खेलों से नाता

बचपन से ही मेरी खेल-कूद में रूचि थी और अम्मा की लाख रोक-टोक के बावजूद मैं रेलवे कालोनी के लड़कों के साथ ऊधम मचाती रहती थी. स्कूल में भी खेलों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थी और इनाम भी जीतती थी. प्राइमरी तक तो ‘आलू दौड़,’ ‘मेंढक दौड़’, ‘म्यूज़िकल चेयर’ वगैरह जाने कितने अजीब-अजीब से खेल होते थे और प्रतियोगिताएँ भी स्कूल के अन्दर ही होती थीं. लेकिन छठी कक्षा से मैंने एथलेटिक्स में भाग लेना शुरू कर दिया और जिले स्तर की विद्यालयीय प्रतियोगिताओं में जाने लगी.

जिला स्तर की खेल-प्रतियोगिताओं में एथलेटिक्स में सिर्फ तीन खेलों में भाग लेने का नियम था, तो मैं सौ मीटर दौड़, डिस्कस थ्रो (चक्का फ़ेंक) और लंबी कूद में भाग लेने लगी. जब मैंने पहली बार सौ मीटर दौड़ लगाई तो मेरी गेम टीचर सिद्दीकी मैम आश्चर्यचकित रह गयीं क्योंकि मैं फ़्लैट फूटेड थी. मुझे तब समझ में ही नहीं आता था कि इसका मतलब क्या होता है. बहुत बाद में पता चला. मैम को अचरज इस बात पर था कि मैं हर बार फर्स्ट आ जाती थी. ये शारीरिक कमी कभी भी मेरी तेज दौड़ में बाधा नहीं बनी. मज़े की बात की मैं दौड़ने का नियमित अभ्यास कभी नहीं करती थी. शायद अपनी कालोनी में खेलना मेरे काम आता था.

आठवाँ पास करने के बाद मेरे हॉकी के कोच नज़्मी भाई ने मुझे एथलेटिक्स में भाग न लेने का और इनडोर खेलों की ओर ध्यान देने की सलाह दी. क्योंकि उन्हें मालूम था कि मैं खेल के साथ-साथ पढ़ाई भी अच्छे से करना चाहती हूँ और एथलेटिक्स के लिए जितनी मेहनत चाहिए उतनी मैं नहीं कर पाऊँगी. फिर पिताजी के मगरवारा से उन्नाव ट्रांसफर के बाद से मेरा खेल का मैदान भी छिन गया था. उन्नाव की रेलवे कालोनी रेलवे स्टेशन के पास थी और कोई खेल का मैदान नहीं था. लड़के तो स्टेशन के उस पार स्थित जी.आई.सी. ग्रांउड में खेलने चले जाते थे. पर मेरा खेल छूट गया. जब तक स्कूल रहता था, तब तक वहीं खेल लेती थी. लेकिन गर्मियों की छुट्टियों में खेलों से नाता बनाए रखने और खुद को फिट रखने के लिए मैंने भी जी.आई.सी. ग्राउंड हॉकी खेलने जाना शुरू कर दिया. हालांकि हॉकी की प्रतियोगिता में कभी भाग  नहीं लिया.

मेरे लड़कों के साथ हॉकी प्रैक्टिस पर जाने का अम्मा ने बहुत विरोध किया, लेकिन बाऊ की अनुमति तुरंत मिल गयी थी. रेलवे कालोनी के लोग भी बहुत खुसुर-फुसुर करते थे कि ‘चौबे जी ने अपनी लड़की को ज़्यादा ही छूट दे रखी है. अरे बैडमिंटन, टेबल-टेनिस तक तो ठीक है, लेकिन हॉकी? उसमें तो आपस में भिड़ना पड़ता है, और वो भी मुसलमान लड़कों से’ ऐसा लगता था कि मुसलमान लड़कों से भिड़कर मुझे छूत का रोग लग जाएगा :)

हॉकी प्रैक्टिस पर मैं सुबह पाँच बजे चल देती थी. मेरे साथ कालोनी की एक और लड़की सुनीता भी जाती थी. उन्नाव जिले की खेल की टीमों के विषय में एक दिलचस्प आँकड़ा ये था कि वहाँ की हॉकी की टीम में मुसलमान लड़कों का प्रतिशत ज़्यादा था और क्रिकेट टीम में हिन्दुओं का. प्रैक्टिस पर आने वाले सारे बड़े-बड़े लड़के थे, जिनको हमलोग भाई कहकर बुलाते थे और वो लोग हमें ‘छोटी’ कहते थे. सिर्फ हमदोनों लड़कियाँ थीं और बाकी लड़के. इसलिए हमें ज़्यादा महत्त्व मिलता था :) कुछ भाई लोगों के नाम तो मुझे अभी भी याद हैं. उरूज़ सर और नज़मी भाई तो हमारे स्कूल के कोच ही थे, इसके अलावा शिबली, सारिक और शाहिद भाई थे. केवल दो लड़के हमारे हमउम्र थे और उनका नाम कैसे भूल सकती हूँ :) एक था शिब्बू और दूसरा राजू.

शिब्बू और राजू से मेरी कभी आमने-सामने बात नहीं हुयी, जबकि सुनीता बराबर बात करती थी. एक तो मैं वैसे ही थोड़ी संकोची और अंतर्मुखी स्वभाव की थी, दूसरे अपने हमउम्र लड़कों (खासकर शिब्बू, मुझे वो अच्छा लगता था :) )से बात करने में और हिचकती थी. बचपन के साथियों की बात दूसरी थी. एक बार शिब्बू और राजू में शर्त लगी मुझसे बात करने की. हमलोग हॉकी प्रैक्टिस के बाद मैदान के बाहर एक बूढ़ी अम्मा की चाय की दुकान पर चाय पीते थे. हम चाय ही पी रहे थे शायद, शिब्बू कुछ देर मेरे पास आकर खड़ा रहा. और मैंने ज्यों पलटकर उसकी ओर देखा, वो भागकर राजू के पास बैठ गया. सबलोग हँसने लगे. जब मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से नज़मी भाई की ओर देखा, तो उन्होंने असल बात बतायी. मैंने मुस्कुरा भर दिया. पर बात नहीं की. कभी भी नहीं.

ओह! क्या मस्ती भरे दिन थे वे. जब खेल छूटा, तो सारे दोस्त भी छूट गए. नज़मी भाई अक्सर मुझसे कहते थे कि हाथ में स्टिक लेकर बिंदास चलने वाली लड़की को कोई छेड़ नहीं सकता. हाँ, हमारे हाथ में स्टिक होती थी, तो हममें एक अलग सा आत्मविश्वास भर जाता था. हम पूरा रेलवे स्टेशन क्रास करके अपनी कालोनी में आते थे. मुसाफिर अचरज भरी निगाहों से हमें देखते थे.

नज़्मी भाई मेरे हॉकी छोड़ने के बाद भी मुझसे मिलते रहते थे. मेरे घर भी आते-जाते थे. मुझे याद है कि चौरानबे में जब हम वैष्णो देवी घूमने गए थे, तो नज़मी भाई ने दीदी को सौ रूपये दिए थे प्रसाद चढ़ाने को. आपको शायद आश्चर्य होगा ये सुनकर कि उन्नाव के कुछ मुस्लिम लोगों की वैष्णो देवी में खासी श्रद्धा थी और वे लोग अक्सर वैष्णो देवी दर्शन के लिए भी जाते थे. खुद नज़मी भाई भी वैष्णो देवी होकर आये थे.

