आराधना चतुर्वेदी ’मुक्ति’
कुछ यादें... कुछ बातें... कुछ अनुभव... कुछ विचार... वादों-विवादों से परे...!
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ढूँढो अपनी पसंद का…
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कल-परसों, उससे भी पहले…
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- कहा जा सकता था, लेकिन…
- मीत के गुण्डा की गुण्डई के किस्से
- क्या किया जाय?
- बैसवारा और आल्हा-सम्राट लल्लू बाजपेयी
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- जंगल जलेबी, स्लेटी रुमाल, नकचढ़ी लड़की और पहाड़ी लड़का
- खेलों से नाता
- नारीवादी स्त्री प्रेम नहीं करती?
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- सरकारी अस्पताल में एक दिन
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- बीते हुए दिन… फिर से नॉस्टेल्जिया
Category Archives: बातें
कहा जा सकता था, लेकिन…
मैंने कई बार सोचा कि इस घटना के बारे में लिखूँ या ना लिखूँ. जब लिख लिया तो इस कश्मकश में पड़ गयी कि इसे ब्लॉग पर पोस्ट करूँ या नहीं. मैं ऐसा इसलिए सोच रही थी कि इसे सार्वजनिक … Continue reading
मीत के गुण्डा की गुण्डई के किस्से
फेसबुक पर मीत ने हमको ‘गुण्डा’ नाम दिया है, जो कि हमारे स्वभाव को पूरी तरह चरितार्थ करता है मीत कौन हैं? इनसे हमारा परिचय करीब साढ़े तीन साल पहले ब्लॉग लिखते-लिखते हुआ था. इनका एक ब्लॉग हुआ करता था … Continue reading
Posted in आस-पड़ोस, बातें
27s टिप्पणियाँ
क्या किया जाय?
कभी-कभी औरतों को सेक्सुअल अब्यूज़ इस तरह से झेलना पड़ता है कि समझ में नहीं आता कि इसे अब्यूज़ मानें या न मानें और अगर मानें तो प्रतिक्रिया किस तरह से व्यक्त करें? क्योंकि किसी बात को लिखने में किसी … Continue reading
बैसवारा और आल्हा-सम्राट लल्लू बाजपेयी
अभी कुछ दिन पहले ‘बैसवारा की शान’ कहे जाने वाले लोकप्रिय आल्हा गायक लल्लू बाजपेयी के देहांत की खबर सुनी तो मन जाने कैसा-कैसा हो गया? शायद पूरे भारत के लोग लल्लू बाजपेयी को न जानते हों, शायद उन्होंने बैसवारा … Continue reading
Posted in बातें
Tagged आल्हा गायक, आल्हा-सम्राट, उन्नाव, बैसवारा, बैसवारा की शान, बैसवारी, लल्लू बाजपेयी
18s टिप्पणियाँ
नारीवादी स्त्री प्रेम नहीं करती?
फेसबुक बड़ी मज़ेदार जगह है. यहाँ गंभीर विमर्श के लिए भले ही अपेक्षित स्थान न हो, लेकिन उसके लिए सामग्री अवश्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। यह पोस्ट फेसबुक पर मेरे एक स्टेटस और उस पर आये एक कमेन्ट से … Continue reading
रिश्तों की उलझनें
कभी-कभी मन इतना उलझ जाता है कि कोई एक सिरा ढूँढे नहीं मिलता। मानवीय सम्बन्ध बहुत जटिल होते हैं। बस दोस्ती का रिश्ता ऐसा होता है, जहाँ सब कुछ सहज ही होता जाता है। इस रिश्ते को बनाये रखने के … Continue reading
सरकारी अस्पताल में एक दिन
अक्सर एक कहावत टाइप की कही जाती है कि दुश्मनों को भी वकील या डॉक्टर के चक्कर ना लगाने पड़ें। और वो भी सरकारी अस्पताल से तो भगवान ही बचाए। फिर भी हम मिडिल क्लास लोगों को कभी न कभी … Continue reading







