बहुत-बहुत मुश्किल होता है अपने ही फैलाए हुए जाल से बाहर निकलना. पहले तो हम चीज़ों को सीरियसली लेते ही नहीं, हर काम पेंडिंग में डालते चलते हैं और जब यही पेंडिंग बातें, मसले, फैसले आपस में उलझ जाते हैं, तो उन्हें सुलझाना मुश्किल से मुश्किलतर होता जाता है. कुल मिलाकर मुझे लगता है कि हिसाबी लोग अपनी ज़िंदगी में सबसे ज्यादा सफल होते हैं, हाँ खुश रहने की कोई गारंटी नहीं है क्योंकि खुशी की परिभाषा सबके लिए अलग-अलग होती है. हिसाबी लोग अपना हर काम एक निश्चित कायदे से, निश्चित समय पर निपटाते जाते हैं. उनके यहाँ चीज़ों का ढेर नहीं लगता. हर बात की, काम की एक निश्चित जगह होती है- पढ़ाई, नौकरी, शादी, फिर बच्चे…
हर उम्र की एक तासीर हुआ करती है. मेरे एक टीचर अक्सर एक कहावत दोहराते थे कि “तीस की
उम्र तक जो मार्क्सवादी ना हो, उसके पास दिल नहीं होता और तीस के बाद भी जो मार्क्सवादी बना रहता है, उसके पास दिमाग नहीं होता.” सच वो दिल वाली उम्र भी क्या उम्र होती है. ग्यारह- बारह से लेकर सत्रह-अठारह तक तो अगला अपने शरीर को लेकर ही परेशान रहता है. दिल-दिमाग-शरीर का संतुलन ही गड़बड़ाया रहता है. सोचो, … अपने ही शरीर पर कंट्रोल ना हो तो. पर उसके बाद मानो दिल और शरीर ठीक-ठाक होकर दिमाग को परे धकेल देते हैं. तब शुरू होती है रूमानियत भरी एक ज़िंदगी. दुनिया का कोई ऐसा असंभव काम नहीं, जो उस उम्र में संभव ना लगे. सब तोड़ डालेंगे, फोड़ डालेंगे, दुनिया को इधर से उधर कर देंगे, पर काम तो हम अपना करके ही रहेंगे.
आज उम्र के इस पड़ाव पर आकर ज़िंदगी मानो ठिठक सी गयी है. क्या हमने जो सपनों के महल बनाए थे, वो सच में थे या सिर्फ़ … क्या प्यार नाम की कोई चीज़ होती है दुनिया में? या ये सब सिर्फ़ ‘हार्मोन्स’ का ‘केमिकल इम्बैलेंस’ है? अगर नहीं है, तो उन दिनों ये इतना सच्चा कैसे लगता था? आखिर कोई तो चीज़ होगी परीलोक की दुनिया, जो सपनों में ही सही, कहीं तो सच्ची होगी. आखिर प्यार कुछ तो होता ही होगा… ईश्वर की तरह- कि जो मानता है, उसके लिए है और जो नहीं मानता, उसके लिए नहीं. पर ये ‘जो’ तो एक ही है ना. बस उम्र का फर्क है. यही दिल जो पहले प्यार के नाम पर मर मिटने को तैयार था, अब उसके अस्तित्व पर ही संदेह कर रहा है.
अब लगता है कि क्या क्रान्ति सच में संभव है? अगर नहीं तो हम क्यों इसके लिए अपना प्यार, अपना कैरियर, सुख-सुविधा की चीज़ें सब छोड़ने को तैयार थे? क्यों सुबह से शाम इधर-उधर घूम-घूमकर पोस्टर चिपकाया करते थे? तेज लू में भी धरना-आन्दोलन पर उतर आते थे? कड़ी धूप में भी जुलूस में निकल पड़ते थे. अब ये धूप इतना काटती क्यों है? वो सारी बातें अब फालतू क्यों लगती हैं? हम सब इतने समझदार क्यों हो गए?
सब लोग कहते हैं कि ‘तुम्हारे अंदर इतनी ऊर्जा है, इतना पोटेंशियल है. तुम चाहो तो कुछ भी कर सकती हो, पर तुम अपनी सारी ऊर्जा को ऐसी जगह पर झोंके जा रही हो, जहां ब्लैकहोल की तरह चीज़ें जाकर वापस नहीं आतीं.’ दोस्त हैं, मेरा भला चाहते हैं तो मुझे ‘रैशनल’ होने की सलाह देते हैं. पर मैं नहीं हो पा रही हूँ. मुझे पहले ही मालूम था कि मैं एक ऐसी राह पर चल पड़ी हूँ, जहां हर कदम पर दोराहा आ जाएगा और मेरी चलने की गति धीमी हो जायेगी. मैं थोड़ी देर तो रुककर सोचूँगी ही कि अब किस ओर आगे बढूँ? नतीजतन, सब आगे बढ़ते जायेंगे और मैं पीछे छूटती जाऊंगी. ज़िंदगी से भी पीछे. पर, मैं आज भी ‘रैशनल’ नहीं हो पा रही हूँ. बड़ा मुश्किल होता है ये, जब आपमें अपार ऊर्जा हो, क्षमता हो और दिल अक्सर दिमाग पर हावी हो जाता हो. ऊपर बेकार ही ये कहा मैंने कि ‘हम सब क्यों समझदार हो गए हैं?’ कम से कम मैं तो अब भी समझदार नहीं हो सकी हूँ.








