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	<title>आराधना का ब्लॉग</title>
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		<title>आराधना का ब्लॉग</title>
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		<title>पंखुरियाँ</title>
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		<pubDate>Fri, 07 Jun 2013 23:00:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>aradhana</dc:creator>
				<category><![CDATA[fiction]]></category>
		<category><![CDATA[ज़िंदगी]]></category>
		<category><![CDATA[प्यार]]></category>
		<category><![CDATA[प्रेम]]></category>
		<category><![CDATA[रसबतियाँ]]></category>

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		<description><![CDATA[एक पत्थर पर थोड़ी चोट लगी थी. उस पर मिट्टी जम गयी. बारिश हुयी और कुछ दिन बाद उस मिट्टी में जंगली फूल खिल गए. उन फूलों पर मँडराती हैं पीले रंग की तितलियाँ और गुनगुनाते हैं भवँरे. उन्हें देख &#8230; <a href="http://draradhana.wordpress.com/2013/06/08/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%96%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%81/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=draradhana.wordpress.com&#038;blog=7739962&#038;post=1689&#038;subd=draradhana&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><!--[if gte mso 9]&gt;--></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:'Mangal', 'serif';">एक पत्थर पर थोड़ी चोट लगी थी. उस पर मिट्टी जम गयी. बारिश हुयी और कुछ दिन बाद उस मिट्टी में जंगली फूल खिल गए. उन फूलों पर मँडराती हैं पीले रंग की तितलियाँ और गुनगुनाते हैं भवँरे. उन्हें देख मुझे तुम्हारी याद आती है. </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:'Mangal', 'serif';">तुम्हीं ने तो बताया था सबसे पहली बार कि फूल की पंखुरियाँ पिघला सकती हैं पत्थर का दिल भी.</span></p>
<p class="MsoNormal">*** *** ***</p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:'Mangal', 'serif';">वो दिन ‘कुछ अलग’ होते हैं. जब फ्रिज की सारी बोतलों में पानी भरा होता है. मैं पढ़ती रहती हूँ और दोनों टाइम का खाना मेरी टेबल पर सज जाया करता है. कोई प्यार से कहता है, ‘चलो, किताब हटाओ और खाना खा लो.’ रात में पढ़ते-पढ़ते इधर-उधर बिखरी किताबें, सुबह करीने से मेज पर सजी होती हैं.</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:'Mangal', 'serif';">नहीं, ये कोई सपना नहीं. ये वो दिन हैं, जब तुम साथ होते हो. </span></p>
<p class="MsoNormal">*** *** ***</p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:'Mangal', 'serif';">मेरी ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत सुबहें वो होती हैं, जब सुबह-सुबह तुम चाय बनाते हो. मेरे सिर पर हाथ फेरकर और माथा चूमकर मुझे उठाते हो, ‘उठो, चाय पी लो’ मैं घड़ी देखती हूँ. सुबह के दस बज गए होते हैं. </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:'Mangal', 'serif';">और मुझे पता है कि तुम सात बजे से जाग रहे हो.</span></p>
<p class="MsoNormal">*** *** ***</p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:'Mangal', 'serif';">हम रात-दिन की तरह हैं. मैं रात की तरह शांत, ठंडी, डार्क और रहस्यों से भरी हुयी. तुम दिन की तरह प्रकाशवान, पारदर्शी, ओजस्वी और ऐक्टिव. हम अलग-अलग होते हुए भी सुबह और शाम के जरिये मिले हुए हैं. जैसे तुम मुझे सबसे पहले बचपन में मिले थे. खेलते-खेलते मैंने तुम्हें धक्का मारकर गिरा दिया था और तुम्हारा घुटना छिल गया था. </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:'Mangal', 'serif';">और अभी कुछ दिन पहले तुमने कहा ‘हम अभी साथ हों न हों. बुढ़ापे में साथ-साथ ही रहेंगे.’ तबसे मुझे बुढ़ापे से डर नहीं लगता, बल्कि वो पहले से अधिक रूमानी लगता है.(हाँ, मैं उन पागल लोगों में से हूँ, जिन्हें बुढ़ापा अट्रैक्ट करता है) </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-family:'Mangal', 'serif';">मैं बुढ़ापे के आने का इंतज़ार करती हूँ और तबके लिए मैंने कोई इंश्योरेंस पालिसी नहीं ली है.</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:center;"><a href="http://draradhana.files.wordpress.com/2013/06/dscn0807.jpg"><img class=" wp-image-1692 aligncenter" alt="DSCN0807" src="http://draradhana.files.wordpress.com/2013/06/dscn0807.jpg?w=179&#038;h=300" width="179" height="300" /></a></p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/draradhana.wordpress.com/1689/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/draradhana.wordpress.com/1689/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=draradhana.wordpress.com&#038;blog=7739962&#038;post=1689&#038;subd=draradhana&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>कहा जा सकता था, लेकिन&#8230;</title>
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		<pubDate>Mon, 03 Jun 2013 02:13:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>aradhana</dc:creator>
				<category><![CDATA[बातें]]></category>
		<category><![CDATA[गाँव]]></category>
		<category><![CDATA[सेक्सुअल एब्यूज़]]></category>

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		<description><![CDATA[मैंने कई बार सोचा कि इस घटना के बारे में लिखूँ या ना लिखूँ. जब लिख लिया तो इस कश्मकश में पड़ गयी कि इसे ब्लॉग पर पोस्ट करूँ या नहीं. मैं ऐसा इसलिए सोच रही थी कि इसे सार्वजनिक &#8230; <a href="http://draradhana.wordpress.com/2013/06/03/%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%95%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%a8/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=draradhana.wordpress.com&#038;blog=7739962&#038;post=1681&#038;subd=draradhana&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>मैंने कई बार सोचा कि इस घटना के बारे में लिखूँ या ना लिखूँ. जब लिख लिया तो इस कश्मकश में पड़ गयी कि इसे ब्लॉग पर पोस्ट करूँ या नहीं. मैं ऐसा इसलिए सोच रही थी कि इसे सार्वजनिक करने के बाद बहुत से रिश्ते प्रश्नों के दायरे में आ सकते हैं और कुछ लोगों के अजीब से सवालों का जवाब भी देना पड़ सकता है. लेकिन फिर ये सोचा कि ऐसी घटनाओं को सामने आना ही चाहिए, जो अक्सर किसी एक की ज़िंदगी पर बहुत बुरा प्रभाव डालने के बावजूद, परिवार की बदनामी और रिश्ते बिगड़ने के डर से दबा दी जाती हैं. मैं इसे ज्यों का त्यों लिख रही हूँ, हालांकि नाम नहीं दे रही हूँ.</p>
<p>बात उन दिनों की है, जब मेरे बाऊ जी उन्नाव जिले के मगरवारा रेलवे स्टेशन पर पोस्टेड थे. हमलोग रोज़ ट्रेन से मगरवारा से उन्नाव पढ़ने के लिए आते-जाते थे. एक दिन सुबह-सुबह हम घर से निकले तो दरवाजे पर गाँव का एक चचेरा भाई खड़ा था. हमलोग गाँव कम जाते थे, इसलिए उसे पहचान नहीं पाये, लेकिन दीदी पहचान गयी. गाँव से किसी के आने पर हम भाई-बहन बहुत खुश होते थे. उसके आने के कुछ दिन बाद ही होली की छुट्टियाँ हो गयीं, तो हमें अपने कज़िन के साथ वक्त बिताने का मौक़ा मिल गया. मेरी और छोटे भाई की उससे खूब जमती थी. हमारा कोई बड़ा भाई नहीं था, इसलिए एक ‘बड़ा भाई’ मिलने की ज़्यादा खुशी थी. हमने सोचा था कि वह हमसे मिलने इतनी दूर आया है, लेकिन बाद में पता चला था कि वह हाईस्कूल का इम्तहान देने के डर से घर से भागकर आया था. अम्मा ने समझाया कि वह छुट्टियों के बाद घर चला जाय, तो वो मान गया.</p>
<p>हालांकि उसकी कुछ बातें मुझे अच्छी नहीं लगती थीं. मैंने उन दिनों सातवीं का इम्तहान दिया था, लेकिन मेरी ड्राइंग अच्छी होने के कारण कालोनी के हाईस्कूल में पढ़ने वाले लड़के अपनी साइंस की फ़ाइल के चित्र मुझसे बनवाते थे. ऐसे ही एक लड़के ने मुझे फ़ाइल दी, तो मेरे उस कज़िन ने उसका एक-एक पन्ना पलटकर चेक करना शुरू कर दिया. मुझे बहुत बुरा लगा. मैंने सोचा कि मेरा दोस्त क्या सोचेगा ? कि इसका ‘भाई’ जासूसी कर रहा है. मैंने घर वापस आकर अम्मा से शिकायत भी की. पर अम्मा ने समझाया कि ‘जाने दो, बड़ा भाई है. उसे तुम्हारी चिन्ता होती होगी.’ इसके अलावा उसने कई बार कालोनी के लड़कों के साथ मेरे बात करने और खेलने के बारे में भी टोका. मुझे इन बातों पर गुस्सा आता था, लेकिन अम्मा की वजह से मैं कुछ नहीं कहती. कुछ दिन बाद वो वापस गाँव लौट गया.</p>
<p>उसी साल गर्मियों की छुट्टी में गाँव में एक चचेरी बहन की शादी पड़ी. अम्मा घर की देखभाल के लिए रुक गयीं और घर के बाकी सदस्य- मैं, छोटा भाई, दीदी और बाऊ चारों लोग गाँव गए. हमलोग लगभग पाँच साल बाद गाँव गए थे, मैं और मेरा भाई किसी और को तो पहचानते नहीं थे, तो उसी कज़िन से बातें करते थे.</p>
<p>पहले दिन तो सब ठीकठाक था, लेकिन दूसरे दिन से कज़िन ने अजीब सी हरकतें शुरू कर दीं. गाँव का घर बहुत बड़ा था, बिजली तब थी नहीं, तो अधिकतर जगहों पर अँधेरा रहता था. वो जब अँधेरे में मेरे पास से गुजरता तो हाथ छूते हुए निकलता. पहले तो मैंने सोचा कि गलती से हाथ लग गया होगा, लेकिन जब कई बार यही हरकत दोहराई तो मेरा दिमाग ठनका. वैसे भी लड़कियों की सिस्क्थ सेन्स इतनी प्रबल होती है कि उन्हें ‘स्पर्श-स्पर्श’ में अंतर पता चला जाता है. मैंने उससे बचना शुरू कर दिया. मैं या फिर बाऊ के पास बाहर बैठी रहती या दीदी और बुआ लोगों के साथ घर के भीतर.</p>
<p>लेकिन उसने परेशान करने की नयी तरकीब निकाली. उसने एक छोटे भतीजे को भेजकर मुझे हाते में बुलवाया. अब जब सबके सामने आकर कोई कह रहा है कि ‘फलाने चाचा’ बुला रहे हैं और मैं न जाती, तो लोगों को शक होता कि बात क्या है? मेरी समझ में कुछ नहीं आया. मैं गयी तो लेकिन एक छड़ी लेकर. मैं दूर खड़ी हो गयी, और धमकी दी कि ‘अगर आपने मुझे हाथ लगाने की कोशिश की तो मैं खींचकर छड़ी मार दूँगी.’ मेरे पीछे-पीछे भतीजी-भांजियों की फौज भी आ गयी थी, इसलिए उसे कुछ कहने का मौका नहीं मिला.</p>
