आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

संगम-तट की रेत पर दो जुड़वा पैरों के निशान

ना जाने क्यों, जीवन में कभी-कभी कोई दोस्त अचानक से ख़ास बन जाता है. वो दोस्त, जिससे हम रोज़ मिलते हैं, बातें करते हैं, घूमते-फिरते हैं और अपने अनुभव बाँटते हैं, किन्हीं कोमल क्षणों में वो कुछ और ही हो जाता है. वो पहले वाली बात नहीं रहती. दोस्त वही होता है, पर वो दोस्त नहीं रह जाता ….अचानक से रिश्ते का पूरा स्वरूप ही बदल जाता है. या हो सकता है यह फागुनी हवा ही ऐसी होती है…. ना जाने कैसी मादकता होती है इसमें?? हर चीज़ ही बदली-बदली लगती है.
बहुत दिनों पहले इसी मौसम में कोई पाहुन चुपके से आन बसा था, मेरे मन-आँगन में और गया नहीं… …बस… बस गया यहीं. हमने बहुत सा समय साथ-साथ बिताया था. कभी महसूस ही नहीं हुआ कि हमारे बीच स्त्री-पुरुष का स्वाभाविक आकर्षण भी हो सकता है. हम अक्सर कहते थे कि पता नहीं लोग कैसे ये मानने को तैयार ही नहीं होते कि लड़का-लड़की भी अच्छे दोस्त हो सकते हैं? हम बहुत अच्छे दोस्त थे…बस…अच्छे दोस्त…लेकिन, एक पल में सब बदल गया.
नहीं…ये इतनी शीघ्रता से नहीं हुआ. मैं बहुत ही कैरियर ओरिएन्टेड, प्रैक्टिकल लड़की थी. मैंने अपने कोमल हृदय के चारों ओर एक दीवार बना रखी थी. इस कठोर हृदय की किलेबन्दी को भेद पाना इतना सहज नहीं था. पर…, जाने क्या था, उन पारदर्शी आँखों में कि मन स्वयं ही इतना कोमल हो गया…सब कुछ अनायास होता गया. उनका आना… मन-मस्तिष्क पर छा जाना और…अस्तित्व का एक अभिन्न अंग बन जाना. संभवतः, सायास यह हो भी नहीं सकता था. मानव-मन का स्वभाव ही ऐसा है. कोई पीछे आता है, तो यह दूर भागता है और कोई दूर जाता है, तो उसके पीछे… … तो, वह मनबसिया हो गया… दूर से ही.
फिर क्या था. मैं, वो और कभी…विस्तृत गंगा का रेतीला तट, तो कभी गम्भीर जमुना का सरस्वती घाट… पर सबसे प्रिय था… गंगा-जमुना का संगम. संगम वैसे भी प्रेमी हृदयों के लिये सबसे सुरक्षित स्थान है. सित-असित तरंगों के साथ ही परस्पर एक होते दो प्रेमातुर हृदय… दूर देश से आये अतिथि खग-वृंद को दाना डालते, लहरों की ठंडक को अपने भीतर अनुभव करते, नाव की सैर करते और तट की ठंडी बालू पर नंगे पाँव टहलते…कोई पुराना गीत गुनगुनाते हुए…
कभी जाओ संगम, तो देखना… दो जुड़वा पैरों के निशान ज़रूर मिेलेंगे संगम-तट की रेत पर…

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29 thoughts on “संगम-तट की रेत पर दो जुड़वा पैरों के निशान

  1. How romantic 🙂
    well written and hey congrats that your post has been published in newspaper.
    Cheers,
    Richa

  2. प्रेम !! कब, कहाँ, किससे और कैसे हो जाए कहाँ पता चलता है…एक पल सब कुछ सामान्य चला रहा होता है और दूसरे ही पल रिश्ते पता नहीं कौन सी करवट ले लेते हैं…बहुत ही प्रेममयी रचना है आपकी…कुछ कहीं भीतर नर्म सा अहसास करा गई है…देखना चाहूंगी मैं भी वो दोजोड़ी पाँव ..गंगा के तीर पर..
    आभार..

  3. कभी जाओ संगम, तो देखना… दो जुड़वा पैरों के निशान’
    बाढ़ के खतरे से बेखबर ही संगम तट पर पैरों के निशान छोड़ सकते हैं
    बहुत ही सुन्दर शैली

  4. कैसी कवितामय हैं ये पक्तियां -ह्रदय को उद्वेलित करती ,बेंधती सी
    समय के पृष्ठ पर मोरपंखों से लिखी ऋचाओं सी …
    इलाहाबाद की संगम रेती धन्य हुयी ….प्रेम के पद चिन्हों को अपने अंक में समेटे
    पुनः पुनरपि तो जाना होता ही है वहां -इस बार कुछ और अनुभूति का आकर्षण रहेगा

  5. मनोभावों का कवित्तमय प्रवाह…बेरोकटोक!!

  6. बहुत सुन्दर संस्मरण/पोस्ट!

