आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

मिट्टी का घर, आम का पेड़, झूले, कजरी…सब बीती बातें

मेरे गाँव में बरसों पहले हमारा एक मिट्टी का घर था. आँगन, ओसार, दालान और छोटे-छोटे कमरों वाले उस बड़े से घर से धुँए, सौंधी मिट्टी, गुड़(राब) और दादी के रखे- उठे हुए सिरके की मिली-जुली गंध आती थी. घर के पश्चिम में एक बैठक थी. बैठक और घर के बीच के बड़े से दुआर में कई छोटे-बड़े पेड़ों के साथ मीठे फल और ठंडी छाँव वाला एक विशाल आम का पेड़ था, जिसके बारे में अम्मा बताती थीं कि जब वो नयी-नयी ब्याह के आयी थीं, तो सावन में उस पर झूला पड़ता था. गाँव की बहुएँ और लड़कियाँ झूला झूलते हुए कजरी गाती थीं. हमने न कजरी सुना और न झूला झूले, पर आम के मीठे फल खाये और उसकी छाया का आनंद उठाया. तब हर देसी आम के स्वाद के आधार पर अलग-अलग नाम हुआ करते थे. उस पेड़ के दो नाम थे “बड़कवा” और “मिठउआ.” घर के बँटवारे के बाद मिट्टी का घर ढहा दिया गया. उसकी जगह पर सबके अपने-अपने पक्के घर बन गये. बड़कवा आम का पेड़ पड़ा छोटे चाचा के हिस्से में. उन्होंने उसे कटवाकर अपने घर के दरवाजे बनवा दिये. वो पेड़, जो सालों से घर की छाया बना हुआ था, उसके गिरने का खतरा था…बूढ़े लोग अनुपयोगी हो जाते हैं…मँझले चाचा के हिस्से का मिट्टी का घर अभी बचा हुआ है, पर कुछ दिनों में वो भी उसे गिरवाकर ईंट और प्लास्टर का घर बनवाएंगे. एक-एक करके यूँ ही गाँव के सारे मिट्टी के घर मिट्टी में मिल जायेंगे. कभी हुआ करते थे मिट्टी के भी घर, हम अपनी आने वाली पीढ़ी को बताएंगे. जैसा कि हमारी अम्मा उस आम के पेड़ के बारे में बताती थीं कि कभी उस पर पड़ते थे सावन में झूले, कभी इस गाँव की लड़कियाँ और बहुयें कजरी गाती थीं.

Single Post Navigation

25 thoughts on “मिट्टी का घर, आम का पेड़, झूले, कजरी…सब बीती बातें

  1. बेहतरीन रचना है… अब कहां आंगन और कहां दालान.. अब दो और तीन बेडरूम के घर होते हैं.. और उसमें भी लोगों को आसामन की तरफ़ देखे हुए हफ्तों बीत जाते हैं.. फिर शहर के लोग भला कहां जाने राब और उसके शर्बत को… बड़े दिन बात ऐसी पोस्ट पड़ी, दिल बाग-बाग हो गया..

  2. आदरणीय आराधना दीदी चरण स्पर्श

    सही कहा आपने, शायद हम भी अपने बच्चो को कहानिया ही सुनायेंगे अपनी संस्कृति और रीति रिवाजो की । गावं की याद ताजा कर दी आपने

  3. कितनी ही चीजें और बातें इतिहास और किताबों का हिस्सा बन कर रह गई हैं..शाश्वत है यह भी.

