Monthly Archives: अगस्त 2011

छूटा हुआ कुछ

पिछले कुछ दिनों से मुझे मेरा घर बहुत याद आ रहा है. बाऊ के रहते डेढ़-दो महीने भी जिससे दूर नहीं रह पाती थी, आज उसे छूटे हुए पाँच साल से ज्यादा हो रहे हैं. कितना सोचा कि अब उस घर में लौटकर कभी नहीं जाऊँगी. पर क्या करूँ? इतनी बड़ी दुनिया में उस घर के सिवा और कहीं कोई ठिकाना भी तो नहीं.

कौन कहता है कि बिना घरवालों के घर, घर नहीं मकान होता है. मुझे लगता है कि घर की भी आत्मा होती है, ऐसा लगता है कि वो भी इस समय बहुत अकेला है और मुझे पुकार रहा है. कितना कुछ तो छूटा हुआ है मेरा उस घर में. उसी घर में हमने पहली बार महसूस किया कि अपना घर कैसा होता है? इससे पहले की ज़िंदगी तो हमने रेलवे क्वार्टरों में बिताई थी. उस घर में हम तीनों-भाई बहनों की हँसी छूटी हुयी है. दीदी की शादी के बाद अकेले अपने कमरे में बहाए हुए मेरे आँसू छूटे हुए हैं, हज़ारों ख्याल, सैकड़ों विचार जो दिमाग में उठे और कागज़ पर नहीं उतरे, उस घर के किसी कोने में ही छूट गए हैं. और इन सबसे भी बढ़कर उस घर में बाऊ की आत्मा बसी हुयी है, जिसने चाहे शरीर के.जी.एम्.सी. के ट्रामा सेंटर में छोड़ा हो, पर घूम-फिरकर उसी घर में आ गयी होगी, जिसे बाऊ ने अपनी तैंतीस साल की सर्विस से रिटायरमेंट के बाद ग्रेच्युटी और फंड के पैसों से बनवाया था. कौन जाने बाऊ की आत्मा ही खींच रही हो मुझे वहाँ? उन्हें मालूम था कि तीनों भाई-बहनों में मुझे ही सबसे ज्यादा उस घर से लगाव है.

हाँ, मुझे उस घर से बेहद लगाव है क्योंकि मेरा कोई और घर नहीं है, क्योंकि वो घर मेरे पिताजी की आकांक्षाओं का मूर्त रूप है, उस घर के नक़्शे से लेकर आतंरिक सज्जा तक में सबसे ज्यादा हाथ मेरा ही था और वहाँ मैंने अपनी ज़िंदगी के सबसे बेहतरीन और सबसे अवसाद भरे दिन बिताए हैं. दीदी की शादी के बाद मैं बहुत अकेली हो गयी थी और तब मुझे वहीं पनाह मिलती थी, अपने उस कमरे में, जिसकी खिड़की से दूर-दूर तक फैले धान के खेत दिखते थे, बारिश में नाचते मोर दिखते थे और ठंडी-ठंडी हवा आकर मेरे गालों को सहलाकर मानो सांत्वना देती थी.

मेरे लिए वो घर ही नहीं उसके आस-पास के पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सभी मेरे अस्तित्व का हिस्सा थे. घर के अहाते में लगे सागौन पर बया घोंसले बनाया करती थी और बँसवारी में महोख और गौरय्या अपना ठिकाना बनाये हुए थे. बरामदे में लगी बोगनबेलिया और मालती के बेलों को जब बाऊ छाँटते थे, तो मुझसे बर्दाश्त नहीं होता था. मुझे लगता था कि उन्हें दर्द होता है. दक्खिन ओर की बँसवारी भी मैंने लड़-झगड़कर काटने से रोकी थी. बाऊ उसे काटना चाहते थे क्योंकि वहाँ एक धामिन ने अपना घर बना रखा था. पर मुझे ज्यादा चिंता उस पर बसने वाले पंछियों की थी. बाऊ ने सामने की ओर दुआर पर तरह-तरह के आम के पेड़ लगाए थे. जाने कहाँ से आम्रपाली ढूँढकर लाये थे, जिसमें बाऊ के जाने के साल खूब फल लगे थे और बाऊ रोज सुबह उठकर उसके फलों को गिनते थे कि कहीं चाचा की बदमाश पोती ने कुछ टिकोरे तोड़ तो नहीं लिए. अब तो वो पेड़ खूब बड़ा हो गया होगा.

मुझे आज भी याद है कि काँच की एक बोतल में लगाया मनीप्लांट टाँड़ पर से बढ़कर रोशनदान के पास पहुँच जाता था और मैं बार-बार उसे खींचकर नीचे कर देती थी. ऐसा लगता था मानो वो अपनी बाहें फैलाकर रोशनी को अपने अंदर भर लेना चाहता हो. मुझे लगा उसे खुली हवा में साँस लेना है. मैंने उस पौधे को बोतल से निकालकर मिट्टी में लगा दिया और वो थोड़ा बड़ा हुआ तो खिड़की के रास्ते अंदर कमरे की ओर बढ़ने लगा. बिलकुल कुछ ऐसे ही, मैं भी घर लौटना चाहती हूँ.