इस बरस उन्नाव गए हुए दस साल हो गए. आजकल नज़्मी भाई की बहुत याद आती है. जाने कैसे होंगे वो ?

Posted in यादें | Tagged , , | 24s टिप्पणियाँ

नारीवादी स्त्री प्रेम नहीं करती?

फेसबुक बड़ी मज़ेदार जगह है. यहाँ गंभीर विमर्श के लिए भले ही अपेक्षित स्थान न हो, लेकिन उसके लिए सामग्री अवश्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।  यह पोस्ट फेसबुक पर मेरे एक स्टेटस और उस पर आये एक कमेन्ट से सम्बन्धित है।

परसों मैंने एक बात लिखी प्रेम और आकर्षण के बारे में- “कभी-कभी प्रेम और आकर्षण में अंतर कर पाना बहुत कठिन होता है। समय बीतने के साथ इनका अंतर पता चलता है। आकर्षण, एक निश्चित समयावधि के बाद घटता जाता है और प्रेम…समय के साथ धीरे-धीरे बढ़ता जाता है।” इस स्टेटस पर कमेन्ट करते हुए एक फेसबुक मित्र सुनील जी ने कहा ‘औरत मर्द से दूर इंसानियत की भाषा में बात करने के लिए धन्यवाद!’ उन्होंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि मैं अक्सर औरतों से जुड़े मुद्दे उठाती रहती हूँ और नारीवादी के रूप में जानी जाती हूँ। और लोगों को ये भ्रम होता है कि नारीवादी स्त्रियाँ पुरुषों से नफ़रत करती हैं, इसलिए प्रेम के बारे में सोचती ही नहीं हैं, प्रेम करना तो दूर की बात। कल रात में सोते समय इस बात की याद आ गयी। और अचानक से बहुत से विचार उमड़-घुमड़ मचाने लगे।

मैंने सोचा कि कि नारीवादी या आधुनिक खुले विचारों वाली औरतों को लोग प्रेम विरोधी क्यों समझ लेते हैं? उनके मन में प्रेम का कैसा स्वरूप होता है, जिसे सिर्फ परम्परागत ढंग से सोचने वाली स्त्रियों के साथ ही जोड़ा जा सकता है, आधुनिक स्त्रियों के साथ नहीं? शायद वो ये सोचते हैं कि चूँकि आधुनिक औरतें किसी तरह की गुलामी बर्दाश्त नहीं करतीं, इसीलिये उन्हें प्रेम में बंधना भी पसंद नहीं। जबकि उनका ये सोचना सिरे से गलत है।

इस विषय में सोचते-सोचते मुझे ‘स्त्री मुक्ति संगठन’ की साथी पद्मा दी का एक वक्तव्य याद आया कि ‘प्रेम, दो स्वतन्त्र व्यक्तित्व वालों में ही संभव है।’ दो ऐसे लोग, जो एक-दूसरे पर किसी मजबूरी के तहत निर्भर न हों। यहाँ यह बात समझनी चाहिए कि प्रेम में जो अंतर्निर्भरता होती है, वह मजबूरन थोपी गयी नहीं होती। वह स्वतः उपजती है और उसका कारण प्रेम के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता।

इसी प्रसंग में बहुत पहले एम.ए. की कक्षा में हमारी काव्यशास्त्र की प्राध्यापिका का एक व्याख्यान याद आया, जिसमें उन्होंने रामायण की रचना के विषय में लोकख्यात श्लोक का उद्धरण दिया था। वह श्लोक है-

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ।
यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी: काममोहितम् ।।

(हे निषाद, तुम अनंत वर्षों तक प्रतिष्ठा प्राप्त न कर सको, क्योंकि तुमने क्रौंच पक्षियों के जोड़े में से कामभावना से ग्रस्त एक का वध कर डाला है।)

इस श्लोक और इससे जुड़ी किंवदंती के विषय में प्रायः सभी सुधीजन जानते होंगे। महर्षि वाल्मीकि वन में भ्रमण कर रहे होते हैं कि उनकी दृष्टि रतिक्रिया में लिप्त क्रौंच पक्षी के जोड़े पर पड़ती है। अगले ही पल उनमें से एक बहेलिये के तीर से घायल होकर भूमि पर गिरकर मर जाता है। दूसरा पक्षी बेचैन होकर इस डाल से उस डाल घूम-घूमकर चीत्कार करने लगता है। यह ह्रदयविदारक दृश्य देखकर ही शोकाकुल महर्षि वाल्मीकि के मुख से उक्त श्लोक निकल पड़ता है। इस श्लोक को काव्य का प्रारम्भिक श्लोक माना जाता है। इसके पहले भी बहुत कुछ लिखा जा चुका था, लेकिन किसी दूसरे की भावनाओं को स्वयं अनुभूत कर स्वतः फूट पड़े ये शब्द ही कविता माने गए। संस्कृत काव्यशास्त्र के अनुसार ‘रसमय वाक्य ही काव्य है।’ और दूसरों के भावों को कविता पढ़ते समय स्वयं अनुभव करना ही रस है।

अब प्रश्न यह कि मैंने यह प्रसंग यहाँ क्यों प्रस्तुत किया? बात ये है कि यह तो सभी लोग जानते हैं कि क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक की मृत्यु पर दूसरे के शोक से यह श्लोक फूटा. पर ये किसी को नहीं मालूम कि मरने वाला पक्षी नर था या मादा थी। हमारी प्राध्यापिका यही बात समझा रही थीं कि प्रायः लोग मानते हैं कि मरने वाला नर था, लेकिन उनके अनुसार मादा थी। वो इसलिए कि नर की मृत्यु पर मादा के विलाप में विरह की वह पीड़ा नहीं होगी, जो  नर के विलाप में होगी। उन्होंने इसे सीधे स्त्री-पुरुष के प्रेम से जोड़ा। उनके अनुसार एक स्त्री भी अपने पति को उतना ही प्रेम करती है, जितना कि पुरुष, लेकिन अपने पति या प्रेमी की मृत्यु पर उसके शोक में प्रेम के बिछड़ने के साथ ही साथ और भी बहुत सी आशंकाएँ होती हैं। वो यह सोचती है कि अब इतने बड़े संसार में वह अकेली कैसे रहेगी? उसके बच्चों का और उसका पालन-पोषण कैसे होगा? अब उसे शेष जीवन वैधव्य में बिताना पड़ेगा आदि-आदि।

इसके विपरीत यदि किसी पुरुष की प्रेमिका या पत्नी की मृत्यु होती है, तो उसके विरह में ‘सिर्फ प्रेम’ होगा और कोई भावना नहीं क्योंकि वह आर्थिक या सामाजिक रूप से प्रेमिका या पत्नी पर आश्रित नहीं होता। वह सिर्फ अपनी पत्नी के विरह में व्याकुल होगा। विरह की तीव्र अनुभूति जितनी यहाँ होगी, उतनी वहाँ नहीं. यहाँ यह भी स्पष्ट है कि यहाँ ‘विरह’ की बात हो रही है ‘शोक’ की नहीं। पत्नी का दुःख ‘शोक’ होगा क्योंकि उसमें प्रेम के अतिरिक्त अन्य भाव सम्मिलित होंगे, लेकिन पति का दुःख ‘विरह’ होगा।

