आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

काहे को ब्याहे बिदेस

मेरे जीवन की कुछ घटनाएँ ऐसी हैं, जिन्हें अच्छी या बुरी की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, पर उन्होंने मेरे मन पर ऐसी अमिट छोड़ी है कि जब भी याद आती है, तो एक टीस सी उठती है.

मेरी माँ की असमय मृत्यु के बाद दीदी ने मुझे बेटी के जैसे ही पाला-पोसा. वो मुझसे लगभग नौ साल बड़ी हैं और आज भी मुझे बच्ची समझती हैं. आज से दस साल पहले दीदी की शादी हुई और शादी होते ही वो जीजाजी के साथ वलसाड (गुजरात) चली गयीं क्योंकि जीजाजी वहाँ एक कम्पनी में थे. अपनी शादी में उन्होंने लम्बी छुट्टी ली थी, इसलिये ज़ल्दी घर नहीं आ पाये. उसके बाद दीदी की बेटी हुई और जब वह एक साल की हो गयी, तब उन लोगों का घर आना हुआ.

दीदी को देखे बहुत दिन हो गये थे और साथ में जीजाजी से मिलने और बिटिया को दुलारने का लोभ. तो मैं रातोंरात यात्रा करके इलाहाबाद से बनारस पहुँच गयी, अपने एक मित्र के साथ. दीदी को सरप्राइज़ जो देना था. उनकी गाड़ी सुबह सात बजे आनी थी, तो रात भर प्लेटफ़ार्म पर बैठकर सुबह होने का इंतज़ार किया. दीदी ने जब यह सुना तो कह उठी कि तुम  ही ऐसा कर सकती हो. मुझे आज भी वो पल नहीं भूलता, जब मैंने बिटिया को गोद में लिया था. वो उस समय एक साल की थी और किसी की गोद में नहीं जाती थी. दीदी ने कहा कि तुम्हारा चेहरा मेरे जैसा है न, तो तुम्हें दूसरी मम्मी समझ रही है.

शादी के बाद लड़कियों की ससुराल ही उनका पहला घर होता है. अतः पहले तो वहीं जाना था, पर मैंने सोचा था कि रात भर वहाँ रुककर हम सब घर जायेंगे और खूब मज़े करेंगे. दीदी से ढाई साल बाद मिली थी. बहुत सारी बातें इकट्ठा हो गयी थीं और इन सबसे बढ़कर बाबूजी अपनी बेटी और नतिनी की अधीरता से राह देख रहे थे.

हम शाम तक दीदी की ससुराल पहुँच गये. पर, वहाँ जाकर मेरी सारी योजनाओं पर पानी फिर गया. दीदी की सासू माँ ने कहा कि जब बेटी बच्चा होने के बाद नैहर जाती है, तो बिना साइत (शुभ मुहूर्त) के नहीं जा सकती. इसे वहाँ सुदेवस कहते हैं. अब मैं क्या कर सकती थी? किसको दोष देती? मुझ पर मानो वज्राघात हो गया. मेरी आँखों में उसी समय आँसू आ गये थे, पर मैं किसी के सामने कभी नहीं रोती.

इतनी लाचारी, इतनी विवशता मैंने पहले कभी अनुभव नहीं की थी. मेरे पिताजी बहुत उदार थे. रीति-रिवाजों के बंधन भी नहीं मानते थे. पर, ये दीदी की ससुराल थी. मेरा मन अनेक प्रश्न-प्रतिप्रश्नों में उलझ गया. जिसने मुझे बचपन से पाल-पोसकर बड़ा किया उस पर मेरा कोई अधिकार नहीं रह गया? और उस पिता का क्या, जो अकेले घर में बेटी की प्रतीक्षा कर रहा है? क्या रीति-रिवाजों के बंधन स्नेह-बन्धन से अधिक बड़े होते हैं? कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें समझाया नहीं जा सकता.

मैं एकदम से शान्त हो गयी. दीदी समझ रही थीं कि मुझे बहुत धक्का लगा है यह सुनकर. दूसरे दिन सुबह मैं अपने घर चली आयी और आते ही अपने कमरे में जाकर खूब रोयी.


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29 thoughts on “काहे को ब्याहे बिदेस

  1. dukhad raha… vastav me koi aavashyakta nahin aaj ke yug me aisi dakiyanoosi manyataon ki..
    Jai Hind…

  2. क्या कहा जाये, दीदी को भी तो अपने परिवार को निबाहना है.

