आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

ये हवा बसंती गाती है…

मेरे मन से उनके मन तक
एक पतली डोर बँधी सी है,
कुछ बात इधर से चलती है
कुछ याद उधर से आती है…
… … …
उनके अन्तस्‌ की व्याकुलता
मैं यहाँ बैठ गुन लेती हूँ,
मेरी पुकार को बिना कहे
वो वहीं बैठ सुन लेते हैं,
वो करते हैं जब याद मुझे
मेरी नींदें उड़ जाती हैं…
… … …
यह नेह-बंध बाँधा जबसे
दो हृदय एक हो गये तभी,
बन गये वो मेरा ही हिस्सा
मैं उनके रंग में रंगी तभी,
यह बंधन रहे सदा यूँ ही
ये हवा बसंती गाती है…

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11 thoughts on “ये हवा बसंती गाती है…

  1. दीदी प्रणाम
    पता नहीं कैसे जिनसे हमे बहुत लगाव रहता है उनको हम महसुस कर पाते है , बहुत ही सुन्दर कविता लगी दीदी ।

  2. जी सच कहा, बसंत की पदचाप तीव्र से तीव्रतर होती जा रही है …..
    मगर एक अतिथि तो पहले से ही दबे पांव मन में प्रवेश पा चुका है ,आपको भनक लगी ?
    ह्रदय गुफा थी सून ,रहा घोर सूना
    इसे मिटाऊँ शीघ्र बढ़ा मन दूना
    पथिक आ गया एक ,न मैंने जाना
    हुए नहीं पदशब्द न मैंने पहचाना
    ..अब बसंत मुकम्मल जान पहचान भी करा देगा.

  3. सुन्दर लगी कविता .. लय में रची – पगी , गोया लय
    भी बासंती हो !
    एक जगह लय – भंग दिखा मुझे —
    ” यह नेह-बंध बँधा जबसे ” यहीं पर , हो सकता है मुझसे
    ही त्रुटि हो रही हो …

  4. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति…बधाई..

  5. बहुत सुन्दर रचना ….. और लयबद्ध होने के कारण और प्रभावशाली हो जाती है …अमरेन्द्र जी की शिकायत जायज़ है पर वहां ”बंधा” की जगह ”बाँधा” हो सकता है और मात्रा भी पूरी हो जायेगी ….
    इतनी सुन्दर रचना के लिए बधाई …..

  6. कविता का प्रवाह देख रहा हूँ । एकाध जगह सुधरने के बाद पढ़ रहा हूँ, इसलिये और भी आनन्द आ रहा है ।

    रम्य-रचना ! आभार ।

  7. namaskar aap ki kavita kafi lok priy ho rahi h , inh aise hi likhte rahiy ,

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