आपको ये स्थापना बेतुकी लग सकती है। कुछ-कुछ मुझे भी लगती है। लेकिन जब इसे हम ऊपर पद्मा दी की बात से और हमारे मौजूदा सामाजिक ढाँचे से जोड़कर देखते हैं, तो बात को समझने का नया आयाम मिलता है। हमारे समाज में लड़कियों  को ‘आत्मनिर्भर’ नहीं बनाया जाता। मैंने दिल्ली में ऐसी लड़कियों से बात की है, जो ब्वॉयफ्रेंड, प्रेमी या पति चाहती हैं, तो अच्छी जॉब और अच्छे-खासे बैंक-बैलेंस वाला, जिससे वह उनके सारे खर्चे उठा सके। साथ ही इतना लंबा-तगड़ा भी कि उनकी रक्षा कर सके और मज़े की बात ये कि उन्हें अपनी इस सोच के लिए कोई ‘गिल्ट’ भी नहीं होता। ऐसा लगता है कि उन्हें पति या प्रेमी नहीं, ए.टी.एम. या चौकीदार चाहिए। ये बात अलग है कि सारी लड़कियाँ ऐसा नहीं सोचतीं, लेकिन अधिकांश लड़कियों की सोच ऐसी ही है।

लेकिन इसमें लड़कियों की कोई गलती नहीं है. गलती उनके पालन-पोषण के ढंग में है, समाज की मानसिकता में है। क्यों नहीं हम अपनी लड़कियों को इतना आत्मनिर्भर बनाते कि वह अपना खर्च खुद उठा सकें, अपनी रक्षा खुद कर सकें। क्यों उन्हें ये सारी अपेक्षाएँ अपने प्रेमी या पति से करनी पड़ें?

बस यहीं पर मैं अपने मूल विषय पर आ जाती हूँ. एक आज़ाद या जिसे आप नारीवादी कहते हैं, वह औरत यदि किसी से प्रेम करती है तो सिर्फ इसलिए कि वह उसे अच्छा लगता है, उसके साथ समय बिताना अच्छा लगता है, …न कि इस कारण कि वह खर्चे उठा रहा है या सहारा और सुरक्षा दे रहा है। ठीक यहीं पर पद्मा दी की कही हुयी ये बात सटीक बैठती है कि प्रेम दो स्वतन्त्र व्यक्तित्वों में ही संभव है। एक-दूसरे पर निर्भरता यहाँ भी होती है, लेकिन किसी मजबूरी या एहसान के कारण नहीं, प्रेम के कारण।

Posted in बातें | Tagged , , , , | 26s टिप्पणियाँ

रिश्तों की उलझनें

कभी-कभी मन इतना उलझ जाता है कि कोई एक सिरा ढूँढे नहीं मिलता। मानवीय सम्बन्ध बहुत जटिल होते हैं। बस दोस्ती का रिश्ता ऐसा होता है, जहाँ सब कुछ सहज ही होता जाता है। इस रिश्ते को बनाये रखने के लिए कोई कोशिश या औपचारिकताएँ नहीं की जातीं, लेकिन कभी-कभी यहाँ भी कुछ सवाल सामने आकर खड़े हो जाते हैं।

कई बार ऐसा हुआ है कि मेरे बहुत करीबी दोस्तों ने या तो मेरा फोन उठाया नहीं या काट दिया, पलटकर फोन नहीं किया। मैंने दो-तीन दिन तक इंतज़ार किया और फिर मैंने ही फोन किया… ये मेरे वो दोस्त हैं, जिनकी पढ़ाई में मैंने अपनी पढ़ाई छोड़कर साथ दिया, जिनके इंटरव्यू की तैयारी के लिए घर नहीं गयी, जिनके समय के लिए अपने समय की परवाह नहीं की। जबकि इन्हें पता है कि मैं अकेली और बेरोजगार हूँ, तब भी इतनी ज़हमत नहीं उठायी कि एक बार पूछ लेते कि मैं किसी मुसीबत में तो फोन नहीं कर रही हूँ।  फिर भी मैंने दोस्ती खत्म नहीं की ये सोचकर कि वो लोग किसी ज़रूरी काम में व्यस्त रहे होंगे और ये कि इतनी छोटी-छोटी बातों में दोस्ती नहीं तोड़ी जाती।

अभी कुछ दिन पहले एक दोस्त ने फोन किया पहली बार। मैं अपनी सहेली के साथ बात कर रही थी। वो बहुत दिनों बाद मेरे पास आयी थी और हम किसी समस्या पर बात कर रहे थे। मैंने दोस्त का फोन नहीं उठाया। कुछ और समस्याओं के कारण मैं शाम को फोन ऑफ कर लेती हूँ, तो उसे मेसेज भी नहीं कर पायी। सोचा था फेसबुक ऑन करूँगी तो उसे मेसेज दे दूँगी। लेकिन उसने नाराज़ होकर मुझसे सम्बन्ध तोड़ लिये और मुझे ब्लाक कर दिया।

एक दूसरा दोस्त है। वो विदेश में है और बीमार है। हम लगभग तेरह साल से दोस्त हैं। इलाहाबाद में एम.ए. करने के समय से। उसे मैंने हमेशा अपने छोटे भाई की तरह माना है। इस समय वो बहुत परेशान है और फेसबुक पर मेसेज और फोन कर-करके मुझसे एक बात पूछ रहा है। वो बात मुझसे सम्बन्धित नहीं है और मेरी आदत नहीं है कि किसी और की बात किसी दूसरे को बताऊँ। जब मैंने उसे वो बात नहीं बताई तो उसने मेरे फेसबुक स्टेटस पर उलटा-सीधा लिखना शुरू किया। मैंने उसे ब्लाक कर दिया। दो-तीन दिन बाद उसने फोन करके माफी माँगी तो मैंने माफ कर दिया और फिर से फेसबुक फ्रैंड बना लिया। कुछ दिन बाद उसने फिर वही हरकत की। फोन कर-करके भी परेशान कर दिया। तो मैंने शाम को फोन ऑफ करना शुरू कर दिया। फेसबुक पर भी उसने वैसा ही किया। मेरी व्यक्तिगत ज़िंदगी के बारे में उल्टा-सीधा लिखना।

बहुत दुःख हुआ मुझे। आप एक ओर तो मुझे अपनी बड़ी बहन मानते हो और दूसरी ओर ऐसी हरकत। उसको छोटा भाई मानती हूँ, उसकी बीमारी और अकेलेपन का ख़याल करती हूँ, इसलिए उसकी गलतियाँ माफ करती जाती हूँ। अगर ऐसा कोई और करता तो मेरी ज़िंदगी से ही बाहर हो जाता।

अब सोचने की बात ये है कि या तो मैं ज़रूरत से ज़्यादा सहनशील हूँ। जो अपने दोस्तों की इग्नोरेंस को इग्नोर कर देती हूँ या फिर वो दोस्त ज़रूरत से ज़्यादा गुस्सैल। ये सोचना बड़ा अजीब लगता है कि वह सीमा कहाँ है, जहाँ आकर हम ये तय कर सकें कि कौन ज़्यादा बड़ी समस्या में होता है।  फोन करने वाला, या किसी कारणवश फोन न उठाने वाला। कोई बार-बार इग्नोर करे तो उससे दोस्ती तोड़ना समझ में आता है, लेकिन एक बार फोन न उठाने पर ऐसा करना क्या सही है?

