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घर और महानगर

घर

(१.)
शाम ढलते ही
पंछी लौटते हैं अपने नीड़
लोग अपने घरों को,
बसों और ट्रेनों में बढ़ जाती है भीड़
पर वो क्या करें ?
जिनके घर
हर साल ही बसते-उजड़ते हैं,
यमुना की बाढ़ के साथ.

(२.)
चाह है एक छोटे से घर की
जिसकी दीवारें बहुत ऊँची न हो,
ताकि हवाएँ बेरोक-टोक
इधर से उधर आ-जा सकें.

*** *** ***

महानगर

(१.)
मन घबराता है,
समझ में नहीं आता कहाँ जायें ?
महानगर के आकाश में
चाँद भी साफ नहीं दिखता,
जिसे देखकर कोई
कविता लिखी जाये.

(२.)
छोटे शहरों में
छोटी-छोटी बातें भी
बड़ी हो जाती हैं
महानगरों में,
बड़ी बातों पर भी
ध्यान नहीं देता कोई.


एक सुबह, एक शाम, एक रात

एक सुबह,
बांस की पत्ती के कोने पर अटकी
ओस की बूँद
कैद कर ली थी,
आँखों के कैमरे में
आज भी कभी-कभी वो
बंद पलकों में
उतरती है,
… …
एक शाम,
पक्षियों के कलरव को
सुना था बैठकर
छत की मुंडेर पर,
जिसकी धुन
मन में आज तक
जलतरंग सी
बजती है,
… …
एक रात
तुम्हारी तपती हथेलियों का स्पर्श
महसूस किया था
अपने गालों पर,
कानों के नीचे वो छुअन
आज भी
धधकती है,
… …
नहीं सही आज
वो सुबह, वो शाम, वो रात,
वो ओस,वो पंछी,
वो तुम्हारी छुअन
पर उनकी यादें
अब भी, सीने में
करकती है.

(photo by fotosearch.com)

गुनगुनी धूप

गुनगुनी धूप
कल उतरी मेरी बालकनी में,
जैसे अम्मा ने
हौले से
दुलार दिया हो मुझे,
इससे पहले तो
धूप में
न था इतना अपनापन …
क्या भेजा है कोई संदेश
उसने स्वर्ग से?

अवसाद-२ (साँझ की धूप)

धान के खेतों पर
दूर तक फैली,
थकी, निढाल पीली-पीली
साँझ की धूप,
आ जाती है खिड़की से
मेरे कमरे में,
और भर देती है उसे
रक्ताभ पीले रंग से,
… …
इस उदास पीले रंग की
अलौकिक आभा से
मिल जाता है
मेरे उदास मन का पीला रंग,
और चल देता है
मेरा मन
साँझ की धूप के सहारे
एक अनन्त यात्रा की ओर,
यह निर्जन स्थान
शायद सूरज है या
आकाश का दूसरा छोर,
जहाँ चारों ओर
प्रकाश ही प्रकाश है…
स्वर्णिम पीला प्रकाश,
… …
मैं आँखे खोलती हूँ
और पाती हूँ अपने आपको
अपने कमरे में
जहाँ अब…
अंधेरा फैल चुका होता है,
अपना चेहरा देखती हूँ
आईने में,
मेरी आँखें उदास और थकी हैं,
उनमें पीलापन है
शायद… …
साँझ की धूप का पीलापन…

अवसाद-1 (अकेलापन)

अखरने लगता है अकेलापन
शाम को…
जब चिड़ियाँ लौटती हैं
अपने घोसलों की ओर,
और सूरज छिप जाता है
पेड़ों की आड़ में,
मैं हो जाती हूँ
और भी अकेली.
… …
मैं अकेली हूँ…
सामने पेड़ की डाल पर बैठे
उस घायल पक्षी की तरह,
जो फड़फड़ाता है पंख
उड़ने के लिये
पर… उड़ नहीं पाता,
और हताश होकर
बैठ जाता है शांत,
… …
अचानक कोई आहट हुई
मैं उठ बैठी,
शायद… दरवाजे पर कोई है
नहीं…वहाँ कोई नहीं…
कोई भी नहीं,
… …
मैं लेट जाती हूँ वापस
बिस्तर पर,
और फिर देखने लगती हूँ
खिड़की के बाहर
उस पक्षी को,
जो उसी डाल पर बैठा
सूनी नज़रों से
ताक रहा है आकाश को…
(photo by fotosearch.com)