<p>मैं रात में चाचा की छत पर सोती थी दीदी, बुआ, कुछ भतीजे-भतीजियों और बड़े भईया के साथ. उस दिन मुझे बहुत नींद आ रही थी, तो दीदी से पहले ही मैं छत पर चली गयी. सोचा बड़े भईया तो हैं ही. गाँव में शादी-ब्याह में कई दिन तक गवनई चलती है, तो दीदी और बुआ उसीमें व्यस्त थीं. मुझे पहली ही झपकी आयी थी कि अचानक लगा कि कोई मेरी चादर खींच रहा है. मेरी नींद बहुत कच्ची है. मैं तुरंत उठ गयी, तो देखा सामने वही कज़िन था. मैंने ज़ोर से पूछा “क्या है?” तो वो डर गया और तेजी से नीचे भाग गया. मैंने बगल में देखा कि भतीजे वगैरह तो गहरी नींद में सो रहे थे और भईया नहीं थे. शायद भाभी के पास चले गए थे. मुझे उसके बाद नींद नहीं आयी. मैं उकडूँ बैठी रही, जब तक दीदी और बुआ नहीं आ गयीं.</p>
<p>उस दिन के बाद से मैं बेहद डर गयी. मुझे रात होते ही डर लगने लगता. मैं उस समय सिर्फ बारह साल की थी और एकाकी परिवार में पली-बढ़ी. मुझे समझ में ही नहीं आ रहा था कि ‘भईया ऐसा कर क्यों रहे हैं?’ दीदी मुझे अकेली मिल ही नहीं रही थीं. हर समय उनके साथ या तो बुआ होतीं, या भाभी या कोई बहन. दूसरे दिन मैंने बाऊ से वापस चलने की रट लगा दी. और कुछ तो कह नहीं सकती थी. बस बार-बार यही कह रही थी कि “अम्मा की याद आ रही है” एक-दो बार तो आँसू भी छलछला आये. मुझे सच में अम्मा की बहुत याद आ रही थी. अम्मा सच कहती हैं, ‘जब कोई आदमी ज़्यादा प्यार से बोलने लगे, तो समझो कि कुछ गडबड है. ऐसे लोग लड़कियों को उठा ले जाते हैं और उनसे खूब काम कराते हैं.’ पर ऐसा तो अम्मा ने ‘आदमियों’ के लिए कहा था ‘भाइयों’ के लिए तो नहीं. मेरा मन इससे अधिक कुछ नहीं सोच पा रहा था. मैं उस समय कैसा महसूस कर रही थी, इस समय नहीं बताया जा सकता.</p>
<p>हमारे गाँव के घर का आहाता बहुत बड़ा था. उसमें उस समय कुछ सब्जियाँ उगाई जाती थीं. उस दिन शाम के समय भाभी के कहने पर मैं हाते से कुछ सब्ज़ी तोड़ने गयी थी कि उसने मुझे रोक लिया. मैं बेहद डर गयी कि अभी तक तो इसकी हरकतें रात में शुरू होती थीं. अब दिन में भी? मैं रो पड़ी. मैंने पूछा, “आप मुझे क्यों परेशान कर रहे हैं?” उसने जवाब दिया, “हम तुम्हें पसंद करते हैं. जो कह रहे हैं वो मानो और किसी से कुछ कहना मत, नहीं तो हम तुमको पूरे गाँव में बदनाम कर देंगे.” मुझे “बदनाम” शब्द का मतलब मालूम था. ऐसी लड़कियाँ जो गंदी होती हैं, उन्हें बदनाम कहा जाता है. मैं और डर गयी और वहाँ से तेजी से भाग आयी.</p>
<p>अब मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था ये सब. मेरे दिमाग में उसके कहे शब्द गूंज रहे थे. लेकिन करती भी तो क्या? संयोग से रात को गाँव के ही एक नातेदार के यहाँ घरभोज में जाने को मिला. दीदी हमेशा बुआ से बातें किया करती थीं. वो बतियाते हुए ही जा रही थीं कि मैंने उन्हें रोका कि कुछ बात कहनी है. दीदी ज्यों रुकीं, मैंने त्यों रोना शुरू कर दिया. रो-रोकर मैंने सारी बात बतायी और ये भी कहा कि ‘वो मुझे बदनाम कर देगा.’ दीदी भी अवाक् रह गयीं. उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई भाई ऐसा कर सकता है. उन्होंने मुझसे कहा, &#8216;वो उससे और उसकी माँ से बात करेंगी.&#8217;</p>
<p>दूसरे दिन दीदी ने मुझसे कहा कि ‘उन्होंने चाची से सारी बात बताई, और कज़िन को भी डाँट पिलाई. लेकिन चाची ने अपने लड़के की गलती नहीं मानी. उन्होंने कहा कि कोई गलतफहमी हुयी होगी.’ चाहे जो भी हुआ हो, उस दिन के बाद से कज़िन ने ऐसी-वैसी कोई हरकत नहीं की. दो दिन के बाद हम वापस घर आ गए. बात आयी-गयी हो गयी. दीदी ने न ये बात अम्मा को बतायी और न बाऊ को. दीदी भी छोटी ही थीं, वो इस बात का निर्णय नहीं ले पाईं कि अम्मा-बाऊ को बताकर बात बढ़ानी चाहिए या नहीं.</p>
<p>लेकिन जब हम किसी सड़ांध को ढककर छिपाना चाहते हैं, तो उसकी दुर्गन्ध फैलती ही है. किसी की एक गलती पर यदि उसे रोक न दिया जाय, या सज़ा न दी जाय, तो वो दूसरी गलती करेगा ही.</p>
<p>इन घटनाओं के चार-पाँच साल बाद बाऊ के रिटायरमेंट के बाद जब हम गाँव शिफ्ट हुए, तो मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए. उस कज़िन से बात करनी चाहिए या नहीं. दिन में लगभग तीन-चार बार उससे सामना होता, लेकिन मैं बात नहीं करती थी. एक दिन भाभी ने मुझसे कहा कि ‘फलाने’ को खाने के लिए बुला दो. मैंने कहा कि मैं उससे बात नहीं करती. भाभी ने जब कई बार मुझसे कारण पूछा तो मैंने पूरी बात बता दी. इसके बाद उन्होंने जो बात बतायी, तो मैं दंग रह गयी. उन्होंने कहा कि “उसने मेरे साथ भी ऐसी हरकत करने की कोशिश की थी. और तो और एक बार अपनी सगी बहन के साथ भी ज़बरदस्ती करने की कोशिश की. इसके बाद उसकी उसके पिताजी ने जमकर पिटाई की.” ये बात सुनकर मेरे पैरों के तले से तो ज़मीन ही निकल गयी. मैं तो उससे सिर्फ दो-तीन साल छोटी थी, लेकिन उसकी छोटी बहन तो बहुत छोटी थी. मैंने कहा, ‘”भाभी, अगर उसको तभी रोक दिया गया होता, जब उसने मेरे साथ बदतमीजी की थी, तो कम से कम उस छोटी लड़की को और आपको तो ये सब न झेलना पड़ता.”</p>
<p>हाँ, ये सच है कि उसे उसी समय रोक देना चाहिए था. उसे सबके सामने शर्मिंदा करना चाहिए था, ‘घर-खानदान की बदनामी’ के डर से डरे बगैर&#8230;लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मैं बहुत छोटी थी और दीदी बहुत सीधी. हम साहस ही नहीं कर पाये उसके खिलाफ &#8216;ज़ोर से&#8217; अपनी बात कहने का. और शायद कहते भी तो दोनों परिवार में झगड़े और मनमुटाव के अतिरिक्त और कुछ न होता.</p>
<p>मुझे ये लगा था कि ये मेरे जीवन की ऐसी घटना है, जिसके बारे में मैं किसी से कभी नहीं कह पाऊँगी. लगता था कि मैं ही ऐसी अभागी हूँ, जिसे ये सब झेलना पड़ा है. लेकिन जब हॉस्टल में और लड़कियों से इस पर खुलकर बातचीत होने लगी, तो पता चला कि लगभग सत्तर प्रतिशत लड़कियाँ बचपन या टीनेज में अपने किसी न किसी नातेदार-रिश्तेदार के द्वारा ‘सेक्सुअल अब्यूज़’ झेल चुकी हैं.</p>
<p>इसका कारण क्या है, इसके लिए लंबे-चौड़े तर्क दिए जा सकते हैं, शोध किये जा सकते हैं, लेकिन एक बड़ा कारण यह भी है कि ऐसी घटनाएँ बाहर नहीं आ पातीं, इसलिए इस तरह की हरकतें करने वालों की हिम्मत बढ़ती जाती है. उन्हें पता होता है कि एक छोटी लड़की ऐसी घटना का जिक्र किसी से नहीं कर पायेगी. इसलिए वो बड़ी बेशर्मी से लड़कियों और छोटे लड़कों के साथ यौन-दुर्व्यवहार करते हैं. ज़रूरत है कि इस पर खुलकर बात हो. कानूनी कार्रवाई के अतिरिक्त ऐसे लोगों को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा किया जाय. उन्हें समाज से बहिष्कृत किया जाय, तो शायद ऐसी घटनाओं पर कुछ हद तक रोक लग पाये.</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/draradhana.wordpress.com/1681/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/draradhana.wordpress.com/1681/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=draradhana.wordpress.com&#038;blog=7739962&#038;post=1681&#038;subd=draradhana&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>मीत के गुण्डा की गुण्डई के किस्से</title>
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		<pubDate>Wed, 22 May 2013 11:45:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>aradhana</dc:creator>
				<category><![CDATA[आस-पड़ोस]]></category>
		<category><![CDATA[बातें]]></category>

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		<description><![CDATA[फेसबुक पर मीत  ने हमको &#8216;गुण्डा&#8217; नाम दिया है, जो कि हमारे स्वभाव को पूरी तरह चरितार्थ करता है मीत कौन हैं? इनसे हमारा परिचय करीब साढ़े तीन साल पहले ब्लॉग लिखते-लिखते हुआ था. इनका एक ब्लॉग हुआ करता था &#8230; <a href="http://draradhana.wordpress.com/2013/05/22/%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%a1%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%a1%e0%a4%88-%e0%a4%95%e0%a5%87/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=draradhana.wordpress.com&#038;blog=7739962&#038;post=1655&#038;subd=draradhana&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:left;">फेसबुक पर <span style="color:#0000ff;"><span style="text-decoration:underline;"><a href="http://www.blogger.com/profile/06968972033134794094" target="_blank"><span style="color:#0000ff;text-decoration:underline;">मीत</span></a></span> </span> ने हमको &#8216;गुण्डा&#8217; नाम दिया है, जो कि हमारे स्वभाव को पूरी तरह चरितार्थ करता है <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  मीत कौन हैं? इनसे हमारा परिचय करीब साढ़े तीन साल पहले ब्लॉग लिखते-लिखते हुआ था. इनका एक ब्लॉग हुआ करता था (अब पता नहीं कहाँ गया?)- &#8216;किससे कहें.&#8217; उस पर ये पुराने फ़िल्मी गीत, ग़ज़लें, गीतकारों और गजलकारों के किस्से और न जाने क्या-क्या छापा करते थे. कुछ पहेलियाँ भी पूछते थे. ऐसी ही किसी पहेली का जवाब सही-सही देने के बाद हमारा इनसे परिचय हो गया. (ये हमने आज तक किसी से नहीं बताया था कि हमको ये बहुत अच्छे लगते थे <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> ) खैर, मीत हमको &#8216;गुण्डा&#8217; कहते हैं , तो हम अपनी गुण्डई के कुछ किस्से सुनायेंगे और आपको सुनना पड़ेगा नहीं तो हम कैसे गुण्डा?</p>
<p style="text-align:center;">(किस्सा नंबर एक)</p>
<p style="text-align:left;">ये इलाहाबाद की घटना है. मैं अपने एक दोस्त के साथ &#8216;धूम&#8217; फिल्म देखने गौतम सिनेमाघर गयी. और हमेशा की तरह किनारे (कार्नर नहीं <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> ) वाली सीट पर बैठी. फिल्म अभी शुरू ही हुयी थी कि पीछे की सीट से एक लड़का उठकर बाहर गया और जाते-जाते मेरे कंधे को छूता गया. पहली बार मैंने सोचा कि हो सकता है कि हाथ गलती से लग गया हो. लेकिन वापस लौटने पर उसने फिर वही हरकत की. मैंने अपनी सीट से खड़े होकर तुरंत उसे टोका, &#8220;तुमने हाथ क्यों लगाया?&#8221; वो डर तो गया लेकिन अपनी गलती न मानते हुए लड़ने लगा, &#8220;गलती से लग गया होगा.&#8221; मैंने कहा, &#8220;गलती से एक बार हाथ लगता है दुबारा नहीं.&#8221; मेरा दोस्त भी उससे झगड़ पड़ा और कहा, &#8216;माफी माँगो&#8217; इस पर वो लड़का भड़क गया. उसके दोस्त जब खड़े हुए तो पता चला कि वो करीब सात-आठ थे. शायद इसीलिये इतना अकड़ रहे थे. सिनेमाहाल के और लोगों को फिल्म छूटने की चिन्ता हो रही थी. उन्होंने उल्टा मुझे समझाया, &#8220;बहनजी, जाने दीजिए&#8221; मैंने ज़ोर से चिल्ला के कहा, &#8220;शर्म तो आती नहीं आपलोगों को. एक लड़का अँधेरे का फ़ायदा उठाकर बदतमीजी कर रहा है और आपलोग हमसे कह रहे हैं कि हम जाने दें.&#8221;</p>