है ना सोचने की बात? कुछ दोस्त ऐसे हैं जो एकदम इग्नोर कर देते हैं और जब मिलते हैं तो ऐसे तपाक से कि उनसे सगा कोई है ही नहीं। फिर इतना सटीक रीज़न देंगे फोन न उठाने का कि आप कुछ कह ही नहीं सकते। आपके पास कोई चारा ही नहीं होता उनकी बात मानने के अलावा। और कुछ दोस्त आपकी प्रॉब्लम नहीं समझते। उनको इससे कोई मतलब ही नहीं कि आप पर क्या गुज़र रही है या आप किस मानसिक स्थिति में हैं, वो बस अपनी बात कहे जायेंगे। उन्हें लगेगा कि उनकी बात ज़्यादा महत्वपूर्ण है और उनकी समस्या ज़्यादा गंभीर। बीच में मेरे जैसे लोग फँस जाते हैं। क्या करें, कहाँ जायं? मेरी बात कोई समझता क्यों नहीं रे :(

Posted in बातें | Tagged , | 33s टिप्पणियाँ

सरकारी अस्पताल में एक दिन

अक्सर एक कहावत टाइप की कही जाती है कि दुश्मनों को भी वकील या डॉक्टर के चक्कर ना लगाने पड़ें। और वो भी सरकारी अस्पताल से तो भगवान ही बचाए। फिर भी हम मिडिल क्लास लोगों को कभी न कभी सरकारी अस्पताल जाना ही पड़ता है। आज मुझे भी जाना पड़ा, अपनी छोटी बहन वंदना के साथ।

वैसे तो वंदना उत्तर प्रदेश राज्य प्रशासनिक सेवा की अफसर है और प्राइवेट क्लीनिक में दिखाने का खर्च उठा सकती है, लेकिन हमारे दोस्तों और परिचित डॉक्टरों का ये मानना है कि प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले ज़्यादातर डॉक्टर मरीज को ‘पेशेंट’ न समझकर ‘कस्टमर’ समझते हैं। ‘कट्स’ और ‘कमीशन’ के रूप में अपना हिस्सा पाने के लिए आलतू-फालतू के टेस्ट लिख देते हैं। मजबूरन जहाँ से वो कहें, उसी जगह से टेस्ट करवाने पड़ते हैं, चाहे वो जगह आपके घर से कितनी ही दूर हो। दिल्ली जैसे महानगर में ये बहुत कष्टप्रद होता है। इसीलिये उसने खुद को सरकारी अस्पताल में दिखाने का निर्णय लिया। आज हम एल.एन.जे.पी. (लोकनायक जयप्रकाश चिकित्सालय) उसके कुछ टेस्ट करवाने गए थे। वो टेस्ट बाहर से करवाना चाहती थी, लेकिन डॉक्टर की सख्त हिदायत थी कि टेस्ट भी इसी जगह से करवाने होंगे।

ढेर सारी पर्चियाँ समेटते जब हम अस्पताल पहुँचे तो वहाँ समझ में ही नहीं आ रहा था कि जाना किधर है? बहुत सारी छोटी-छोटी बिल्डिंग अलग-अलग बनी हुयी हैं वहाँ। कुछ पर्चियों पर तो रूम नंबर लिखा था, तो हम पूछते-पूछते वहाँ पहुँच गए। पता चला रूम नम्बर 37 में ब्लड का सैम्पल देने के लिए नंबर लेना होगा, फिर रूम नंबर 34 में जाकर ब्लड सैम्पल देना होगा। दोनों जगह बारी-बारी लंबी लाइन लगानी पड़ी। जहाँ से ‘नम्बर’ लेना था, वो जगह गंदी और धूल भरी थी। ऐसा लग रहा था कि बरसों से वीरान पड़े किसी खण्डहर को अस्पताल के काम के लिए खोल दिया गया हो। गनीमत ये कि हवा नहीं चल रही थी। अगर जरा सी भी हवा चलती तो धूल उड़कर मेरे नाक-मुँह में जाती और फिर ‘डस्ट एलर्जी’ से खाँस-खाँसकर मेरा बुरा हाल होता। शायद धूल ‘उड़ने’ के ही डर से वहाँ झाड़ू न लगाई जाती हो।

फिर हम कमरा नम्बर 34 में पहुँचे। वंदना ब्लड सैम्पल देने के लिए लाइन में लगी और मुझसे कहा कि मैं पता करके आऊँ कि एक्स रे कहाँ होता है, जिससे कमरा ढूँढने में ज़्यादा समय ना व्यर्थ हो। मैंने उस बिल्डिंग से निकलकर गार्ड भैया से पूछा कि एक्स रे कहाँ होता है, उन्होंने कहा कि ‘जी होता तो दो जगह है। एक ऊपर, एक नीचे। आपको कहाँ जाना है?’ मैंने पर्ची को ध्यान से देखा, उस पर कहीं भी नहीं लिखा था कि एक्स रे किस नम्बर के कक्ष में करवाना है। मेरे साथ एक और महिला थी, जिसे अपनी सास का एक्स रे करवाना था। लोअर मिडिल क्लास में बच्चों और वृद्ध घरवालों को दिखाने औरतें ही अस्पताल का चक्कर लगाती हैं। मेरी कामवाली भी अक्सर अपने बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाने के लिए छुट्टी लेती रहती है।

खैर हम दोनों दूसरे तल पर रूम नंबर 137 में पहुँचे। थोड़ी देर लाइन में लगे रहे। जब कक्ष से एक ‘परोपकारी क़िस्म का’ लड़का निकलकर कुछ लोगों के पर्चे देख रहा था, तो मेरे साथ की महिला ने अपना पर्चा भी दिखाया। पता चला ‘ये वाला’ एक्सरे नीचे रूम नम्बर 32 में होगा। मुझे ये नहीं समझ में आ रहा था कि अस्पताल वाले एक ही जगह ‘सब तरह’ के एक्स रे करवाने का प्रबंध करवा देते, तो इनका क्या बिगडता? लगे हाथ मैंने भी अपना पर्चा दिखाया और उसने मुझे भी नीचे जाने को कहा। नीचे जाते हुए ही वंदना का फोन आया कि यहाँ का काम खत्म हो गया। आप कहाँ हो? मैंने कहा अभी आती हूँ। मैं अक्सर रास्ते भूल जाती हूँ। इस बार भी भूल गयी। दूसरे दरवाजे से बाहर के गेट की ओर निकल गयी, फिर घूमकर वंदना की बिल्डिंग पहुँची और फिर उसे लेकर रूम नम्बर 32 में।

