आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

एक छूटी हुई बात…

कुछ दिनों पहले मैंने एक पोस्ट लिखी थी अपने नाम के संबंध में. उसे बहुत लोगों ने पढ़ा और टिप्पणियाँ भी दीं. मैं यहाँ यह बात बताना चाहती हूँ कि उस पोस्ट में एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात छूट गयी थी. मैंने कहा था कि मुझे अपना नाम बहुत अच्छा लगता है, सभी को लगता होगा. पर एक प्रसंग ऐसा है, जहाँ मुझे आराधना शब्द बिल्कुल अच्छा नहीं लगता.

यह प्रसंग है संस्कृत के नाटक “उत्तररामचरितम्‌” से, जो कि प्रसिद्ध नाटककार भवभूति की रचना है. इसकी कथा रामायण के उत्तरकाण्ड पर आधारित है, जिसके बारे में सभी लोग जानते हैं. नाटक के अनुसार राम की एक बहन हैं-शान्ता, जिनके पति ऋष्यशृंग बारहवर्षीय यज्ञ करवाते हैं. राम की माताएँ उस यज्ञ में हिस्सा लेने जाती हैं, इसी सूचना से नाटक का आरंभ होता है. ऊपर मैंने जिस प्रसंग का उल्लेख किया है, वह नाटक के शुरुआत में ही है. ऋष्यशृंग के आश्रम से अष्टावक्र, वसिष्ठ (जो राम के कुलगुरु थे) और राम की माताओं का संदेश लेकर आते हैं. माताओं ने कहलाया कि राम, सीता का ध्यान रखें क्योंकि वे गर्भवती हैं. वसिष्ठ ने संदेश दिया कि वे प्रजा को सर्वथा प्रसन्न रखें. इसी स्थान पर राम कहते हैं –
“स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि
आराधनाय लोकस्य मुंचतो नास्ति मे व्यथा.”
अर्थात्‌ “प्रजा को प्रसन्न रखने के लिये प्रेम, दया, सुख अथवा जानकी को भी छोड़ते हुये मुझे कष्ट नहीं होगा.” जैसा कि मैंने बताया था कि “आराधनम्‌” का एक अर्थ प्रसन्न करना भी होता है. यहाँ यही अर्थ प्रयुक्त हुआ है. यह तो सभी को पता है कि राम ने प्रजा के ही कहने पर सीता को गृह-निष्कासन दे दिया था. इस प्रसंग में उसी बात का संकेत दिया गया है. यह एक नाटक का अंश है और नाट्यशास्त्रीय दृष्टि से इसे “पताकास्थानक” कहते हैं, अर्थात्‌ भावी घटनाओं की सूचना संकेत द्वारा देना. इसी अंक में आगे राम सीता की गंगा-स्नान की इच्छा पूरी करने के बहाने से लक्ष्मण द्वारा वन में छुड़वा देते हैं.

उपर्युक्त प्रसंग में मुझे ’आराधना’ शब्द इसलिये अच्छा नहीं लगता क्योंकि इसकी आड़ लेकर राम ने सीता के साथ इतना बड़ा अन्याय किया और फिर स्वयं पूरे नाटक में इतना रोये कि यह रचना करुणरस के लिये संस्कृत-साहित्य में प्रसिद्ध हो गयी. ये ”प्रसन्न करना या तुष्टीकरण” शब्द ही ऐसा होता है. इसी तुष्टीकरण की नीति पर चलकर राम ने गर्भवती सीता को घर से निकाल दिया और तब से लेकर इस शब्द ने कितनी सामाजिक उथल-पुथल मचाई है.

मैं सीता के निष्कासन के लिये राम को कभी क्षमा नहीं कर पाउँगी क्योंकि उन्होंने दो ग़लत उदाहरण रखे. पहला, किसी एक को प्रसन्न करने के लिये, दूसरे को कष्ट पहुँचाया जा सकता है. मतलब कि जनता की भलाई से ज्यादा ज़रूरी उसे खुश रखना है. दूसरा, नारी पर अत्याचार करने के लिये कोई भी बहाना चल सकता है.
क्या कोई और रास्ता नहीं हो सकता था या नहीं हो सकता है?

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11 thoughts on “एक छूटी हुई बात…

  1. http://mypoemsmyemotions.blogspot.com/2008/06/blog-post_30.html#comments
    read this when you get some time mukti

    दूसरा, नारी पर अत्याचार करने के लिये कोई भी बहाना चल सकता है. hamesha chalaa haen aur chalegaa

  2. पोस्ट बहुत अच्छी लगी…

  3. पूरे दृष्टांत को विस्तृत रूप से जाना -आराधनाय लोकस्य …..लोकतंत्र का उद्गम यही से है क्या मुक्ति ?
    मैं और कुछ नहीं कह पा रहा …..

    • प्राचीन साहित्य मुख्यतः पालि और संस्कृत में ऐसे कई उदाहरण हैं, जो लोकतंत्र की ओर संकेत करते हैं, पर मेरा प्रश्न यहाँ तुष्टीकरण और नारी-शोषण से सम्बन्धित है. क्या प्रजा को तुष्ट रखने के लिये गर्भवती सीता का गृह-निष्कासन उचित था? आज भी यह प्रश्न प्रासंगिक है.

  4. इस तरह के प्रसंग तो और नामों के साथ भी खोज कर लाये जा सकते हैं…
    कहां तक जाएंगे हम…

    इतना अधिक भावुकता से लेना शायद ठीक नहीं…

    पर अच्छा लगा…इस प्रश्न के बरअक्स इसे रखना…
    इस बहाने से चीज़ों को आलोचना के दायरे में लाना…

  5. Mukti, tumne mere dil ki baat likhi hai. mujhe bhi wo prasang nahi bhata jaha Raamji ne Sitaji ka tiraskar kar diya tha sirf apni praja ko khush karne ke liye….
    Too sad and I understand your feelings.

  6. I beg to differ with you Aradhana.In fact,I strongly disagree with your interpretation. The questions of this nature cannot be viewed via stereotypical mindset.Yes,you have a right to analyze and interpret the way you want.Honouring your right to disagree and also honouring your right to intercept the divine/mythological/historical episodes in new light, I wish to say that sometimes it’s better to apply heart than head. I prefer using heart than mind in such situations.Or, if it’s so necessary to use head then at least use both head and heart. That will let you have better take on sensitive issues.

    One may be smiling all the time but who knows what pain resides in heart of that man or woman.The world only sees the tears.The world only sees the smile.It just cannot view the turmoils or conflicts that have possessed the soul.

    So,hats off to you Sree Maryada Puroshttam Ram Ji !! I can see that your great game has attained larger than life significance in our times.You are in the dock for your sins !! And that’s what you really wanted. I have found one more reason to love you more ,of course, along with Sita Maiyya.

    Keep it up Sri Lord Rama !! I know you are super- consciousness (Parabrahman) and therefore all pervading. So for a moment attain form -turn into saguna brahman- and receive my good wishes and then once again go back to your original Nirgun Niraakar form.

  7. आपकी बात से पूरी तरह सहमत!

  8. Mujhe to lagta hai ki Ramayan me abhi bahut si aisi jagah hai jaha Ramji ko maf nahi kiya ja sakta hai.

  9. अच्छी और ज्ञानवर्धक पोस्ट|

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