  7. गिरिजेश राव on said:

    .. फाग आग आँच
    नरम हुई कड़ियाँ
    – फिर टूटीं।

    पसर गया प्रेम
    शब्द शब्द आखर आखर।

    … तूने क्या, कैसे, क्यों बाँध रखा था ?
    _________________

    दोस्त में अपनापन समाहित है – अपना हटाइए।
    @ दो जुड़वा पैरों के निशान
    जुड़वा को जोड़ी होना चाहिए क्या? (सिर खुजा रहा हूँ।)

  8. कभी जाओ संगम, तो देखना… दो जुड़वा पैरों के निशान ज़रूर मिेलेंगे संगम-तट की रेत पर…
    Bahut sundar! Kab kiswaqt manme pyaar ka ehsaas jaagega..kaun kah sakta hai?

  9. संगम की रेती ने माँगा
    दो जोड़ी पैरों का प्यार
    यूँ तो उसका पैर पूजता
    है देखो सारा संसार …

  10. सुन्दर प्रेमभाव, अभी तक डूबा हुआ हूँ…

  11. सुन्दर अभिव्यक्ति शुभकामनायें

  12. Thanks………………………………..

    Very Nice…………………………….

  13. मृदुल-तरल अनुभूतियों का स्पर्श कितना मोहक है, महसूस रहा हूँ । लिखावट भी छूती है, रोयें सहलाती है, बेसुध कर डालती है ।

    @”मैंने अपने ’कोमल हृदय’ के चारों ओर एक दीवार बना रखी थी. इस ‘कठोर हृदय ‘की किलेबन्दी को भेद पाना इतना सहज नहीं था ”
    सच बताइये ’कोमल हृदय’ या ’कठोर हृदय’ ?

    • हृदय कोमल है या कठोर, मैं ही कहाँ समझ पायी हूँ, अब तक…जीवन के बड़े-बड़े झंझावात झेल लेती हूँ, पर अपनों की थोड़ी सी उपेक्षा नहीं सही जाती. अमरेन्द्र का “नारिकेल फल समान” ही मान लीजिये.
      बन्धुद्वय का समर्थन मिला…मेरा लेखन सफल हुआ.

  14. @ …… … तो, वह मनबसिया हो गया… दूर से ही
    —- ” वह आज हो गयी दूर तान
    इसलिए मधुर वह और गान ” ( निराला )
    .
    ” कैरियर ओरिएन्टेड, प्रैक्टिकल लड़की ” यह बना(बनाया) हुआ कठोर ह्रदय है , पर मूल में
    शायद वह कोमल ह्रदय है जो कठोरता के साथ कह रहा है ” “जुड़वा” नहीं हटाऊँगी. ” …
    @ सच बताइये ’कोमल हृदय’ या ’कठोर हृदय’ ?
    — मुझसे तो पूछा नहीं गया है पर काहे न बकें ! गाँव का ” बर्री ” हूँ न जो !
    नारिकेल-ह्रदय मान लो भैया ! झंझट ख़तम ! अब समझा करौ ! हमार काम ख़तम !
    …………….
    ‘फेमिनिस्म’ के रूढ़ चौकठे में आप ‘फिट’ हो ही नहीं सकतीं ! यह उन्मुक्त-अनुभव-सलिला ही ‘मुक्ति’ है ! आभार !

    • पोस्ट के कमेंट पढ़ने आया फिर से ! यहाँ तो अमरेन्द्र मेरे मन की बात कह गये थे ! मुक्ति की कई भंगिमायें हैं आपके पास ! इससे तो एकदम सहमत हूँ –
      “‘फेमिनिस्म’ के रूढ़ चौकठे में आप ‘फिट’ हो ही नहीं सकतीं ! “

      ’फेमिनिस्ट पोएम्स’ बदल दिया जाय क्या ! कोई रूढ़ उत्तर न दीजियेगा !

  15. बहुत सुंदर लगी यह पोस्ट,बहुत कुछ मेरे आँखों से भी गुजर गया,कितना अपनापन,आखिर क्यों न हो इन स्थलों का एक दशक तक साक्षी जो रहा हूँ.

  16. सुन्दर प्रेमभाव….सुन्दर अभिव्यक्ति…..

  17. हम अक्सर कहते थे कि पता नहीं लोग कैसे ये मानने को तैयार ही नहीं होते कि लड़का-लड़की भी अच्छे दोस्त हो सकते हैं?….

    आखिर आपने लोगों को सही साबित कर दिया…
    आखिर आपको पता चल गया कि वे क्यूं ये मानने को तैयार नहीं होते थे…

    अच्छी स्वीकरोक्ति…प्रस्तुति…

  18. और उसके पश्चात क्या हुआ ? क्या वो निशान जल के बहाव से मिट गए या अभी भी है ?

  19. गज़ब! (टिप्पणियों की नोंकझोंक)

  20. अहसासों से सारी पंक्तियाँ झूम रही है ……….महोब्बत खुद इतनी कोमल होती है …..कठोरता भी उसके सामने कोमल हो जाती है…….

  21. kya khu….bs moun hokr un pairo ki chhap ko dekhna chahti hu..bhut khubsurat ehsas.

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