<p style="text-align:left;">इसी बीच शोर-शराबा सुनकर चौकीदार आ गया. उसने उनलोगों को शांत करके बैठा दिया और मुझसे भी बैठने के लिए कहा. मैं बैठ तो गयी, लेकिन मेरा खून खौल रहा था कि जिस लड़के ने मेरे साथ बदतमीजी की, उसका मैं कुछ नहीं बिगाड़ पायी. मैंने सुना कि वो लड़का किसी से फोन पर बात कर रहा था, जिससे ये लगा कि वो कुछ और गुंडों को अपनी मदद के लिए बुला रहा है. मुझे और गुस्सा आया. मेरे दोस्त ने मेरा मूड और हालात देखते हुए वापस चलने के लिए कहा, तो मैंने मना कर दिया कि &#8220;फिल्म देखने आयी हूँ, तो देखकर जाऊँगी. इन कमीनों के कारण मैं भाग नहीं सकती.&#8221; और सच में मैं भागती कभी नहीं. हमेशा लड़ती हूँ.</p>
<p style="text-align:left;">तभी चौकीदार ने मेरे पास आकर कहा, &#8220;मैडम, आप आराम से बैठिये. मैनेजर ने गेट बंद करवा दिया है और पुलिस को बुला लिया है.&#8221; तब जाकर मेरा गुस्सा कुछ शांत हुआ. ठीक दस मिनट बाद पुलिस आ गयी. उस थाने का एस.एच.ओ. उन दिनों काफी मशहूर था ऐसे बदमाशों को सबक सिखाने के लिए. पुलिस ने दोनों पक्षों को बाहर बुलाया और मुझसे लड़के को पहचानने को कहा. मेरे इशारा करते ही उन्होंने डंडे बरसाने शुरू कर दिए, तो मेरे मुँह से निकला, &#8220;आप मार क्यों रहे हैं?&#8221; इंस्पेक्टर बोला, &#8220;मैडम, आप जानती नहीं. ये लोग ऐसे ही सीधे किये जाते हैं&#8221; पुलिस उससे पूछ रही थी कि वो किसे बुला रहा था. तब पता चला कि वो इलाके के किसी जाने-माने गुंडे का छोटा भाई था.</p>
<p style="text-align:left;">खैर, पुलिस उन बदमाशों को पकड़कर ले गयी. हमलोग पूरी फिल्म देखकर ही वापस लौटे.</p>
<p style="text-align:center;">(किस्सा नम्बर दो)</p>
<p style="text-align:left;">अभी इसी दीवाली की बात है. रात के दो बज गये थे, लेकिन नीचे रहनेवाले &#8216;लोकल्स&#8217; ने पटाखे फोड़-फोड़कर सिर में दर्द कर दिया था. पटाखों की आवाज़ से ज़्यादा उससे उठने वाले धुएँ ने नाक में दम कर दिया था. तीसरे माले पर कमरा होने के कारण सारा धुँआ कमरे में भर गया था. मुझसे जब नहीं सहन हुआ, तो मैं बालकनी में जाकर चिल्लाई, &#8220;अब आपलोग पटाखे जलाना बंद कर दें प्लीज़.&#8221; नीचे से आवाज़ आयी, &#8220;अरे साल भर में एक दिन तो त्यौहार होता है. हम तो छुड़ाएंगे पटाखे. आपको क्या तकलीफ है?&#8221; और फिर से पटाखे दगाने लगे. मैंने कहा, &#8220;सारा धुँआ ऊपर आ रहा है&#8221; उन्होंने सुना नहीं. फिर मैंने कहा कि &#8220;आप ये बंद करें, वरना मैं पुलिस को कॉल कर दूँगी.&#8221; इस पर एक लड़का ऊपर मुँह करके चिढ़ाने लगा, &#8220;क्या कह रही हैं? आवाज़ नहीं आ रही है?&#8221;</p>
<p style="text-align:left;">उसकी इस हरकत से मुझे इतनी ज़ोर की चिढ़ मची कि मैंने मोटर ऑन करके टैप में पाइप फिट कर दिया और पानी से भिगो दिया उन सबको. अब नीचे भगदड़ मची हुयी थी. एक आदमी का &#8216;इगो&#8217; जाग गया. वो &#8216;आउट ऑफ कंट्रोल&#8217; होकर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा. बोला ये क्या बेहूदा हरकत है. मैंने चिल्लाकर कहा, &#8220;जैसे नीचे से धुँआ ऊपर आ सकता है. वैसे ही पानी भी नीचे जा सकता है.&#8221; सभी पटाखे छुड़ाने वाले और उनके पटाखे भीग चुके थे. ऊपर अँधेरा होने के कारण वो लोग ये नहीं देख पाये कि ये हरकत किसने और किस बिल्डिंग से की है? नीचे से आवाजें आ रही थीं&#8230;&#8217;ये क्या बदतमीजी है&#8217; &#8216;किस मकान से फेंका गया पानी&#8217; &#8216;मकान मालिक को बुलाओ और इनको निकलवा दो&#8217;</p>
<p style="text-align:left;">मैं थोड़ी देर तक उनका तमाशा देखती रही. फिर आकर अपने कमरे में सो गयी. वो लोग फिर कहीं से पटाखे ले आये और दुबारा वही काम शुरू कर दिया&#8230;लेकिन तब तक कुछ और लोगों ने भी विरोध करना शुरू कर दिया. बड़ी देर तक नीचे चिल्ल पों होती रही और इस सबकी शुरुआत करने वाली मैं गुंडी आराम से बिस्तर पर लेटी हुयी थी. मुझे हँसी आ रही थी कि ये सिरफिरे लोग मेरे कारण अपने पैसे से पटाखे खरीदकर फूँक रहे हैं <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p style="text-align:center;">( किस्सा नंबर तीन)</p>
<div id="attachment_1659" class="wp-caption alignleft" style="width: 284px"><a href="http://draradhana.files.wordpress.com/2013/05/579645_2863687720783_649089013_n.jpg"><img class="size-full wp-image-1659" alt="हमारे मुहल्ले की एक तस्वीर " src="http://draradhana.files.wordpress.com/2013/05/579645_2863687720783_649089013_n.jpg?w=640"   /></a><p class="wp-caption-text">हमारे मुहल्ले की एक तस्वीर</p></div>
<p style="text-align:left;">रात के तीन बजे सामने की बिल्डिंग के तीसरे मंजिल वाले का दिल रोमैंटिक हो गया था और उसने फुल वोल्यूम में &#8216;साँस में तेरे साँस मिली तो मुझे साँस आयी&#8217; गाना बजाना शुरू कर दिया. हमारा मुहल्ला ठहरा सँकरी गलियों वाला. ऐसा लगा जैसे गाना मेरे ही कमरे में बज रहा हो. मेरी आँख खुल गयी. बालकनी में निकली तो देखा कि एक-दो और लड़के देख रहे थे (यहाँ ज्यादातर सिविल की तैयारी करने वाले लड़के हैं, जिनकी पढ़ाई में विघ्न पड़ रहा था) पर समस्या ये कि इस बिल्डिंग से नीचे उतरकर सामने वाली बिल्डिंग में मना कौन करने जाय? वैसे भी सिविल वाले किसी से पंगा नहीं लेते. थोड़ी देर में सब अपने-अपने कमरों में चले गए.</p>
<p style="text-align:left;">मैंने सोचा कि जाने दो. बेचारा पूरा गाना सुन लेगा तो खुद ही बंद कर देगा. लेकिन पता नहीं सामने वाले को क्या फितूर सवार था कि उसने वही गाना करीब तीन बार रिपीट किया. जब चौथी बार गाना शुरू हो गया तो मेरी गुण्डई जाग गयी. मैंने दीवाली में बालकनी पर रखे पुराने &#8216;दीये&#8217; उठाये और एक-एक करके सामने वाले के दरवाजे पर निशाना लगाना शुरू किया. सोचा कि बन्दा आजिज आकर दरवाजा खोलेगा तो उससे कहूँगी कि &#8216;तुमने मुझे डिस्टर्ब किया तो मैं तुम्हें कर रही हूँ.&#8217; लेकिन वो नौबत नहीं आयी. तीसरा दीया फेंकते ही गाना बंद हो गया और दुबारा नहीं बजा <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p style="text-align:center;">(किस्सा खतम पइसा हजम <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> )</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/draradhana.wordpress.com/1655/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/draradhana.wordpress.com/1655/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=draradhana.wordpress.com&#038;blog=7739962&#038;post=1655&#038;subd=draradhana&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>क्या किया जाय?</title>
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		<pubDate>Sat, 18 May 2013 23:38:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>aradhana</dc:creator>
				<category><![CDATA[बातें]]></category>
		<category><![CDATA[Sanskrit]]></category>
		<category><![CDATA[sexual abuse]]></category>

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		<description><![CDATA[कभी-कभी औरतों को सेक्सुअल अब्यूज़ इस तरह से झेलना पड़ता है कि समझ में नहीं आता कि इसे अब्यूज़ मानें या न मानें और अगर मानें तो प्रतिक्रिया किस तरह से व्यक्त करें? क्योंकि किसी बात को लिखने में किसी &#8230; <a href="http://draradhana.wordpress.com/2013/05/19/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%af/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=draradhana.wordpress.com&#038;blog=7739962&#038;post=1637&#038;subd=draradhana&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:center;"><a href="http://draradhana.files.wordpress.com/2013/05/untitled.jpg"><img class="aligncenter  wp-image-1641" alt="Untitled" src="http://draradhana.files.wordpress.com/2013/05/untitled.jpg?w=226&#038;h=240" width="226" height="240" /></a></p>
<p>कभी-कभी औरतों को सेक्सुअल अब्यूज़ इस तरह से झेलना पड़ता है कि समझ में नहीं आता कि इसे अब्यूज़ मानें या न मानें और अगर मानें तो प्रतिक्रिया किस तरह से व्यक्त करें? क्योंकि किसी बात को लिखने में किसी का क्या मंतव्य रहा होगा, ये पता नहीं किया जा सकता. अगर आपने शिकायत की तो अगला सीधे-सीधे कह देगा कि उसका ये मतलब नहीं था और इल्जाम आप पर लग जाएगा.</p>
<p>कुछ साल पहले मैं संस्कृत के एक सेमीनार में मसूरी गयी थी. वहाँ आधुनिक संस्कृत के जाने-माने साहित्यकार आये हुए थे, जिन्हें उसी साल संस्कृत का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था. मैं उस सेमीनार की सबसे छोटी प्रतिभागी थी और आयोजनकर्ता मसूरी महाविद्यालय के संस्कृत विभाग के प्रवक्ता मेरे गाइड के परिचित थे, तो सबलोग मेरा बहुत ध्यान रख रहे थे. सबने मेरी तारीफ़ भी की कि मैं इतनी दूर से वहाँ पहुँची और &#8216;आधुनिक संस्कृत-नाटकों में चित्रित नारी-सम्बन्धी सामाजिक समस्याएँ&#8217; विषय पर एक अच्छा शोध-पत्र पढ़ा.</p>
<p>उस सेमीनार के अगले ही दिन दिल्ली में एक सेमीनार था. मैं पूरी रात मसूरी से यात्रा करके आयी और दिल्ली वाले सेमीनार में भी पहुँची. भोजन के समय सब लोग आपस में बात कर रहे थे. वहाँ भी वे कवि महोदय थे, जिनकी बात मैंने ऊपर की है. मुझसे मेरे गाइड ने कहा था कि कुछ आधुनिक साहित्यकार मिलेंगे तो उनकी पुस्तक के प्रकाशनों का पता ले लेना, ताकि उन्हें डाक से मंगाया जा सके क्योंकि आधुनिक संस्कृत-साहित्य की पुस्तकें या तो पुस्तकालय में मिलती हैं, या प्रकाशन से मंगानी पड़ती हैं. सामान्य पुस्तक-वितरण केन्द्रों या दुकानों पर नहीं मिलतीं. मैंने इसी उद्देश्य से कवि महोदय के पास जाकर निवेदन किया कि &#8216;सर आप अपने प्रकाशन का पता दे दीजिए, मुझे एक शोध-पत्र के सम्बन्ध में पुस्तकें मंगवानी हैं.&#8217; उन्होंने मुझसे कहा कि &#8216;मसूरी में तुम्हारा शोध-पत्र अच्छा था. तुम प्रतिभाशाली लड़की हो.&#8217; मुझे खुशी हुयी कि इतने बड़े विद्वान ने मेरे शोध-पत्र की ओर ध्यान दिया. मैंने उनसे उनके पते और हस्ताक्षर के साथ कुछ प्रोत्साहन के शब्द भी लिखने को कहा. उन्होंने लिखा. जब मैंने पढ़ना चाहा तो उन्होंने कहा कि &#8216;यहाँ नहीं घर जाकर पढ़ना&#8217; और मुझे देखकर मुस्कुराने लगे, तो मुझे थोड़ा अजीब लगा. लंच खत्म हो गया था, तो सबलोग अपनी-अपनी जगह बैठ गए.</p>
