Monthly Archives: अप्रैल 2010

भागना परछाइयों के पीछे-पीछे…

छुटपन में, जब पेड़ों की परछाइयाँ धूप से लड़ते-लड़ते, शाम को थककर ज़मीन पर पसर जाती थीं, तो हम उनकी फुनगियों पर उछल-कूद  मचाते थे और कहते थे “देखो, हम पेड़ की फुनगी पर हैं”—बचपन कितना मासूम होता है, परछाइयों … Continue reading

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ज़िन्दगी का एक खराब दिन

कल रात से मूड बहुत खराब है और ये पोस्ट मैं अपनी फ़्रस्टेशन निकालने के लिये लिख रही हूँ. रात में “रोड, मूवी” नाम की एक फ़िल्म देखी. फ़िल्म अच्छी लगी या बुरी, पता नहीं. पर उसे देखकर मन बड़ा … Continue reading

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चलत की बेरिया

हमारा देश दार्शनिकों का देश है, दर्शन का देश है. दर्शन यहाँ के जनमानस के अन्तर्मन में समाया हुआ है, जनजीवन में प्रतिबिम्बित होता है. कुछ लोग कर्मवादी हैं, तो कुछ लोग भाग्यवादी. पर समन्वय इतना कि कर्मवादी लोग भी … Continue reading

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अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (2.)

मेरे और अम्मा के अघोषित युद्ध में अक्सर दीदी शान्ति-स्थापना का असफल प्रयास किया करती थीं. वो एक ओर मुझे समझाती कि अम्मा तुम्हें बहुत प्यार करती हैं, बस दिखाती नहीं हैं, दूसरी तरफ अम्मा से कहती कि ज्यादा मार-पीट … Continue reading

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अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (1.)

मैंने जब से होश सँभाला, अपने और अम्मा के बीच एक अजीब सा तनाव पाया. शायद इसका कारण मेरा छोटा भाई रहा हो, जिसकी वजह से मैं “दुधकटही बिटिया” बन गई थी या शायद कुछ और, पता नहीं, पर हम दोनों … Continue reading

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मर रहा है गरीब आदमी…

मन व्यथित है…व्याकुल है…परेशान है…जब भी कोई ऐसी घटना होती है, तो परेशान कर जाती है…चाहे वो उड़ीसा या बुन्देलखंड में भूख से मरने वालों की खबर हो या कल की खबर…सुबह तो फिर भी कुछ ठीक था मन…पर शाम … Continue reading

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घर और महानगर

घर (१.) शाम ढलते ही पंछी लौटते हैं अपने नीड़ लोग अपने घरों को, बसों और ट्रेनों में बढ़ जाती है भीड़ पर वो क्या करें ? जिनके घर हर साल ही बसते-उजड़ते हैं, यमुना की बाढ़ के साथ. (२.) … Continue reading

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