  3. बहुत से ऐसे सन्दर्भों से ही जीवन रचता-पगता है । यह न घटता तो शायद मुक्ति की भाव-भावना-गहनता मुक्त न होती, अभिव्यक्त न होती ।

    जब यह रीति रची गयी होगी शायद इसके निहितार्थ होंगे । इसे सीधे दकियानूसी नहीं कह सकता ।

  4. मनोव्यथा ना पाले, आंसु बहा लें , इसपर जल्द ही एक मेरा लेख आने वाला है , जहाँ मैं बताऊंगा कि रोना भी बहुत आवश्यक है । ऐसा कई बार होता है दीदी जब हम अक्सर जो सोचते है उकसे विपरीत मिलता है, जो चाहते हैं वह नहीं मिलता ।

  5. जी ह मुक्ति जी,
    मै आपके दिल पर हुए कुठाराघात को समझ सकती हूँ ……….एक लड़की के लिए आज भी हमारे समाज में इतनी विषमताए क्यों है ??ये मेरे लिए भी सबसे बड़ा सवाल है ! एक लड़की अपना सुनहरा अतीत और मीठे बचपन से जुड़े रिश्ते नाते यादे सब कुछ छोड़ कर अपना जीवन एक नए परिवार को दे सकती है ! मगर वही परिवार उसे उसके जीवन पर ही अधिकार नहीं देता ! इसी कई बाते है जिनके माध्यम से पड़े लिखे सम्मानित ससुराल वाले भी दकियानूसी तरीको से अपनी बहू और उसके मेहर वालो को ठेस पहुचाते है !
    http://kavyamanjusha.blogspot.com/

  6. आप चाहती थीं, दीदी आप के घर आएँ, और उन का ससुराल चाहता था वे वहाँ रहें। प्रथाओं ने एजेंडा तय कर दिया। शायद प्रथाएँ और मुहूर्त इसी लिए होते हैं कि हम तिराहे पर जा कर कोई एक रास्ता चुन सकें।

  7. O -My, main samajh sakti hu ki aap par aur did par kya beeti hogi. kya kare hamare samaj main paramparyein manviya sanvednaon se upar hain….

  8. क्या कहूँ दिवेदी जी से सहमत हूँ। शुभकामनायें

  9. आज का बिदेस्……बिदेस जैसा है कहाँ ? पल में यहाँ पल में वहां…फिर भी स्त्री का मन है …ज़रा ज़रा में फूट पड़ता है …जो लाज़मी भी है 🙂

  10. mukti
    the basic question is is there any auspicous occassion for “man” . why just woman are “conditioned” to lay rules for woman

  11. आप का भावनाओं में बह कर रोना भी स्वाभाविक था और सासु माँ का कथन भी.खैर अब तो इस बात को एक अरसा हो गया होगा . मन पर बोझ न रखें I

  12. aapka sansmanran bhavuk kar gaya….
    Rachna ji ka prashn bahut saarthak hai..aakhir kyun har riwaaz naari ke liye hi hai…purushon ke liye nahi..
    aur sabse badi baat lagbhag ye saare niyam mahilaaon ne hi ijaad kiye hain…riti-riwaaz ke naam par…
    bahut hi marmik prastuti…

  13. मेरी भी माँ की असमय मृत्यु हो गई थी…. मैं उस वक़्त बारह साल का था…. यादें तो बहुत हैं …. पर अभी उन्ही यादों के सहारे ही माँ का साथ महसूस करता हूँ….

  14. ज़िंदगी सिर्फ़ भावुकताओं से नहीं चलती…
    अपनी राह ख़ुद बनानी हो तो, बंधे-बंधाए ढ़ांचे को तोड कर ही यह संभव है…

    दो सबक…इस वज़ह से मिले…

    आभार….

  15. Devnagari font nahin hai is liye roman lipi mein hindi likhane ka man tyag rahi hoon.

    I understand Aradhana did not pen this post out of angst. She penned it to raise a question about women’s agency in family and marriage. Two female respodents here have raised the issue but men have diverted the discussion ito another direction.

    Why all rituals and conditions imposed on women? Yes, there are few “shubh mahurta” kind of things that bind them but they are very few as compared to those on women.

    Swapna,
    It is difficult to say all these rules were created by women. To understand the dynamics of these rules and rituals one has to understand the power structure of the society. In highly stratified and structured society (read caste and geder stratification; within gender stratification is generational stratification, respect for elder women and those women related to one’s conjugal family) women have very few opportunities for tastig power and exhibitig control. Such rituals provide women personal control over the household, younger men and women in the family. The larger society creates and endorses such opportunities to curb women’s frustration and revolt so that they do not challenge the male dominance in the larger world. Thus women not only religiously follow these rituals but take pride in performing them because they provide them dominant roles.

    Such practices are even observed in highly educated professionally sound families- reason such practices give women personal power over another human being that is more than indirect power in the impersonal world of professions.

    For this reason women oppress other women also because it is easier than challengig the male dominance in the larger society.

