आदत

उस घर में सिर्फ एक कमरा था, जिसमें एक रोशनदान था, एक खिड़की और एक ही दरवाजा. खिड़की के उस ओर दूसरी बिल्डिंग की दीवार होने की वजह से उससे उतनी रोशनी नहीं आती थी, जितनी आनी चाहिए. रोशनदान से थोड़ा सा आसमान दिखता था.  उसके साथ ही एक टाँड़ थी, जिस पर पिछले किरायेदार कुछ चीज़ें छोड़कर गये थे.

वो जबसे इस घर में आयी थी, एक अजीब सी बेचैनी घेरे रहती थी उसे. रात में सोते हुए भी बीच-बीच में नींद खुल जाती और उसे महसूस होता कि कोई उसे देख रहा है. हर वक्त  किसी की नज़रें अपने ऊपर चिपके रहने का एहसास होता रहता. कभी-कभी वो बेहद डर जाती थी, दूसरा घर ढूँढने के बारे में सोचती, लेकिन ये घर काफी सस्ता था और दूसरा ढूँढने के लिए न उसके पास पैसे थे और न ही फुर्सत.

एक बार रात के तीन बजे उसकी नींद खुली तो उसे महसूस हुआ कि कमरे में धुंआ फैला हुआ है. वो हडबड़ाकर उठी कि कहीं कुछ जल तो नहीं रहा, लेकिन कुछ नहीं मिला. आखिर उसने अपने मन को यह कहकर समझाया कि नीचे की बालकनी में लड़के सिगरेट पी रहे होंगे. उसने सोने की बहुत कोशिश की, पर नींद नहीं आयी. आखिर उसने एक कप चाय बनायी और पीते हुए एक किताब उठा ली.

दो-तीन दिन बाद उसे रात में पढ़ते हुए किसी की खुसुर-फुसुर सुनायी दी. ‘बगल के घर से आ रही होगी आवाज़’ उसने सोचा. पर धीरे-धीरे आवाज़ बढ़ती गयी और एकदम रसोई से आती सुनायी देने लगी. उसके रोंगटे खड़े हो गए डर के मारे. उसने ध्यान लगाकर सुनना चाहा. कोई और भाषा थी शायद.  उसने रजाई में मुँह छुपा लिया. कुछ देर बाद आवाजें बंद हो गयीं. जब उसने मुँह पर से रजाई हटाकर देखा तो टाँड़ पर एक साया सा नज़र आया. लगा कि कोई उकडूँ बैठा है. अगले ही पल उसे लगा कि बहुत अधिक डर जाने के कारण उसे भ्रम हुआ है. वहाँ कोई भी नहीं है. आखिर उसने अपना ध्यान बँटाने के लिए टी.वी. खोल लिया.

एक दिन दोपहर में उसे सोते हुए  महसूस हुआ कि किसी ने उसकी चोटी खींची. रजाई हटाने पर कोई नहीं था. वो थोड़ी परेशान हो गयी. ‘पहले तो रात में ही ये सब होता था और अब दिन में भी’ उसने सोचा. भूत-प्रेत में उसका बिलकुल विश्वास नहीं था. तो उसे ऐसे अनुभव क्यों हो रहे थे, ये समझ में नहीं आ रहा था. इस नए शहर में उसका कोई दोस्त भी नहीं था और किसी को फोन पर बताकर वो परेशान नहीं करना चाहती थी. उसे इसी कमरे में रहना था, इन्हीं अजीब हालात के साथ. उसने सोचा कि हो सकता है कि नयी जगह के साथ एडजस्टमेंट होने में अभी थोड़ा और समय लगे. उसने इन बातों पर ध्यान न देने का निश्चय किया.

उसके बाद भी अजीब घटनाएँ घटनी बंद नहीं हुईं. कभी उसे किसी चीज़ के जलने की गंध आती, कभी रसोई गैस की, तो कभी किसी के बात करने की आवाज़. पर उसे कोई परेशानी नहीं होती थी. हाँ, कभी-कभार बर्तनों के टूटने पर दुःख ज़रूर होता था. जब कांच के सभी कप और गिलासें टूट गयीं, तो वो स्टील की गिलास ले आयी और उसी में चाय पीना शुरू किया. चीनी-मिट्टी के प्लेट भी उसने दुबारा नहीं खरीदे. उसे आदत हो गयी थी रात में अचानक जल गयी बत्ती या अचानक खुल गए बाथरूम के नल को बंद करने की. बस, उसे कभी भी किसी भी घटना से नुकसान नहीं पहुँचा. ऐसा लगता था कि कोई अपनी उपस्थिति जताना चाहता है.

कोई सहेली या दोस्त आते तो असुविधा ज़रूर होती. उनके सवालों का जवाब उसे झूठ बोलकर देना पड़ता. ‘स्विच खराब है’ ‘नल ढीला है’ ‘नीचे वाले लड़के सिगरेट बहुत पीते हैं’ ‘बगल वाले बातें बहुत करते हैं’ वगैरह-वगैरह…उसने खुद को भी यही समझा लिया था कि ये घर थोड़ा डिस्टर्बिंग है, लेकिन कुल मिलाकर अच्छा है.

