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चलत की बेरिया

हमारा देश दार्शनिकों का देश है, दर्शन का देश है. दर्शन यहाँ के जनमानस के अन्तर्मन में समाया हुआ है, जनजीवन में प्रतिबिम्बित होता है. कुछ लोग कर्मवादी हैं, तो कुछ लोग भाग्यवादी. पर समन्वय इतना कि कर्मवादी लोग भी भाग्य पर विश्वास करते हैं…और भाग्यवादी लोग भी कर्म करते हैं. लगभग सभी ये मानते हैं कि यह संसार मोहमाया है, यह शरीर भी नश्वर है. न यहाँ कोई कुछ लेकर आया है और न लेकर जायेगा. अनपढ़ लोगों को भी पता नहीं कहाँ से इस दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है…?

बस, जीवन जीने का तरीका सबका अलग-अलग होता है. कुछ मानते हैं कि जब हम यहाँ कुछ दिनों के लिये आये हैं, तो इस संसार से मोह कैसा? इसकी वस्तुओं में रमना कैसा? रमना है तो भगवान की भक्ति में रमो…तो कुछ लोग यह मानते हैं कि एक दिन सभी को जाना है, छोटा-बड़ा, शिक्षित-अनपढ़, गरीब-अमीर, सेठ-साहूकार, सभी चले जायेंगे…इस मामले में कोई भेदभाव नहीं…अगर एक दिन ये जीवन नष्ट हो जायेगा तो इसे भरपूर जियो. चार्वाक इसी दर्शन के प्रतिपादक थे. मेरे पिताजी ये मानते थे कि यही हमारे लोकदर्शन का आधार है. लोकदर्शन क्या होता है? मुझे नहीं मालूम, पर, एक अनपढ़ देहाती व्यक्ति भी कैसे दर्शन का गूढ़ तत्व सरल शब्दों में समझा देता है, ये देखना कभी-कभी बहुत रोचक होता है. इसी सन्दर्भ में एक घटना का उल्लेख कर रही हूँ.

फसल कटाई के समय गाँवों के खेतों-खलिहानों में उत्सव का सा माहौल हो जाता है. हमारे चाचा का खलिहान उनके दुआरे पर ही है. ये घटना धान की कटाई के समय की है. चाचा के घर के सामने धान की पिटाई हो रही थी. मज़दूरों की भीड़ थी. रस-दाना, खाना और मीठा आदि चल रहा था. मुझे ये चीज़ें बहुत आकर्षित करती हैं. ग्राम्यजीवन की सुन्दरता अपने कठोरतम रूप में… मज़दूर-मज़दूरिनों की जीवन्तता…फसल के एक गट्ठर या कुछ सेर अनाज और कुछ रुपयों के लिये जी-तोड़ परिश्रम करना, कठिन श्रम में भी खिलखिलाकर हँसना…तो, धूल से एलर्जी होने के बावजूद मैं वहाँ जमी थी.

मेरे चाचा के बड़े लड़के मज़दूरों से कुछ खफा से रहते हैं. उनके अनुसार जबसे बसपा का शासन हुआ है मज़दूरों के भाव बढ़ गये हैं. बहुत नखरे करने लगे हैं. कुछ मज़दूरों के लड़के छोटी-मोटी सरकारी नौकरी पा गये हैं, … वो सब लम्बी-लम्बी फेंकते हैं. तो भैय्या इन लोगों को इनकी औकात बताने में जुटे थे. वो अपने हवेलीनुमा घर, ज़मीन-जायदाद, खेत-खलिहान, ट्रक, ट्यूबवेल, बैंक-बैलेंस, यहाँ तक गोरू-बछरू आदि के बारे में बता-बताकर अपनी हैसियत का परिचय दिये जा रहे थे. जैसे किसी को इसके बारे में मालूम ही न हो. अरे गाँव में तो कोसों दूर तक लोग एक-दूसरे को जानते हैं, पर हमारे भैय्या…ऐसे ही हैं.

किसी को भी उनका इस तरह से डींगे हाँकना अच्छा नहीं लग रहा था, मुझे भी नहीं. पर मैं तो बोल नहीं सकती थी… बड़े भैय्या जो ठहरे. बाउ ने एक-दो बार टोका, पर वो नहीं माने. मज़दूरों को उनकी औकात बताने का काम चालू रखा. थोड़ी देर बाद एक मज़दूर महिला हँसकर भैय्या से बोली, “ए बाबा, ( हमारे यहाँ ब्राह्मणों को बाबा कहते हैं) काहे भभकत हउआ फुटही ललटेन मतिन. इ कुल तोहरे साथ न जाई चलत की बेरिया” (फूटी हुई लालटेन की तरह भभक क्यों रहे हो? ये सब संसार छोड़ते समय तुम्हारे साथ नहीं जायेगा). भैय्या एक क्षण के लिये अवाक रह गये, फिर बड़बड़ाते हुये घर के भीतर चले गये…कौन बोल सकता है भला इसके आगे ???


मोक्ष

मैंने जन्म लिया
इसी जगह
बार-बार
और मरती रही
तिल-तिलकर
कितनी ही बार
जीवन और मरण के बीच
पड़ी रही कोमा में
कभी महीनों
तो कभी सालों
फिर मरी
और फिर जन्म लिया
एक ही जन्म में
सैकड़ों जन्म बिता दिये मैंने
पर बस!
अब नहीं
मुझे इस रोज़-रोज़ के
जीने-मरने से
मुक्ति चाहिये
कहीं इसी मोक्ष की कामना
तो नहीं की थी
हमारे ऋषियों ने
सदियों पहले