वहाँ फिर वही चक्कर। पहले नम्बर के लिए लाइन में लगना और फिर एक्स रे करवाने के लिए। इस बार फिर वंदना को लाइन में लगने को कहकर मैं अल्ट्रासाउंड वाले कमरे को ढूँढने निकल पड़ी। भला हो 137 वाले ‘परोपकारी’ लड़के का कि उसने इस पर्ची में नम्बर डाल दिया था- 128। मैं घुमावदार गलियों से होते हुए किसी तरह 128 के पास पहुँची, लेकिन थोड़ी दूर से ही वापस आ गयी कि कहीं भटककर दूसरे गेट से बाहर न निकल जाऊं। मुझे ये अस्पताल भूल-भुलैय्याँ की तरह लग रहा था।

मैं वापस वंदना के पास आकर खड़ी हो गयी और माहौल का जायजा लेने लगी। सरकारी अस्पतालों में ज़्यादातर ऐसे लोग जाते हैं, जिन्हें छूना और उनके आस-पास होना तक हम बर्दाश्त नहीं करते। उनके शरीर से पसीने की गंध आती है क्योंकि वो लोग ‘डीयो’ ‘अफोर्ड’ नहीं कर सकते। उन गंदे-मंदे, गन्हाते-बसाते लोगों के बीच से अगर कोई स्मार्ट, कान्फिडेंट और साफ-सुथरा आदमी या औरत निकलती दिखती थी, तो वो डॉक्टर होता/होती थी। उसके गले में लटक रहा स्टेथोस्कोप बोले तो ‘आला’ इस बात की ताकीद कर रहा होता। मुझे अलग ‘खाली’ खड़े देखकर एक औरत मेरे पास आयी और कमरा नम्बर 4 किधर है, पूछने लगी। उसके साथ एक बेहद बूढ़ी औरत थी, जिसे वह अम्मा कह रही थी। उसका कहना था कि “अम्मा को भर्ती कराना है।” मेरा दिमाग घूम गया। मैंने न में सिर हिलाया और सोचा कि ‘काश, मालूम होता कि कमरा नम्बर 4 किधर है, तो इस थकी-मांदी हताश सी दिखने वाली महिला की कुछ मदद कर सकती। मुश्किल से चल पा रही बूढ़ी औरत को लेकर बेचारी कहाँ-कहाँ भटकेगी?’

मेरे चिंतन में डूब जाने पर वो औरत वहाँ से चली गयी। थोड़ी देर बाद मैंने वंदना से कहा कि मैं बाहर जा रही हूँ। मुझे वहाँ घुटन हो रही थी और चाय पीने के तलब भी लग रही थी। बाहर आकर चाय पीते हुए मैंने सोचा कि आज इस पर पोस्ट लिखूँगी और धडाधड दो-तीन फोटो खींच लिए। बहुत से लोग दिल्ली/एन.सी.आर. के ग्रामीण इलाकों से इन सरकारी अस्पतालों में आते हैं। कई लोग पेड़ों के नीचे बैठे थे तो कई लोग गत्ता और चादर बिछाकर लेटे हुए थे। मुझे रेलवे प्लेटफार्म याद आने लगा। मैं वापस चिंतन मुद्रा में चली गयी- ‘ज़िंदगी एक प्लेटफार्म ही तो है, मुसाफिर आते हैं, जाते हैं, गाडियाँ आती-जाती हैं। या अस्पताल है…?’

मैंने जूस खरीदा और वंदना को ले जाकर दिया। वो खाली पेट घर से गयी थी। मैंने अगर हचक के “हैवी ब्रेकफास्ट” ना लिया होता, तो शायद मैं भी अगले दिन ओ.पी.डी. में किसी डॉक्टर को दिखाने की लाइन में लगी होती। मैंने वंदना से कहा “कैसा अस्पताल है ये? यहाँ तो मरीज टेस्ट करवाते-करवाते ही मर जाय।” हद है।

इस सारे घटनाक्रम में सबसे अच्छी लगी एक्स रे कर रही लड़की। वो इतनी तेजी और तन्मयता से अपना काम कर रही थी कि जी खुश हो गया। जब उसने नाम पुकारा तो हमें लगा कि ये दुबली-पतली सी लड़की ‘नाम पुकारने के लिए’ ही रखी गयी है। लेकिन अन्दर गए, तो देखा कि वो अकेली ही बुलाने का काम भी कर रही थी और एक्स रे लेने का भी। वो एक मरीज का नाम बुलाती…फलां कौन है? मरीज आगे बढ़ता। लड़का/आदमी होता तो कहती “शर्ट उतार दो” उसको एक्स रे लेने वाली जगह पर खड़ा करके कहती “ठुड्डी इसके ऊपर रखो…पैड को दोनों हाथों से पकड़ो…साँस ज़ोर से खींचकर रखना और रोके रखना”…फिर मशीन पर जाती, बटन दबाती और कहती “हो गया”। इसके बाद तेजी से एक्स रे फिल्म निकालकर उस पर पर्ची लगाकर अलग रखती और दूसरा नाम पुकारती…एक-एक मरीज को लड़की दो-तीन मिनट में निपटा रही थी। वंदना मुझे भी अन्दर ले गयी थी, तो मैंने उसकी कार्यकुशलता को ध्यान से देखा। मैं अनुमान नहीं लगा पा रही थी कि इस छोटी सी, महीन आवाज़ वाली लड़की ने सुबह से कितने मरीज़ ‘निपटाए’ होंगे? ईमानदारी से काम करने वाले हर जगह मिल जाते हैं :)

Image120

एल.एन.जे.पी. अस्पताल का इमरजेंसी विभाग

Image124

ज़मीन पर बैठे लोग

Image125

बैठने के लिए चादर बिछाती औरत

Posted in आस-पड़ोस, बातें | Tagged , , | 12s टिप्पणियाँ

एफ बी जेन बोले तो फेसबुकिया पीढ़ी

Instructables DIY laptop stand

हमने होश संभालते ही ब्लैक एंड व्हाईट टी.वी. पाया, जो कुछ दिनों में रंगीन हो गया। टीनेज में सेटेलाईट चैनल मिले और युवा होने पर मोबाइल और इंटरनेट। सोशल वेबसाईट तो हमारी युवावस्था के ढलने की ओर अग्रसर होने पर मिली है :) पर ‘एफ.बी. जेनरेशन’ ने आँखें खोलते ही ये सारी चीज़ें एक साथ अपने सामने पाईं। ये इनके साथ ही बड़ी हो रही है और इसलिए इन दोनों को अलग रख पाना आजकल के अभिभावकों के लिए नामुमकिन हो रहा है। मेरा साबका कुछ दिनों से इस पीढ़ी से सीधे-सीधे पड़ने लगा है, जबसे मेरी भतीजी जी दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने आयीं हैं।

पहले तो भतीजी जी मेरे ही साथ रह रही थीं, लेकिन मुझसे इनका साथ बर्दाश्त नहीं हुआ और मैंने इन्हें पी.जी. में शिफ्ट करवा दिया। नहीं, बच्ची बहुत सीधी है। उससे मुझे कोई समस्या नहीं थी, मुझे बस ये लग रहा था कि वो अपने कॉलेज के पास रहे, जिससे उसका समय बचे और बचा हुआ समय वो पढ़ाई में लगा सके। दूसरी बात आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनने के लिए अकेले रहना ज़रूरी है…। ये बात और लोगों को देर से समझ में आयी खुद उसको भी। (यहाँ अपनी प्राइवेसी के खतरे में पड़ने की बात को हमने चतुराई से छिपा लिया है।) अक्सर वीकेंड में वो मेरे पास आती-जाती है, लेकिन हमदोनों एक-दूसरे को दो दिन से ज़्यादा झेल नहीं सकते। :)