<p>कमरे पर आकर जब मैंने वो डायरी देखी, जिसमें कवि महोदय ने मेरे लिए &#8220;प्रोत्साहन के शब्द&#8221; लिखे थे, तो मेरे क़दमों के नीचे से ज़मीन निकल गयी. उन्होंने मेरे शारीरिक सौंदर्य पर एक श्लोक लिखा था संस्कृत में. जिसका भाव ये था कि &#8220;वैसे तो तुम्हारे कटि, वक्षस्थल, मुखमुद्रा और केश बहुत ही सुन्दर हैं, लेकिन जो तुम्हारे गालों के गढ्ढे में गिरा, उसके उबरने का कोई उपाय नहीं.&#8221; मैं दंग थी. समझ में नहीं आ रहा था कि एक कवि द्वारा अपनी तारीफ़ किये जाने पर खुश होऊँ या एक दादा के उम्र के आदमी के द्वारा एक तेईस-चौबीस साल की लड़की के शरीर को देखकर श्रृंगार-भाव जागृत होने पर रोऊँ. मैंने सोचा &#8216;इसका मतलब ये आदमी मेरे रिसर्च पेपर को नहीं सुन रहा था, बल्कि मेरे शरीर के अंग-प्रत्यंगों का निरीक्षण कर रहा था, नहीं तो इतनी सूक्ष्मता से वर्णन कैसे कर सकता था?&#8217;</p>
<p>ऐसा तब था जबकि सबको मालूम था कि मैं किसके पर्यवेक्षण में शोध कर रही थी और उसी के कहने से वहाँ गयी थी? मेरे गाइड एक जाने-माने व्यक्ति हैं और वो और उनकी पत्नी मुझे अपनी बेटी की तरह स्नेह करते थे. क्या इस आदमी को ज़रा-सा भी ये नहीं लगा कि उसका ये &#8220;श्रृंगार रससिक्त&#8221; श्लोक यदि मैं अपने सर को पढ़ा दूँ, तो इसकी क्या इमेज रह जायेगी? मुझे खुद भी समझ में नहीं आ रहा था कि कवि महोदय के मन में वह श्लोक लिखते समय सिर्फ काव्यात्मक प्रतिभा थी या कुछ और.</p>
<p>खैर, मैंने वो श्लोक अपने एक दोस्त के अलावा किसी को नहीं दिखाया. दोस्त श्लोक देखते ही गुस्से से उबल पड़ा. आखिर किसी सत्तर वर्षीय वृद्ध के मन में एक नवयुवती को देखकर ऐसे भाव कैसे आ सकते हैं? मान लो, ये माना जाय कि आदमी बूढा होता है, उसका दिल नहीं, तो भी, ऐसे पठन-पाठन के माहौल में इस ओर ध्यान कैसे जाता है किसी का? इस सबसे भी ऊपर कि संस्कृत के विद्वान होने के कारण उनको चारों आश्रमों के विषय में पता था, तो संन्यास आश्रम की अवस्था में श्रृंगार वाले भाव शोभा देते हैं क्या?</p>
<p>मैं नहीं जानती कि कवि महोदय की उक्त हरकत को लोग सेक्सुअल एब्यूज़ के श्रेणी में रखेंगे या नहीं. ये एक विवादित विषय हो सकता है. लोग रचनात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देने लगेंगे. मैं इतनी शुद्धतावादी नहीं हूँ कि रचनाकार की हर रचना पर नैतिक आधारों पर प्रश्नचिन्ह लगाती फिरूँ, लेकिन एक बात मैं जानती हूँ कि मुझे अच्छा नहीं लगा था. बहुत दुःख हुआ था और धक्का लगा था. अब सोचती हूँ तो हँसी आती है, लेकिन ये सच है कि इस घटना ने मुझे इतना डरा दिया कि मैं सेमीनार में तो जाती थी, लेकिन किसी से बात नहीं करती. व्यक्तिगत पहचान बनाना न मेरा स्वभाव कभी रहा है और न मैंने कभी इसकी कोशिश की है, लेकिन शिष्टाचारवश भी किसी से बात करने से बचने लगी.</p>
<p>मुझे लगता है किसी के भी बारे में ऐसा कुछ लिखना जिसे पढ़कर उसे अच्छा न लगे, &#8216;अब्यूज़&#8217; की ही श्रेणी में आना चाहिए. और यदि ऐसा सामने वाले के सेक्स को देखकर लिखा गया है, तो इसे &#8216;सेक्सुअल अब्यूज़&#8217; कहेंगे. यदि सामने वाला आपको सकारात्मक संकेत दे रहा हो, तो आप एक क्या, उस पर सौ श्लोक लिखिए. &#8216;श्रृंगारशतक&#8217; बना डालिए, लेकिन जो लड़की आपसे प्रोत्साहन की अपेक्षा रखती है, उसे उसके शरीर की तारीफ़ करके हतोत्साहित करना बिल्कुल भी उचित नहीं है. आपने उसे उत्साहित करने के बजाय इस तरह की शैक्षिक और अकादमिक गतिविधियों में भाग लेने से हतोत्साहित किया, तो आपने भी अब्यूज़ ही किया.</p>
<p>खैर, वो कवि महोदय इस समय दिवंगत हो चुके हैं, नहीं तो मैं यहाँ बाकायदा उनका नाम लिखती और उनका लिखा श्लोक भी. फिर मुझे परवाह नहीं होती कि उनसे पंगा लेने के कारण मुझे कहीं नौकरी न मिलती. और आज अगर वो मेरे साथ ऐसा करते तो मैं वहीं लंच की जगह पर सबको पढ़कर सुना देती कि देखो, कवि महोदय ने अपनी पोती की उम्र की लड़की पर कितना सुन्दर श्रृंगाररससिक्त श्लोक लिखा है.</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/draradhana.wordpress.com/1637/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/draradhana.wordpress.com/1637/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=draradhana.wordpress.com&#038;blog=7739962&#038;post=1637&#038;subd=draradhana&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>बैसवारा और आल्हा-सम्राट लल्लू बाजपेयी</title>
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		<pubDate>Mon, 13 May 2013 00:34:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>aradhana</dc:creator>
				<category><![CDATA[बातें]]></category>
		<category><![CDATA[आल्हा गायक]]></category>
		<category><![CDATA[आल्हा-सम्राट]]></category>
		<category><![CDATA[उन्नाव]]></category>
		<category><![CDATA[बैसवारा]]></category>
		<category><![CDATA[बैसवारा की शान]]></category>
		<category><![CDATA[बैसवारी]]></category>
		<category><![CDATA[लल्लू बाजपेयी]]></category>

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		<description><![CDATA[अभी कुछ दिन पहले &#8216;बैसवारा की शान&#8217; कहे जाने वाले लोकप्रिय आल्हा गायक लल्लू बाजपेयी के देहांत की खबर सुनी तो मन जाने कैसा-कैसा हो गया? शायद पूरे भारत के लोग लल्लू बाजपेयी को न जानते हों, शायद उन्होंने बैसवारा &#8230; <a href="http://draradhana.wordpress.com/2013/05/13/%e0%a4%ac%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%86%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b9%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9f-%e0%a4%b2/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=draradhana.wordpress.com&#038;blog=7739962&#038;post=1622&#038;subd=draradhana&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>अभी कुछ दिन पहले &#8216;बैसवारा की शान&#8217; कहे जाने वाले लोकप्रिय आल्हा गायक लल्लू बाजपेयी के देहांत की खबर सुनी तो मन जाने कैसा-कैसा हो गया? शायद पूरे भारत के लोग लल्लू बाजपेयी को न जानते हों, शायद उन्होंने बैसवारा का नाम भी कभी न सुना हो, लेकिन मैं बैसवारा क्षेत्र में ही पली-बढ़ी हूँ, इसलिए मेरा इससे बेहद लगाव है. लल्लू बाजपेयी को दूरदर्शन पर देखते और रमई काका उर्फ &#8216;बहिरे बाबा&#8217; के किस्से सुन-सुनकर बड़ी होने के कारण मैं बैसवारा को इन दोनों नामों की वजह से ही ज़्यादा जानती हूँ.</p>
<p>मेरे चाचा वसंत सिंह तोमर ने मुझे बैसवारा के इतिहास, साहित्य और संस्कृति आदि के बारे में बताकर मेरी रूचि इस ओर पैदा की थी, लेकिन स्कूली पढ़ाई-लिखाई और जीवन के झंझावातों के चलते मैं इस सम्बन्ध में अधिक अध्ययन नहीं कर पायी. फिर भी जितना जाना-सुना था, उसके अनुसार किसी ज़माने में यह क्षेत्र अपनी पृथक पहचान रखता था. यह पहचान समय के साथ-साथ धीरे-धीरे मिटती गयी. आमतौर पर बैसवारा को लोग रायबरेली से जोड़कर देखते हैं (शायद वहाँ स्थित इसी नाम के रेलवे स्टेशन के कारण), जबकि वास्तविकता यह है कि बैस राजपूतों के प्रभाव के कारण इस क्षेत्र को बैसवारा कहा जाता है. पहले यह क्षेत्र बाईस परगनों में फैला हुआ था. इन बाइस परगनों में आधुनिक उन्नाव, रायबरेली, लखनऊ व बाराबंकी के थोड़े-थोड़े भाग सम्मलित हैं.  दैनिक जागरण में एक बार बैसवारा के इतिहास के बारे में एक मज़ेदार लेख पढ़ा था और उसे बुकमार्क कर लिया था. इस लेख को <a href="http://www.jagran.com/uttar-pradesh/raibareilly-8435871.html" target="_blank"><span style="color:#ff6600;">यहाँ</span></a> पढ़ा जा सकता है.</p>
<p>हिंदी की एक बोली के रूप में &#8216;बैसवारी&#8217; का उतना ज़िक्र नहीं होता या हो सकता है कि होता हो, मुझे ही नहीं पता. वैसे भी अवधी खुद एक बोली है और बैसवारा को अवधी से जुड़ी हिंदी की एक &#8216;उपबोली&#8217; कहा जा सकता है. अवधी के बहुत से शब्दों से और लहजे से बैसवारा में काफी भिन्नता पायी जाती है, लेकिन मुख्यतः बैसवारी बोली से ज़्यादा &#8220;बैसवारा&#8221; क्षेत्र का अधिक महत्त्व है. किसी युग में इस क्षेत्र से हिंदी साहित्य के बड़े-बड़े नाम जुड़े हुए थे, जिनमें सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महावीर प्रसाद द्विवेदी, राम विलास शर्मा, शिवमंगल सिंह सुमन, प्रताप नारायण मिश्र, भगवतीचरण वर्मा, रमई काका आदि प्रमुख हैं. अभी कुछ दिन पहले बैसवारा से सम्बन्धित कैलाश बाजपेयी जी का एक लेख अमर उजाला में पढ़ा था- <a href="http://www.amarujala.com/news/samachar/reflections/shesh-vishesh/cultivation-of-poetry-in-baswara/" target="_blank"><span style="color:#ff6600;">बैसवारा में कविता की खेती</span><span style="color:#888888;"> ,</span></a>जिसमें उन्होंने अपने कुछ अनुभवों के साथ बैसवारा की समृद्ध साहित्यिक विरासत पर प्रकाश डाला है.</p>
<p>हमलोग लल्लू बाजपेयी का आल्हा गायन लखनऊ दूरदर्शन के चौपाल कार्यक्रम में बचपन से ही सुनते आये हैं. वे एक ओर तो अपने जोशीले गायन के लिए जाने जाते थे, दूसरी ओर तलवार और मूँछों के लिए. आल्हा गाते हुए वे अपने हाथ में एक तलवार रखते थे और गाते-गाते उसे भाँजते रहते थे. दुबले-पतले शरीर पर खूब बड़ी-बड़ी मूँछें उन्हें एक अलग व्यक्तित्व प्रदान करती थीं. कभी-कभी आल्हा गाते हुए वे स्टेज पर पैर पटकते हुए इतनी आगे बढ़ जाते थे कि हम छोटे बच्चों को लगता था कि अभी तलवार भाँजते हुए टी.वी. के बाहर आ जायेंगे <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  शुरू में तो डर लगता था, फिर तो ये हाल था कि इधर उनका आल्हा-गायन शुरू उधर हमलोग पढ़ाई-लिखाई, खेल-कूद छोड़कर टी.वी. के सामने <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>माँ चन्द्रिका देवी के उपासक श्री लल्लू बाजपेयी उन्नाव जिले के <span class="userContent"><span class="text_exposed_show">नारायणदास खेड़ा गाँव के रहने वाले थे. </span></span>इसी मई के पहले हफ्ते में श्री लल्लू बाजपेयी का देहांत हो गया. यूँ तो उनका असली नाम पं. चन्द्रनाथ था. पर हमलोग तो उन्हें लल्लू बाजपेयी के नाम से ही जानेंगे. उनको हार्दिक श्रद्धांजलि और नमन.</p>
<p>प्रस्तुत है उनके आल्हा-गायन का एक वीडियो-</p>
<p><span class='embed-youtube' style='text-align:center; display: block;'><iframe class='youtube-player' type='text/html' width='640' height='390' src='http://www.youtube.com/embed/gfLNe5PnSMw?version=3&#038;rel=1&#038;fs=1&#038;showsearch=0&#038;showinfo=1&#038;iv_load_policy=1&#038;wmode=transparent' frameborder='0'></iframe></span></p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/draradhana.wordpress.com/1622/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/draradhana.wordpress.com/1622/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=draradhana.wordpress.com&#038;blog=7739962&#038;post=1622&#038;subd=draradhana&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>कक्कू</title>
