वो जिन्होंने मुझे जन्म दिया, बनाया, अपनी गलतियों से सीखना सिखाया… अपनी चाल से चलना सिखाया… और… चले गए…मुझे अपनी यादों में डूबता-उतराता छोड़कर… इतनी मजबूती दी कि मैं टूट ना सकूँ… इतनी विनम्रता दी कि बड़ों के सामने झुक सकूँ … तो मैं खड़ी हूँ निश्चल, बिना इस अहंकार के कि मुझे कोई झुका नहीं सकता…
मैं अब भी उनकी यादों में डूबती-उतराती हूँ… तैरना नहीं आता… बस बहती जाती हूँ… पर बस, उनकी याद में … नहीं तो मैं अडिग हूँ, निश्चल, अपनी राह पर…









दोनों कविता पढ़ कर रोना आ गया…. मुझे भी अपनी माँ याद आ गयीं…..
जब भी आपको पढता हूँ भाव टूट पड़ते हैं , अश्रु बहने लगते हैं, आप के लेखन में एक इमानदारी है , सच्चाई है और हम सब में धधकता एक कोमल सा मन है ….मेरी दुआ है कि आप बहुत आगे जाएँ और अपने माँ पिता का नाम रोशन करें ….
Aaradhana…..G……kaaphi achha likhte hai aap……bhagwaan se prathana karta hun…..aap khoob tarkki kare……aur apne parents ke bataye rasto per chalkar unka naam roshan kare…….best of luck…….aapki kavita padhkar achha laga …….
“पर उसकी छाँव को मैंने
प्रतिपल महसूस किया,”
नमन
good,
aasa laga jasha dill ke ghari ma dabi bat sabdoma, sa nikal aai ho….
My eyes moistened after reading your kavita
samanya sabdo me bhavo ki abhivyakti adutiya he
bahut sunder…
यकीनन ये आपकी खुशकिस्मती है |
माँ जी और बाबू जी को सादर नमन |
(Y)
:’( :’(
Hakikat likhane ke liye madda chahiye.or apne se imandari.