आज मेरे साथ एक ऐसी घटना हुयी, जिसने मुझे कुछ विचलित कर दिया और थोड़ा दहला भी दिया. मैं अक्सर शाम को सोना को लेकर अपने मोहल्ले के पीछे की खाली जगह पर टहलने जाती हूँ. शाम को वहाँ बहुत भीड़ होती है. यहाँ औरतें और वृद्धजन टहलते हुए और बच्चे और युवा खेलते नज़र आते हैं. ये ज़मीन काफी लंबी-चौड़ी है, जिसे ‘धीरपुर विलेज प्रोजेक्ट’ के नाम पर छोड़ा गया है. पिछले दो दिन से मैं शाम को घूमने नहीं गयी, तो सोचा कि आज सोना को रात में घुमा दूँ क्योंकि वो बड़ी तेजी से बड़ी हो रही है और उसके खेलने के लिए मेरा कमरा बहुत छोटा पड़ता है.
तो रात को करीब साढ़े दस बजे मैं टहलने पीछे गयी. इस समय भी यहाँ लोग सपरिवार टहलते हैं, लेकिन सिर्फ़ सड़क पर. सड़क से लगे पार्क और अन्य खाली जगहों पर इक्का-दुक्का लोग ही जाते हैं क्योंकि वहाँ स्ट्रीट लाईट न पहुंचने के कारण अँधेरा रहता है. पर सोना को मिट्टी में खेलना पसंद है, इसलिए मैं मैदान की तरफ चली गयी और सोना की लीश को खोल दिया. अपनी आदत के मुताबिक़ उसने दौड़-भाग करना शुरू कर दिया.
उसको पकड़ने की कोशिश करते-करते मैं सड़क से काफी दूर आ गयी. तभी मैंने देखा कि तीन लोग सड़क से मैदान में उतरकर तेजी से मेरी ओर बढ़ रहे हैं. मैंने सोना को पकड़कर वहाँ से निकलने में ही भलाई समझी. पर सोना कहाँ हाथ आने वाली? उसने सोचा कि मैं खेल रही हूँ और इधर-उधर दौडना शुरू कर दिया. आखिर मैंने सोना को छोड़ दिया और तेजी से तिरछे चलकर सड़क पर पहुँच गयी. पलटकर देखा कि वो लोग सोना से खेल रहे हैं. अब मुझे सोना की चिंता हो गयी क्योंकि लेब्रेडोर सीधे होने के कारण बड़ी जल्दी अपरिचितों से घुलमिल जाते हैं और अक्सर चोरी हो जाते हैं. मैंने जोर से सोना को बुलाया तो वो मेरे पास आ गयी. इसी बीच मैंने देखा कि मैं जिस जगह सोना के साथ खेल रही थी, ठीक वहाँ से कुछ दूरी पर एक कार और एक ऑटो खड़े थे. वैसे ये वहाँ के लिए कोई अटपटी बात नहीं थी क्योंकि खाली जगह होने के कारण आसपास के मोहल्लों से लोग अक्सर कार या ऑटो सीखने आते रहते हैं. लेकिन रात को कोई गाड़ी पहली बार दिखी. मेरा दिल किसी अनहोनी के बारे में सोचकर धक् से रह गया. खैर, मैंने सोना की लीश पकड़ी और अपने आपको संतुलित करते हुए आराम से चलने लगी.
थोड़ी देर बाद मैंने देखा कि उनमें से एक आदमी तेजी से चलते हुए मेरे पास आकर बगल में चलने लगा. इसी बीच मेरे भाई कृष्णा का फोन आ गया और मैं उससे बात करने लगी. उस आदमी ने कुछ कहा. शायद ये कि मेरा कुत्ता बहुत सुन्दर है. मैंने फोन पर बात का बहाना करते हुए उसकी बात को अनसुना करने का नाटक किया. मुझे डर तो नहीं लग रहा था क्योंकि वहाँ बहुत से लोग टहल रहे थे, पर फिर भी मैं सावधान थी. भाई से बात करने के बाद मैंने देखा कि वो कार जो पीछे अँधेरे में खड़ी थी, मेरे बगल में सड़क के दूसरी ओर आकर रुकी. वो आदमी उसमें बैठ गया. वो लोग गाड़ी में से भी सोना को पुचकार रहे थे और मैं ध्यान ना देने का नाटक कर रही थी.
मैं अब भी डरी तो नहीं हूँ, लेकिन अनेक सवाल मेरे दिमाग में उथल-पुथल मचाये हुए हैं. हो सकता है, जो कुछ भी हुआ, उसमें अनहोनी की आशंका मेरा भ्रम रहा हो. हो सकता है कि उन्हें सच में मेरे कुत्ते के साथ खेलना रहा हो. हो सकता है कि वो वहाँ गाड़ी चलाना सीखने ही आये हों और उनका कोई और इरादा ना रहा हो. पर फिर भी कहीं भी कुछ भी हो सकता है. ये बात मुझे ध्यान में रखनी चाहिए. माना कि मेरे मोहल्ले में आज तक इस तरह की घटना नहीं हुयी. माना कि मेरा मोहल्ला इतना सुरक्षित लगता है कि रात में ग्यारह बजे भी मैं दूसरे ब्लाक में कूड़ा फेंकने चली जाती हूँ. मैं अकेली ही कहीं भी आती जाती हूँ, साथ की अपेक्षा नहीं रखती, लेकिन इस एक घटना ने मुझे बहुत सावधान कर दिया है. शायद मैं अति आत्मविश्वासी हो रही थी, और इस घटना ने मेरे आत्मविश्वास को हिलाकर मुझे चेतावनी दे दी.
मैंने निश्चित किया है कि अकेली रात में बाहर घूमने नहीं जाऊँगी. अगर कभी गयी भी तो सड़क पर ही टहलूँगी, पार्क में नहीं. कभी भी सुनसान जगह पर नहीं जाऊँगी. वैसे तो मैं बेफिक्र टहलते हुए भी अगल-बगल का ध्यान रखती हूँ, शायद यह गुण महिलाओं में इनबिल्ट होता है, लेकिन अब से मैं और भी सावधान रहूँगी.
मुझे मालूम है कि मैं ये पोस्ट प्रकाशित करके मुसीबत मोल लेने वाली हूँ क्योंकि मेरे मित्र और शुभचिंतक मुझे अच्छा-ख़ासा लेक्चर पिलायेंगे. पर फिर भी मैंने ये पोस्ट लिखी, इसलिए कि आज बहुत दिनों बाद मुझे एहसास हुआ कि लाख आत्मविश्वासी हूँ, निडर हूँ, बोल्ड हूँ, लेकिन फिर भी मैं एक लड़की हूँ और दिल्ली में रहती हूँ. मुझे अतिरिक्त रूप से सावधान रहना चाहिए.