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		<pubDate>Tue, 07 May 2013 20:56:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>aradhana</dc:creator>
				<category><![CDATA[किस्सा-कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[fiction]]></category>
		<category><![CDATA[हल्का-फुल्का]]></category>
		<category><![CDATA[humor]]></category>
		<category><![CDATA[wit]]></category>

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		<description><![CDATA[पागल लोग होते हैं ना, उनका पाला ज़िंदगी में पागल लोगों से ही पड़ता है. मैं पागल हूँ, तो पागल लोग ही मिलते हैं. वो भी ऐसा ही है-कक्कू. खुद को वेल्ला कहने में ज़रा सी भी शर्म नहीं आती &#8230; <a href="http://draradhana.wordpress.com/2013/05/08/%e0%a4%95%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%82/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=draradhana.wordpress.com&#038;blog=7739962&#038;post=1603&#038;subd=draradhana&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>पागल लोग होते हैं ना, उनका पाला ज़िंदगी में पागल लोगों से ही पड़ता है. मैं पागल हूँ, तो पागल लोग ही मिलते हैं. वो भी ऐसा ही है-कक्कू. खुद को वेल्ला कहने में ज़रा सी भी शर्म नहीं आती उसे. जाने कौन सी घड़ी में उससे मुलाक़ात हुयी और दोस्ती हो गयी. यूँ तो खुद को बड़ा होशियार समझता है, लेकिन मेरे सामने होशियारी किसी की नहीं चलती&#8230; <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>एक तो रोज़ रोज़ चला आता है. मैं कितना तो मना करती हूँ, उसके बाद भी. बहाने भी ऐसे-ऐसे बनाता है कि जी जल जाय. कभी फोन का बिल लेकर दरवाजा खटखटाएगा &#8220;मैडम, ये बाहर धूप में पड़ा सूख रिया था, मैंने सोचा इसे घर पहुंचा दूँ. थोड़ी कुल्लर की हवा लेगा, तो हरा हो जाएगा.&#8221; &#8216;लिफाफा है या मनीप्लांट?&#8217; मैं लिफाफा लेकर दरवाजा बंद करना चाहूँगी तो बोलेगा &#8220;डाकिये को चाय नहीं पिलायेंगी? इत्ती मेहनत की बेचारे ने.&#8221; अब मैं तो इतनी बेशर्म हूँ नहीं कि दरवाजा बंद कर दूँ मुँह पर.</p>
<p>कभी-कभी दूध का पैकेट लेकर आ जाता है और बोलता है &#8220;पता चला है कि मैडम ने सुबह से चाय नहीं पी है&#8221; &#8220;पी चुकी हूँ&#8221; मैं बेरुखी से बोलूंगी, तो कहेगा &#8220;तो मुझे पिला दीजिए&#8221; मैं कहूँगी &#8220;शर्म तो आती नहीं तुम्हें&#8221; &#8220;नईं जी, बिल्कुल भी नईं, शर्म गल्त काम करने वालों को आती है. मैं गल्त करता नहीं और झूठ कदी मैं बोलता नईं.&#8221; &#8230;&#8217;बोलना तो ढंग से आता नहीं, झूठ क्या बोलेगा तू, बेशर्म&#8217; मैं सोचूंगी&#8230; पर फिर भी, कितना भी बेशर्म हो, है तो अपना दोस्त ही.</p>
<p>यूँ तो उसकी बेतुकी बातों पर गुस्सा आता, लेकिन उसके जाने के बाद हँसी आती. ये भी कमाल की बात है कि आप किसी के भी घर में &#8216;मान न मान मैं तेरा मेहमान&#8217; करके घुस जाओ, और मेजबान को आप पर गुस्सा भी न आये. पर धीरे-धीरे उससे गहरी दोस्ती होती गयी और पता चलता गया कि इस हँसी-खुशी वाले चेहरे के पीछे भी लंबी दर्दीली कहानी है. बड़ा स्ट्रगल किया है बंदे ने और खुद के बल पर खड़ा है.</p>
<p>एक दिन ऐसे ही आ गया. मैं थोड़ी परेशान थी, पर मैंने उससे ढेर सारी बातें की. करती ही गयी. वो मुझे लगातार देखे जा रहा था बस. मैंने उससे कहा भी &#8220;मेरी ओर ऐसे मत देखो&#8221; पर वो नहीं माना. मैंने उसकी आँखों में देखा और मुझे बड़ी ज़ोर का रोना आया. उसने उठकर पानी दिया. मैंने कहा, &#8220;मैं बहुत परेशान हूँ&#8221; तो बोला, &#8220;वो तो मुझे तभी लग गया था, जब तू लगातार बोले जा रही थी. मुझे पता है तू परेशान होती है, तो बकबक करके छिपाने की कोशिश करती है, पर इससे कोई फ़ायदा नहीं. मैं चाहता था कि तू रो ले. फूटकर बह जाने दे.&#8221;</p>
<p>मुझे बहुत आश्चर्य हुआ, गज़ब का मनोवैज्ञानिक है ये तो. &#8220;बड़ी-बड़ी बातें करने लग गए हो&#8221; मैंने कहा. तो बोला, &#8220;मैडम, ज़िंदगी की किताब है ही ऐसी. सब पढ़ा देती है&#8221; &#8220;चुप करो, तुम्हारे ऊपर ये दर्शन-वर्शन सूट नहीं करता.&#8221; मैं बोली, तो तपाक से बोला, &#8220;वो क्या होता है जी?&#8221;</p>
<p>मुझे दूसरा आश्चर्य तब हुआ, जब उसने कहा, &#8220;चाय बनाऊँ तेरे लिए&#8221; मुझे हँसी आ गयी. &#8220;चाय, और तुम?&#8221; अपने घर में उसने अपने बापजी को दूध गर्म करके देने के अलावा कभी रसोई का कोई काम नहीं किया.<br />
मैंने कहा, &#8220;नीतू (उसकी पत्नी) के लिए भी कभी चाय बनायी है&#8221;<br />
&#8220;अरे, वो मुझे किचेन से धक्के देकर भगा देती है&#8221;<br />
&#8220;किया क्या था तुमने?&#8221;<br />
&#8220;कुछ नहीं, वो बीमार थी, तो मैं चाय बनाने गया. मैंने वन-थर्ड दूध और टू-थर्ड पानी मिलाकर बर्तन में डालकर गैस पर रखा और वो बह गया&#8221;<br />
&#8220;वाह-वाह! बह गया, अपने-आप? आप क्या कर रहे थे?&#8221;<br />
“नहीं, मैंने कुछ नहीं किया था सच्ची. इतना भी पुअर कॉमन सेन्स नहीं मेरा”<br />
“चलो-चलो, पता है मुझे. जो पेट्रोल की टंकी के ऊपर माचिस की तीली लगाकर देखे कि तेल बचा है कि नहीं, उसका कॉमन सेन्स कैसा होगा?” उसका मुँह देखने लायक था. (उसने ही ये बात बतायी थी मुझे. ये तब की बात थी जब वो अठारह साल का था और पहले-पहल अपने बापजी की &#8216;एल.एम.एल. वेस्पा&#8217; लेकर दोस्त के साथ निकला था <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  )वो बोला, “लड़कियों को कोई बात नहीं बतानी चाहिए. जाने कब, किसके सामने, किस मौके पर उगल दें.”<br />
“मुद्दे पर आओ और बताओ जब चाय का पानी उबलकर बहा, तो तुम कहाँ थे?”<br />
&#8220;मैं एनीमल प्लेनेट देख रहा था&#8221; कहकर ज़ोर से हँसा,&#8221; फिर नीतू ने मुझे किचेन से निकाल दिया और तुरंत किचेन साफ करने लग गयी. उसकी तबीयत किचेन गन्दा देखकर ठीक हो गयी. हा हा हा हा! &#8220;<br />
&#8220;इसमें हँसने वाली कौन सी बात है? अपनी बीवियों को जो आपलोग &#8220;किचेन की शोभा&#8221; कहते फिरते हैं. दरअसल बात उनकी तारीफ़ की होती नहीं. मतलब तो ये होता है कि वो खाना बनाती है और आप बैठे-बैठे खाते हैं&#8221;<br />
&#8220;अरे, तो क्या मैं कुछ नहीं करता?&#8221;<br />
&#8220;क्या करते हो?&#8221;<br />
&#8220;वो खाना बनाती है, तो मैं उसको पप्पी देता हूँ. वो खुश हो जाती है और मन से काम करती है. हे हे हे हे!&#8221;<br />
&#8220;छिः&#8221;<br />
&#8220;अरे, तू छिः बोल रही है, तो आगे से नहीं करूँगा.&#8221;<br />
&#8216;ओफ्फोह! किससे पाला पड़ा है. ऐसे दोस्तों को कौन झेल सकता है मेरे सिवा?&#8217; मैं सोच रही थी कि वो चाय बनाकर ले आया.</p>
<p>&#8220;देख, कैसी बनी है, खराब बोलेगी, तो ऊपर फ़ेंक दूँगा. मैं किसी के लिए चाय नहीं बनाता.&#8221; अकड़ तो देखो इनकी. मैंने कहा, &#8220;मैं नहीं पीऊंगी. तुमने धौंस क्यों जमाई?&#8221; &#8220;अच्छा-अच्छा माफ कर. चल पी के बता&#8221; &#8216;ऐसे किसी से चाय पीने को कहते हैं भला?&#8217; मैंने चाय पी. सच में अच्छी बनी थी. पर मैंने उसे बताया नहीं और बोला, &#8220;ठीक है&#8221; उसका मुँह उतर गया. बेचारा <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  फिर अचानक कुछ सोचकर चौंका.</p>
<p>(बात दरअसल ये थी कि एक साल पहले कुछ दोस्त ग्राउंड से वापस आकर चाय पी रहे थे. कक्कू अकड़ से बोला, &#8220;मैंने आज तक किसी के लिए चाय नहीं बनायी.&#8221; मैंने कहा, &#8220;मैं बनवा लूँगी एक दिन.&#8221;<br />
&#8220;ओए चल.&#8221;<br />
&#8220;अरे नहीं, तू ऐवें ही मत ले इसे कक्कू. तुझे पता नहीं ये लड़की पत्थर को कोल्हू में डालकर तेल निकाल सकती है और जार्ज बुश से अपनी रसोई में चाय बनवा सकती है.&#8221; एक दोस्त बोला.<br />
&#8220;सुन लो.&#8221; मैंने कॉलर उचकाते हुए कक्कू से कहा.<br />
&#8220;हुँह, देखूँगा.&#8221;<br />
&#8220;तो लगी हज़ार-हज़ार की शर्त.&#8221; दोस्त बोला.<br />
&#8220;लगी.&#8221;)</p>
<p>मुझे पता है इस समय अचानक कक्कू को वो शर्त याद आ गयी. मैंने सारा समय उसे बातों में लगाए रखा चाय बनाते समय. उसका ध्यान ही नहीं गया कि वो शर्त हार रहा है.</p>
<p>उसने मेरी ओर देखा और बोला, &#8220;मान गए  छोरी&#8221;<br />
&#8220;तो रखो हज़ार रूपये.&#8221; कहते हुए मैंने उसकी ओर हथेली फैलाई. उसने बुरा सा मुँह बनाते हुए हज़ार रूपये मेरे हाथ पर रख दिए. मैं मन ही मन बोली, &#8216;तू बड़ा श्याणा है, तो मैं कम हूँ क्या कक्कू&#8217; <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/draradhana.wordpress.com/1603/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/draradhana.wordpress.com/1603/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=draradhana.wordpress.com&#038;blog=7739962&#038;post=1603&#038;subd=draradhana&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>जंगल जलेबी, स्लेटी रुमाल, नकचढ़ी लड़की और पहाड़ी लड़का</title>
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		<pubDate>Sat, 04 May 2013 04:42:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>aradhana</dc:creator>
				<category><![CDATA[यादें]]></category>
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		<description><![CDATA[बचपन की कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिनका मतलब उस समय समझ में नहीं आता है. जब हम बड़े हो जाते हैं, तब समझ में आता है कि अमुक काम को करने से, किसी विशेष व्यक्ति से मिलने से या &#8230; <a href="http://draradhana.wordpress.com/2013/05/04/%e0%a4%9c%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%b2-%e0%a4%9c%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%ac%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%9f%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%a8/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=draradhana.wordpress.com&#038;blog=7739962&#038;post=1596&#038;subd=draradhana&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://draradhana.files.wordpress.com/2013/05/image0003.jpg"><img class="aligncenter size-medium wp-image-1600" alt="image0003" src="http://draradhana.files.wordpress.com/2013/05/image0003.jpg?w=225&#038;h=300" width="225" height="300" /></a></p>
