Category Archives: poetry/कविता

अम्मा के सपने

वैसे तो माँ को याद करने के लिए कोई एक ख़ास दिन नहीं होता, वो हर समय पास-पास ही रहती है, उसकी तस्वीर आँखों में और यादें हर वक्त दिल में होती हैं,लेकिन फिर भी एक ख़ास दिन जब सब अपनी-अपनी माँ को याद करते हैं तो मुझे भी अम्मा की याद बेतरह आने लगती है. उसके छोटे-छोटे अरमान, कुछ बेहद साधारण आकांक्षाएं और मामूली से सपने उसे इतना ख़ास क्यों बनाते हैं?

डेढ़ साल पहले माँ पर लिखी एक कविता याद आ रही है, जो कि मेरे ब्लॉग फेमिनिस्ट पोयम्स पर प्रकाशित हो चुकी है.

मेरी अम्मा
बुनती थी सपने
काश और बल्ले से,
कुरुई, सिकहुली
और पिटारी के रूप में,
रंग-बिरंगे सपने…
अपनी बेटियों की शादी के,

कभी चादरों और मेजपोशों पर
काढ़ती थी, गुड़हल के फूल,
और क्रोशिया से
बनाती थी झालरें
हमारे दहेज के लिये,
खुद काट देती थी
लंबी सर्दियाँ
एक शाल के सहारे,

आज…उसके जाने के
अठारह साल बाद,
कुछ नहीं बचा
सिवाय उस शाल के,
मेरे पास उसकी आखिरी निशानी,
उस जर्जर शाल में
महसूस करती हूँ
उसके प्यार की गर्मी…

ओढ़े रात ओढ़नी बादल की

मैं अक्सर जो सोचती हूँ, कर डालती हूँ. कुछ समय से दिल्ली से मन ऊबा था. आठ महीनों से कहीं बाहर नहीं निकली थी. गर्मी ने और नाक में दम कर दिया… मन हुआ कहीं दूर बादलों की छाँव में चले जाने का, तो निकल लिए बाहर. दस घंटे का बस का सफर करके नैनीताल पहुँचे. इरादा तो रानीखेत जाने का था, पर नैनीताल में अधिक बारिश होने लगी, तो इरादा बदल दिया. आखिर जान तो प्यारी है ही ना… अपने पास कैमरा नहीं है, तो मोबाइल कैमरे से ही कुछ फोटो खींचे.

एक कविता भी लिख डाली…

…कविता क्या है…? कुछ काव्यमय पंक्तियाँ हैं… या पता नहीं… कुछ उसके जैसा ही …

… … … …

ओढ़े रात ओढ़नी बादल की

करती है अठखेलियाँ

पहाड़ों की चोटी पर,

चाँदनी से करने आँखमिचौली

छिप जाती है पेड़ों के झुरमुट में,

देखती है पलटकर

उसकी मेघ-ओढ़नी

अटक गयी है देवदार की फुनगी पर

और छूटकर  उतर रही है

धीरे-धीरे घाटी में.


घर और महानगर

घर

(१.)
शाम ढलते ही
पंछी लौटते हैं अपने नीड़
लोग अपने घरों को,
बसों और ट्रेनों में बढ़ जाती है भीड़
पर वो क्या करें ?
जिनके घर
हर साल ही बसते-उजड़ते हैं,
यमुना की बाढ़ के साथ.

(२.)
चाह है एक छोटे से घर की
जिसकी दीवारें बहुत ऊँची न हो,
ताकि हवाएँ बेरोक-टोक
इधर से उधर आ-जा सकें.

*** *** ***

महानगर

(१.)
मन घबराता है,
समझ में नहीं आता कहाँ जायें ?
महानगर के आकाश में
चाँद भी साफ नहीं दिखता,
जिसे देखकर कोई
कविता लिखी जाये.

(२.)
छोटे शहरों में
छोटी-छोटी बातें भी
बड़ी हो जाती हैं
महानगरों में,
बड़ी बातों पर भी
ध्यान नहीं देता कोई.


एक सुबह, एक शाम, एक रात

एक सुबह,
बांस की पत्ती के कोने पर अटकी
ओस की बूँद
कैद कर ली थी,
आँखों के कैमरे में
आज भी कभी-कभी वो
बंद पलकों में
उतरती है,
… …
एक शाम,
पक्षियों के कलरव को
सुना था बैठकर
छत की मुंडेर पर,
जिसकी धुन
मन में आज तक
जलतरंग सी
बजती है,
… …
एक रात
तुम्हारी तपती हथेलियों का स्पर्श
महसूस किया था
अपने गालों पर,
कानों के नीचे वो छुअन
आज भी
धधकती है,
… …
नहीं सही आज
वो सुबह, वो शाम, वो रात,
वो ओस,वो पंछी,
वो तुम्हारी छुअन
पर उनकी यादें
अब भी, सीने में
करकती है.

(photo by fotosearch.com)

गुनगुनी धूप

गुनगुनी धूप
कल उतरी मेरी बालकनी में,
जैसे अम्मा ने
हौले से
दुलार दिया हो मुझे,
इससे पहले तो
धूप में
न था इतना अपनापन …
क्या भेजा है कोई संदेश
उसने स्वर्ग से?