पिछले कुछ दिनों से मुझे मेरा घर बहुत याद आ रहा है. बाऊ के रहते डेढ़-दो महीने भी जिससे दूर नहीं रह पाती थी, आज उसे छूटे हुए पाँच साल से ज्यादा हो रहे हैं. कितना सोचा कि अब उस घर में लौटकर कभी नहीं जाऊँगी. पर क्या करूँ? इतनी बड़ी दुनिया में उस घर के सिवा और कहीं कोई ठिकाना भी तो नहीं.
कौन कहता है कि बिना घरवालों के घर, घर नहीं मकान होता है. मुझे लगता है कि घर की भी आत्मा होती है, ऐसा लगता है कि वो भी इस समय बहुत अकेला है और मुझे पुकार रहा है. कितना कुछ तो छूटा हुआ है मेरा उस घर में. उसी घर में हमने पहली बार महसूस किया कि अपना घर कैसा होता है? इससे पहले की ज़िंदगी तो हमने रेलवे क्वार्टरों में बिताई थी. उस घर में हम तीनों-भाई बहनों की हँसी छूटी हुयी है. दीदी की शादी के बाद अकेले अपने कमरे में बहाए हुए मेरे आँसू छूटे हुए हैं, हज़ारों ख्याल, सैकड़ों विचार जो दिमाग में उठे और कागज़ पर नहीं उतरे, उस घर के किसी कोने में ही छूट गए हैं. और इन सबसे भी बढ़कर उस घर में बाऊ की आत्मा बसी हुयी है, जिसने चाहे शरीर के.जी.एम्.सी. के ट्रामा सेंटर में छोड़ा हो, पर घूम-फिरकर उसी घर में आ गयी होगी, जिसे बाऊ ने अपनी तैंतीस साल की सर्विस से रिटायरमेंट के बाद ग्रेच्युटी और फंड के पैसों से बनवाया था. कौन जाने बाऊ की आत्मा ही खींच रही हो मुझे वहाँ? उन्हें मालूम था कि तीनों भाई-बहनों में मुझे ही सबसे ज्यादा उस घर से लगाव है.
हाँ, मुझे उस घर से बेहद लगाव है क्योंकि मेरा कोई और घर नहीं है, क्योंकि वो घर मेरे पिताजी की आकांक्षाओं का मूर्त रूप है, उस घर के नक़्शे से लेकर आतंरिक सज्जा तक में सबसे ज्यादा हाथ मेरा ही था और वहाँ मैंने अपनी ज़िंदगी के सबसे बेहतरीन और सबसे अवसाद भरे दिन बिताए हैं. दीदी की शादी के बाद मैं बहुत अकेली हो गयी थी और तब मुझे वहीं पनाह मिलती थी, अपने उस कमरे में, जिसकी खिड़की से दूर-दूर तक फैले धान के खेत दिखते थे, बारिश में नाचते मोर दिखते थे और ठंडी-ठंडी हवा आकर मेरे गालों को सहलाकर मानो सांत्वना देती थी.
मेरे लिए वो घर ही नहीं उसके आस-पास के पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सभी मेरे अस्तित्व का हिस्सा थे. घर के अहाते में लगे सागौन पर बया घोंसले बनाया करती थी और बँसवारी में महोख और गौरय्या अपना ठिकाना बनाये हुए थे. बरामदे में लगी बोगनबेलिया और मालती के बेलों को जब बाऊ छाँटते थे, तो मुझसे बर्दाश्त नहीं होता था. मुझे लगता था कि उन्हें दर्द होता है. दक्खिन ओर की बँसवारी भी मैंने लड़-झगड़कर काटने से रोकी थी. बाऊ उसे काटना चाहते थे क्योंकि वहाँ एक धामिन ने अपना घर बना रखा था. पर मुझे ज्यादा चिंता उस पर बसने वाले पंछियों की थी. बाऊ ने सामने की ओर दुआर पर तरह-तरह के आम के पेड़ लगाए थे. जाने कहाँ से आम्रपाली ढूँढकर लाये थे, जिसमें बाऊ के जाने के साल खूब फल लगे थे और बाऊ रोज सुबह उठकर उसके फलों को गिनते थे कि कहीं चाचा की बदमाश पोती ने कुछ टिकोरे तोड़ तो नहीं लिए. अब तो वो पेड़ खूब बड़ा हो गया होगा.
मुझे आज भी याद है कि काँच की एक बोतल में लगाया मनीप्लांट टाँड़ पर से बढ़कर रोशनदान के पास पहुँच जाता था और मैं बार-बार उसे खींचकर नीचे कर देती थी. ऐसा लगता था मानो वो अपनी बाहें फैलाकर रोशनी को अपने अंदर भर लेना चाहता हो. मुझे लगा उसे खुली हवा में साँस लेना है. मैंने उस पौधे को बोतल से निकालकर मिट्टी में लगा दिया और वो थोड़ा बड़ा हुआ तो खिड़की के रास्ते अंदर कमरे की ओर बढ़ने लगा. बिलकुल कुछ ऐसे ही, मैं भी घर लौटना चाहती हूँ.











