Monthly Archives: सितम्बर 2010

किस्सा नखलऊवा का…

नखलऊवा की कहानी में मैंने अपनी ओर से कोई मिलावट नहीं की है. ये ऐसे ही मिली थी मुझे मय नमक-मिर्च और बैसवारे के आमों से बने अमचूर पड़े अचार की तरह, चटपटी और जायकेदार. इसका महत्त्व इस बात में … Continue reading

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छुअन के चार पड़ाव

पहला पड़ाव मेरा जन्मदिन. हम दिन भर घूमे थे. शाम को हॉस्टल के गेट पर खड़े होकर बातें कर रहे थे. मेरा मन नहीं हो रहा था कि तुम्हें छोड़कर अंदर जाऊँ. शाम का धुँधलका, गुलाबी ठण्ड. तभी हल्की हवा … Continue reading

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उलझन-उलझन ज़िंदगी …

उलझन-उलझन ज़िंदगी… सुलझती ही नहीं… सुलझाने के चक्कर में हम और भी उलझते जाते हैं…एक धागा सुलझाते हैं कि कोई दूसरा उलझ जाता है. कभी हांफते, कभी थक जाते … हम सभी अपनी उलझनों को सुलझा लेना चाहते हैं, पर … Continue reading

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मौत की खामोशी की धुन

अन्तर्जाल की दुनिया… एक आभासी संसार. किसी-किसी के लिये दुनिया से भागने की सबसे अच्छी जगह है ये…पर खुद से भागना हो तो? कोई जगह ही नहीं है, आदमी खुद से भाग ही नहीं सकता, कहीं भी नहीं, कभी भी … Continue reading

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