सुनहरी धूप

मुझे नहीं पता कि मैं कैसे उससे इतनी बातें कह गयी. माना कि मेरा बहुत अच्छा दोस्त है, पर मैं जल्दी किसी के आगे भावुक नहीं होती. बहुत दुखी होती हूँ, तो भी नहीं. मैं कहती ज़रूर हूँ अपनी बातें, पर सामान्य होकर. फिर क्या हुआ? …कभी-कभी हो जाता है. अक्सर भावुक होकर इंसान अपना आपा खो बैठता है…पर मुझे ठीक-ठीक याद नहीं कि मैंने कहा क्या था?

शायद ये कि ‘मेरे होने ना होने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता. ना मेरे ऊपर किसी की जिम्मेदारी है और ना मैं किसी की जिम्मेदारी हूँ. तो अगर कल को मैं न होऊं, मतलब मर जाऊँ, तो क्या फर्क पड़ता है किसी को? किसी को भी.’ मैं एक सांस में बोलती गयी और वो एकटक मुझे देखता रहा. शायद ये कि क्या ये वही लड़की है, जो बड़ी-बड़ी परेशानियों से नहीं डरती. तो आज इसको क्या हो गया? फिर वो कुछ सोचने लगा. हो सकता है कि ये सोच रहा हो कि सभी कभी न कभी कमज़ोर हो जाते हैं, टूट जाने की हद तक. उसने कुछ कहना चाहा, पर उठकर चला गया.

ठीक उसके जाने के बाद मुझे लगा कि मैंने कुछ गलत कर दिया. मुझे इतना कमज़ोर नहीं होना चाहिए था. हाँ, मेरे अन्दर ये खास बात है कि मुझे अपनी गलती बहुत जल्दी पता चल जाती है और उसे स्वीकार करके मैं जल्द से जल्द सुधार कर लेती हू, कुछ भी बिगड़कर न सुधरने से बहुत पहले. लेकिन आज ये मौका मेरे हाथ से जा चुका था. वो चला गया था और उसने वो सबकुछ सुना था जो मैंने अपनी बेवकूफी में उसके सामने बक दिया था. उफ़, कितनी बड़ी गलती की थी मैंने. अपने करीबी दोस्तों से भी अपनी परेशानियां जल्दी ना कहने वाली मैं ये क्या कर गयी और क्यों ?

उसी समय मेरे पास उसका मेसेज आया. ‘आपने पूछा था ना कि आपके जाने से किसको फर्क पड़ता है, तो सुन लीजिए ‘दुनिया को फर्क पड़ता है’ आप इतनी स्वार्थी कैसे हो गयीं कि ये भूल जाएँ कि आप सबसे अलग हैं. कुछ लोग सिर्फ अपने लिए नहीं होते’ और मैं बहुत देर तक उस मेसेज को बार-बार पढ़ती रही. मेरे आँखों में आंसू ज़रूर थे, पर होठों पर मुस्कान भी थी. कोई ऐसा, जो मुझे सिर्फ दो सालों से जानता है, मेरे ऊपर इतना विश्वास कर सकता है, तो मैं आत्मविश्वास कैसे खो सकती हूँ? मैं खुद उससे कई बार ये बात कह चुकी हूँ कि अपने लिए सभी जीते हैं, पर मेरा प्रण है कि मैं दूसरों के लिए कुछ करूँ. उसे ये बात याद रही, तो मुझे भूल कैसे गयी?

नहीं, मुझे भी नहीं भूली थी वो बात. बस कहीं से कुछ बादल आ गए थे. थोड़ी धुंध छा गयी थी. पर ये धुंध हट चुकी थी, सुनहरी धूप निकल आयी और सब कुछ साफ था. आप कैसे टूट सकते हैं, कैसे कमज़ोर हो सकते हैं, जब कोई ऐसा दोस्त है आपके पास, जो आपमें इतना विश्वास करता हो? आपसे भी ज्यादा.

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About aradhana

a research fellow of ICSSR at JNU.
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23 Responses to सुनहरी धूप

  1. सुनहरी धूप शाम को निकली। खिली। बहुत प्यारी लग रही है धूप! पोस्ट च!

  2. सुकून देने वाली, बड़ी प्यारी पोस्ट है।..वाह!

  3. यह आधार बहुत व्यापक होता है..

  4. सोना कैसी है ? उसकी आँखों में इंसानों से अधिक प्यार मिलेगा !
    शुभकामनायें !