समझदार होना क्या होता है?
तुम नहीं समझोगे बाबू. मेरे भाई हो ना!
सच में हम वो करना चाहते जो पहले किसी ने ना किया हो, अब तो बनायीं हुयी पगडंडियों पर चलने में भी थकान हो जाती है… हम समझदार हो गए हैं या नहीं पता नहीं…लेकिन थक बहुत जल्दी जाते हैं.. दो पांति याद आ गयी, लिखने वाले का नाम याद नहीं आ रहा..
बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो
चार किताबें पढ़ कर वो भी हम जैसे हो जायेंगे …
और निदा फाजली की ये भी…
देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ
हर वक़्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ
होता है यूँ भी रास्ता खुलता नहीं कहीं
जंगल-सा फैल जाता है खोया हुआ सा कुछ …
sahi hai………pahele to ye samjhna jaroori hai………..samjhdar hona kya hota hai…………
pranam.
“बड़ा मुश्किल होता है ये, जब आपमें अपार ऊर्जा हो, क्षमता हो और दिल अक्सर दिमाग पर हावी हो जाता हो”.
एक दम सही कहा आपने , इंसान अपनी ही भावनाओ से हार जाता है
बहुत समय बाद आपने कुछ लिखा है शायद, इसका कारण भी जैसे इस लिखने में ही आ गया हो। बीच में आया था इस ब्लोग पर पर..!
यह द्वंद्व तो होता ही है, स्वप्न और यथार्थ के द्वंद्व सा! सर्जक इसमें भी सकार खोजता है, जीता है, सृजित करता है।
शुभकामनाएँ!!
तीस की उम्र तक जो मार्क्सवादी ना हो, उसके पास दिल नहीं होता और तीस के बाद भी जो मार्क्सवादी बना रहता है, उसके पास दिमाग नहीं होता.
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ओह, अब पता चला कि हमारे दिल ही नहीं है!
और हमारे दिमाग नहीं है
इश्क, इन्कलाब और जिन्दगी.. यह सचमुच हमारे होने के बीच का ऐसा तिराहा है जहाँ सबकुछ उलझता रहता है.. सबकुछ फिसलता रहता है. इस तिराहे की किसी एक राह पे बढ़ो तो लगे की छूट गयी राहों पे हरियाली कुछ ज्यादा होगी..
पर होता नहीं कुछ ऐसा… सारी राहें एक ही जैसी होतीं.. या तो सब एक ही सी हरी होती हैं या एक सी बंजर, एक सी उदास.
तो बस.. अपनी बड़ी सी आंखे उठाओ. और फिर इस दुनिया को देखो.. कुछ तो बेहतर होगा..
तुम्हारी इन्हीं बातों के तो हम कायल हैं दोस्त.
Ye bhi life ka ek moment hai…..sabke saath hota hai…..Zindgi ruki hui si lagti hai hai …..lekin chalti rahti hai…ham hi nahi samajh paate shyad….ek sa routine zindgi ko monotonous karta hai ….ham us routine se bhagna chahte hain bas…..wo kahte hain na changes are inevitable….changes aate hain, acchey changes……infact unhe aana hi hoga
samajhdaar hona bura nahi hota……haan! samajh ke aage samajhdaari acchhi nahi hoti…..aur bewkoofi mein hi sachcha sukh hai….aur waise bhi ladkiyan kab hoti hain samajhdaar……ye samjhdaar hone ki khushfahmi hain aapko bas
samajhdaari ki baaten karna aur samajhdaar hone me bada fark hai… main bhi nahin ho saki hun
pyaaraa aalekh hai….araadhanaa ji…..
धन्यवाद !
ये सोच के बैठी हो,एक राह तो वो होगी
उस तक जो पहुँचती है,इस मोड़ से जाती है
मैं भी ‘हिसाबी’ लोगो को बड़ी रश्क भरी निगाहों से देखती हूँ….उन्हें कभी कोई ‘रिग्रेट’ नहीं रहता और कितनी अच्छी बात है यह.
