Category Archives: fiction

दर्दे-ए-हिज्र बेहतर है फिर तो तेरे पास होने से

मुझे तारीखें याद नहीं रहतीं. पिछली दफा तुम किस तारीख को आये, कब गए, अगली बार कब आओगे, कुछ भी नहीं. मैं कैलेण्डर के पन्ने नहीं पलटती, जिससे तुम्हारे जाने का दिन याद रहे… और जब तुम आते हो, तो अपने हाथों से नयी तारीख लगाते हो.

तुम्हारे जाने से ज़िंदगी ठहर सी जाती है. यूँ लगता है कोई हलचल ही नहीं. ना सुबह उठने की जल्दी, ना कोई काम करने का मन. बस पड़े रहने का जी करता है, जिससे ठहरी हुयी ज़िंदगी से तालमेल बिठाया जा सके.

तुम्हारे आने के ठीक पहले परदे धो दिए जाते हैं, चादरें बदल दी जाती हैं, घर के सामानों पर पड़ी धूल पोछकर साफ़ कर दी जाती है, गुलदान में नए फूल लगा दिए जाते हैं.  बस, तारीख नहीं बदली जाती, क्योंकि उसका रुके रहना या बदलना तुम तय करते हो.

और फिर…

तुम्हारे आने पर महक उठते हैं मुरझाए हुए फूल, उनके रंग चटख हो उठते हैं, पत्ते अधिक हरे हो जाते हैं, खिड़की के बाहर का आसमान गहरा नीला हो जाता है. पर… मैं ये सब नहीं देखना चाहती. मैं तुम्हारे होने को किसी और से बाँटना नहीं चाहती. फिर गहरा सन्नाटा. सुकून देता हुआ. बहुत देर तक…

‘कब जाना है?’

‘परसों’

…सुनकर लगा ज्यों दिल ने अपनी जगह छोड़ दी हो, पर काम दोगुना कर दिया. अब धडकन गले में सुनायी दे रही है और भी तेज…आँखें दो दिन बाद की घटनाएँ देखने लग जाती हैं. कान बीस डेसीबल से भी कम की आवाज सुन सकते हैं.  सन्नाटा और भी गहरा हो जाता है, पर सुकून नहीं देता. बेचैन कर देता है.

अड़तालीस घंटे अभी बाकी हैं. पर खर्चूं कैसे ? हिसाब जो नहीं आता. मुझे मालूम है मैं खर्चीली इन्हें यूँ ही गँवा दूँगी. हमारे दिल की धडकनें कुछ सोचने भी तो नहीं देतीं…

अजीब सी स्थिति है. इसे समझना मुश्किल है. गणित के सवाल हल करने से भी ज्यादा.  मुझे खुद नहीं मालूम कि मेरी हालत कैसी हो गयी?

…पता है …?

इस समय मैं दुखी नहीं हूँ. बिल्कुल नहीं. क्योंकि तुम पास हो,  लेकिन …

तुम्हें जाना है… इसलिए मैं खुश भी नहीं…

छुअन के चार पड़ाव

पहला पड़ाव

मेरा जन्मदिन. हम दिन भर घूमे थे. शाम को हॉस्टल के गेट पर खड़े होकर बातें कर रहे थे. मेरा मन नहीं हो रहा था कि तुम्हें छोड़कर अंदर जाऊँ. शाम का धुँधलका, गुलाबी ठण्ड. तभी हल्की हवा का एक झोंका आया और मेरे बालों की एक लट मेरे चेहरे पर बिखर गयी. जाने क्या सोचकर मेरी आँखे भर आयी थीं. तुमने अपने हाथों से मेरे चेहरे से वो लट उठाकर कानों के पीछे अटका दी, इस बात का पूरा ध्यान रखते हुए कि कहीं तुम्हारा हाथ मेरे कान या गर्दन से छू ना जाए, पर वो छू ही गया और मेरा पूरा शरीर सिहर उठा. तुमने कहा, “मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ” तुम्हारी वो छुअन, बातों की और हाथों की, अभी भी मुझे सिहरा देती है.

दूसरा पड़ाव

तुम मुझसे मिलने हॉस्टल आये. हम विजिटिंग हॉल में बैठे. मैं नाराज़ थी किसी बात पर और तुम मनाने की कोशिश कर रहे थे. अचानक तुमने मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए और बोले, “तुम्हारे हाथ तो आम के नवपल्लवों की तरह कोमल हैं.” मुझे तुम्हारी ये हिन्दी सुनकर हँसी आ गयी. मैं आज भी अपने हाथ अपने गालों पर रखकर महसूसने की कोशिश करती हूँ कि वे वाकई नव आम्रपल्लवों जैसे कोमल हैं कि नहीं.

