आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

गाँव की सर्दियाँ

दिल्ली की सर्दी भी हाड़ कँपा देने वाली होती है. कोहरा, धुन्ध और ठन्डी हवाओं से बचने के कुछ ही उपाय होते हैं- रजाई, चाय और हीटर. पर इस बार फिर मुझे गाँव की सर्दियों की बहुत याद आ रही है. गाँव की सर्दी का अलग स्वाद होता है, एक अपने तरह का आनंद.

हमलोग बचपन से ही शहर में पले-बढ़े, पर हमारे बाबूजी ने पहले से ही बता दिया था कि घर तो वो गाँव में ही बनवायेंगे. और  रिटायरमेंट के  बाद उन्होंने वही किया. लेकिन हम भाई-बहनों को भी गाँव से बचपन से ही लगाव था. खासकर मुझे वहाँ का वातावरण, सादगी, शान्ति बहुत अधिक रोमांचित करती थी. सर्दियों में शाम होते ही सभी घरों के दुआर पर कौड़े जल जाते थे और बच्चे-बूढ़े सभी उसके चारों ओर इकट्ठे होकर बतकही में पूरी शाम बिताते थे. बच्चों को आग तापने से कम, कौड़े में पड़ी आलू और शकरकन्द के भुनने से ज़्यादा मतलब होता था.

सुबह-सुबह नाश्ते में मटर की घुँघनी और गुड़ की चाय या ताज़े गन्ने का रस मिलता था. दुनिया का कोई भी फ़ास्टफ़ूड इस नाश्ते की बराबरी नहीं कर सकता. गुड़ की भेली बनाने के लिये जब चाचा और भाई लोग कड़ाह में गन्ने का रस पकाते थे, तो उसकी सोन्धी खुशबू दूर-दूर तक फैल जाती थी. ताज़ी भेली खाने के चक्कर में बच्चे भी भेली बँधवाने के लिये तैयार हो जाते थे. हथेली जलती रहती थी, पर क्या मज़ाल उफ़ तक कर दें. पर मेरी हिम्मत कभी भी हाथ जलाने की नहीं हुई.

मेरे बाबूजी हाते में बैठकर धूप लेते रहते थे. उस पुराने हाते को घर बनवाने के बाद भी वैसे ही छोड़ दिया गया था, बाबूजी की बागवानी का शौक पूरा करने के लिये. सोचती हूँ कि वो होते तो इस समय पूरे हाते में छोटी-छोटी क्यारियाँ बनाकर गाजर, मूली, धनिया वगैरह बो रखी होती. पता नहीं वो हाता वैसा ही होगा या उसमें बड़ी-बड़ी घासें उग आयी होंगी. बाबूजी की तेरही के बाद से घर नहीं गयी हूँ. साढ़े तीन साल हो गये अब तो. कभी-कभी मन होता है उस घर को देखने का जिसे बाबूजी ने बड़े मन से बनवाया था और जो अब सिर्फ़ मकान होकर रह गया है. पर मैं जा नहीं सकती. कैसे जाउँगी? वहाँ जाकर बाबूजी को चारपाई पर बैठकर अपनी राह ताकते नहीं पाउँगी तो क्या टिक पाउँगी एक भी पल वहाँ.

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9 thoughts on “गाँव की सर्दियाँ

  1. गाँव की सर्दियों का बहुत सटीक चित्रण किया है…अच्छा लगा…

    डा.रमा द्विवेदी

  2. बहुत मासूम यादे हैं, ऐसी ही हमारी भी।

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  4. aapki post dekhkar mujhe gaanv yaad aa gaha

    जब चलती चक्की घोर घोर, सब बोले हो गयी भोर भोर
    फिर चून पीस कर चार किलो, गिड़गम पर रखा दूध बिलो
    नेती से जब जब रई चली फिर छाछ बटी यूं गली गली
    यूं बांट बांट कर स्वाद लिया, बचपन को हमने खूब जिया
    क्या जीवन था वो ता…ता…धिन
    मैं ढूंढ़ रहा हूं वो पल छिन

    सांझ घिरी जब धुएं से, फिर आयी पड़ोसन कुएं से
    लीप पोत कर चूल्हे को ज्यों सजा रहे हों दूल्हे को
    फिर झींना उसमें लगवाया, फोड़ अंगारी सुलगाया
    कितने चूल्हे जले गांव में दर्द भरा है ये मत गिन
    मैं ढूंढ़ रहा हूं वो पल छिन

  5. ओह, यह तो मेरा ही परिवेश है -सब कुछ याद हो आया !
    तपनी ,आलू ,डांड मेड और क्यारियाँ ,पिता जी का अवसान ओह !

  6. Hi,

    At SpeakBindas.com, we interview Blogger and get to know about their blogging life. So far, we have interviewed many bloggers for this series. Continuing the same, we would like to interview you as well.

    This would be an online interview, i.e. we will send you questionnaire via email.

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    You may reply back via email to me with your consent, and we move ahead.


    Regards
    Devang Vibhakar
    (Editor) – http://www.Speakbindas.com

  7. गाँव जैसा जीवन शहर में कहाँ ।

  8. बहुत प्यारी यादें हैं।
    घुघूती बासूती

  9. आप जैसों को तो अवश्य गाँव जाना चाहिए, नही तो भारत वैसे भी शहरों में बसने लगा है और गाँव हाशिए पर है। भारत का निर्माण करने वाले लोग ही महरूम है बुनियादी जरूरतों और बातों से……….

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