  4. आराधना जी , गाँव की सौंधी मिटटी की महक को गाँव में रहने वाले तो जानते ही हैं …आजकल के बच्चे भी जानना चाहते हैं …देखना चाहते हैं वे मिटटी के घरों , खेलना चाहते हैं मिटटी में लिप पुत कर , पेड़ों पर लटककर झूले झुलाना चाहते हैं …
    अपने बच्चों को इसी गाँव और कस्बेनुमा संस्कृति के बारे में बताती रहती हूँ तो कई बार बोल पड़ती हैं कि हमारा गाँव क्यों नहीं है …बहुत शौक है इन बच्चों को मिट्टी और फूस के बने छोटे घर , गोबर के लिपे पुते आँगन में विचारने का ….कभी कभी इस बचपन को देखा कर बहुत अफ़सोस होता है कि हम जीवन के वास्तविक आनंद से इन्हें कितना दूर ले आये हैं …इसी अपराधबोध को दूर करने के लिए ही मैं वो सब कुछ करती हूँ जो ग्रामीण महिलाएं मजबूरीवश करती हैं ….ताकि ये पीढ़ी किताबों में यह सब पढ़कर ना काहे कि हमें तो ये पता ही नहीं था ….!!

    • सही कहा आपने वाणी जी, बच्चे तो उत्सुक होते ही हैं उन सभी चीज़ों के प्रति जो उन्हें आनन्द देती हैं. हमें भी बड़ा आश्चर्य होता था यह जानकर कि कभी गाँवों में कजरी गायी जाती थी. वैसे ही अब मिट्टी के घर म्यूज़ियम की चीज़ हो गये हैं. क्या करें समय परिवर्तनशील है.

  5. क्या सबके गाँव में यही सब हो रहा है ? आपके गाँव या आपके गाँव के घर की दशा तो बिल्कुल मेरे गाँव और उसमे मेरे घर जैसी है !! लगता है की हमारा गाँव और आपका गाँव कुंभ में बिछुड़े दो भाई है !!

  6. “आया है मुझे आज याद वो ज़ालिम
    गुजरा ज़माना बचपन का ………”

    आपका ब्लॉग पढ़ कर बरबस स्व. मुकेश का गया ये गीत ज़ेहन में आ गया.

  7. बाग बगीचे, मिट्टी के घरोंदे, कच्ची अम्बिया का स्वाद, और सीकर (पेड़ से पक कर टपका हुआ आम) के लिए तडपती लूक में भटकना … या फिर सुग्गे का काटा आम… सब छूट गया पीछे …. घर से अम्मा का सुबह सुबह ही कलेवा तैयार कर खाने के लिए चिल्लाना… और बच्चे खेलने में मस्त… धान कूटती मजूरिन… और जांत पीसने की घर्र घर्र … मन कचोटता है……. कहीं से लौट आये सब ..

  8. सही कहा…
    सचमुच हम गांव से बहुत दूर निकल आये हैं…

    और गांव लगभग अभी भी वहीं है…वैसे ही…
    हमारे बच्चों का इन्तज़ार करते हुए….

  9. मैं आपके पहले इस दुनिया में आया हूँ तो मैं आम और नीम की डाल पर पड़ने वालों झूलों पर झूला भी हूँ और पेंगें भी मारी है …आम भी खाएं हैं ,कोयल की कूंक की नक़ल भी उतारी है -ये बिम्ब अब कहाँ रहे ?
    वे भी क्या रोलर कोस्टर थें जब झूला पूरी ऊँचाई से सहसा नीचे चलायमान होता था तो लगता था की दिल आम की फुनगी पर ही लटक गया …..हा हा …मगर अब ये यादे ही हैं और दिल को कचोटती हैं , मगर ये दिल भी शायद अब असली वाला भी नहीं रहा ..वो तो अभी उसी आम की फुनगी पर ही रह गया है शायद !

