आराधना चतुर्वेदी ’मुक्ति’
कुछ यादें... कुछ बातें... कुछ अनुभव... कुछ विचार... वादों-विवादों से परे...!
लेखागार
- मई 2013
- अप्रैल 2013
- मार्च 2013
- फ़रवरी 2013
- नवम्बर 2012
- अक्टूबर 2012
- सितम्बर 2012
- अगस्त 2012
- जुलाई 2012
- मई 2012
- अप्रैल 2012
- फ़रवरी 2012
- अक्टूबर 2011
- सितम्बर 2011
- अगस्त 2011
- मई 2011
- अप्रैल 2011
- मार्च 2011
- फ़रवरी 2011
- जनवरी 2011
- दिसम्बर 2010
- नवम्बर 2010
- अक्टूबर 2010
- सितम्बर 2010
- अगस्त 2010
- जुलाई 2010
- जून 2010
- मई 2010
- अप्रैल 2010
- मार्च 2010
- फ़रवरी 2010
- जनवरी 2010
- दिसम्बर 2009
- सितम्बर 2009
- मई 2009
श्रेणियाँ
ढूँढो अपनी पसंद का…
-
कल-परसों, उससे भी पहले…
- मीत के गुण्डा की गुण्डई के किस्से
- क्या किया जाय?
- बैसवारा और आल्हा-सम्राट लल्लू बाजपेयी
- कक्कू
- जंगल जलेबी, स्लेटी रुमाल, नकचढ़ी लड़की और पहाड़ी लड़का
- खेलों से नाता
- नारीवादी स्त्री प्रेम नहीं करती?
- रिश्तों की उलझनें
- सरकारी अस्पताल में एक दिन
- एफ बी जेन बोले तो फेसबुकिया पीढ़ी
- ‘चौराहे पर सीढियाँ’ को पढ़ते हुए…
- ब्लू
- झूमना अंतरिक्ष में नक्षत्रों के बीच
- दीवाने लोग
- दुनिया रंगीन सपनों वाली फूलों की सेज नहीं
- लिखि लिखि पतियाँ
- कुछ प्रश्न
- बीते हुए दिन… फिर से नॉस्टेल्जिया
- कि तू प्यार में है
- सागर, तुम इतने रीते क्यों हो?
Tag Archives: उन्नाव
बैसवारा और आल्हा-सम्राट लल्लू बाजपेयी
अभी कुछ दिन पहले ‘बैसवारा की शान’ कहे जाने वाले लोकप्रिय आल्हा गायक लल्लू बाजपेयी के देहांत की खबर सुनी तो मन जाने कैसा-कैसा हो गया? शायद पूरे भारत के लोग लल्लू बाजपेयी को न जानते हों, शायद उन्होंने बैसवारा … Continue reading
Posted in बातें
Tagged आल्हा गायक, आल्हा-सम्राट, उन्नाव, बैसवारा, बैसवारा की शान, बैसवारी, लल्लू बाजपेयी
18s टिप्पणियाँ
जंगल जलेबी, स्लेटी रुमाल, नकचढ़ी लड़की और पहाड़ी लड़का
बचपन की कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिनका मतलब उस समय समझ में नहीं आता है. जब हम बड़े हो जाते हैं, तब समझ में आता है कि अमुक काम को करने से, किसी विशेष व्यक्ति से मिलने से या … Continue reading
खेलों से नाता
बचपन से ही मेरी खेल-कूद में रूचि थी और अम्मा की लाख रोक-टोक के बावजूद मैं रेलवे कालोनी के लड़कों के साथ ऊधम मचाती रहती थी. स्कूल में भी खेलों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थी और इनाम भी जीतती थी. … Continue reading
बीते हुए दिन… फिर से नॉस्टेल्जिया
नॉस्टेल्जिया बड़ी अजीब सी चीज़ होती है। पता नहीं ये एक मानसिक स्थिति है या मानसिक विकार या बीमारी, लेकिन है अजीब। मुझे लगता है कि कुछ लोग प्रवृत्ति से ही अतीतजीवी होते हैं और ये उनकी बीमारी नहीं होती। … Continue reading
खुरपेंचें, खुराफातें…पीढ़ी दर पीढ़ी
जी, खुरपेंची होना हमारे बैसवारा की सबसे बड़ी विशेषता है. बड़े-बड़े लम्बरदार भी इससे बाज नहीं आते. बचपन से ऐसी खुराफातें देखकर बड़ी होने के बाद भी मैं इतनी सीधी (?) हूँ, इससे सिद्ध होता है कि वातावरण हमेशा ही … Continue reading
अँगीठी पर भुने भुट्टे और स्टीम इंजन के दिन
बचपन अलग-अलग मौसमों में अलग खुशबुओं और रंगों के साथ याद आता है। डॉ॰ अनुराग के एक अपडेट ने यादों को क्या छेड़ा, परत दर परत यादें उधड़ती गयीं, जिंदगी के पन्ने दर पन्ने पलटते गए। जैसे बातों से बातें निकलती … Continue reading
दिए के जलने से पीछे का अँधेरा और गहरा हो जाता है…
मैं शायद कोई किताब पढ़ रही थी या टी.वी. देख रही थी, नहीं मैं एल्बम देख रही थी, बचपन की फोटो वाली. अधखुली खिड़की से धुंधली सी धूप अंदर आ रही थी. अचानक डोरबेल बजती है. मैं दरवाजा खोलती हूँ, … Continue reading