इस मोड़ से जाते हैं …

बहुत-बहुत मुश्किल होता है अपने ही फैलाए हुए जाल से बाहर निकलना. पहले तो हम चीज़ों को सीरियसली लेते ही नहीं, हर काम पेंडिंग में डालते चलते हैं और जब यही पेंडिंग बातें, मसले, फैसले आपस में उलझ जाते हैं, तो उन्हें सुलझाना मुश्किल से मुश्किलतर होता जाता है. कुल मिलाकर मुझे लगता है कि हिसाबी लोग अपनी ज़िंदगी में सबसे ज्यादा सफल होते हैं, हाँ खुश रहने की कोई गारंटी नहीं है क्योंकि खुशी की परिभाषा सबके लिए अलग-अलग होती है. हिसाबी लोग अपना हर काम एक निश्चित कायदे से, निश्चित समय पर निपटाते जाते हैं. उनके यहाँ चीज़ों का ढेर नहीं लगता. हर बात की, काम की एक निश्चित जगह होती है- पढ़ाई, नौकरी, शादी, फिर बच्चे…

हर उम्र की एक तासीर हुआ करती है. मेरे एक टीचर अक्सर एक कहावत दोहराते थे कि “तीस की उम्र तक जो मार्क्सवादी ना हो, उसके पास दिल नहीं होता और तीस के बाद भी जो मार्क्सवादी बना रहता है, उसके पास दिमाग नहीं होता.” सच वो दिल वाली उम्र भी क्या उम्र होती है. ग्यारह- बारह से लेकर सत्रह-अठारह तक तो अगला अपने शरीर को लेकर ही परेशान रहता है. दिल-दिमाग-शरीर का संतुलन ही गड़बड़ाया रहता है. सोचो, … अपने ही शरीर पर कंट्रोल ना हो तो. पर उसके बाद मानो दिल और शरीर ठीक-ठाक होकर दिमाग को परे धकेल देते हैं. तब शुरू होती है रूमानियत भरी एक ज़िंदगी. दुनिया का कोई ऐसा असंभव काम नहीं, जो उस उम्र में संभव ना लगे. सब तोड़ डालेंगे, फोड़ डालेंगे, दुनिया को इधर से उधर कर देंगे, पर काम तो हम अपना करके ही रहेंगे.

आज उम्र के इस पड़ाव पर आकर ज़िंदगी मानो ठिठक सी गयी है. क्या हमने जो सपनों के महल बनाए थे, वो सच में  थे या सिर्फ़ … क्या प्यार नाम की कोई चीज़ होती है दुनिया में? या ये सब सिर्फ़ ‘हार्मोन्स’ का ‘केमिकल इम्बैलेंस’ है? अगर नहीं है, तो उन दिनों ये इतना सच्चा कैसे लगता था? आखिर कोई तो चीज़ होगी परीलोक की दुनिया, जो सपनों में ही सही, कहीं तो सच्ची होगी. आखिर प्यार कुछ तो होता ही होगा… ईश्वर की तरह- कि जो मानता है, उसके लिए है और जो नहीं मानता, उसके लिए नहीं. पर ये ‘जो’ तो एक ही है ना. बस उम्र का फर्क है. यही दिल जो पहले प्यार के नाम पर मर मिटने को तैयार था, अब उसके अस्तित्व पर ही संदेह कर रहा है.

अब लगता है कि क्या क्रान्ति सच में संभव है? अगर नहीं तो हम क्यों इसके लिए अपना प्यार, अपना कैरियर, सुख-सुविधा की चीज़ें सब छोड़ने को तैयार थे? क्यों सुबह से शाम इधर-उधर घूम-घूमकर पोस्टर चिपकाया करते थे? तेज लू में भी धरना-आन्दोलन पर उतर आते थे? कड़ी धूप में भी जुलूस में निकल पड़ते थे. अब ये धूप इतना काटती क्यों है? वो सारी बातें अब फालतू क्यों लगती हैं? हम सब इतने समझदार क्यों हो गए?

सब लोग कहते हैं कि ‘तुम्हारे अंदर इतनी ऊर्जा है, इतना पोटेंशियल है. तुम चाहो तो कुछ भी कर सकती हो, पर तुम अपनी सारी ऊर्जा को ऐसी जगह पर झोंके जा रही हो, जहां ब्लैकहोल की तरह चीज़ें जाकर वापस नहीं आतीं.’ दोस्त हैं, मेरा भला चाहते हैं तो मुझे ‘रैशनल’ होने की सलाह देते हैं. पर मैं नहीं हो पा रही हूँ. मुझे पहले ही मालूम था कि मैं एक ऐसी राह पर चल पड़ी  हूँ, जहां हर कदम पर दोराहा आ जाएगा और मेरी चलने की गति धीमी हो जायेगी. मैं थोड़ी देर तो रुककर सोचूँगी ही कि अब किस ओर आगे बढूँ? नतीजतन, सब आगे बढ़ते जायेंगे और मैं पीछे छूटती जाऊंगी. ज़िंदगी से भी पीछे. पर, मैं आज भी ‘रैशनल’ नहीं हो पा रही हूँ. बड़ा मुश्किल होता है ये, जब आपमें अपार ऊर्जा हो, क्षमता हो और दिल अक्सर दिमाग पर हावी हो जाता हो. ऊपर बेकार ही ये कहा मैंने कि ‘हम सब क्यों समझदार हो गए हैं?’ कम से कम मैं तो अब भी समझदार नहीं हो सकी हूँ.