  10. सही कहा आपने .. मिट्टी के घर मिट्टी में मिल जाएंगे .. नास्ताल्जिया (?) इतना बुरा
    नहीं होता जितना बताया जाता है ! … सच में लोग बताने पर विश्वास
    तक नहीं करेंगे .. जैसे लोग आज नहीं विश्वास कर पाते कि ‘डेहरी’ में अनाज रखा जाता
    था और वह सालों साल बचा रहता था .. जैसे हथपोइया की ‘बेझरी’ खाने में जो स्वाद
    मिलता था वह पिज्जा और बर्गर को लात मारता है .. और ‘गोरस’ के बारे में बताने पर
    सब हँसेंगे , कहेंगे कि कोल्ड-ड्रिंक के आगे सब फीका है .. !!!
    .
    मिट्टी को मिट्टी में मिलने से भला कौन रोक सकता है ! , पर हम तो ख़ाकसार होते जा रहे हैं !
    एक प्रजाति के आम ने देसी का स्वाद ही बिसरा दिया है .. बिजुर्गों से कौन स्वाद जानना चाहे !..
    बाजार तो है न हमें सब बताने के लिए ! इसकी विश्वसनीयता पर कौन संदेह करे ! अर्थ तो यूँ
    बदला ही जाता है , ” ठंडा मतलब कोकाकोला ” ! यहाँ कौन आये बहस करने .. बाजार है तो सब
    सही है … लोक को तो खा ही गए है बाजार , विशेषतः बाजारवादी मानसिकता ने .. अब समझ में
    आता है कि कबीर ने क्यों कहा था , बाजार में खड़ा होकर — ” जो घर फूंकै आपना चलै हमारे साथ ” ..
    .
    ६ साल से इस लोक से दूर हूँ जो आपकी पोस्ट के वातायन से दिख रहा है .. ऐसी पोस्टों से सहज ही
    जुड़ाव हो जाता है .. हाँ , आपने अभी तक इस पोस्ट तक पहुँचने की राह नहीं बताई थी , इसका दोष
    आपके मत्थे मढ़ूँगा ही , यह जानते हुए कि मेरी पसंद लोक की है .. फिर भी ठीक है – देर आया दुरुस्त आया ..
    ……. आभार ,,,

    • अरे ये ब्लॉग अधिक पुराना नहीं है. अभी जल्दी ही बनाया है. पोथी-पतरा बाँचते-बाँचते आजिज आ गयी थी, तो भूले-बिसरे दिन याद आने लग गये. सच, वो दिन बहुत ही रूमानियत भरे थे. आजकल के बच्चे इस मामले में हम से बदकिस्मत हैं.

  11. आपकी पोस्ट से कजरी याद आयी जिसे टीपे बिना
    न रह सका —
    .
    ” झूला परा कदम की डारी
    झूलैं राधा प्यारी न …. ”
    .
    ” झूला धीरे से झुलाओ बनवारी … रे सांवरिया …
    तेज झुलत मोरा मनवा डरत है
    लचकै कदम्बवा की डारी … रे सांवरिया …
    अगल बगल दुई सखियाँ झुलत हैं
    बिचवा मा झूलैं राधा प्यारी … रे सांवरिया … ”
    .
    अफ़सोस ! ये लोक – रंग अब मिट रहे हैं …

