Tag Archives: कविता

झूमना अंतरिक्ष में नक्षत्रों के बीच

तुमसे मिलना है फूलों की घाटी में होना, असंख्य पुष्पों की हज़ारों खुशबुओं और सैकड़ों रंगों के बीच डूब जाना, ढाँप लेना मुँह को शीतल परागकणों से, घास के मखमली कालीन पर लोट लगाना…. ताकना तुम्हारी आँखों में, गहरे नीले … Continue reading

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दीवाने लोग

दीवाने लोग पड़ ही जाते हैं अक्सर किसी न किसी के प्यार में अफ़सोस ये कि जिससे प्यार है, उसे पता ही नहीं, जाने क्या मिलता है और जाने क्या खो जाता है, रात आती है, मगर नींद गुमशुदा है … Continue reading

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घर और महानगर

घर (१.) शाम ढलते ही पंछी लौटते हैं अपने नीड़ लोग अपने घरों को, बसों और ट्रेनों में बढ़ जाती है भीड़ पर वो क्या करें ? जिनके घर हर साल ही बसते-उजड़ते हैं, यमुना की बाढ़ के साथ. (२.) … Continue reading

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एक सुबह, एक शाम, एक रात

एक सुबह, बांस की पत्ती के कोने पर अटकी ओस की बूँद कैद कर ली थी, आँखों के कैमरे में आज भी कभी-कभी वो बंद पलकों में उतरती है, … … एक शाम, पक्षियों के कलरव को सुना था बैठकर … Continue reading

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गुनगुनी धूप

गुनगुनी धूप कल उतरी मेरी बालकनी में, जैसे अम्मा ने हौले से दुलार दिया हो मुझे, इससे पहले तो धूप में न था इतना अपनापन … क्या भेजा है कोई संदेश उसने स्वर्ग से?

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अवसाद-२ (साँझ की धूप)

धान के खेतों पर दूर तक फैली, थकी, निढाल पीली-पीली साँझ की धूप, आ जाती है खिड़की से मेरे कमरे में, और भर देती है उसे रक्ताभ पीले रंग से, … … इस उदास पीले रंग की अलौकिक आभा से … Continue reading

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अवसाद-1 (अकेलापन)

अखरने लगता है अकेलापन शाम को… जब चिड़ियाँ लौटती हैं अपने घोसलों की ओर, और सूरज छिप जाता है पेड़ों की आड़ में, मैं हो जाती हूँ और भी अकेली. … … मैं अकेली हूँ… सामने पेड़ की डाल पर … Continue reading

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