आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

गाँव की मिट्टी

मैं नहीं कहती
कि मेरे दामन को
तारों से सजा दो
चाँद को तोड़कर
मेरा हार बना दो
मेरे लिये
कुछ कर सकते हो
तो इतना करो
मेरे गाँव की मिट्टी की
सोंधी खुशबू ला दो

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4 thoughts on “गाँव की मिट्टी

  1. वाह
    अत्यंत उत्तम लेख है
    काफी गहरे भाव छुपे है आपके लेख में
    ………देवेन्द्र खरे
    http://devendrakhare.blogspot.com

  2. वाह
    अत्यंत उत्तम लेख है
    काफी गहरे भाव छुपे है आपके लेख में
    ………देवेन्द्र खरे

  3. उस एहसास को जो हमारे शरीर के प्रत्येक तन्त्र में रचा बसा हो, जिसे हमने जिया हो अतीत में, वो महक, वो दृश्य तो मन-मस्तिष्क के डाटाबेस में हमेशा रहता है, हां सुनी हुई अपनी जगहों से भी प्रेम हो जाता है जैसे पूर्वजों की कर्म-जन्म भूमि भले हमने उसे न जिया हो

  4. It’s really hard to rise above attachment with one’s village.I am no exception.Your poem brings back memories of my own village.No wonder I love to go merge my identity in the village landscape so that aura of my village comes to environ my being forever.

    Anyway,hats off to your emotions lying latent in your heart.Hope to see them more often in form of poems.

    Email id : akpandey77@gmail.com

    Website:indowaves.instablogs.com

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