मेरी प्रिय सहेली की शादी तय हो गयी है और आश्चर्य है कि मुझे खुशी नहीं हो रही है, दुःख भी नहीं हो रहा है, बड़ा ही अजीब लग रहा है, बहुत ज्यादा. अपने आपको ठगा सा महसूस कर रही हूँ. ऐसा क्यों हो रहा है, ये भी समझ में नहीं आ रहा है. पता नहीं ऐसा इस ईर्ष्या के कारण हो रहा है कि उसे कोई मुझसे भी ज्यादा चाहने वाला मिल जाएगा. कोई ऐसा, जिसका महत्त्व मुझसे कहीं ज्यादा होगा उसके जीवन में. या इस बात का डर है कि मेरी ये सहेली भी अपनी घर-गृहस्थी में खो जायगी और फिर मुझे याद नहीं करेगी.
हो सकता है कि किसी-किसी को ये मेरा निपट स्वार्थ लगे, पर ये सच है. मुझे डर लगता है अपनी प्रिय सहेली को खो देने का. क्योंकि इससे पहले कई सहेलियाँ शादी के बाद अपनी घर-गृहस्थी में खो गयीं और भूल गयीं कि कभी हम एक-दूसरे से एक दिन भी बिना बात किये नहीं रह पाते थे. हॉस्टल में कितना हल्ला-गुल्ला मचाते थे. जानती हूँ कि शादी एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है, पति-पत्नी दोनों के लिए, पर इसकी कीमत लड़कियों को कहीं ज्यादा चुकानी पड़ती है. लोग कहते रहें कि ज़माना बदल गया है, पर अब भी अपना घर-परिवार, अपना शहर लड़कियों को ही छोड़ना पड़ता है. माँ-पिता और भाई-बहन से बिछड़ना पड़ता है, दोस्तों से दूरियां बन जाती हैं. उनके लिए सबकुछ अब नया होता है. एकदम नयी ज़िंदगी की शुरुआत. बीता सब कुछ पीछे छोड़कर नए माहौल में सामंजस्य. तो लड़कियों के पास अपने दोस्तों के लिए समय ही कहाँ बचता है? लगता ही नहीं ये वही लड़कियाँ हैं…शादी के पहले जिन लड़कियों के बातों का विषय सारा संसार हुआ करता था, अब वही सिर्फ अपने पति, परिवार, ससुराल और बच्चों तक सिमट के रह जाती हैं. जो सहेलियाँ अपनी लगती थीं, उनसे अपने आपको जोड़ पाना कठिन लगता है. असहज सा महसूस होता है. ये मेरा स्वार्थ हो सकता है, तो मैं स्वार्थी हूँ या हो सकता है मेरी मजबूरी हो…
मजबूरी …मेरी मजबूरी, एक अविवाहित लड़की की. एक अकेली लड़की की स्थिति हमारे समाज में इतनी अजीब होती है कि उसे अपने संबंधों को बनाए रखने या नए सम्बन्ध बनाने में सौ बार सोचना पड़ता है. सिर्फ शादीशुदा सहेलियों से ही नहीं, पुरुष मित्रों से भी बात करने में हिचक होती है. पिछले दिनों मेरे एक बहुत अच्छे दोस्त की शादी होने के बाद मैंने उससे बात करना कम कर दिया. इसलिए नहीं कि उसके पास या मेरे पास समय नहीं है, बल्कि इसलिए कि मुझे इस बात से डर लगता है कि कहीं मेरा ज्यादा बात करना उसकी पत्नी को बुरा ना लगे. मैं जानती हूँ कि मेरे और मेरे दोस्त में कैसे सम्बन्ध हैं, पर हो सकता है कि एक सामान्य से माहौल में पली-बढ़ी उसकी पत्नी इस बात को ना समझ पाए. ऐसा हर जगह नहीं होता, मेरे साथ हो सकता है क्योंकि मैं अकेली हूँ. हो सकता है कि ये सिर्फ मेरा डर हो, पर सावधान तो रहना ही पड़ता है.
मैं अपनी जिस सहेली के बारे में यहाँ बात कर रही हूँ, वो पूरे आठ साल मेरी रूममेट रही है और सहेली तो पिछले चौदह सालों से है और आगे की सारी ज़िंदगी के लिए. मैं जानती हूँ कि अपनी शादी के बाद भी वो मुझे वैसे ही याद करेगी, वैसे ही चाहेगी, पर फिर भी एक अनजाना सा डर मन में बैठ गया है. इस समय भी वो मेरे साथ नहीं है, पर फिर भी मेरे सबसे करीब है. उसकी कोई बात मुझसे पहले किसी को पता चल जाती है, तो मुझे बुरा लगता है. इतना ज्यादा भी नहीं, पर लगता है. उससे कह ज़रूर देती हूँ कि तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया? तुमने उसे फोन किया, मुझे नहीं किया. बचकानी सी बात है, पर है. उसके हर मामले में पहला होने का मेरा हक खो जाएगा. कोई उसके लिए सबसे करीब, सबसे पहला हो जाएगा.
अगले महीने उसकी शादी है. सबसे ज्यादा दुःख इस बात का होगा कि वो हम सबसे दूर, दूसरे देश चली जायेगी. अभी हम महीने-दो महीने पर मिल लेते हैं, फिर शायद सालों मुलाक़ात ना हो. पर, मेरी उसके लिए हमेशा यही शुभकामना है कि उसका वो “सबसे पहला” उसे इतना चाहे, इतना प्यार करे कि वो मुझे क्या दुनिया को भूल जाए.