    This whole episode was preventable if Jijaji or his father would have stepped up and supported his wife and DIL. It was she who went through a life changig experience- motherhood. It was easier for them to accept it as a customary practice from generations than challenge his mother and wife and the significance of this custom. If Jijaji had done that there would have been a big drama and every body would have accused didi for tutoring him into doig so; forgetting that a man has his own brain a woman does not have to teach him everythig. In our patriarchal society it is tacit that a woman and her natal family ought to do what her marital family wants.

    kya kare hamare samaj main paramparyein manviya sanvednaon se upar hain….

    Richa,

    This will continue until we start questioning and challenging the inequality between natal and conjugal families.

    Mukti,

    This is my first response here I wish to visit you more often. Keep up the good work.

    • आप से यह मेरी पहली मुलाकात है. पर आपके विचार बिल्कुल मेरे विचारों से मिलते हैं. आपकी यह बात बिल्कुल सही है कि जीजाजी को ही कदम उठाना चाहिये था, पर जैसा हमारा समाज है, इसके लिये भी दोष दीदी को दिया जाता. चूँकि यह पहली बार था, जीजाजी कुछ नहीं बोले, पर बाद में ऐसा कई बार हुआ कि उन्होंने बाहर से आने के बाद दीदी को दूसरे ही दिन मायके जाने दिया. मेरे इन मामलों में पुरुषों को भी वैसे ही रूढ़ियों को तोड़ना होगा जैसे औरतों को. मेरे पिताजी ने कभी ये दकियानूसी रीति-रिवाज नहीं माने, जिनका कोई तार्किक आधार न हो. पर वहीं जब मामला बेटी की ससुराल का हो, तो कुछ नहीं कर पाते थे. वहाँ पर निर्णय, उनका होता था. अब जीजाजी भी बहुत हद तक ये बातें नहीं मानते.

  16. यहाँ पढ़ते-पढ़ते कण्व-दुःख याद आ रहा है —
    ” अर्थो ही कन्या परकीय एव …. ”
    ———- जाने कब से यह दुःख उठाते आ रहे हैं सभी !

  17. कुछ ऐसे दिन जो कभी नहीं भूलते ……..हमारे कुछ रीती रिवाज सिर्फ खुद को और दूसरों को कास्ट देने के लिए ही बने है .

    आप इलाहाबाद से है ?

  18. एक कुम्हार था.उसके दो पुत्रियां थी.दोनो के विवाह के सालो बाद कुम्हार ने बाकी जीवन तीर्थाटन करने का विचार किया.पुत्रियों से भी विदा लेनेके लिए वह उस पुत्री के पास गया जो पास के गांव मे ,एक किसान से बिहाई थी.एक रात टहर कर सुबह जाने से पहले पुत्री से पूछा कि तेरे लिये भगवान से क्या मांगू.पुत्री ने कहा कि हमने तो हमारा काम पूरा किया अब वो बरसात बढिया कर दे.तत्पश्चयात वह दूसरी पुत्री के भी रात रूका जिसे कुम्हार को बिहाई थी.प्रात: इससे भी पुछा.पुत्री ने कहा कि इस बार हमने बहुत सुन्दर-सुन्दर बर्तन बनाए हैं आप प्रार्थना करना कि बरसात कम ही करॆं.
    किसान आगे बढा और आसमान कि ओर हाथ करके कहने लगा.हे भगवान तुझे क्या करना है तू सही जानता है.
    अत: आप दुसरो के दृश्टिकोण से भी देखने का प्रयास करें.यदि वे गलत हैं तो उन्हें” प्रेम” से सुधने मे” मदद” करे

  19. मैं कैसे इसे छोड़ दिया -जीवन ऐसे ही कभी खुशी कभी गम जैसे अनुभवों ,वर्जनाओं और कुछ चुराई स्वच्छंद्ताओं से मिलकर
    समृद्ध होता है -और भी विचार जो यहाँ प्रस्तुत हुए हैं चिंतन मनन योग्य है!

  20. क्या रीति-रिवाजों के बंधन स्नेह-बन्धन से अधिक बड़े होते हैं? most important

  21. Hi, Good content throughout the site. This page is probably where I got the most useful information for my research. Thanks for posting, maybe we can see more on this. Are you aware of any other websites on this subject

  22. संवेदनशील संस्मरण! आज याद करने पर सिर्फ़ एक याद है लेकिन उस समय कैसा लगा होगा। अपने समाज में ससुराल वाले और मायके वाले जानबुझकर या अनजाने में ही दो अलग-अलग से दल बने रहने पर अड़े रहे शायद!

  23. स्कूल में एक कहानी पढ़ी थी ‘बहू की विदा’, याद दिला दी आपने |

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