कुछ ऐसी घटनाएँ होती हैं आपकी ज़िंदगी में, जो अक्सर गुदगुदा जाती हैं हौले से… और शांत बैठे रहने पर भी एक मुस्कान सी तिर जाती है होठों पे… ऐसे ही कुछ किस्से यहाँ लिख रही हूँ… ये किस्से जीवन के उन स्वर्णिम दिनों के हैं, जब उड़ने को सारा आसमान भी कम लगता है… और बिना परों के भी मन जाने कहाँ-कहाँ हो आता है. जब उमंग और जोश अपनी सौ प्रतिशत की सांद्रता के साथ हममें मौजूद होते हैं और बात-बात पर आँसू बनकर छलक पड़ते हैं. जब हँसने को बस एक छोटा सा बहाना चाहिए होता है और खिखिलाती हँसी के आगे सोना भी शर्मा जाता है, फूल अपने में सिमट जाते हैं और तारे फीके लगने लगते हैं… वो हँसी प्राकृतिक झरने की कलकल सी गूंजती है और सीनियर्स की डपट की परवाह नहीं करती…
ए लड़की, टिकट ब्लैक करती है?
हॉस्टल से हम आठ लड़कियाँ रिक्शे में लद-फँदकर मुट्ठीगंज गए टाइटेनिक देखने.. जो लोग इलाहाबाद में रह चुके हैं , वो जानते हैं कि वहाँ एक ही कैम्पस में तीन सिनेमा हाल हैं- गौतम, संगीत और दर्पण. इलाहाबाद के रिक्शे भी अजीब होते हैं. दो लोग मुश्किल से बैठ पाते हैं, पर हम तीन-तीन जन लदकर जाते थे, किराए का पैसा बचाने के लिए. ये अलग बात है कि वहाँ तक जाते-जाते एक पैर सुन्न पड़ जाता था.
संगीत सिनेमा के काउंटर की भीड़ में घुसकर किसी तरह मैंने आठ टिकट खरीदे. वहाँ की भीड़ देखकर हम कह रहे थे कि ‘देखो आजकल ऐसे सामान्य लोग भी अंगरेजी फिल्म देखने लगे हैं’ (टाइटेनिक हिन्दी डब नहीं थी). भीड़ में धक्का-मुक्की करके बाहर निकले, तो देखा उस सिनेमाहाल में तो ‘घरवाली-बाहरवाली’ लगी है, टाइटेनिक तो दर्पण में है. अब जाकर उस जेन्ट्री का राज़ समझ में आया. इत्ती मुश्किल से तो टिकट खरीदे थे… अब वापस काउंटर पर जाकर कैसे वापस करें? मैंने तो हाथ खड़े कर दिए “जिसे जाना हो जाए . मैं ले आयी, यही क्या कम है?” तभी मेरी एक सहेली ने झट से मेरे हाथ से टिकट लिए और बाहर ही लाइन वालों को बेचने लगी. उसे ये करने में ज़रा भी हिचक नहीं लगी. आखिर लेफ्टिनेंट कर्नल की बेटी थी. उसने फटाफट सारे टिकट बेच दिए और हम वहाँ से चल दिए… बाद में उसने कहा कि मुझे यही डर लग रहा था कि कहीं पीछे से हवलदार एक डंडा लगाकर ये न बोले “ए लड़की टिकट ब्लैक करती है”
आपकी आँखें
मेरी उसी सहेली साथ एक मजेदार घटना घटी. वो स्टेशन रिज़र्वेशन कराने गयी थी या कहीं और की बात है, याद नहीं. वो एक काउंटर पर खड़ी थी. थोड़ी दूर पर एक आदमी सनग्लास लगाकर खड़ा था और उसे देखकर रह-रहकर आँख मार रहा था. पर मज़े की बात बगल से आ रही रौशनी में उसकी ये हरकत दिखाई पड़ रही थी. इससे रहा नहीं गया. उस आदमी के पास पहुँची और उसके एकदम सामने जाकर खड़ी हो गयी. आधी जान तो उस आदमी की ऐसे ही सूख गयी… फिर मेरी सहेली ने पूछा, “भैया, आपकी आँख में कुछ प्रॉब्लम है क्या ?” अब सोच सकते हैं कि उस बेचारे का क्या हाल हुआ होगा?