अब इनके एफ.बी. के किस्से। वैसे बच्ची पढ़ाकू है, लेकिन साथ ही उसमें आज की जेनरेशन के सारे गुण हैं। देवी जी फोटो इतनी स्टाइल में खिंचवाती हैं, कि हीरोइनें भी शर्मा जायं। हमको तो आज तक फोटो खिंचाना नहीं आया…पर अब इनको देखकर थोड़ा-थोड़ा हम भी सीख गए हैं। खूबसूरत स्माइल तो हम दोनों के जींस में ही है :) । हाँ, तो भतीजी जी जब भी फेसबुक पर अपनी प्रोफ़ाइल पिक अपलोड करती हैं, तो तुरंत हमें एक मेसेज करती हैं ‘नयी प्रोफ़ाइल पिक अपलोड की है। नेट ऑन कीजियेगा, तो एफ.बी पर जाकर मेरी फोटो लाइक कर दीजियेगा।’ :)

आजकल इनको ‘चैटिंग’ का शौक चर्राया हुआ है। मेरे यहाँ आते ही मेरे लैप्पी पर कब्ज़ा जमाकर बैठ जाती हैं और जब तक उसमें जान बाकी रहती है, चैटियाती रहती हैं। तभी छोडती हैं, जब बेचारे लैप्पी की बैटरी खत्म हो जाती है और वो बेहोश हो जाता है :P  बहुत दिनों से इनका लैपटॉप खरीदना ड्यू है। हमने कहा ‘बच्चा, हम तुम्हारे लिए लैपटॉप तो खरीदवा दे रहे हैं, लेकिन नेट कनेक्शन नहीं लेने देंगे।’ पर फ़ायदा ? आजकल तो साधारण से फोन पर नेट कनेक्शन उपलब्ध है। बस एक कार्ड डलवाओ और सोशल साईट पर पहुँच जाओ। फिर चाहे जितना चैटियाओ।

एक भतीजी के भतीजा जी भी हैं। (बड़े संयुक्त परिवारों में ऐसे अटपटे रिश्ते होते हैं) अभी पन्द्रह साल के हैं और अपनी प्रोफ़ाइल बनवा डाली एफ.बी. पर। हमें पता चला तो हमने उनके पिताजी से कहकर प्रोफ़ाइल डिलीट करवा दी। लेकिन बच्चे ने फिर से चुपचाप प्रोफ़ाइल बना ली। इस बार हमसे बचने के लिए अपनी फोटो नहीं लगाई। कॉमन फ्रेंड्स की पोस्ट पर कमेन्ट करने से भी बचते रहते थे। जहाँ हम पहुँचे नहीं, कि जनाब फूट लेते थे। एक दिन एफ.बी. के ही किसी मैटर को लेकर उनके पिताजी से बात हुयी, तो उन्होंने कहा ‘लो, तुम खुद ही बतिया लो इनसे।’ अब बच्चा बेचारा डर गया कि कहीं हम हड़का न दें। जब हमने कुछ नहीं कहा तो खुश हो गया। हमने भी सोचा कि इनलोगों को रोका तो जा नहीं सकता, तो बेहतर है कि इनसे एक कदम आगे रहो। खुद अपडेट रहो और बच्चों की अपडेट पर नज़र रखो :)

भतीजी जी इस बार फिर वीकेंड पर आयीं। खुद तो एफ.बी. पर चैट करने में बड़ा मज़ा आता है इन्हें, लेकिन जब हम नेट पर बैठते हैं, तो बोर होती हैं। परसों हमने इनकी बोरियत दूर करने के लिए दो-तीन कविताएँ नेट से पढ़कर सुना दीं, तो ये और भी ज़्यादा बोर हो गयीं और बदला निकालने के लिए अपने मोबाइल पर कानफाडू भड़कीला सा भोजपुरी गाना लगा दिया। हमने इतना कहा कि अब तुमको कविताएँ नहीं सुनायेंगे, इसे बंद कर दो प्लीज़, लेकिन बंदी पूरा गाना सुनाकर ही मानी :)

ये एफ.बी. जेनरेशन है। न आप इन्हें झेल सकते हैं और न ये आपको। हमने कल भतीजी से कहा ‘कभी-कभी आ जाया करो। मनोरंजन होता है।’ तो हमें चिढ़ाने के लिए बोली ‘हाँ, आयी हूँ, तो रहूँगी ना पूरी छुट्टी।’ सुनते ही हमारी तो जान निकल गयी। हमने कहा, ‘अब इतने दिन भी नहीं।’ सत्रह मार्च तक इनके सेमेस्टर ब्रेक की छुट्टी है। ‘तो मैं जाऊं मंडे को?’ हमने झट से कहा ‘हाँ!’ वो मुस्कुराई। उधर उसकी सहेलियाँ भी इंतज़ार कर रही थीं और बार-बार पूछ रही थीं वापस पी.जी. आने के बारे में। जाते-जाते बोली, ‘झूठ-मूठ में भी रोक नहीं सकतीं। बाय तो कर दीजिए।’ :)
हमने लैपटॉप से नज़र उठाये बिना कहा ‘बाय!’

Posted in बातें | Tagged , , , , , , | 20s टिप्पणियाँ

‘चौराहे पर सीढियाँ’ को पढ़ते हुए…

आज ही किशोर चौधरी का कहानी संग्रह ‘चौराहे पर सीढियाँ’ पढ़कर समाप्त (?) किया है। समाप्त के आगे प्रश्नचिन्ह इसलिए लगा है क्योंकि कोई भी किताब पढ़कर समाप्त नहीं की जा सकती और चौराहे पर सीढियाँ जैसी किताब तो बिल्कुल नहीं। ऐसी किताबें शुरू तो की जा सकती हैं, लेकिन खत्म नहीं क्योंकि आप उनके असर से ही बाहर नहीं निकाल पाते खुद को।

मैं इस पुस्तक की समीक्षा नहीं लिखने जा रही क्योंकि पहली बात तो मैं खुद को इस काबिल नहीं समझती और दूसरी बात किसी भी निरपेक्ष समीक्षा के लिए उसके प्रभावक्षेत्र से बाहर आना ज़रूरी होता है और मैं अभी वहीं अटकी हुयी हूँ। इस नज़रिए से देखा जाय, तो शायद मैं कभी इसकी समीक्षा न लिख सकूँ…मैं बस अपने अनुभव बाँटना चाहती हूँ, जैसा कि मैंने इस किताब को पढ़ते हुए महसूस किया।

चौदह कहानियों वाली दो सौ पेज की इस किताब को पढ़ने में मुझे एक महीना लग गया। एक तो पिछले कुछ दिन से मैं और मेरी दिनचर्या बहुत अस्त-व्यस्त है…दूसरे एक कहानी को पढ़ने के बाद उसका असर कम से कम दो-तीन दिन तक दिमाग पर हावी रहता है। नौ फरवरी को ये किताब मुझे मिली। मैंने एक कहानी तो दूसरे ही दिन पढ़ डाली, लेकिन बाकी को पढ़ने में काफी समय लगा।