  5. हम कभी कभी इतना टूट जाते हैं कि ये समझ ही नहीं पाते कि कोई तो है जिसके लिए हम खुद बहुत ज़रूरी होते हैं | फिर जब वो शख्स एक दिन चला जाता है तो पता चलता है कि हमने क्या खो दिया !!!

    बढ़िया लगी पोस्ट !!!!

  6. सुनहरी धूप खिली रहे, बनी रहे.. :)

  7. कभी कभी हम अपनी वास्तविक शक्ति को भुला बैठते हैं,तभी हमारा कोई अपना हमें झिंझोड़कर अहसास दिला देता है और हमें फ़िर से अपने पर भरोसा आ जाता है !

  8. अकसर हमें अपने ही नैराश्य से उबारते हैं,हमें फ़िर से ऊर्जित करते हैं !

  9. यह तो बड़ी अच्छी बात हुयी!

  10. rasprabha says:

    कल ही अपनी दीदी से आपका ज़िक्र कर रही थी…और कहा,बेपरवाह हवा सी दिखती है,पर दिखने और होने में बहुत फर्क है…पर चलना है तो भय भी निडरता में बदल जाता है. बाहरी एहसास भी पूर्णता की चाल चलते हैं, सच अपने अन्दर का कभी तो शांत नहीं होता …पर जो जीता वही सिकंदर …तो एक मुस्कान हो जाए :)

  11. shikha varshney says:

    होता है कभी कभी ..काले बदल छा जाते हैं पर फिर धूप खिली न ..खिली रहे बस यूँ ही :)

  12. मैं तो अक्सर आपकी बातें करता हूँ अपने एक ख़ास दोस्त से… आपके आँगन में हमेशा धूप खिलती रहेगी… और अगर कभी शाम हो जाए तो एक दीया लेकर मैं भी खड़ा मिलूंगा.. खुश रहिये हमेशा.. मुस्कान अच्छी लगती है आपके चेहरे पर….. :)
    ************

    प्यार एक सफ़र है, और सफ़र चलता रहता है…

  13. Punit Omar says:

    सभी कभी न कभी कमज़ोर हो जाते हैं, टूट जाने की हद तक.. पर भावुक होना या अपने आप को व्यक्त करना इतना अपराधबोध क्यों लेकर आया…

    • aradhana says:

      जो आमतौर पर अपने दुःख और समस्यायों को किसी दूसरे से नहीं कहता, वो यदि भावावेश वश ऐसा करता है, तो कुछ पल के लिए उसके मन में अपराध बोध होता है. खासकर जब उसने किसी ऐसे के सामने में खुद को व्यक्त किया हो, जिसे वह बहुत दिनों से या बहुत अच्छी तरह से ना जानता हो. पर यदि सामने वाला उसे समझता है, तो अपराधबोध समाप्त हो जाता है.

  14. aradhana says:

    रश्मि रविजा दी की ईमेल से प्राप्त टिप्पणी-
    अच्छा होता है…यूँ कभी कभी कमजोर पड़ जाना..
    तभी तो पता चलता है..आस-पास हैं लोग,जिन्हें अहमियत पता है.

  15. rohit says:

    इतना प्यार दोस्त हर किसी को नहीं मिलता…दोस्त हमेशा दोस्त होता है उसकी कद्र कीजिए..आपके मन में सुनहरी धूप खिली रहे यही कामना करता हूं…

  16. अभी कुछ ही दिनों से आपका ब्लॉग पढना शुरू किया ,मैं और शेखर अक्सर आपकी पोस्ट के बारे में बात करते हैं ,यहाँ कई लोग एसे हैं जो आपको पड़ते हुए आपसे जुड़ गए हैं ….और हर किसी को आपकी उपस्थिति और अनुपस्थिति से फर्क पड़ता है ….आपको पढना अच्छा लगता है एसे ही अपनी बातें शेयर करते रहिये और खुश रहिये…..:-)

  17. अभी कुछ ही दिनों से आपका ब्लॉग पढना शुरू किया ,मैं और शेखर अक्सर आपकी पोस्ट के बारे में बात करते हैं ,
    यहाँ कई लोग एसे हैं जो आपको पढ़ते हुए आपसे जुड़ गए हैं ….और हर किसी को आपकी उपस्थिति और अनुपस्थिति से फर्क पड़ता है ….आपको पढना अच्छा लगता है एसे ही अपनी बातें शेयर करते रहिये और खुश रहिये….. :-)

  18. सुनहरी धूप यूं ही खिली रहे …

  19. akash says:

    कभी कभी टूटना भी जरूरी होता है , शायद |
    कम-से-कम आपको पता तो चला कि कोई आपकी कद्र करता है |

    सादर

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