उसे इस घर में रहते हुए पूरा एक साल हो चुका था. एक दिन किसी ने कॉलबेल बजाई. उसने दरवाजा खोला तो देखा कि एक लड़का खड़ा है.

“आपको किससे मिलना है?” उसने पूछा.

“जी, दरअसल मैं इस घर में आपसे पहले कुछ दिन रहा था. एक दो फॉर्म में मैंने यहीं का एड्रेस दे दिया था, तो बीच-बीच में लेटर के लिए पूछने आ जाता हूँ.” लड़के ने बताया.

“पर मैंने तो आपको पहले कभी नहीं देखा”

“जी, अक्सर मैं फर्स्ट फ्लोर से ही लौट जाता हूँ. उन्हीं से मैंने कह रखा है कि मेरे नाम का लेटर आये तो वो रख लें. आज कोई नहीं था तो मैं यहाँ आ गया. आप यहाँ कबसे रह रही हैं?”

“एक साल से”

“क्या?” लड़के ने चौंककर पूछा.

“इसमें इतनी चौंकने वाली कौन सी बात है?”

“न…नहीं. ये घर तो…मेरा मतलब है…ये बहुत अजीब है. मैं यहाँ एक महीना नहीं रह पाया.”

“आप भूत-प्रेतों में विश्वास करते हैं?”

“नहीं…लेकिन…फिर भी इतने अजीब इंसिडेंट्स…पता नहीं आपको ऐसा महसूस हुआ या नहीं…जैसे…”

“जैसे धुएँ की गंध, अजीब आवाजें, कुछ साये दिखाई पड़ना”

“ह…हाँ, देखा ना…आपको भी महसूस होता है…प्रापर्टी एजेंट मान ही नहीं रहा था. कह रहा था कि मैं पागल हूँ”

“नहीं, आप पागल नहीं है, लेकिन भूतों से डरते हैं”

“मैं भूतों में बिलकुल विश्वास नहीं करता” लड़के ने खीझकर कहा.

“आप करते हैं और उनसे डरते भी हैं. मैं नहीं डरती. आपका कोई लेटर नहीं आया है. सॉरी” कहकर उसने दरवाजा बंद कर दिया.

अन्दर आकर उसने केतली से एक गिलास में अपने लिए चाय निकाली और दूसरी गिलास में निकालकर मेज के दूसरी ओर रख दिया. फिर उसने इत्मीनान से किताब उठाते हुए मुस्कुराकर रोशनदान की ओर देखा. कमरे में हल्का-हल्का धुँआ फैला हुआ था.

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About aradhana

a research fellow of ICSSR at JNU.
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26 Responses to आदत

  1. aadatan bhoot aaye to uski aadat laga lena accha hai : bahut alag bahut khoob !!

  2. फिर उसने इत्मीनान से किताब उठाते हुए मुस्कुराकर रोशनदान की ओर देखा. कमरे में हल्का-हल्का धुँआ फैला हुआ था…
    अलग अंदाज़ पसंद आया !!!

  3. हम होते तो पक्का चीख मारकर बेहोश हो जाते … पर जानते है इस महंगाई में भूतों के साथ गुज़ारा करना आसान है …. बढ़िया कहानी

  4. अच्‍छी बात यह है कि आप विश्‍वास भी करती हैं, और उनसे डरती भी नहीं है… मस्‍त…

    क्‍यों न एक भूत से दोस्‍ती की जाए… अच्‍छा आइडिया है… :)

  5. Monali Jain says:

    darawana h yaar…aur upar se m saara din gharme akeli hi rehti hu……..kaa soch k likh maari ho :(

  6. पता नहीं आराधना, ये कहानी है या संस्मरण
    अगर कहानी है तो बहुत रोचक है
    संस्मरण है तो इस पर कुछ भी कहना मुश्किल है क्यूंकि ये तुम्हारा भोग हुआ यथार्थ है ,वैसे मनोवैज्ञानिकों के पास इसके अनेक जबाब हैं कि क्यूँकर, मस्तिष्क ऐसा सोचता है, क्यूँ उसे ऐसा महसूस होता है।
    अपने विषय में यही कह सकती हूँ जब नवीं कक्षा में ही मैंने इन आत्माओं को चैलेंज कर दिया था कि अगर आपका अस्तित्व है तो कभी मुझे सामने आकर दिखाओ, अब कब्र से पैर ज्यादा दूर नहीं हैं फिर भी आजतक चैलेंज वैसा ही पडा हुआ है।
    और ऐसा नहीं कि मैं अँधेरे में अकेले में नहीं रही हूँ, पूरे इलाके की बत्ती गुल रहती थी। पापा एक बजे टूर से वापस आते थे, अकेले मैं ही जग रही होती थी। कहते थे छत पर बिस्तर लगा दो। मैं अकेले छत पर जाती थी, काफी देर खड़ी रहती थी। ये ख्याल भी आता था, भूतों को चैलेंज किया है अब वे जरूर सामने आयेंगे, पर आजतक नहीं आये :)

    • aradhana says:

      न दीदी, ये संस्मरण तो नहीं है. हाँ, गाँव वाले घर में अकेले रहते हुए कई बार ऐसे अनुभव हुए हैं, पर डरती मैं भी नहीं.

