के मनपसंद आम के पेड़ पर नज़र लगाये रहते थे. उस पर छोटी-छोटी अमिया लगी थीं. पिताजी साधु बाबा और उनके शिष्यों की नज़र बचाकर, वहाँ रखे गोल पत्थरों को बन्दर भगाने और अमिया तोड़ने के काम में लाने लगे. एक दिन साधु बाबा ने ध्यान दिया कि बहुत कम पत्थर बचे हैं. उन्होंने धमकाकर पूछा तो वहाँ रह रहे और परीक्षार्थियों ने पिताजी का नाम बता दिया. अब क्या था? साधु बाबा का गुस्सा सातवें आसमान पर. उन्होंने पिताजी को डाँटा. जब दादाजी परीक्षाओं के बाद पिताजी को लेने गये तो उनसे पिताजी की शिकायत करते हुये साधु बाबा ने कहा कि इतना घोर पाप किया है इसने. इसके पास होने के आसार कम ही हैं. दादाजी चिन्तित हो गये. जब पिताजी अच्छे नम्बरों से पास हो गये तो साधु बाबा बोले “घोर कलियुग है.”

जब देश स्वतन्त्र हुआ तो पिताजी की उम्र ग्यारह-बारह साल रही होगी. पिताजी बताते थे कि कैसे आज़ादी की खुशी में स्कूल में प्रभात फेरियाँ लगायी जाती थीं, जिसमें वे सबसे आगे रहते. गाँधीजी के बारे में पिताजी अपने मास्टर साहब से सुना करते थे. असहयोग आन्दोलन, दांडी मार्च आदि की कहानियाँ गाँव-गाँव में सुनी-सुनाई जाती थीं. संचार के साधन न होते हुये भी कोई भी खबर रातोंरात बिजली की तरह फैल जाती थी. पिताजी बताते थे कि गाँव की औरतें गाँधी बाबा को भगवान का अवतार मानती थीं. हमलोगों को आज़ादी के समय की बातें पिताजी से सुनना बहुत भाता था.

पिताजी के बचपन के दिनों में अनाज की बहुत किल्लत थी. देश में हरित क्रांति के बाद ही लोगों को पर्याप्त अन्न मिलने लगा. खुद पिताजी एक समय खाकर और चिउड़ा लेकर स्कूल जाते थे. जूते-चप्पल भी मुश्किल से मिलते थे. भयंकर ठंड में उन्हें नंगे पाँव स्कूल जाना पड़ता था, वो भी इतनी दूर. सभी की यही हालत थी. पिताजी को पहली जूतों की जोड़ी मिडिल स्कूल में मिली थी. पिताजी ने बचपन में जितनी कठिनाइयाँ झेली थीं, उन सबका बदला हम बच्चों से लिया. मैं जब दस साल की थी तो पिताजी का ट्रान्सफ़र उन्नाव जिले के बगल के एक छोटे से रेलवे स्टेशन मगरवारा में हो गया. उस समय पिताजी उन्नाव में पोस्टेड थे. उन्नाव छोटा जिला ज़रूर था, पर शहर में सारी सुविधाएँ थीं. हम एक बहुत अच्छे स्कूल में पढ़ रहे थे. सभी लोगों ने कहा “चौबे जी, आप इसी शहर में कोई किराये का मकान लीजिये और डेली पैसेन्जरी कर लीजिये. कहाँ जंगल में ले जायेंगे बीवी-बच्चों को.” पर पिताजी नहीं माने. उन्होंने हम भाई-बहनों से कहा कि “तुमलोग बहुत आरामपसंद हो गये हो. मेरे रिटायर हो जाने पर तुम्हें गाँव में रहना पड़ेगा. इसलिये अभी से आदत डाल लो.” और हमें मगरवारा जाना पड़ा. हमलोगों ने पूरे चार साल डेली पैसेन्जरी करके पढ़ाई की. ऐसे थे हमारे पिताजी.

पिताजी ने हमलोगों को जितना हो सका, कठोर परिस्थितियों को झेलने के लिये तैयार किया. उन्होंने बचपन में जिन चीज़ों की कमी झेली थी, हमें कभी भी नहीं होने दी. पर उन्होंने हमें जानबूझकर सुख-सुविधाओं की आदत नहीं लगने दी. वे ऐसे व्यक्ति थे कि कूलर इसलिये नहीं लिया कि हम इतने सुविधाभोगी न हो जायें कि गाँव में न रह पायें. फ़्रिज़ इसलिये नहीं लिया कि हमें ताज़ी सब्ज़ियाँ खाने की आदत रहे और खुद बाज़ार से जाकर रोज़ हरी सब्ज़ी ले आते थे. पर हमारे खाने-पीने, पढ़ाई और अतिरिक्त गतिविधियों के लिये उनका हाथ हमेशा खुला रहता था. पिताजी ने अपने बचपन में परीक्षा के लिये कभी पढ़ाई नहीं की और इसीलिये हमलोगों पर कभी परीक्षा में अच्छे नम्बर लाने के लिये दबाव नहीं डाला. ये बात अलग है कि कोई दबाव न होने पर भी मैं हमेशा टॉपर रही.

पिताजी के बचपन की कहानियों ने हमें समय-समय पर बहुत प्रेरित किया है. जब भी कोई मुश्किल पड़ती, पिताजी के बचपन के दिन याद आ जाते. हम जानते थे कि हमें जो भी मुश्किलें झेलनी पड़ें, वे पिताजी द्वारा बचपन में सही गयी मुश्किलों के सामने कहीं नहीं टिकतीं. और… इन सब से बढ़कर, पिताजी के बचपन के विद्रोहों ने मुझे हमेशा अतार्किक बातों का विरोध करने की ताकत दी.