पर फिर उनके पास वे ढेर सारे उतार-चढ़ाव वाले अनुभव भी नहीं होते…
किसी ने कहा था ना..
‘बी.ए.हुए …नौकरी की पेंशन लिया और फिर मर गए…”
मेरे पास दिमाग नहीं है.
तभी तो आप मेरे दोस्त हैं.
आप इतने दिन कहाँ थी ? आते ही सभी को समझदार हैं की नहीं की गुत्थी में उलझा दिया . यार मै भी सोचने लगी की सच में समझदार कौन है ? मै तो नहीं हूँ ये बात तो पक्की है क्योंकि १५ साल के बेटे की बातों में उलझ जाती हूँ हमेशा वही सही होता है अपनी बात किसी भी तरह मनवा लेने में तर्क करता है . कैसे समझदार हो कोई फ़ॉर्मूला हो तो बताएं
संध्या जी, मालूम होता तो खुद ही ना हो जाती
प्रश्न ही प्रश्न…और मोह भंग…
और self analysis … यहाँ भी अपने ज़िंदा होने का एहसास तो
है ही… तुमने जो लिखा है, बेहद सहज अनुभव है जीवन के हर उस मोड़ के
जैसा की जिक्र है आलेख में… और कुछ-कुछ है ‘conditioning’ के तहत …
और ‘conditioning’ ही सबकुछ नहीं जिंदगी में, ‘conditioning’ के उस
ओर भी बेहतर जीवन का आश्वासन है…जागरूक चेतना की मालिक हो तुम,
तुम्हें और क्या कहना…पर रैशनल तो हर कोई होता है, भले ही न देख पाए.
फ़िर इल्म्याफ्ता हो तुम, कितने अच्छे ढंग से अपनी बात रख सकती हो, जिसकी
मिसाल है यह आलेख “इस मोड़ से जाते हैं”…अपना सिक्का जमाया है तुमने
इस आलेख से…
शुक्रिया शेख जी,
आपका आना सुखद है.
हम आज तक नहीं समझ पाए समझदारी की परिभाषा……इसलिए अधिकतर मौन रहते हैं कि कहीं पोल न खुल जाए ……..
:)
शान्त बैठकर नित्य सोचिये, आपका साम्य आपको धीरे धीरे दिखता है, नित्य थोड़ा थोड़ा।
बड़ा मुश्किल होता है ये, जब आपमें अपार ऊर्जा हो, क्षमता हो और दिल अक्सर दिमाग पर हावी हो जाता हो
कितना सही है यह
जीवन के पड़ावों पर
बेहतर दुनिया को दिल वालों की बेहद ज़रूरत है !
दिल और दिमाग की उक्ति को पश्चिम बंगाल पर घटा कर सोच रहा हूं और आनंदित हूं.
बस यही कहना है- नीड़ का निर्माण फिर ….फिर! यह मनुष्य जीवन ही बहुत जटिल और दुःख भरा है ….यहाँ आसक्ति का कोई स्थान नहीं है …तटस्थता,निर्विकार भाव से जगत का आनंद जैसे राजा जनक का चरित्रांकन हुआ है -जीवन के लिए श्रेय है -मुझे घोर आश्चर्य है कि एक संस्कृत की अध्येता होकर भी आप लाचारों और असहायों की भाषा बोलती है -मुझे यह पसंद नहीं !
आप क्षमताओं और प्रतिभा से परिपूर्ण व्यक्तित्व हैं -क्लैव्यता से बचिए -नहीं तो काल के बियाबान में वजूद खो जाएगा! बहुत शुभकामनाएं!
आपने तो क्लास ले ली हमारी
मतलब मेरे पास दिल था, और अब दिमाग़ नहीं है
खुद का पोस्टर चिपकाना याद आ गया.
मैं तो अभी इस लेख को समझने की कोशिश ही कर रही हूँ … यानि कि सीधी बात कि समझदार तो नहीं ही हूँ
बड़ी विकट बातें लिख मारीं। हम तो अरविंद मिश्र जी की ही तरह की कुछ बात कहना चाहते हैं। लेकिन वे कह चुके तो अब उसे क्या दोहरायें।
वैसे लोग कहते हैं- सब कुछ लुट जाने के बाद भी भविष्य बचा रहता है।
वैसे लिखा अच्छा है! भौत अच्छा!
समझदार होने का दिखावा तो सब ही करते हैं परन्तु वास्तविकता में वो समझदारी से काफ़ी दूर रहते हैं …. इसलिये नासमझ रहने में ही समझदारी है
जब हम किसी से प्यार करते हैं….
तो तब हम तर्क से सोचना ही नहीं चाहते…
जब तक दोनों दिल से सोचते है, सब ठीक चलता है….
