Monthly Archives: मई 2010

अब सब कुछ पहले जैसा है

छत पर पानी खेलकर आयी और सज़ा पायी (बैठी रहो सीढ़ी पर, अंदर मत आना नहीं तो फर्श गंदी हो जायेगी)

अब किसी पड़ोसी को इस बात की शिकायत नहीं होगी कि उसने छत पर सूखने के लिए टंगे कपड़ों को खींचकर ज़मीन पर गिरा दिया , कि उसने उनके कमरे के सामने पोटी या सुसु कर दी, अब किसी को छत पर जाने से भौंक-भौंककर कोई नहीं रोकेगा… अब मुझे भी रात में दो बजे उठाकर खेलने के लिए नहीं भौंकेगा, न ही कोई सुबह-सुबह बेड की चादर खींचकर वाक पर चलने की जिद करेगा ….अब बिस्तर से नीचे उतरने पर मुझे मेरी चप्पलें अपनी जगह मिलेंगी , अब दोस्तों के आने पर उनकी चप्पलें काटे जाने के डर से उठाकर रैक पर नहीं  रखनी  पड़ेंगी … अब छत की टंकी से गिरने  वाले पानी में भीगकर कोई अपने नन्हे-नन्हे पंजों से कमरे की फर्श पर निशान  नहीं बनाएगा …मेरा घर साफ-सुथरा रहेगा … मेरे झाडू लगाने पर उसे खींचकर कोई नहीं खेलेगा और न ही कोई पोछा लेकर भागेगा … मेरे बाथरूम में जाने पर दरवाजे पर पंजे मारकर उसे खोलने की कोशिश नहीं करेगा और न ही बाहर निकलने पर पैरों से लिपट जाएगा … कोई ज़बरदस्ती बिस्तर पर बैठाने की जिद नहीं करेगा … दोनों पंजे से पकड़कर कोई मुँह नहीं चाटेगा…अब मुझे बाहर जाने से पहले उसकी चिंता नहीं करनी पड़ेगी… और न लौटने की कोई उत्सुकता होगी .

उसका प्रिय काम चप्पल काटना (मेरी दो जोड़ी चप्पलें और मेरी दो सहेलियों की एक-एक जोड़ी चप्पलें काट दीं )

… अब सब कुछ पहले जैसा है…कोई हलचल नहीं … शांत, स्थिर, खामोश …न हँसने का कोई बहाना , न गुस्सा होने की कोई वजह … मैं अब अकेली हूँ पहले की तरह … पता नहीं मेरे साथ ऐसा क्यों होता है कि मैं जिसे बहुत चाहती हूँ, वो मुझसे दूर हो जाता है …अब तो मुझे डर लगने लगा है किसी से भी प्यार करने से या दोस्ती करने से …मैं उसे बहुत चाहती थी …बहुत ज्यादा. मेरी कली कुछ ही दिनों में मेरी ज़िंदगी का हिस्सा बन गयी थी …

उसने मेरी ज़िंदगी को खुशियों से भर दिया था कुछ दिनों के लिए और जाते-जाते उन्हें वापस ले गयी…जाने कब तक के लिए … अब वो इस दुनिया में नहीं है…वो चली गयी , किसी दूसरी दुनिया में , लेकिन मुझे मालूम है, वो जहाँ भी होगी …कोई न कोई शैतानी कर रही होगी …उसने वहाँ भी सबको तंग कर दिया होगा …

( बेड पर चढ़ने के लिए झगड़ा)