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कोई हमको भी तो देखे, कोई हमसे भी तो पूछे

कुछ दिनों से लिख नहीं पा रही हूँ हालांकि शेयर करने के लिए बहुत कुछ है. कई सपनें, कुछ सवाल, कुछ समस्याएँ, कुछ समाधान. जाने कैसा दिमाग है कि किसी विशेष आयोजन के समय या विशेष दिवस को नज़र उन पर जाती है, जो फ्रेम से  बाहर हैं. आज बालदिवस है तो सोचा कि कुछ ऐसा देखा-दिखाया जाए…

 

बाल दिवस पर उन्हें हमारी शुभकामनाएँ !

(नोट : सारे चित्र मेरी सहेली चैंडी के कैमरे से… दहशत वाला छाया चित्र उस दलित परिवार के बच्चे का है, जिसके घर को सवर्णों द्वारा जला दिया गया था और उसके बाद वह बच्चा थोड़ी सी भी हलचल से डर जाता है.)

चार चित्र आज़ादी के…

आज फिर मैं अपनी सहेली चैंडी द्वारा ली हुयी कुछ तस्वीरें पोस्ट कर रही हूँ… कैप्शन मैंने लिखे हैं. आज़ादी का छोटा सा मतलब…

(सभी चित्र मेरी सहेली चैंडी के कैमरे से )

तस्वीरें बोलती हैं शब्दों से ज्यादा

सोचा था कि फ्रेंडशिप डे पर तो आज कुछ नहीं लिखूँगी. वैसे ये पोस्ट उस पर है ही नहीं. ये मेरी एक सहेली के बारे में है. चंद्रकांता भारती, जिसे प्यार से हमलोग ‘चैंडी’ कहते हैं, हॉस्टल के दिनों से ही. एक बेहद आत्मनिर्भर, मजबूत, विटी और ऐक्टिव लड़की, जिसने नेट क्वालिफाइड और पीएच.डी. में एनरोल्ड होते हुए भी अपने लिए एक दूसरा ही रास्ता चुना. वो दलित फाउन्डेशन नाम के एक एन.जी.ओ. में काम करती है और अपने काम के प्रति पूरी तरह समर्पित है.

अपने काम के सिलसिले में चैंडी को विभिन्न राज्यों की दलित बस्तियों में जाना पड़ता है. वो अपने काम से तो जाती ही है, बहुत सी ऐसी जीवंत तस्वीरें लेकर आती है, जो एक ओर तो हमारे देश की समृद्ध परम्परा के बारे में बातें बताती हैं, दूसरी ओर दलितों की आर्थिक स्थिति के विषय में. फोटोग्राफी उसका शौक है और उसने अपने शौक को अपने काम का एक हिस्सा बना लिया है, एक मिशन की तरह.

हमारे संविधान के निर्माण के समय ही दलितों के लिए नौकरी में आरक्षण की व्यवस्था की गयी, जो अभी तक जारी है. ध्यातव्य हो कि डॉ. अम्बेडकर पूरी तरह इसके पक्ष में नहीं थे और अब इसके परिणाम सामने आ रहे हैं. दलितों के आरक्षण के साथ ही उनकी शिक्षा-दीक्षा और जागरूकता के लिए मुहिम चलानी चाहिए थी, जो कि नहीं किया गया. परिणामतः आज जो दलित आर्थिक रूप से सशक्त भी हैं, वे भी शेष समाज से नहीं जुड़ पाए हैं और खुद उनमें उस स्तर की जागरूकता नहीं है, जैसी कि उस आर्थिक स्तर वालों की होनी चाहिए.

खैर, ऐसा मैं सोचती हूँ. इस विषय पर लोगों में मत-वैभिन्न्य हो सकता है. पर मेरा सिर्फ ये कहना है कि मात्र आरक्षण से कुछ नहीं होगा. दलितों में जागरूकता लाने और उन्हें शेष समाज से जोड़ने के प्रयास भी होने चाहिए.