<p>बचपन की कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिनका मतलब उस समय समझ में नहीं आता है. जब हम बड़े हो जाते हैं, तब समझ में आता है कि अमुक काम को करने से, किसी विशेष व्यक्ति से मिलने से या किसी जगह जाने से क्यों रोका गया था? समझ ही कितनी होती है तब? ऐसे ही कुछ दोस्त होते हैं, जो उस समय हमारे दुश्मन लगते हैं, जबकि बाद में पता चलता है कि अगर वो न होते, तो कुछ घटनाओं का मतलब ही बदल जाता. और हमारे बचपन की यादें इतनी खुशनुमा न होतीं.</p>
<p>मैंने जब होश संभाला था, तो खुद को उन्नाव जिले की बाबूगंज रेलवे कालोनी में पाया था. उसके पहले की सारी यादें इतनी धुँधली हैं कि उन्हें मिलाकर एक अब्स्ट्रेक्ट ही बन पाता है. अम्मा-बाऊ की बतायी गयी बातों से ही उन्हें आपस में जोड़ पाती थी. तो अब वे भी नहीं हैं. उस कालोनी में जब हम आये तो मेरी उम्र लगभग पाँच साल रही होगी. और कालोनी में जो सबसे पहला दोस्त बना, वो मुझसे तीन-चार साल बड़ा था. यूँ तो उसका नाम राघवेन्द्र सिंह जलाल था, लेकिन उसके घर में सब उसे राकेश बुलाते थे. चार भाइयों और एक बहन में सबसे छोटा लड़का. उसके पिताजी आर.पी.एफ. में थे. कुमाउँनी थे वे लोग. पता नहीं कब उसके घर से मेरे घर का नाता बन गया और अम्मा उन सभी भाइयों को अपने बेटों जैसे मानने लगीं.</p>
<p>मेरी माता जी की एक विशेषता थी कि जब उनकी किरपा किसी पर बरसती थी, तो उसकी सीमा नहीं होती थी. राकेश पर अम्मा की विशेष कृपा थी. वो हम-दोनों भाई-बहनों से बड़ा और अम्मा की नज़रों में बहुत समझदार था, तो अम्मा ने उसे हमारा अभिभावक नियुक्त कर दिया. क्योंकि उन्हें लगता था कि कालोनी के और सारे लड़के एक नम्बर के गुंडे हैं और उनसे हमारी रक्षा उनके द्वारा नियुक्त सेनापति ही कर सकता था <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  वो हमदोनों की हर बदमाशी की खबर अम्मा तक पहुँचाता, अम्मा हमें डाँटती और मैं मन ही मन कुढ़ती रहती थी. अम्मा को पता था कि मैं एक नम्बर की ढीठ और नकचढी लड़की थी, इसलिए मेरे मामले में तो अम्मा मेरा पक्ष भी नहीं सुनती थीं. राकेश ने शिकायत की नहीं कि सीधे डाँट पड़ती (और कभी-कभी मार भी <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_sad.gif' alt=':(' class='wp-smiley' />  )</p>
<p>जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ती जा रही थी, राकेश की रोक-टोक और अम्मा की डाँट भी. उस कालोनी में दो फील्ड थीं, एक छोटी, जो रेलवे की सम्पत्ति थी और एक ठीक उसके बगल में खाली फील्ड, जो उस समय उन्नाव के सबसे बड़े मुहल्लों में से एक मोतीनगर से रेलवे कालोनी को अलग करती थी. राकेश मुझे बड़ी फील्ड में अकेले जाने से रोकता. हम आइस-पाइस खेलते, तो दो-तीन साल बड़े लड़कों के साथ छिपने से रोकता. एक बार जब मैंने उसकी बात नहीं मानीं, तो गुस्से में जाकर अम्मा से शिकायत कर दी. पता नहीं अम्मा के पास जाकर क्या खुसुर-फुसुर की कि अम्मा की बमबारी-गोलाबारी शुरू हो गयी- &#8220;कहा था तुमसे कि राकेश की बात माना करो, फिर क्यों उसके मना करने के बाद भी &#8220;उस लड़के&#8221; के साथ झाड़ी में छिपने गयी.&#8221; &#8220;तो क्या हुआ? ये कौन होता है मुझे मना करने वाला?&#8221; मेरे इतना कहने के साथ दो चांटे पड़े &#8216;तड़-तड़.&#8217; मैंने रोना शुरू कर दिया. राकेश को भी मेरा मार खाना बुरा लगा. उसने कहा &#8220;जाने दो चाची, आगे से नहीं करेगी ऐसा&#8221; पर इससे क्या? वो मेरा पक्का दुश्मन बन गया.</p>
<p>इस सबके बावजूद राकेश के साथ रहना मजबूरी थी क्योंकि हमदोनों &#8220;बिगड़े हुए&#8221; भाई-बहन को बिना उसके साथ के, न खेलने की इजाज़त थी और न कहीं आने-जाने की. दीदी का स्कूल सुबह से शाम तक का होता था और अम्मा को घर के सारे काम करने होते थे. हमारा स्कूल &#8216;विवेकानंद&#8217; रेलवे कालोनी के पीछे ही था और ग्यारह बजे हम प्राइमरी के बच्चे फ्री हो जाते. हम सारा दिन खेलते रहते. अम्मा हम पर नज़र नहीं रख सकती थीं, इसीलिये राकेश को कह रखा था इस काम के लिए और वो पूरी ईमानदारी से ये ज़िम्मेदारी निभाता था <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>मैं उससे कभी सीधे मुँह बात नहीं करती थी, उस समय के अलावा, जब वो हमारे लिए बाऊ की बनायी हुयी लग्गी से बड़ी फील्ड में लगे जंगल जलेबी और खजूर के पेड़ से फल तोड़ता था. जंगल जलेबी के विशालकाय पेड़ की निचली डालियों तक तो लग्गी पहुँच जाती थी, लेकिन ऊपर की डालों पर नहीं. एक दिन एक भी जंगल जलेबी न पाने से मेरा मुँह बन गया, तो राकेश पेड़ पर ही चढ़ गया. मुझे ये घटना पूरी तरह से याद नहीं क्योंकि उस समय मैं सिर्फ आठ या नौ साल की थी, लेकिन इतना याद है कि वो अपनी गंदी सी स्लेटी रुमाल में ऊपर से जंगल जलेबी के फल बाँधकर ले आया था. हम होली जलाने के लिए सूखी लकडियाँ काटकर ले आते, कभी-कभी उपले चुराते <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  वो एक काम और मेरी पसन्द का करता था. गर्मी की छुट्टियों में कैरम, लूडो और शतरंज खेलने के अलावा हमें कॉमिक्स पढ़ने का शौक चर्राया. वो पता नहीं कहाँ-कहाँ से प्रति चवन्नी एक दिन के किराए पर कॉमिक्स लेकर आता था और वापस भी वही करता था <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>एक-दो साल बाद बाऊ का ट्रांसफर उन्नाव के बगल में स्थित एक छोटे से स्टेशन मगरवारा हो गया. ट्रक में हमारे साथ चन्दन भैय्या भी गए हमें पहुँचाने. बाद में राकेश वहाँ भी आता था और कई बार &#8216;जंगल जलेबी&#8217; भी लाता था क्योंकि मगरवारा में वो पेड़ नहीं था. कभी-कभी खुमानी वगैरह भी ले आता था, जो उसके गाँव से कोई लाया होता था. पर मुझे वो अच्छी नहीं लगती थी.</p>
<p>मैं बचपन में उससे इतना चिढ़ती थी कि कालोनी के कल्चर के विरुद्ध मैंने उसे राखी कभी नहीं बाँधी. जबकि उसके चन्दन भैया को बांधती थी. मुझसे चार साल बड़ा था, लेकिन मैंने उसे कभी &#8216;भैय्या&#8217; नहीं कहा. मैं थोड़ी लंबी हो गयी तो वही मुझे चिढ़ाता था &#8220;गुड्डू, अब तो तू मुझसे बड़ी हो गयी. अब मैं तुझे &#8216;दीदी&#8217; कहूँगा- गुड्डू दीदी&#8221; तब भी मैं बहुत गुस्सा होती थी- &#8220;तुम हमें दीदी कहोगे, तो सबलोग हमें तुमसे बड़ा समझने लगेंगे&#8221; और कौन लड़की बड़ी दिखना चाहती है भला <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>जब मैंने मगरवारा से उन्नाव ट्रेन से पढ़ने आना-जाना शुरू किया और भीड़ में अनचाहे स्पर्शों का सामना करना पड़ा, तब समझ में आया कि क्यों अम्मा और राकेश मुझे किशोरावस्था के लड़कों के साथ सुनसान जगहों पर जाने से मना करते थे? क्यों कुछ लड़कों के साथ खेलने पर इसलिए पाबंदी थी कि वे &#8220;गंदे लड़के&#8221; थे और ये बात राकेश अम्मा को बताता रहता था. तब ये भी समझ में आया कि क्यों एक बार एक लड़के के साथ घनी झाडियों में छिपने के कारण राकेश की शिकायत पर अम्मा से दो चांटे खाने पड़े थे और ये भी कि उसने अम्मा के पास जाकर खुसुर-फुसुर करके क्या बताया होगा?</p>
<p>आज मुझे लगता है कि दस-ग्यारह साल की उम्र तक मेरे साथ कोई अप्रिय घटना न होने का सबसे बड़ा कारण अम्मा की सतर्कता के साथ ही राकेश का होना भी था. मैं सोच नहीं सकती कि उसके बगैर मेरा बचपन कैसा होता? यूँ तो नकचढ़ी और ढीठ, लेकिन दुनियादारी की बातों से अनजान मैं निश्चिन्त होकर इसलिए खेल पायी क्योंकि राकेश मेरे साथ होता था. शायद वो नहीं होता, तो अम्मा मुझे बाहर खेलने ही न भेजतीं. डेली पैसेंजरी शुरू करते ही मैं इतनी समझदार हो गयी कि अपनी देखभाल खुद कर सकती थी. अम्मा वैसे भी बहुत सतर्क रहती थीं और मगरवारा की कालोनी भी बहुत छोटी थी. मैं खूब ऊधम मचाती लड़कों के साथ क्योंकि मुझे कभी उनके साथ असहज नहीं लगा. शायद एक अप्रिय घटना मेरी ये सहजता मुझसे छीन लेती.</p>
<p>राकेश और उसके घरवालों से हमारा सम्बन्ध बहुत बाद तक बना रहा. जब बाऊ के रिटायरमेंट के बाद हम गाँव शिफ्ट हुए, तब भी चन्दन भइय्या पहुँचाने गए थे और बाद में अक्सर हमारे गाँव आते रहते थे. हमलोग भी जब उन्नाव जाते थे, तो उनलोगों से मिलते थे. बाद में वो लोग भी नैनीताल शिफ्ट हो गए. केन्द्र सरकार की नौकरी करने वाले लोग जाने कहाँ-कहाँ से आकर मिलते हैं और फिर अपने-अपने देस चले जाते हैं. मेरे बचपन के साथी जाने कहाँ हैं? कुछ की तो बिल्कुल कोई खबर नहीं.</p>
<p>मैं लगभग ग्यारह-बारह साल से राकेश से नहीं मिली हूँ. अभी कुछ दिन पहले चन्दन भइय्या का फोन आया. शायद दीदी से मेरा फोन नम्बर लिया था. उन्होंने बताया कि उनकी अम्मा गुजर गयी हैं. उन्होंने शादी बना ली है (वो लोग ऐसे ही बोलते थे) और टीचर लग गए हैं नैनीताल जिले में ही. राकेश भी वहीं कहीं पढ़ा रहा है. मुझसे भईया ने पूछा &#8220;दीदी ने बताया तूने शादी नहीं बनायी. तुम्हारे लोगों को हुआ क्या है? कोई शादी ही नहीं बनाना चाहता. राकेश ने भी नहीं बनायी अब तक.&#8221;</p>
<p>काठगोदाम एक्सप्रेस से हल्द्वानी जाते वक्त रास्ते में लालकुआँ पड़ता है. वहीं के एक गाँव में मेरे दोस्त का घर है. उन लोगों ने पता भी दिया था, लेकिन वो घर पर छूटा है और सालों से घर ही नहीं गई. सोच रही हूँ, फिर से पता पूछकर कभी हो ही आऊँ.</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/draradhana.wordpress.com/1596/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/draradhana.wordpress.com/1596/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=draradhana.wordpress.com&#038;blog=7739962&#038;post=1596&#038;subd=draradhana&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>खेलों से नाता</title>
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		<pubDate>Sun, 28 Apr 2013 03:57:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>aradhana</dc:creator>
				<category><![CDATA[यादें]]></category>
		<category><![CDATA[उन्नाव]]></category>
		<category><![CDATA[खेल]]></category>
		<category><![CDATA[हॉकी]]></category>