फिर ज़मीनी हकीकतें , कभी कभी दूर कर देती है….
ऐसे मौके पर, हम हकीकत से मुंह मोड लेते हैं…
तर्क से सोचना ही नहीं चाहते….
दिमाग जानता भी है की अब कुछ हो नहीं सकता…
लेकिन दिल मानने को तैयार ही नहीं होता….
सिर्फ वक्त ही समझा पाता है इंसान को …
सिर्फ इतना ही होता है, कि कुछ इंसान जल्दी समझ पाते है…
कुछ का दिल देर से समझता है….
इसे समझदारी समझे, practicality समझें ,
हर इंसान अपने हिसाब से इसे नाम देता है
बिलकुल सही कहा आपने.
आराधना जी आपका प्रस्तुतिकरण बहुत- बहुत अच्छा है सधी हुइ भाषा मेँ आप अपनी बात लिख देती हैँ……दिल और दिमाग एक साथ नहीँ रहते इसलिए तो ज़िन्दगी मे कइ नासमझियाँ हो जाती है और हम नासमझ ही रह जाते है क्योकि “किसी को समझ लेने का /दावा नही करना/ जितना भी समझ लो/ उतना ही उलझ जाते है।” यही रिश्तो मे सच और दुनियादारी को समझने के लिए भी सभी समझदार हो जाएगे तब भी दुनिया बहुत खूबसूरत नहीँ होगी …. जैसे रात न हो तो दिन का क्या महत्व , दुख न हो तो सुख का महत्व न रह जाता …..दुनिया दोनो बातो से चलती है चिंता मत कीजिए बहुत सारे लोग दोनो बिरादरी के मिल जायेगे और दुनिया चलती रहेगी ….सार्गर्भित लेख के लिए ढेर सारी शुभकामनाएँ…..
धन्यवाद!
यह उम्र ही ऐसी है – प्रेम हो हो ही जाता है। लेकिन यह क्षणिक है। अमर प्रेम केवल कहानियों और फिल्मों में होता है।
आपकी पोस्ट पढ़ी आराधना ..
मुझे बहुत करीब सी लगी ,मेरे … पता नहीं .. एक ऐसी भटकन का हिस्सा बन बन जाना अपने आप , वो भी सिर्फ इसीलिए क्योंकि , आप दिल से जीते है और दिमाग के वजूद को नहीं मानते , तब ये सब खरीदे हुए दुःख में शामिल हो जाते है …
लिखना तो बहुत चाहता हूँ इस पोस्ट के बारे में , क्योंकि , जैसे कि कहा है , खुद से जुदा हुआ पा रहा हूँ इसे लेख से……..[ वैसे ये लेख नहीं आपबीती सी है ]
अभी तो आपकी लेखन को सलाम ….
आभार
विजय
कृपया मेरी नयी कविता ” फूल, चाय और बारिश ” को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html
प्रेरणादायी और यथार्थपरक सोच ! इस जीवन में कई बार ऐसा होता है की जिस बात को पहले हम गलत समझते हैं,बाद में वही हमें सही लगती है और पहले जिसे सही समझते हैं बाद में वह ग़लत निकल जाती है ! यह हमारे नज़रिए का असर है या समाज में हो रहे बदलाव की वजह ?
आज पहले ‘जनसत्ता’ में पोस्ट पढ़ी,फिर यहाँ आया !
अपने अनुभब बाँटने का आभार !
धन्यवाद
जब हम छोटे होते है तो हमारा दिल बड़ा और दिमाग छोटा होता है जैसे जैसे उम्र बढ़ती है दिमाग बड़ा और दिल छोटा होने लगता है और काम और रुचियों पर भी यही दिल और दिमाग का अंतर असर करता है | हम जैसे जैसे बड़े होते है हमारी जरूरते बदलने लगती है और उसी के हिसाब से हमारे सोचने का ढंग भी बदलने लगता है | जहा तक बात प्यार की है तो वो भी दुनिया की बाकि चीजो की तरह स्थाई नहीं होता है जब है तब तक उसे आस्तिक मानिये उसके होने पर विश्वास कीजिये किन्तु कभी भी उसे चिर स्थाई मत मानिये एक समय के बाद उसे जाना ही है आप के पास रहेगा पर शायद उसका रूप बिल्कुल बदल चूका होगा |
hum bhi arvind misr ji k vichaaro se sehmat h
ab bhi jaago nai toh duniya se peeche jaoge
मैं तो अभी इस लेख को समझने की कोशिश ही कर रही हूँ … यानि कि सीधी बात कि समझदार तो नहीं ही हूँ
वो मंजिल न मिली न सही किसी और राह चल ,
अभी तुझको थकने की इज़ाजत नहीं है |
सादर