“कॉमा”
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के सामने की सड़क ‘यू रोड’ के नाम से मशहूर है… मेरी मनपसंद जगहों में से एक. उस सड़क पर आते-जाते
लड़कियों को बड़े कमेन्ट सुनने को मिलते थे. एक बार हमारे हॉस्टल की लड़कियों का एक ग्रुप उधर से निकला. उनके दोनों तरफ लड़कों के दो ग्रुप चलने लगे. एक सड़क के इस पार और दूसरा उस पार, लड़कियों का ग्रुप बीच में. लड़कों ने एक हाथ ऊपर उठाकर मुट्ठी बाँध रखी थी और अंगूठा नीचे की ओर था. वे कुछ कह नहीं रहे थे, इसलिए लड़कियाँ भी कुछ बोल नहीं रही थीं, पर समझ में नहीं आ रहा था कि लड़के ऐसा कर क्यों रहे हैं? तभी सामने से कुछ लड़कों ने उनसे पूछा कि ये क्या कर रहे हो? उन लड़कों ने जवाब दिया, ” दिखता नहीं है. इम्पार्टेंट लोग जा रहे हैं, त हमलोग कोमा लगाए हैं”
देवर सा का हॉस्टल
यू रोड पर एक हॉस्टल है एस.एस.एल. जब वहाँ से हम लड़कियाँ निकलते थे तो गेट पर खड़े लड़के भाभी-भाभी कहकर चिढाते थे. बड़ा गुस्सा आता था. हमलोगों ने उस हॉस्टल में रहने वाले अपने बैचमेट से कहा तो वो बोले कि “सीनियर्स हैं यार” फिर हमने अपनी हॉस्टल सीनियर्स से शिकायत की. उनलोगों ने अपने उस हॉस्टल के साथियों के बीच बात उठाई तो वो कहने लगे “जूनियर हैं. उनकी मस्ती के दिन हैं. करने दो.” अब हमलोगों को कुछ नहीं सूझ रहा था. आखिर हम लड़कियों ने उस हॉस्टल का नामे ही “देवर सा लोगों का हॉस्टल” रख दिया. एक दिन मैं घर से आ रही थी. बस स्टेशन से रिक्शा किया. साथ में बैग था. एस.एस.एल. के गेट पर पहुँचते ही कुछ लड़के बोले ” का हो भौजी, कहाँ से?” मैं बोली “तोहरे भैया के ससुराल से”
गुलमोहर की छाँव
एक बार मैंने अपने दोस्त समर को हॉस्टल बुलाया. हमें स्टडी सर्किल में जाना था- लाल बहादुर वर्मा सर के यहाँ. वो तय समय से बीस मिनट लेट आया. लड़कियाँ खुद चाहे आधा-घंटा लेट हो जाएँ, पर लड़कों के लेट होने पर नाराज़ हो जाती हैं… उसका कारण भी होता है. इलाहाबाद का वूमेन हॉस्टल कैम्पस, जिसे ‘डब्लू.एच.’ के नाम से जाना जाता है, लोगों के आकर्षण का केन्द्र होता है. वहाँ खड़े होकर इंतज़ार करना एक लड़की के लिए साहस का काम होता है. … तो मैं नाराज़ होने का पूरा हक रखती थी. पूरे बीस मिनट बाद जब महाशय पैदल बेफिक्री से टहलते हुए आते दिखे, तो मेरा पारा सातवें आसमान पर था. मुझे धूप में खड़ा करके कोई मुस्कुरा कैसे सकता है… पास आने पर जले पर नमक छिडकते हुए अपनी बेसुरी आवाज़ (सॉरी समर) में एक गाना गुनगुनाना शुरू कर दिया… “साँवली सी एक लड़की, गुलमोहर की छाँव में, आरज़ू के गाँव में… इन्तज़ार करती थी” कुछ गाने किसी सिचुएशन पर कितने फिट बैठते हैं… मैंने अचानक ऊपर देखा — मैं गुलमोहर की छाँव में खड़ी थी.