किशोर की कहानियों को पढ़ना मानो ज़िंदगी को एक नए नज़रिए से देखना है। हर एक कहानी का कथ्य और शिल्प अपने में बेजोड़ है। मानवीय सम्बन्धों के सूक्ष्म बुनावट पर बारीकी से नज़र डालती हुयी ये कहानियाँ आपको अपने आस-पास के माहौल को एकदम अलग ढंग से दिखाती हैं। कुछ बेहद नए बिम्ब सामने आते हैं, जिन्हें पढ़कर मैं चकित रह जाती हूँ कि किसी बात को इस ढंग से भी कहा जा सकता है। जो कहानियाँ मुझे सबसे अधिक पसंद आयीं, वो हैं- गीली चाक, चौराहे पर सीढियाँ, खुशबू बारिश की नहीं मिट्टी की है, गली के छोर पर अँधेरे में डूबी एक खिड़की और अंजलि तुम्हारी डायरी से बयान मेल नहीं खाते। मुझे ये कहानियाँ ही क्यों ज़्यादा पसंद आयीं, इसका कोई ठीक-ठीक जवाब नहीं है मेरे पास। हो सकता है कि मैं उनके पात्रों के साथ खुद का जुड़ाव महसूस कर रही हूँ या कहानी ही अपनी सी लगी हो या कहानी कहने का ढंग बेहद रोचक रहा हो।

अंजलि की कहानी पढ़ने के बाद मैं अवाक् थी और दुखी भी। ये एक अभागी लड़की की कहानी हो सकती है, लेकिन ऐसी लड़कियाँ अपने आस-पास मिल जायेंगी आपको। खासकर मेरे जैसी लड़की को, जो खुद एक हॉस्टल में रही हो और अनगिनत लड़कियों की ज़िंदगी की कहानियों को करीब से देख चुकी हो। इस दुनिया में भोली-भाली और भावुक लड़की की कोई जगह नहीं अगर वो अकेली हो तो। हाँ, उसे कोई अच्छा साथी मिल जाय, जो उसको ‘इस्तेमाल’ न करे, तो ये उसकी खुशकिस्मती है। इस कहानी को पढ़ने के बाद मन घोर निराशा में डूब जाता है और मैं ये सोचती हूँ कि कहानीकार ने कैसे एक घटना के चारों ओर कहानी बुन डाली?

कहानी ‘चौराहे पर सीढियाँ’, जिसके नाम पर संग्रह का नाम रखा गया है, अद्भुत कहानी है। कथ्य तो बेमिसाल है, लेकिन शिल्प की दृष्टि से यह कहानी मुझे अद्वितीय लगी। मैं ज़्यादा कुछ नहीं कहूँगी, बस कुछ अंश उद्धृत कर रही हूँ-
“यह कई बार सुना गया था कि कुछ लोग रिश्तों को सीढ़ी बनाकर चढ़ जाते हैं और फिर वापस लौटना भूल जाते हैं। लेकिन ये कभी नहीं सुना कि चलने में समर्थ लोग नीचे रह गए किसी रिश्ते को उठाने के लिए कुछ देर घुटनों के बल चले हों।”…
“रास्ते के बारे में यह प्रसिद्ध था कि वह कहीं जाया करता है। लोग पूछा करते थे कि ये रास्ता कहाँ जाता है। ऐसा पूछने वालों से कुछ मसखरे कहते थे कि रास्ते कहीं नहीं जाते। वे यहीं पड़े रहते हैं लेकिन ये बात सच न थी। रास्ते समय के साथ चलते रहते थे। वे आपको समय से आगे-पीछे होने का सही ठिकाना बता सकने का हुनर रखते थे।”

‘खुशबू बारिश की नहीं मिट्टी की है’ एक बेहद खूबसूरत कहानी है, जो स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की सूक्ष्म पड़ताल करती हुयी एक खूबसूरत नोट के साथ खत्म होती है… खुशबू तो मिट्टी में पहले से मौजूद होती है, बारिश बस उसकी याद दिला देती है। शहरी जीवन के दिखावटी माहौल में रिश्तों की गर्मी को बचाए रखना बहुत कठिन होता है। एक उदाहरण देखिये। पार्टी का एक दृश्य-
“अपने-अपने ग्लास थामे हुए सब मर्द एक-दूसरे से इतने दूर खड़े थे कि कहीं छूत फैली हो। लेकिन शहरी जीवन में एक-दूसरे से दूर हो जाना ही असली सफलता है।”

‘गली के छोर पर अँधेरे में डूबी एक खिड़की’ प्रेम के रहस्यों को टटोलती है। प्रेम में डूबे दो युवाओं के मन की उद्विग्नता, आकुलता, छटपटाहट, दुस्साहस, नफरत आदि को अलहदा ढंग से प्रस्तुत करती है.
“लेकिन उन मुलाकातों से राहत आने की जगह बेचैनी की आफ़त आ जाया करती थी। दो बार देखा और तीन बार इशारे किये फिर आगे का पूरा दिन और रात खराब हो जाती थी।”
“…खिड़की में लगे हुए एक लोहे के सरिये को पकड़े हुए वह विदा लेने को ही था तभी एक नर्म नाज़ुक स्पर्श ने पागल-सा कर दिया। वह खुशी से झूमना चाह रहा था किन्तु इस नाज़ुक और प्रतीक्षित स्पर्श से उपजी उत्तेजना के अतिरेक में जड़वत हो गया।” (ये टुकड़ा पढ़ते हुए मुझे लगा कि मैं संस्कृत का कोई काव्य पढ़ रही हूँ।)
“इस बढ़ते जा रहे प्रेम में अब चाँद की परवाह कौन करता! एक नए किस्म का दुस्साहस उसमें भर गया था। वह पगलाया हुआ दूधिया रौशनी के बिछावन पर खड़ा खिड़की को चूमता रहता था। कुछ नयी खुशबुएँ भी उसी खिड़की में पहली बार मिलीं। एक अनूठी देहगंध बिस्तर के पसीने और सलवटों से भरी हुयी, उसके बदन के पास मंडराती रहती।”

मेरी सबसे अधिक मनपसंद कहानी ‘गीली चाक’ लगभग हर युवा पाठक की फेवरेट कहानी होगी, ये मैं पूरे दावे के साथ कह सकती हूँ। इस कहानी के बारे में कुछ बताकर मैं पाठकों का मज़ा किरकिरा नहीं करना चाहती। लेकिन कुछ खूबसूरत टुकड़े (वन लाइनर्स) ज़रूर शेयर करना चाहूँगी।
“पानी खत्म हो गया, बोतल बोझ हो गयी। प्रेम नहीं रहा, देह से नाता भी जाता रहा। ऐसे ही काश हर बंधन से आज़ाद हुआ जा सकता।”
“दीवारों पर पान गुटके की पीक फैली थी। जैसे किसी महबूब ने पिए हुए कह दिया हो, हाँ मैं तुम पर मरता था। और महबूबा भूत काल के ‘था’ को पकड़कर बैठ गयी हो।”
“सुबह की सर्द हवा में सफ़ाई वाली औरत ने अपने झाडू से कचरे को एक तरफ किया और गर्द चारों तरफ़ हो गयी। जैसे प्रेम कोई करता है और खुशबू सब तक आती है।”
“ये कोई ज़िंदगी थी? इसमें सिवा इसके कोई ख़ूबसूरती न थी कि ये बहुत अनिश्चित जीवन था।”
मैं ये कहानी पढ़कर बहुत रोई।क्यों? पता नहीं। लेकिन बहुत से युवा इस कहानी खुद को आसानी से जोड़ सकते हैं, खासकर वे, जो अपने घरों से दूर किसी बड़े शहर या महानगर में रहकर अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

