आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

पिल्ला-कथा का अंत

कल रात मैं बिल्कुल नहीं सो पायी. मैं जिस पपी को अपनी गली से उठाकर ले आयी थी. वो हर एक घंटे बाद सू-सू करती थी और फिर कटोरी खटकाती थी, दूध माँगने के लिये. ये भूख भी इतनी कठोर होती है कि बच्चा और कुछ सीखे चाहे न, खाना माँगना ज़रूर सीख जाता है. तो रात भर मैं इस आगंतुक की सेवा-शुश्रूषा में लगी रही. दिन में थोड़ी देर आराम किया. और फिर निकल पड़ी उसकी माँ की खोज में. मैंने आधा मोहल्ला ढूँढ़ डाला, पर उसकी माँ नहीं मिली. कुछ मौसियाँ ज़रूर मिलीं, जिन्होंने उसे सूँघा और फिर मुँह फेर लिया. एक मौसी थोड़ी अच्छे दिल की थी, तो वो अपनी गली के नुक्क्ड़ तक हम दोनों को छोड़ने आयी.
मैं बहुत निराश हुयी. आखिर में एक चाय वाले ने मेरी हालत पर दया करके कहा कि आप इसे यहीं छोड़ दो, हम पाल लेंगे. आपको लग रहा होगा कि ये चाय वाला कहाँ से टपक पड़ा? तो साहब ये मेरी खुशकिस्मती है कि मैं महानगर के ऐसे कोने पर रहती हूँ, जहाँ का माहौल पूरी तरह तो नहीं, लेकिन काफ़ी कुछ कस्बों जैसा है.
मैं उत्तरी दिल्ली के गाँधी विहार नाम के मोहल्ले में रहती हूँ, जो अनेक छोटे-छोटे प्लाटों में बँटा हुआ है. यह पूरा क्षेत्र एक विशेष कारण से बहुत महत्त्वपूर्ण है कि यहाँ सिविल सर्विसेज़ की तैयारी करने वाले काफ़ी संख्या में रहते हैं. इन लोगों के कारण यहाँ हर नुक्कड़ पर चाय-नाश्ते और खाने की दुकानें हैं. गाँधी विहार के पीछे “धीरपुर विलेज ग्रीन प्रोजेक्ट” के नाम पर काफ़ी लम्बा-चौड़ा मैदान छूटा हुआ है, जिसके किनारे सड़क बनी हुई है. इस सड़क और मोहल्ले के बीच में भी दो-तीन चाय की दुकानें हैं. उन्ही में से एक चाय वाले ने मेरी मुश्किल हल कर दी.
आज रात को मैं चैन से सो सकूँगी. पर कहाँ?? मुझे अब उसकी याद आ रही है. मैं अगर ग्राउंड फ़्लोर पर होती तो निश्चित ही पाल लेती उसे. पता नहीं क्यों ? वो अपनी काली-काली आँखों से मुझे बड़ी ध्यान से देखती थी. जितनी देर मैं उसके आस-पास होती…वो आराम से सोती. मेरे इधर-उधर होते ही कूँ-कूँ करने लगती.  कल उसने परेशान किया और आज उसकी याद परेशान कर रही है.

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14 thoughts on “पिल्ला-कथा का अंत

  1. केसा रहा आप का ये अनुभव

  2. हाँ , अच्छा है .. हाल-चाल लेती रहिएगा ..
    ” पिल्लिया ” भी याद कर रही होगी ऐसे ही ..
    शहर में अच्छे दिल की मौसियाँ मिल जाती हैं , जानकार अच्छा लगा !
    .
    @ ” ..ये भूख भी इतनी कठोर होती है कि बच्चा और कुछ सीखे चाहे न, खाना माँगना ज़रूर सीख जाता है. ”
    …. याद आया … ” मानत हौं चारी फल चारि चणक कौ ” ( तुलसी दास जी )

  3. सच में…लगाव तो हो जाता है और बिछौह बहुत तकलीफदायक.

  4. बड़ी सीधी और सरल भाषा में काफी बड़ी बात की आपने… एक अतुकांत कविता की यही खासियत है…
    जय हिंद… जय बुंदेलखंड

  5. अरे गलती से ये जो लिखा वो कॉपी नहीं हुआ….
    माफ़ करियेगा.. मुझे ये कमेन्ट करना था—
    सही कहा समीर जी.. और ऐसे लोगों से लगाव स्वाभाविक है जो वफादार होते हैं… आप इस कर्म के लिए साधुवाद की पात्र हैं मैम..
    जय हिंद… जय बुंदेलखंड

  6. आपने तो उसे जीवन दिया.
    साधुवाद

  7. जिसे जीवन दिया हो उसकी याद कैसे जा सकती है? अच्छा लगा आपका ये प्रसंग शुभकामनायें

  8. अले ले ले ये उदर पिशाचिन तो बहुत प्यारी है ..ठीक है, हाल चाल लेती रहिएगा .
    “और हाँ हित अनहित पशु पक्षीहु चीन्हा “

  9. और पिल्ला कथा क्यों ?ये तो फीमेल पप्पी थी .
    हाँ याद आया आप पिल्ली नहीं कहना चाहती -एक नारी के लिए यह डिस्ग्रेस्फुल होता न! हा हा !!

  10. चलिए मुक्ति मिली…
    बड़ी शालीनता और ग्रेसफ़ुल तरीके से….

    याद का क्या है…
    दो तीन दिनों में चली जाएगी…

    कुछ और नया मिल जाएगा….

    आप बेवज़ह परेशान ना हो….

  11. aalekh padhkar prateet hua..aap ek bahut hi samvedansheel, sahriday mahila hai…
    bahut hi accha laga aapko padhna…dil se likhti hain..
    aur bahut bada dil rakhti hain…
    bahut bahut khushi hui aapse milkar..
    shukriya…

  12. ऐसा ही होता है कई बार कि संवेदना की बहियाँ पकड़कर मन चिरौरी करता है….आप उसे न तो बिसरा सकती हैं, न ही खुद को कसकने से रोक सकती हैं ।
    सुन्दर प्रसंगांत ।

  13. पिंगबैक: मेरे घर आयी एक नन्ही कली « aradhana-आराधना का ब्लॉग

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