      • वाह !! बहादुर बहन हो बिलकुल, :) :)
        मुझे भी लगा था ,संस्मरण नहीं है पर टिप्पणियों को देखकर लगा, क्या पता, संस्मरण ही हो।
        वैसे मेरी यहाँ की उच्च शिक्षित सहेलियां भी पूरा विश्वास करती हैं, आत्माओं पर।
        एकाध के पास past life regression therapy का अनुभव भी है और उनका कहना है कि वे घरों में दरवाजे का खुल जाना, किसी साया का होना, उसका सन्देश महसूस करती हैं।
        पर मुझे विश्वास नहीं होता।

  7. Guarav kumar says:

    कहीं भी हम अकेले नहीं होते कोई तो हमारे साथ होता है चाहे वो दिखाई न दे पर साथ तो है……………..

  8. shikha varshney says:

    तो तुम होरर कहानी भी लिखती हो :) .बढ़िया रोचक अंदाज है. और अगर संस्मरण है तो बहुत बहादुर हो तुम :) .

    • aradhana says:

      ये खाली दिमाग की खुराफ़ात है :) सोच रही थी कि सबको बकवास लगेगी ये पोस्ट :)
      हारर फ़िल्में बहुत देखती हूँ मैं, पर आज तक दो-तीन फिल्मों के अलावा किसी से डरी नहीं. ऐसे अनुभव भी हुए हैं, पर ज्यादा नहीं.

  9. बहुत खूब कहानी है, एकदम सच्चाई जैसी :) कथा-लेखन पर ध्यान लगाया जाये :) मेरी साक्षात मृतात्मा से मुलाकात हुई है, कोई माने या न माने. आत्माओं का अस्तित्व वैज्ञानिक नहीं नकार सके, तो हम कैसे नकार देंगे? आज भी ये शोध का विषय है. भूत-प्रेतों पर मेरा एकदम भरोसा नहीं है. दूसरों को भी भरोसा न करने को कहती हूं :)

  10. मज़ा आ गया बिलकुल हिचकॉक वाला एक्सपीरिएंस… मुझे लगा कि कहानी यूं आगे जायेगी:
    /
    ““नहीं, आप पागल नहीं है, लेकिन भूतों से डरते हैं”
    “मैं भूतों में बिलकुल विश्वास नहीं करता” लड़के ने खीझकर कहा.
    “आप करते हैं और उनसे डरते भी हैं. मैं नहीं डरती. और हाँ! आपका कोई लेटर नहीं आया है.”
    तभी अचानक गयी बत्ती आ गयी और कमरे में उजाला भर गया. उस लडके ने मेरे चेहरे की तरफ देखा और उलटे पाँव बदहवास सा भागा.
    आज से पहले शायद उसने बेचेहरा इंसान नहीं देखा होगा शायद!
    /
    बेहतरीन किस्सागोई!! बांधकर रखती है कहानी!!

  11. इतने दुष्टों से भरे विश्व में रहना आ गया है, वह भूत तो बेचारा सीधा साधा लग रहा था..

  12. :) मेरी देखी सर्वश्रेष्ठ भुतहा फिल्म से भी बेहतर!

  13. रोचक …. अंत लाजवाब …. चाय का दूसरा गिलास …. बढ़िया प्रस्तुति

  14. smita says:

    अरे यार मुक्ति आज कल मैं भी अकेली ही रह रही हूँ ……..जी धक् धक् करने लगा ………और इस डी टाइप बंगले में इतने बड़े बड़े कमरे हैं …और करीब ८ बाई १५ का किचेन है …….कम से कम ६ टांड बने हुए हैं …..लगता है सारे दरवाजे और खिड़कियाँ बंद करनी पड़ेंगी …..अब तो नींद नहीं आएगी ……..मैं डरपोक तो नहीं हूँ पर बहादुर भी नहीं हूँ क्या करू बोलो ?????

  15. उम्दा प्रस्तुति…बहुत बहुत बधाई। मेरे पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद।

  16. राजीव शंकर गोहिल says:

    सुंदर कहानी है ..

  17. akash says:

    राज फिल्म में आशुतोष राणा का एक डायलोग था – “अगर आप भगवान पर विश्वास करते हैं तो आपको शैतान पर भी विश्वास करना होगा|”
    भूतों के उपर दिया हुआ सबसे तार्किक तथ्य लगता है मुझे ये , लेकिन आपकी कहानी एक दूसरी दुनिया की सैर कराती है | मेरे नजरिये से ये सिर्फ उनके लिए नहीं है जो भूतों में विश्वास नहीं रखते ये उनके लिए भी है जो विश्वास रखते हैं |
    एक बहुत अच्छे निष्कर्ष पर पहुँचाया है – आदत , शायद कुछ दिनों में ये आदत जरूरत भी बन जाए |

    सादर

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