बहुत दिनों बाद कोई किताब पढ़कर रोई, निराश हुयी, मुस्कुराई, उदास और बेचैन हुयी। बहुत दिनों बाद रात-रात में जागकर कहानियों की कोई किताब पढ़ी। वो कहानी ही क्या जो आपको भीतर तक हिला न दे? और किशोर की हर एक कहानी ने अन्दर तक प्रभावित किया। अभी मैं उस असर से बाहर नहीं निकल पायी हूँ।

181187_321714087928913_2043023282_n

Posted in Uncategorized | 7s टिप्पणियाँ

ब्लू

27072012058 - Copy 1

ज़िंदगी, एक कैनवस पर बनी इन्द्रधनुषी तस्वीर है, जिसमें बैंगनी और हरे के बीच नीला रंग आता है। वही नीला रंग जो आकाश, समुद्र और पहाड़ों को अपने रंग में रंग लेता है। मेरा मनपसंद उदासी का गहरा नीला रंग, जितना उदास, उतना ही सुकून देने वाला भी।

वैसे  तो और भी बहुत से रंग हैं ज़िंदगी में, लेकिन ब्लू इतना ज्यादा है कि सबको अपने प्रभाव में ले लेता है। हर ओर नीला, नीला और नीला। कल कई बार इस रंग ने पूरी तरह भिगोकर रख दिया। ऐसा लग रहा था कि होली आ गयी। पर होली में नीला रंग कौन खेलता है भला…?

एक दोस्त है। बहुत परेशान है। दूर विदेश में अकेला और बीमार। रात में फोन किया उसने। अक्सर करता है। मैं उसकी बात सुनती हूँ क्योंकि उसको बहुत मानती हूँ। वो कहता जाता है अपनी बातें। कई बार रोता है। मैं बस सुनती हूँ।  इसलिए कि वो अकेला है। मैं खुद परेशान हूँ, लेकिन वो मुझे खुद से ज़्यादा परेशान लगता है। उसके दिमाग में खून के थक्के हैं। कई आपरेशन हो चुके हैं और भी कई होने हैं। हमारे देश में इस बीमारी का कोई स्थायी इलाज नहीं है शायद और अगर होगा भी तो बहुत मँहगा।

वो फोन करता है और मुझसे कुछ पूछता है। एक ऐसी बात, जो मैं उसे बता नहीं सकती। वो मुझे वास्ता देता है अपनी अपनी ज़िंदगी का, जो कि बिल्कुल अनिश्चित है…मैं तब भी नहीं बता सकती। मैं कुछ नहीं कर सकती। उदासी का गहरा रंग घेर लेता है मुझको। वो उधर रोता है, मैं इधर रोती हूँ। वो बार-बार पूछता है, पर मैं नहीं बताती। छः बार फोन करने पर भी नहीं। आखिर मैं फोन काटकर ऑफ कर देती हूँ…और सारी रात गहरे नीले रंग में डूबी रहती हूँ…

एक बहन है। गाँव में रहती है। उसकी कहानी लिखी थी मैंने अपनी पोस्ट पर। वो वहाँ घुट-घुटकर जीती है और उसकी घुटन मैं यहाँ महसूस करती हूँ। वो निकलने की कोशिश कर रही है एक अंधे कुँए से। छटपटाती है, कुछ ऊपर चढ़ती है और फिर फिसलकर वापस कुँए में गिर जाती है। कल एक फोन आया। शायद फिर वो बाहर निकलने की सोच रही है। एक सीढ़ी लगाने की कोशिश की है, देखो क्या होता है? मैं बस इतना कर सकती हूँ। मैंने परसों अपने एक दोस्त से कहा था कि मैं दूसरों की चिन्ता ज़्यादा करती हूँ। इसलिए दुखी रहती हूँ। सिर्फ अपने बारे में सोचने वाले लोग खुश रहते हैं या नहीं… पता नहीं…

एक सहली है। ज़िंदगी के दोराहे पर भ्रमित। दो रास्तों से एक रास्ता चुनना था उसे। अक्सर लड़कियों के पास विकल्प बहुत कम होते हैं और जो विकल्प होते भी हैं, उनमें से किसी एक को चुनना बहुत कठिन होता है। लड़कियाँ निश्चित दायरों में पाली-पोसी जाती हैं। उन्हें बहुत सीमित आज़ादी मिली होती है। बस ये समझ लो कि एक छोटे पिंजरे से निकालकर बड़े पिंजरे में डाल दिया जाता है। इस पिंजरे में वो थोड़े बड़े दायरे में उड़ान भरती हैं। ज़्यादा उड़ने की कोशिश करती हैं, तो पिंजरे की दीवारों से टकराकर खुद ही गिर जाती हैं। पर दरवाजे नहीं खुलते। उन्हें उसी दायरे में अपनी दुनिया बनानी होती है। जो लड़कियाँ खुला आकाश देखकर आहें भरती है, वो खुद को परेशान करती हैं। कुछ मिलने वाला नहीं होता इस चाहत से। एक और चिड़िया पिंजरे की दीवार से टकराकर गिर पड़ी और हार मान ली। शायद उसे लगा हो कि पिंजरे की गुलामी से कहीं ज़्यादा खतरनाक नीले आकाश की आज़ादी है…या शायद कुछ और…

एक दोस्त ने लंबे समय बाद फोन किया। वो बड़ा अफसर बन गया है और तबसे उसकी दुनिया दिन पर दिन चमकीली होती जा रही है। उसकी ज़िंदगी में उदासी के गाढ़े नीले रंग की कोई जगह नहीं। उसे मेरा एक काम करना था। चार महीने हो गए, काम नहीं हुआ। वो मुझे बता रहा था कि वो कितना व्यस्त है। मैं बेमन से सुन रही थी अपने नीले वालपेपर को देखते हुए….मेरे साथ बहुत बड़ी दिक्कत ये है कि जब कोई दोस्त सिर्फ अपनी खुशी के लिए मुझसे बात करता है, तो मुझे लगता है कि वो मतलबी है और जब सिर्फ मेरी हालचाल लेने के लिए फोन करता है, तो लगता है कि मेरे ऊपर एहसान कर रहा है। खासकर ऐसे बड़े अफसर बन गए दोस्तों के बारे में न चाहते हुए भी ऐसा सोचने लगती हूँ। दोस्त ऐसे हैं नहीं, मुझे ऐसा लगता है, ये मेरी प्रॉब्लम है। मुझे ये लगता है कि इस ‘सिर्फ’ को दोस्ती के बीच में नहीं होना चाहिए। खैर…

कल फिर देर रात तक नींद नहीं आयी। एक कोरे हैंडमेड कागज़ पर एक लैंडस्केप बनाया, और अधूरा छोड़ दिया। फिर कभी शायद उसे पूरा कर सकूँ…और फिर रंग भर सकूँ…अपना मनपसंद नीला रंग…

Posted in बातें | Tagged , , , , , | 6s टिप्पणियाँ