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		<description><![CDATA[बचपन से ही मेरी खेल-कूद में रूचि थी और अम्मा की लाख रोक-टोक के बावजूद मैं रेलवे कालोनी के लड़कों के साथ ऊधम मचाती रहती थी. स्कूल में भी खेलों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थी और इनाम भी जीतती थी. &#8230; <a href="http://draradhana.wordpress.com/2013/04/28/%e0%a4%96%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=draradhana.wordpress.com&#038;blog=7739962&#038;post=1590&#038;subd=draradhana&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>बचपन से ही मेरी खेल-कूद में रूचि थी और अम्मा की लाख रोक-टोक के बावजूद मैं रेलवे कालोनी के लड़कों के साथ ऊधम मचाती रहती थी. स्कूल में भी खेलों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थी और इनाम भी जीतती थी. प्राइमरी तक तो &#8216;आलू दौड़,&#8217; &#8216;मेंढक दौड़&#8217;, &#8216;म्यूज़िकल चेयर&#8217; वगैरह जाने कितने अजीब-अजीब से खेल होते थे और प्रतियोगिताएँ भी स्कूल के अन्दर ही होती थीं. लेकिन छठी कक्षा से मैंने एथलेटिक्स में भाग लेना शुरू कर दिया और जिले स्तर की विद्यालयीय प्रतियोगिताओं में जाने लगी.</p>
<p>जिला स्तर की खेल-प्रतियोगिताओं में एथलेटिक्स में सिर्फ तीन खेलों में भाग लेने का नियम था, तो मैं सौ मीटर दौड़, डिस्कस थ्रो (चक्का फ़ेंक) और लंबी कूद में भाग लेने लगी. जब मैंने पहली बार सौ मीटर दौड़ लगाई तो मेरी गेम टीचर सिद्दीकी मैम आश्चर्यचकित रह गयीं क्योंकि मैं फ़्लैट फूटेड थी. मुझे तब समझ में ही नहीं आता था कि इसका मतलब क्या होता है. बहुत बाद में पता चला. मैम को अचरज इस बात पर था कि मैं हर बार फर्स्ट आ जाती थी. ये शारीरिक कमी कभी भी मेरी तेज दौड़ में बाधा नहीं बनी. मज़े की बात की मैं दौड़ने का नियमित अभ्यास कभी नहीं करती थी. शायद अपनी कालोनी में खेलना मेरे काम आता था.</p>
<p>आठवाँ पास करने के बाद मेरे हॉकी के कोच नज़्मी भाई ने मुझे एथलेटिक्स में भाग न लेने का और इनडोर खेलों की ओर ध्यान देने की सलाह दी. क्योंकि उन्हें मालूम था कि मैं खेल के साथ-साथ पढ़ाई भी अच्छे से करना चाहती हूँ और एथलेटिक्स के लिए जितनी मेहनत चाहिए उतनी मैं नहीं कर पाऊँगी. फिर पिताजी के मगरवारा से उन्नाव ट्रांसफर के बाद से मेरा खेल का मैदान भी छिन गया था. उन्नाव की रेलवे कालोनी रेलवे स्टेशन के पास थी और कोई खेल का मैदान नहीं था. लड़के तो स्टेशन के उस पार स्थित जी.आई.सी. ग्रांउड में खेलने चले जाते थे. पर मेरा खेल छूट गया. जब तक स्कूल रहता था, तब तक वहीं खेल लेती थी. लेकिन गर्मियों की छुट्टियों में खेलों से नाता बनाए रखने और खुद को फिट रखने के लिए मैंने भी जी.आई.सी. ग्राउंड हॉकी खेलने जाना शुरू कर दिया. हालांकि हॉकी की प्रतियोगिता में कभी भाग  नहीं लिया.</p>
<p>मेरे लड़कों के साथ हॉकी प्रैक्टिस पर जाने का अम्मा ने बहुत विरोध किया, लेकिन बाऊ की अनुमति तुरंत मिल गयी थी. रेलवे कालोनी के लोग भी बहुत खुसुर-फुसुर करते थे कि &#8216;चौबे जी ने अपनी लड़की को ज़्यादा ही छूट दे रखी है. अरे बैडमिंटन, टेबल-टेनिस तक तो ठीक है, लेकिन हॉकी? उसमें तो आपस में भिड़ना पड़ता है, और वो भी मुसलमान लड़कों से&#8217; ऐसा लगता था कि मुसलमान लड़कों से भिड़कर मुझे छूत का रोग लग जाएगा <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>हॉकी प्रैक्टिस पर मैं सुबह पाँच बजे चल देती थी. मेरे साथ कालोनी की एक और लड़की सुनीता भी जाती थी. उन्नाव जिले की खेल की टीमों के विषय में एक दिलचस्प आँकड़ा ये था कि वहाँ की हॉकी की टीम में मुसलमान लड़कों का प्रतिशत ज़्यादा था और क्रिकेट टीम में हिन्दुओं का. प्रैक्टिस पर आने वाले सारे बड़े-बड़े लड़के थे, जिनको हमलोग भाई कहकर बुलाते थे और वो लोग हमें &#8216;छोटी&#8217; कहते थे. सिर्फ हमदोनों लड़कियाँ थीं और बाकी लड़के. इसलिए हमें ज़्यादा महत्त्व मिलता था <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  कुछ भाई लोगों के नाम तो मुझे अभी भी याद हैं. उरूज़ सर और नज़मी भाई तो हमारे स्कूल के कोच ही थे, इसके अलावा शिबली, सारिक और शाहिद भाई थे. केवल दो लड़के हमारे हमउम्र थे और उनका नाम कैसे भूल सकती हूँ <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  एक था शिब्बू और दूसरा राजू.</p>
<p>शिब्बू और राजू से मेरी कभी आमने-सामने बात नहीं हुयी, जबकि सुनीता बराबर बात करती थी. एक तो मैं वैसे ही थोड़ी संकोची और अंतर्मुखी स्वभाव की थी, दूसरे अपने हमउम्र लड़कों (खासकर शिब्बू, मुझे वो अच्छा लगता था <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  )से बात करने में और हिचकती थी. बचपन के साथियों की बात दूसरी थी. एक बार शिब्बू और राजू में शर्त लगी मुझसे बात करने की. हमलोग हॉकी प्रैक्टिस के बाद मैदान के बाहर एक बूढ़ी अम्मा की चाय की दुकान पर चाय पीते थे. हम चाय ही पी रहे थे शायद, शिब्बू कुछ देर मेरे पास आकर खड़ा रहा. और मैंने ज्यों पलटकर उसकी ओर देखा, वो भागकर राजू के पास बैठ गया. सबलोग हँसने लगे. जब मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से नज़मी भाई की ओर देखा, तो उन्होंने असल बात बतायी. मैंने मुस्कुरा भर दिया. पर बात नहीं की. कभी भी नहीं.</p>
<p>ओह! क्या मस्ती भरे दिन थे वे. जब खेल छूटा, तो सारे दोस्त भी छूट गए. नज़मी भाई अक्सर मुझसे कहते थे कि हाथ में स्टिक लेकर बिंदास चलने वाली लड़की को कोई छेड़ नहीं सकता. हाँ, हमारे हाथ में स्टिक होती थी, तो हममें एक अलग सा आत्मविश्वास भर जाता था. हम पूरा रेलवे स्टेशन क्रास करके अपनी कालोनी में आते थे. मुसाफिर अचरज भरी निगाहों से हमें देखते थे.</p>
<p>नज़्मी भाई मेरे हॉकी छोड़ने के बाद भी मुझसे मिलते रहते थे. मेरे घर भी आते-जाते थे. मुझे याद है कि चौरानबे में जब हम वैष्णो देवी घूमने गए थे, तो नज़मी भाई ने दीदी को सौ रूपये दिए थे प्रसाद चढ़ाने को. आपको शायद आश्चर्य होगा ये सुनकर कि उन्नाव के कुछ मुस्लिम लोगों की वैष्णो देवी में खासी श्रद्धा थी और वे लोग अक्सर वैष्णो देवी दर्शन के लिए भी जाते थे. खुद नज़मी भाई भी वैष्णो देवी होकर आये थे.</p>
<p>इस बरस उन्नाव गए हुए दस साल हो गए. आजकल नज़्मी भाई की बहुत याद आती है. जाने कैसे होंगे वो ?</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/draradhana.wordpress.com/1590/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/draradhana.wordpress.com/1590/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=draradhana.wordpress.com&#038;blog=7739962&#038;post=1590&#038;subd=draradhana&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>नारीवादी स्त्री प्रेम नहीं करती?</title>
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		<pubDate>Wed, 10 Apr 2013 01:26:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>aradhana</dc:creator>
				<category><![CDATA[बातें]]></category>
		<category><![CDATA[क्रौंच पक्षी]]></category>
		<category><![CDATA[नारीवादी]]></category>
		<category><![CDATA[प्रेम]]></category>
		<category><![CDATA[वाल्मीकि]]></category>
		<category><![CDATA[विरह]]></category>

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		<description><![CDATA[फेसबुक बड़ी मज़ेदार जगह है. यहाँ गंभीर विमर्श के लिए भले ही अपेक्षित स्थान न हो, लेकिन उसके लिए सामग्री अवश्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।  यह पोस्ट फेसबुक पर मेरे एक स्टेटस और उस पर आये एक कमेन्ट से &#8230; <a href="http://draradhana.wordpress.com/2013/04/10/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%ae-%e0%a4%a8%e0%a4%b9/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=draradhana.wordpress.com&#038;blog=7739962&#038;post=1580&#038;subd=draradhana&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>फेसबुक बड़ी मज़ेदार जगह है. यहाँ गंभीर विमर्श के लिए भले ही अपेक्षित स्थान न हो, लेकिन उसके लिए सामग्री अवश्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।  यह पोस्ट फेसबुक पर मेरे एक स्टेटस और उस पर आये एक कमेन्ट से सम्बन्धित है।</p>
<p>परसों मैंने एक बात लिखी प्रेम और आकर्षण के बारे में- <em>&#8220;कभी-कभी प्रेम और आकर्षण में अंतर कर पाना बहुत कठिन होता है। समय बीतने के साथ इनका अंतर पता चलता है। आकर्षण, एक निश्चित समयावधि के बाद घटता जाता है और प्रेम&#8230;समय के साथ धीरे-धीरे बढ़ता जाता है।&#8221;</em> इस स्टेटस पर कमेन्ट करते हुए एक फेसबुक मित्र सुनील जी ने कहा &#8216;औरत मर्द से दूर इंसानियत की भाषा में बात करने के लिए धन्यवाद!&#8217; उन्होंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि मैं अक्सर औरतों से जुड़े मुद्दे उठाती रहती हूँ और नारीवादी के रूप में जानी जाती हूँ। और लोगों को ये भ्रम होता है कि नारीवादी स्त्रियाँ पुरुषों से नफ़रत करती हैं, इसलिए प्रेम के बारे में सोचती ही नहीं हैं, प्रेम करना तो दूर की बात। कल रात में सोते समय इस बात की याद आ गयी। और अचानक से बहुत से विचार उमड़-घुमड़ मचाने लगे।</p>
<p>मैंने सोचा कि कि नारीवादी या आधुनिक खुले विचारों वाली औरतों को लोग प्रेम विरोधी क्यों समझ लेते हैं? उनके मन में प्रेम का कैसा स्वरूप होता है, जिसे सिर्फ परम्परागत ढंग से सोचने वाली स्त्रियों के साथ ही जोड़ा जा सकता है, आधुनिक स्त्रियों के साथ नहीं? शायद वो ये सोचते हैं कि चूँकि आधुनिक औरतें किसी तरह की गुलामी बर्दाश्त नहीं करतीं, इसीलिये उन्हें प्रेम में बंधना भी पसंद नहीं। जबकि उनका ये सोचना सिरे से गलत है।</p>
<p>इस विषय में सोचते-सोचते मुझे &#8216;स्त्री मुक्ति संगठन&#8217; की साथी पद्मा दी का एक वक्तव्य याद आया कि &#8216;प्रेम, दो स्वतन्त्र व्यक्तित्व वालों में ही संभव है।&#8217; दो ऐसे लोग, जो एक-दूसरे पर किसी मजबूरी के तहत निर्भर न हों। यहाँ यह बात समझनी चाहिए कि प्रेम में जो अंतर्निर्भरता होती है, वह मजबूरन थोपी गयी नहीं होती। वह स्वतः उपजती है और उसका कारण प्रेम के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता।</p>
<p>इसी प्रसंग में बहुत पहले एम.ए. की कक्षा में हमारी काव्यशास्त्र की प्राध्यापिका का एक व्याख्यान याद आया, जिसमें उन्होंने रामायण की रचना के विषय में लोकख्यात श्लोक का उद्धरण दिया था। वह श्लोक है-</p>
<p><em>मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ।<br />
यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी: काममोहितम् ।।</em><em><br />
</em>(हे निषाद, तुम अनंत वर्षों तक प्रतिष्ठा प्राप्त न कर सको, क्योंकि तुमने क्रौंच पक्षियों के जोड़े में से कामभावना से ग्रस्त एक का वध कर डाला है।)</p>