तुम्हारा घर कितना पुराना है आराधना ?
कुछ भीगा-भीगा सा जो सूखता भी जा रहा है और कोंपल-कोंपल हरिया भी रहा है…उदास मुस्कराहट जैसा…लेकिन ये है कि रोशनी और छाँह…दोनों ही अच्छी लग रही हैं – एक साथ।
लगा रहा है जैसे किसी ने मेरे दिल की बात लिख दी मै भी अपने घर से काफी दूर हूं | एक बार अपने दीदी के दिल की बात भी पूछियेगा उनके लिए आज भी घर का मतलब वही घर होगा जिसका आप ने जिक्र किया है अपने अनुभव से बता रही हूं | उसके जाने के बाद जितना तनहा आप रही वो तनहाई उन्हें भी उतनी ही महसूस हुई होगी | घर तो वही होता है जहा हम अपने भाई बहनों के साथ रहे |
भीगी भीगी सी पोस्ट , मन को भीतर तक छू गयी !
घरों में प्राण बसते हैं, न जाने कितना कुछ देखा होता है उन्होनें घटते हुये।
ये घर बड़ा हसींन है-हमारी चाहतों का घर…
अभी-अभी तीन रोज़ पर ही दो मनी-प्लांट्स ख़रीद कर लाया था…
बारिश भरूच में कई दिनों से जारी है…अभी भी बेशुमार घने घनघोर बादल शहर पर झुक आए हैं, उतर आए हैं… भरुच, हमारी सोसईटी और घर-बाहर इतना घना अंधेरा है की घर में लाइट जला कर काम चला रहा है…आकाश में बादलों की गरज और बाहर बूंदाबांदी चालू है.
फ़िर भी मैंने नर्सरी से लाए मनी-प्लांट्स के गमले बदले. शेड में रखी नई सूखी भुरभुरी मिट्टी नए बड़े गमलों में डाली और मनी-प्लांटस के असंख्य रूटस को विस्तार दिया और उन्हें टप-टप बरसते बारिश में बाहर खुले में रख दिए…
घर में आकर तुम्हारा आलेख पढ़ने बैठा, जिसमें मनी-प्लांट्स का भावनात्मक ज़िक्र है.
बिलकुल सही कहा…घर की भी आत्मा होती है..और वो भी बुलाती रहती है.
मन भिगा गयी ये पोस्ट.
ये हँसती – रोती – गाती यादें ही घर के होने का एहसास बनाये रखती हैं……
स्वीट होम -बाकी क्या कहूं -हां निगेटिविटी से बचिए -अन्ना की जन सभा में गयीं या नहीं? प्रखर बौद्धिकता आत्मघाती है
@ छूटा हुआ कुछ ,
आपकी तर्ज़ पर अपने 21 साल हो लिये और टुकड़ा टुकड़ा भी गिनू तो 36 .
अरे भई…घर लौटना ही है तो तुरंत लौट जाइए…इतना भावुक होएंगी…तो या तो लौट ही नहीं पाएंगी…या लौटने पर झटका खाएंगी…अरे ये भी नही है…अरे ये भी ना रहा…
बेहतर…
मुझे आपकी यह भावुकता बहुत अच्छी लगती है !
आज फ़िर से यह पोस्ट पढ़ी! इसे पढ़कर स्व.सुमन सरीन की कवितायें याद आ गयीं। एक यहां दे रहा हूं:
नंगे पांव सघन अमराई
बूँदा-बांदी वाले दिन
रिबन लगाने,उड़ने-फिरने
झिलमिल सपनों वाले दिन।
अब बारिश में छत पर
भीगा-भागी जैसे कथा हुई
पाहुन बन बैठे पोखर में
पाँव भिगोने वाले दिन।
बाकी पढ़ने का मन करे तो इस पोस्ट पर हैं !
ये कविता पूरी पढ़ी. सच में जिसका बचपन छोटे शहरों या गाँवों में बीतता है, प्रकृति के बीच, ताउम्र वो साथ नहीं छूटता. हम सभी के साथ एक बचपन रहता है मन के किसी कोने में.
sach main ghar hota hi hain aisa…ki angan chot jaata hain….par ghar nahi chut ta…..apne ghar se kai hazaar koso dor rah rahi main….ghar ko bahut yaad karti hoon…aur phir aap jaisa ghar ka varnan pad …ek baar phir ghar ko jee jaati hoon…dhanywaad…ek baar phir ghar ki purani galiyon main le jaane ke liye