मैं आज मुसहर जनजाति की चैंडी द्वारा ली गयी कुछ फोटो अपलोड कर रही हूँ. देखिये ये कितना अपनी बात कह पाती हैं और लोग कितना समझ पाते हैं. मुसहर बिहार और पूर्वी यू.पी. की जनजाति है, जिसके बारे में यह कहा जाता है कि वह चूहे मारकर खाते हैं… इससे अधिक अगर जानना हो तो आप यहाँ और यहाँ देख सकते हैं.

ये पोस्ट चैंडी के नाम … मुझे गर्व है कि वो मेरी सहेली है.


ओढ़े रात ओढ़नी बादल की

मैं अक्सर जो सोचती हूँ, कर डालती हूँ. कुछ समय से दिल्ली से मन ऊबा था. आठ महीनों से कहीं बाहर नहीं निकली थी. गर्मी ने और नाक में दम कर दिया… मन हुआ कहीं दूर बादलों की छाँव में चले जाने का, तो निकल लिए बाहर. दस घंटे का बस का सफर करके नैनीताल पहुँचे. इरादा तो रानीखेत जाने का था, पर नैनीताल में अधिक बारिश होने लगी, तो इरादा बदल दिया. आखिर जान तो प्यारी है ही ना… अपने पास कैमरा नहीं है, तो मोबाइल कैमरे से ही कुछ फोटो खींचे.

एक कविता भी लिख डाली…

…कविता क्या है…? कुछ काव्यमय पंक्तियाँ हैं… या पता नहीं… कुछ उसके जैसा ही …

… … … …

ओढ़े रात ओढ़नी बादल की

करती है अठखेलियाँ

पहाड़ों की चोटी पर,

चाँदनी से करने आँखमिचौली

छिप जाती है पेड़ों के झुरमुट में,

देखती है पलटकर

उसकी मेघ-ओढ़नी

अटक गयी है देवदार की फुनगी पर

और छूटकर  उतर रही है

धीरे-धीरे घाटी में.


मेरे घर आयी एक नन्ही कली

मुझे होली में एक पामेरेनियन पपी उपहार में मिली. मैं उसकी कुछ फोटो अपलोड कर रही हूँ. मैंने उसका नाम कली रखा है. कली बहुत शैतान है. वो या तो खेलती है या फिर सोती रहती है. सोती भी है अजीब-अजीब मुद्राओं में. अभी दो महीने की भी पूरी नहीं हुई है, पर बड़ी अक्ल है उसमें. मेरे बेड पर सोने के लिये चादर खींचती है और मेरे जवाब न देने पर भौंकने लगती है. जब उसे अपनी मम्मी की याद आती है, तो बालकनी में जाकर मुँह ऊपर करके कूँ-कूँ करती है. मैं उसको अभी सुबह-शाम उसकी मम्मी के पास ले जाती हूँ.

कुछ दिन पहले मैं एक पपी को रात में गली से उठाकर ले आयी थी. उसे मैंने एक चाय वाले को दे दिया था. दूसरे दिन जब उससे पूछने गयी, तो उसने कहा कि एक लड़का पपी को ले गया. मैं उसको याद करके इतनी परेशान हुई कि किसी से मेरा दुःख देखा नहीं गया और उन्होंने मुझे ये पपी उपहार में दे दी.

मेरे कुछ मनोवैज्ञानिक दोस्त कहते हैं कि पिल्लों को लेकर तुम्हारी दीवानगी एक मानसिक व्याधि है. वो क्या कहते हैं उसे ओ.सी.डी. (ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिसऑर्डर). जिसमें कोई व्यक्ति किसी एक बात के पीछे पड़ जाता है. कुछ लोग सफाई के पीछे इतने पागल हो जाते हैं कि हमेशा अपना हाथ धोते रहते हैं. कुछ लोग किसी और बात के पीछे पड़े रहते हैं. मेरे जैसे लोगों को “मेनेयिक” भी कहा जाता है. तो इसका मतलब यह है कि मुझे “पपी मेनिया” हुआ है. अच्छा शब्द है न.