Category Archives: गीत

मैं प्यासी

जब घुमड़ घिरी घनघोर घटा

रह-रहके दामिनी चमक उठी,
उपवन में नाच उठे मयूर
सौंधी मिट्टी की महक बिखरी,
बूँदें बरसीं रिमझिम-रिमझिम
सूखी धरती की प्यास बुझी,
पर मैं बिरहन प्यासी ही रही…
… … …
ये प्रकृति का भरा-पूरा प्याला
हर समय छलकता रहता है,
ऋतुओं के आने-जाने का
क्रम निशदिन चलता रहता है,
सारे के सारे तृप्त हुए
प्याले के अमृतरस को पी,
मैं प्यासी थी, प्यासी ही रही…
… … …
वो मिलन अधूरा मिलन रहा
वो रात अधूरी रात रही,
कुछ भी ना, कहा कुछ भी ना सुना
वो बात अधूरी बात रही,
वो मुझसे कुछ कहते शायद
मैं तो सुध-बुध थी खो बैठी,
मैं प्यासी थी, प्यासी ही रही…
… … …
ये कैसी ठंडी आग है जो
तन-मन में जलती रहती है,
ना मुझे समझ में आती है
ना किसी से कहते बनती है,
जब-जब भी बुझाना चाहा है
ये और बढ़ी,मैं और जली,
मैं प्यासी थी, प्यासी ही रही…
… … …
रातों में बंद पलकों से
ये यूँ ही रिसते रहते हैं,
मैं जानना चाहती हूँ लेकिन
जाने आँसू क्या कहते हैं,
इनके यूँ बहते रहने से
मौसम भीगा, मैं भी भीगी,
मैं प्यासी थी, प्यासी ही रही…
… … …
जलने की चाह रहे यूँ ही
ये प्यास, प्यास ही बनी रहे,
उनसे मिलकर ना मिलने की
ये आस, आस ही बनी रहे,
अपने अंतस की पीड़ा को
मन ही मन में, मैं सहती रहूँ,
मैं तो बस यही चाहती हूँ
मैं प्यासी थी, प्यासी ही रहूँ… …

चलो मीठा सा गीत कोई गुनगुनाएं

जाके बीते ज़माने में आज फिर से
चलो बचपन की यादों को बीन लायें,
भूलकर ज़िंदगी की परेशानियाँ,
चलो मीठा सा गीत कोई गुनगुनाएं.
… … … …
चलो पलटें पुरानी किताबों को आज,
बिछड़े यारों की फोटो को फिर से देखें,
बंद हैं घर के बक्से में बरसों से जो,
उन चिठ्ठियों और कार्डों को फिर से देखें,
अपनी बगिया के फूलों को पानी डालें,
छत पे जाकर कबूतर को दाना खिलाएं,
चलो मीठा सा गीत कोई गुनगुनाएं … …
… … … …
दम घुटता रहा, साँस फूलती रही,
पिछले दरवाजे को कब से खोला नहीं,
रात में आँसू बनकर के बहती है जो,
बात दिल में रही, कभी बोला नहीं,
दिल के दरवाजों को आज फिर खोलकर
ताजी हवा के झोकों में झूम जायें,
चलो मीठा सा गीत कोई गुनगुनाएं … …।

(यह रचना मेरे ब्लॉग फ़ेमिनिस्ट पोएम्स पर पिछले वर्ष प्रकाशित की जा चुकी है.)

ये हवा बसंती गाती है…

मेरे मन से उनके मन तक
एक पतली डोर बँधी सी है,
कुछ बात इधर से चलती है
कुछ याद उधर से आती है…
… … …
उनके अन्तस्‌ की व्याकुलता
मैं यहाँ बैठ गुन लेती हूँ,
मेरी पुकार को बिना कहे
वो वहीं बैठ सुन लेते हैं,
वो करते हैं जब याद मुझे
मेरी नींदें उड़ जाती हैं…
… … …
यह नेह-बंध बाँधा जबसे
दो हृदय एक हो गये तभी,
बन गये वो मेरा ही हिस्सा
मैं उनके रंग में रंगी तभी,
यह बंधन रहे सदा यूँ ही
ये हवा बसंती गाती है…

मेरे जीवन में भी काश

मेरे जीवन में भी काश
एक बार आता मधुमास

कामदेव का बाण मुझे भी लग जाता
मुझको भी हो जाती
पिया मिलन की आस
मेरे जीवन में…

रिक्त हृदय का प्याला
भर जाता मधु से
मिट जाती मेरे भी
हृदय के प्रेम की प्यास
मेरे जीवन में…

विरह-अग्नि में मैं भी जलती
धीरे-धीरे
प्रेम आग है
मुझको भी होता विश्वास

मेरे जीवन में भी काश
एक बार आता मधुमास.