तीसरा पड़ाव

हम बस से घर जा रहे थे. मैं आठ घंटे की यात्रा से बहुत थक गयी थी और बार-बार ऊँघ रही थी. मेरे बगल में बैठे हुए तुमने अपना हाथ पीछे से मेरे कन्धों पर रखा और मेरा सिर अपने कन्धों पर टिका लिया और मैं चुपचाप सोने का नाटक करती रही…

चौथा पड़ाव

तुम मेरे घर आये थे. गर्मियों की रात थी. गाँव में लाईट तो रहती नहीं. सबलोग रात का खाना खाकर बाहर बैठे हुए थे. मैं बारी-बारी से सबके बिस्तर लगा रही थी. मैं पिताजी के लिए  मच्छरदानी लेने कमरे में आयी तो पानी पीने का बहाना करके तुम भी आ गए. मेरा हाथ पकड़कर अपनी ओर खींचा और अचानक रुककर बोले, “डर गयी थी ना?” मैं तड़पकर रह गयी कि बेवकूफ ने इतना अच्छा मौका गँवा दिया… गले क्यों नहीं लगा लिया?

छुअन के इन पड़ावों के साथ ही हमारा नाता गहरा होता जाता है… …

संगम-तट की रेत पर दो जुड़वा पैरों के निशान

ना जाने क्यों, जीवन में कभी-कभी कोई दोस्त अचानक से ख़ास बन जाता है. वो दोस्त, जिससे हम रोज़ मिलते हैं, बातें करते हैं, घूमते-फिरते हैं और अपने अनुभव बाँटते हैं, किन्हीं कोमल क्षणों में वो कुछ और ही हो जाता है. वो पहले वाली बात नहीं रहती. दोस्त वही होता है, पर वो दोस्त नहीं रह जाता ….अचानक से रिश्ते का पूरा स्वरूप ही बदल जाता है. या हो सकता है यह फागुनी हवा ही ऐसी होती है…. ना जाने कैसी मादकता होती है इसमें?? हर चीज़ ही बदली-बदली लगती है.
बहुत दिनों पहले इसी मौसम में कोई पाहुन चुपके से आन बसा था, मेरे मन-आँगन में और गया नहीं… …बस… बस गया यहीं. हमने बहुत सा समय साथ-साथ बिताया था. कभी महसूस ही नहीं हुआ कि हमारे बीच स्त्री-पुरुष का स्वाभाविक आकर्षण भी हो सकता है. हम अक्सर कहते थे कि पता नहीं लोग कैसे ये मानने को तैयार ही नहीं होते कि लड़का-लड़की भी अच्छे दोस्त हो सकते हैं? हम बहुत अच्छे दोस्त थे…बस…अच्छे दोस्त…लेकिन, एक पल में सब बदल गया.
नहीं…ये इतनी शीघ्रता से नहीं हुआ. मैं बहुत ही कैरियर ओरिएन्टेड, प्रैक्टिकल लड़की थी. मैंने अपने कोमल हृदय के चारों ओर एक दीवार बना रखी थी. इस कठोर हृदय की किलेबन्दी को भेद पाना इतना सहज नहीं था. पर…, जाने क्या था, उन पारदर्शी आँखों में कि मन स्वयं ही इतना कोमल हो गया…सब कुछ अनायास होता गया. उनका आना… मन-मस्तिष्क पर छा जाना और…अस्तित्व का एक अभिन्न अंग बन जाना. संभवतः, सायास यह हो भी नहीं सकता था. मानव-मन का स्वभाव ही ऐसा है. कोई पीछे आता है, तो यह दूर भागता है और कोई दूर जाता है, तो उसके पीछे… … तो, वह मनबसिया हो गया… दूर से ही.
फिर क्या था. मैं, वो और कभी…विस्तृत गंगा का रेतीला तट, तो कभी गम्भीर जमुना का सरस्वती घाट… पर सबसे प्रिय था… गंगा-जमुना का संगम. संगम वैसे भी प्रेमी हृदयों के लिये सबसे सुरक्षित स्थान है. सित-असित तरंगों के साथ ही परस्पर एक होते दो प्रेमातुर हृदय… दूर देश से आये अतिथि खग-वृंद को दाना डालते, लहरों की ठंडक को अपने भीतर अनुभव करते, नाव की सैर करते और तट की ठंडी बालू पर नंगे पाँव टहलते…कोई पुराना गीत गुनगुनाते हुए…
कभी जाओ संगम, तो देखना… दो जुड़वा पैरों के निशान ज़रूर मिेलेंगे संगम-तट की रेत पर…