  12. गाँव की सुधि कभी आ जाय तो मन कचोटता है … गेहूं की सिंचाई के लिए पुर(चमड़े का बड़ा सा थैला जिस से कुँए से पानी खीचा जाता था) खींचते बैल रात रात भर बार बार ऊपर से नीचे आते जाते … बज्र दुपहरिया में आम की बाग में एक कटहुले या सीकर के गिरते ही सारे बच्चे दौड पड़ते … मटर के खेत में लेट लेट कर हरी मटर खाते … प्यास लगने पर नहर का बलुआ पानी भी पी लेते … जो आज के यूं वी प्यूरीफायर के पानी से ज्यादा स्वादिष्ट लगता … सावन की कजरी..झूले … मोती मोती बेडौल औरतों का झूले पर बैठकर चीख चीख कजरी गाना …. सोने की गेडुई गंगा जल पानी …. और लड़के उचक उचक पेंगें देते …. नहर तालाब में कूद कूद नहाना … गाँव में कभी कोई मोटर दिख जाय तो बहुत दूर तक गुबार का पीछा करती आँखें … लड़कियों का घर घरोंदा खेलना … और स्कूल जाते समय विद्या आने के लिए किताब में मोर पंखी रखने के अलावा मार खाने के डर से दूब की फुनगी को बाँध कर कसम देना … कि आज मार न खाया तो तुम्हे खोल दूँगा शाम को … और सच कहूँ … जब भी ये टोटका किया उस दिन मार नहीं ही खाया … और शरारतें … तौबा तौबा .. बरसात में धान भिगाने मिट्टी के कूंडे में छोटे छोटे पचासों गिजगिजे मेढक पकड़ कर पालते … परती खेतों में मैदान (शंका) जाते तो टोली बना कर… और घंटों बतियाते … और तालाब के किनारे खड़े हो कर पानी पर पत्थर फेक कर छिछली तैराते … और कितना बताऊँ … लिखते लिखते एक और पोस्ट हो जायेगी …. पर इस पोस्ट ने सब याद दिला दिया … आपका बहुत आभार इस मतलबी शहर की मानसिकता से चंद पलों के लिए गाँव ले चलने के लिए …(मै ठेठ गवई हूँ कुछ असहज लगे तो मिटा कृपया मिटा दें)…….. बहुत आभार आपका ..

    • दुर्भाग्य है उनका जो गँवई नहीं हैं. हम इस मामले में किस्मतवाले हैं. और…ये गँवई शब्द बहुत मूल्यवान हैं. इन्हें तो याद रखना चाहिये, जिससे ये कहीं म्यूज़ियम की वस्तु न बन जायें.

      • Sahi kah rahi hai aradhanaji aap..Sabke naseeb me nahi hota
        “गँवई” hona..Hume agar ye saubhagya mila hai to yeh hamara farz bant hai ki hum isme naye aayam jode !!

      • hymane padha hamari aankhon main aansoo aa gaye . mere parent mumbai main hain isliye mujhe yahan rahana pad raha hai. mujhe bhi kheton main bansuri bajana. doosare ke khet se chane aur ganna ukhadana achcha lagata tha. abki bar ganv gaya to ganne ke khet dikhai nai diye. subah uthakar mahua binane jate the.school se aate samay kisi ke ped pr chad kr aam todkr late. namakaur lahsoon pees kr jeb mein lekr ghumata tha

  13. ganvo ki viluppt hoti sansakriti yah eik chinta ka vishay hame esaki surchha sanrchha ki par bal deta hai es tarah ke vichar lekh ki abhi avshyakata hai

  14. ganvo ki yad karna usaki sanskriti ki sanrchha surachha karna pratek bharati ka kartvy hei ,es tarah ke lekh or vichar logo ko ganvo ki mahatta samaghhane mai sarthak sidha hoga.

  15. ajj bhi ye sab hota hai hmare gav me mai varanasi ka rhne wala hnu ynha aaj bhi mitti ke mkan hai ye sab kutch jo pda hamne ye sab hmare yah hota hai aaj bhi ham jhula jhulte hai kjri gai jati hai rab hota hai

  16. मेरे ननिहाल में सिर्फ एक हाल पक्का था बाकी पूरा घर कच्चा | छत में लेंटर की जगह धन्नियाँ पटी होतीं थीं | दीवार गारे की , सुबह घर गोबर से लीपा जाता था | बाहर गायों को बाँधने के लिए बड़ा दालान | पूरे घर में मोटी-मोटी पुराणी लकड़ियों के खम्भे |सामने ही एक नीम का पेड़ , जिस पर झूला डाला जाता था |
    अब सब यादें हैं🙂

  17. शैलेन्द्र साहू on said:

    काश वो दिन फिर लौट आते, वो मिट्टी की हंङिया, छप्पर और उसमे चिङिया का घोसला

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: