Category Archives: यादें

जंगल जलेबी, स्लेटी रुमाल, नकचढ़ी लड़की और पहाड़ी लड़का

बचपन की कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिनका मतलब उस समय समझ में नहीं आता है. जब हम बड़े हो जाते हैं, तब समझ में आता है कि अमुक काम को करने से, किसी विशेष व्यक्ति से मिलने से या … Continue reading

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खेलों से नाता

बचपन से ही मेरी खेल-कूद में रूचि थी और अम्मा की लाख रोक-टोक के बावजूद मैं रेलवे कालोनी के लड़कों के साथ ऊधम मचाती रहती थी. स्कूल में भी खेलों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थी और इनाम भी जीतती थी. … Continue reading

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बीते हुए दिन… फिर से नॉस्टेल्जिया

नॉस्टेल्जिया बड़ी अजीब सी चीज़ होती है। पता नहीं ये एक मानसिक स्थिति है या मानसिक विकार या बीमारी, लेकिन है अजीब। मुझे लगता है कि कुछ लोग प्रवृत्ति से ही अतीतजीवी होते हैं और ये उनकी बीमारी नहीं होती। … Continue reading

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खुरपेंचें, खुराफातें…पीढ़ी दर पीढ़ी

जी, खुरपेंची होना हमारे बैसवारा की सबसे बड़ी विशेषता है. बड़े-बड़े लम्बरदार भी इससे बाज नहीं आते. बचपन से ऐसी खुराफातें देखकर बड़ी होने के बाद भी मैं इतनी सीधी (?) हूँ, इससे सिद्ध होता है कि वातावरण हमेशा ही … Continue reading

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अँगीठी पर भुने भुट्टे और स्टीम इंजन के दिन

बचपन अलग-अलग मौसमों में अलग खुशबुओं और रंगों के साथ याद आता है। डॉ॰ अनुराग के एक अपडेट ने यादों को क्या छेड़ा, परत दर परत यादें उधड़ती गयीं, जिंदगी के पन्ने दर पन्ने पलटते गए। जैसे बातों से बातें निकलती … Continue reading

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बाऊजी की बातें

मेरे बाऊजी बहुत दिलचस्प इंसान थे. चीज़ों को देखने का उनका खुद का नजरिया होता था और वो बड़ा अलग और अनोखा था. किसी भी विषय में मेरी उत्सुकता का उत्तर वे बहुत तार्किक ढंग से देते थे. ऐसे कि … Continue reading

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दिए के जलने से पीछे का अँधेरा और गहरा हो जाता है…

मैं शायद कोई किताब पढ़ रही थी या टी.वी. देख रही थी, नहीं मैं एल्बम देख रही थी, बचपन की फोटो वाली. अधखुली खिड़की से धुंधली सी धूप अंदर आ रही थी. अचानक डोरबेल बजती है. मैं दरवाजा खोलती हूँ, … Continue reading

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