<p>इस श्लोक और इससे जुड़ी किंवदंती के विषय में प्रायः सभी सुधीजन जानते होंगे। महर्षि वाल्मीकि वन में भ्रमण कर रहे होते हैं कि उनकी दृष्टि रतिक्रिया में लिप्त क्रौंच पक्षी के जोड़े पर पड़ती है। अगले ही पल उनमें से एक बहेलिये के तीर से घायल होकर भूमि पर गिरकर मर जाता है। दूसरा पक्षी बेचैन होकर इस डाल से उस डाल घूम-घूमकर चीत्कार करने लगता है। यह ह्रदयविदारक दृश्य देखकर ही शोकाकुल महर्षि वाल्मीकि के मुख से उक्त श्लोक निकल पड़ता है। इस श्लोक को काव्य का प्रारम्भिक श्लोक माना जाता है। इसके पहले भी बहुत कुछ लिखा जा चुका था, लेकिन किसी दूसरे की भावनाओं को स्वयं अनुभूत कर स्वतः फूट पड़े ये शब्द ही कविता माने गए। संस्कृत काव्यशास्त्र के अनुसार &#8216;रसमय वाक्य ही काव्य है।&#8217; और दूसरों के भावों को कविता पढ़ते समय स्वयं अनुभव करना ही रस है।</p>
<p>अब प्रश्न यह कि मैंने यह प्रसंग यहाँ क्यों प्रस्तुत किया? बात ये है कि यह तो सभी लोग जानते हैं कि क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक की मृत्यु पर दूसरे के शोक से यह श्लोक फूटा. पर ये किसी को नहीं मालूम कि मरने वाला पक्षी नर था या मादा थी। हमारी प्राध्यापिका यही बात समझा रही थीं कि प्रायः लोग मानते हैं कि मरने वाला नर था, लेकिन उनके अनुसार मादा थी। वो इसलिए कि नर की मृत्यु पर मादा के विलाप में विरह की वह पीड़ा नहीं होगी, जो  नर के विलाप में होगी। उन्होंने इसे सीधे स्त्री-पुरुष के प्रेम से जोड़ा। उनके अनुसार एक स्त्री भी अपने पति को उतना ही प्रेम करती है, जितना कि पुरुष, लेकिन अपने पति या प्रेमी की मृत्यु पर उसके शोक में प्रेम के बिछड़ने के साथ ही साथ और भी बहुत सी आशंकाएँ होती हैं। वो यह सोचती है कि अब इतने बड़े संसार में वह अकेली कैसे रहेगी? उसके बच्चों का और उसका पालन-पोषण कैसे होगा? अब उसे शेष जीवन वैधव्य में बिताना पड़ेगा आदि-आदि।</p>
<p>इसके विपरीत यदि किसी पुरुष की प्रेमिका या पत्नी की मृत्यु होती है, तो उसके विरह में &#8216;सिर्फ प्रेम&#8217; होगा और कोई भावना नहीं क्योंकि वह आर्थिक या सामाजिक रूप से प्रेमिका या पत्नी पर आश्रित नहीं होता। वह सिर्फ अपनी पत्नी के विरह में व्याकुल होगा। विरह की तीव्र अनुभूति जितनी यहाँ होगी, उतनी वहाँ नहीं. यहाँ यह भी स्पष्ट है कि यहाँ &#8216;विरह&#8217; की बात हो रही है &#8216;शोक&#8217; की नहीं। पत्नी का दुःख &#8216;शोक&#8217; होगा क्योंकि उसमें प्रेम के अतिरिक्त अन्य भाव सम्मिलित होंगे, लेकिन पति का दुःख &#8216;विरह&#8217; होगा।</p>
<p>आपको ये स्थापना बेतुकी लग सकती है। कुछ-कुछ मुझे भी लगती है। लेकिन जब इसे हम ऊपर पद्मा दी की बात से और हमारे मौजूदा सामाजिक ढाँचे से जोड़कर देखते हैं, तो बात को समझने का नया आयाम मिलता है। हमारे समाज में लड़कियों  को &#8216;आत्मनिर्भर&#8217; नहीं बनाया जाता। मैंने दिल्ली में ऐसी लड़कियों से बात की है, जो ब्वॉयफ्रेंड, प्रेमी या पति चाहती हैं, तो अच्छी जॉब और अच्छे-खासे बैंक-बैलेंस वाला, जिससे वह उनके सारे खर्चे उठा सके। साथ ही इतना लंबा-तगड़ा भी कि उनकी रक्षा कर सके और मज़े की बात ये कि उन्हें अपनी इस सोच के लिए कोई &#8216;गिल्ट&#8217; भी नहीं होता। ऐसा लगता है कि उन्हें पति या प्रेमी नहीं, ए.टी.एम. या चौकीदार चाहिए। ये बात अलग है कि सारी लड़कियाँ ऐसा नहीं सोचतीं, लेकिन अधिकांश लड़कियों की सोच ऐसी ही है।</p>
<p>लेकिन इसमें लड़कियों की कोई गलती नहीं है. गलती उनके पालन-पोषण के ढंग में है, समाज की मानसिकता में है। क्यों नहीं हम अपनी लड़कियों को इतना आत्मनिर्भर बनाते कि वह अपना खर्च खुद उठा सकें, अपनी रक्षा खुद कर सकें। क्यों उन्हें ये सारी अपेक्षाएँ अपने प्रेमी या पति से करनी पड़ें?</p>
<p>बस यहीं पर मैं अपने मूल विषय पर आ जाती हूँ. एक आज़ाद या जिसे आप नारीवादी कहते हैं, वह औरत यदि किसी से प्रेम करती है तो सिर्फ इसलिए कि वह उसे अच्छा लगता है, उसके साथ समय बिताना अच्छा लगता है, &#8230;न कि इस कारण कि वह खर्चे उठा रहा है या सहारा और सुरक्षा दे रहा है। ठीक यहीं पर पद्मा दी की कही हुयी ये बात सटीक बैठती है कि प्रेम दो स्वतन्त्र व्यक्तित्वों में ही संभव है। एक-दूसरे पर निर्भरता यहाँ भी होती है, लेकिन किसी मजबूरी या एहसान के कारण नहीं, प्रेम के कारण।</p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/draradhana.wordpress.com/1580/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/draradhana.wordpress.com/1580/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=draradhana.wordpress.com&#038;blog=7739962&#038;post=1580&#038;subd=draradhana&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>रिश्तों की उलझनें</title>
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		<pubDate>Thu, 21 Mar 2013 15:26:27 +0000</pubDate>
		<dc:creator>aradhana</dc:creator>
				<category><![CDATA[बातें]]></category>
		<category><![CDATA[दोस्ती]]></category>
		<category><![CDATA[रिश्ते]]></category>

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		<description><![CDATA[कभी-कभी मन इतना उलझ जाता है कि कोई एक सिरा ढूँढे नहीं मिलता। मानवीय सम्बन्ध बहुत जटिल होते हैं। बस दोस्ती का रिश्ता ऐसा होता है, जहाँ सब कुछ सहज ही होता जाता है। इस रिश्ते को बनाये रखने के &#8230; <a href="http://draradhana.wordpress.com/2013/03/21/%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%89%e0%a4%b2%e0%a4%9d%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%82/">Continue reading <span class="meta-nav">&#8594;</span></a><img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=draradhana.wordpress.com&#038;blog=7739962&#038;post=1570&#038;subd=draradhana&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>कभी-कभी मन इतना उलझ जाता है कि कोई एक सिरा ढूँढे नहीं मिलता। मानवीय सम्बन्ध बहुत जटिल होते हैं। बस दोस्ती का रिश्ता ऐसा होता है, जहाँ सब कुछ सहज ही होता जाता है। इस रिश्ते को बनाये रखने के लिए कोई कोशिश या औपचारिकताएँ नहीं की जातीं, लेकिन कभी-कभी यहाँ भी कुछ सवाल सामने आकर खड़े हो जाते हैं।</p>
<p>कई बार ऐसा हुआ है कि मेरे बहुत करीबी दोस्तों ने या तो मेरा फोन उठाया नहीं या काट दिया, पलटकर फोन नहीं किया। मैंने दो-तीन दिन तक इंतज़ार किया और फिर मैंने ही फोन किया&#8230; ये मेरे वो दोस्त हैं, जिनकी पढ़ाई में मैंने अपनी पढ़ाई छोड़कर साथ दिया, जिनके इंटरव्यू की तैयारी के लिए घर नहीं गयी, जिनके समय के लिए अपने समय की परवाह नहीं की। जबकि इन्हें पता है कि मैं अकेली और बेरोजगार हूँ, तब भी इतनी ज़हमत नहीं उठायी कि एक बार पूछ लेते कि मैं किसी मुसीबत में तो फोन नहीं कर रही हूँ।  फिर भी मैंने दोस्ती खत्म नहीं की ये सोचकर कि वो लोग किसी ज़रूरी काम में व्यस्त रहे होंगे और ये कि इतनी छोटी-छोटी बातों में दोस्ती नहीं तोड़ी जाती।</p>
<p>अभी कुछ दिन पहले एक दोस्त ने फोन किया पहली बार। मैं अपनी सहेली के साथ बात कर रही थी। वो बहुत दिनों बाद मेरे पास आयी थी और हम किसी समस्या पर बात कर रहे थे। मैंने दोस्त का फोन नहीं उठाया। कुछ और समस्याओं के कारण मैं शाम को फोन ऑफ कर लेती हूँ, तो उसे मेसेज भी नहीं कर पायी। सोचा था फेसबुक ऑन करूँगी तो उसे मेसेज दे दूँगी। लेकिन उसने नाराज़ होकर मुझसे सम्बन्ध तोड़ लिये और मुझे ब्लाक कर दिया।</p>
<p>एक दूसरा दोस्त है। वो विदेश में है और बीमार है। हम लगभग तेरह साल से दोस्त हैं। इलाहाबाद में एम.ए. करने के समय से। उसे मैंने हमेशा अपने छोटे भाई की तरह माना है। इस समय वो बहुत परेशान है और फेसबुक पर मेसेज और फोन कर-करके मुझसे एक बात पूछ रहा है। वो बात मुझसे सम्बन्धित नहीं है और मेरी आदत नहीं है कि किसी और की बात किसी दूसरे को बताऊँ। जब मैंने उसे वो बात नहीं बताई तो उसने मेरे फेसबुक स्टेटस पर उलटा-सीधा लिखना शुरू किया। मैंने उसे ब्लाक कर दिया। दो-तीन दिन बाद उसने फोन करके माफी माँगी तो मैंने माफ कर दिया और फिर से फेसबुक फ्रैंड बना लिया। कुछ दिन बाद उसने फिर वही हरकत की। फोन कर-करके भी परेशान कर दिया। तो मैंने शाम को फोन ऑफ करना शुरू कर दिया। फेसबुक पर भी उसने वैसा ही किया। मेरी व्यक्तिगत ज़िंदगी के बारे में उल्टा-सीधा लिखना।</p>
<p>बहुत दुःख हुआ मुझे। आप एक ओर तो मुझे अपनी बड़ी बहन मानते हो और दूसरी ओर ऐसी हरकत। उसको छोटा भाई मानती हूँ, उसकी बीमारी और अकेलेपन का ख़याल करती हूँ, इसलिए उसकी गलतियाँ माफ करती जाती हूँ। अगर ऐसा कोई और करता तो मेरी ज़िंदगी से ही बाहर हो जाता।</p>
<p>अब सोचने की बात ये है कि या तो मैं ज़रूरत से ज़्यादा सहनशील हूँ। जो अपने दोस्तों की इग्नोरेंस को इग्नोर कर देती हूँ या फिर वो दोस्त ज़रूरत से ज़्यादा गुस्सैल। ये सोचना बड़ा अजीब लगता है कि वह सीमा कहाँ है, जहाँ आकर हम ये तय कर सकें कि कौन ज़्यादा बड़ी समस्या में होता है।  फोन करने वाला, या किसी कारणवश फोन न उठाने वाला। कोई बार-बार इग्नोर करे तो उससे दोस्ती तोड़ना समझ में आता है, लेकिन एक बार फोन न उठाने पर ऐसा करना क्या सही है?</p>
<p>है ना सोचने की बात? कुछ दोस्त ऐसे हैं जो एकदम इग्नोर कर देते हैं और जब मिलते हैं तो ऐसे तपाक से कि उनसे सगा कोई है ही नहीं। फिर इतना सटीक रीज़न देंगे फोन न उठाने का कि आप कुछ कह ही नहीं सकते। आपके पास कोई चारा ही नहीं होता उनकी बात मानने के अलावा। और कुछ दोस्त आपकी प्रॉब्लम नहीं समझते। उनको इससे कोई मतलब ही नहीं कि आप पर क्या गुज़र रही है या आप किस मानसिक स्थिति में हैं, वो बस अपनी बात कहे जायेंगे। उन्हें लगेगा कि उनकी बात ज़्यादा महत्वपूर्ण है और उनकी समस्या ज़्यादा गंभीर। बीच में मेरे जैसे लोग फँस जाते हैं। क्या करें, कहाँ जायं? मेरी बात कोई समझता क्यों नहीं रे <img src='http://s0.wp.com/wp-includes/images/smilies/icon_sad.gif' alt=':(' class='wp-smiley' /> </p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/draradhana.wordpress.com/1570/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/draradhana.wordpress.com/1570/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=draradhana.wordpress.com&#038;blog=7739962&#038;post=1570&#038;subd=draradhana&#038;ref=&#038;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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