आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

पिताजी का बचपन (1)

मेरे पिताजी के बारे में लोग कहते थे कि वे अपने समय से पचास साल आगे की सोच रखने वाले इन्सान थे. बहुत ही खुले विचारों के, तार्किक, बुद्धिवादी, बेहद लोकतान्त्रिक, मस्तमौला और फक्कड़ किस्म के आदमी थे. वे नास्तिक थे. मतलब, ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे. ये कहा जा सकता है कि साकार ईश्वर को नहीं मानते थे. हिन्दू संस्कृति में ‘नास्तिक’ वेदों को न मानने वाले को कहते हैं. इस दृष्टि से पिताजी नास्तिक नहीं थे क्योंकि वे वेदों में विश्वास रखते थे. पर, तार्किक दृष्टि से, न कि आस्थावश. पुराणों के घोर आलोचक थे. हमलोग बचपन से ही पिताजी के कारनामे सुनकर बड़े हुये हैं, इसलिये इतनी सारी बातें हैं मेरे पास उनके बारे में बताने के लिये कि एक पोस्ट कम पड़ेगी.

वे कई मामलों में अनोखे थे. तीन बहनों के बाद उनका जन्म हुआ और वह भी कृष्ण जन्माष्टमी के दिन आधी रात को, आँधी-पानी और तूफान के बीच. उनके जन्म के विषय में एक किस्सा मशहूर था. हमारे गाँव में एक कुटिया है. वहाँ कृष्ण जन्माष्टमी मनाने लोग एकत्र होते थे. घड़ियाँ तो होती नहीं थी. इसलिये कृष्ण-जन्म का पता लगाने के लिये पकी फूट (एक प्रकार का फल) रखी जाती थी. उसके फूटते ही जन्म मान लिया जाता था. लोग कहते हैं कि उधर कुटिया से कोई कृष्ण-जन्म की खबर लेकर आया और इधर से पुत्र-जन्म की खबर लेकर वापस गया. आश्चर्यजनक ढंग से पिताजी के जन्म का समय वही था. वैसे भी गाँव के लोग किंवदंतियाँ गढ़ने में बड़े होशियार होते थे और ये कथा पिताजी के जन्म के साथ जुड़ गयी. घर के लोग डरते थे कि ठीक भगवान कृष्ण के जन्म जैसी परिस्थितियों में पैदा हुआ बालक बहुत दिनों तक जीवित नहीं रहता. इसीलिये पिताजी को छींक भी आ जाती, तो सारे खानदान वाले घबरा जाते थे. वैसे भी खानदान के सबसे बड़े बेटे की पूछ तो होती ही है. इतने लाड़-प्यार से पले होने के बावजूद पिताजी विद्रोही होते गये. ये विद्रोह उस समय समाज में फैले अंधविश्वास और रूढ़ियों से पिताजी की तार्किक और विवेकशील बुद्धि के टकराव का परिणाम था. शायद आज़ादी के तुरंत पहले का वह समय भी इसका ज़िम्मेदार रहा हो.

पिताजी के विद्रोहों की शुरुआत हुई थी, छोटी-छोटी रूढ़ियों को तोड़ने से. तब ब्राह्मणों के लिये बड़े नियम कायदे होते थे. बिना नहाये नहीं खाना, दर्जी का सिला कपड़ा पहनकर न खाना, जनेऊ ज़रूर पहने रहना वगैरह. पिताजी ने ये सारे नियम मानने से इंकार कर दिया. जब मनुस्मृति का हवाला दिया गया, तो उन्होंने कहा कि वह सैकड़ों साल पहले तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार लिखी गयी थी. उसमें जैसा लिखा है, अगर अक्षरशः पालन करने लगे , तो इस युग में जीना मुश्किल हो जायेगा. और ये तो कोई बात नहीं हुई कि कुछ बातें मानो और कुछ ना मानो. इसके लिये पितीजी ये श्लोक उदाहरण में सुना देते थे “…न मूत्रं पथि कुर्वीत न भस्मनि न गोव्रजे……..विसर्जनम्‌ .” (अर्थात्‌ ब्राह्मण को कहाँ-कहाँ मूत्रत्याग नहीं करना चाहिये- न भस्म पर, न गोशाला में, न जोते हुये खेत में, न  भट्ठे पर या आवां में, न पहाड़ पर, न पुराने मन्दिर में, न जीवयुक्त बिल में, न चलते हुये, न नदी के किनारे, न पहाड़ की चोटी पर वगैरह वगैरह…) अब बताओ ब्राह्मण बेचारा मूत्रत्याग करे तो कहाँ ?”

फिर कुछ ऐसे अंधविश्वास थे, जिन्हें पिताजी ने सिरे से बकवास करार दे दिया. उस समय चिकन पॉक्स और स्माल पॉक्स को माता कहते थे. बड़ी माता और छोटी माता. इनके आने पर लोग झाड़-फूंक करके एक मटकी, एक लाठी और न जाने क्या-क्या गाँव के बाहर छोड़ आते थे. मेरे पिताजी चुपचाप जाकर इन चीज़ों को उठा लाते थे और उन्हें इस्तेमाल करते थे. उस आयु में वैसे भी ऐसी चीज़ें बच्चों को खिलौना लगती हैं. पर बड़ों के डराने पर बच्चे डर जाते हैं. पिताजी नहीं डरते थे. मैंने भी उन्हें कभी किसी चीज़ से डरते नहीं देखा. मैं भी उन्हीं के जैसी हूँ, पर कभी-कभी अनजानी सी बातों से डर जाती हूँ. पर उस ज़माने में जब पेड़ों और कुओं में चुड़ैल, भूत, बरम और आत्माएँ पायी जाती थीं, मेरे पिताजी कभी भयभीत नहीं हुये. वे हर ऐसी जगह पहुँच जाते थे और अपनी लाठी (तब लगभग हर व्यक्ति अपने साथ लाठी ज़रूर रखता था) से ठोंक-ठोंककर भूत और चुड़ैल को डराते थे.

क्रमशः


Advertisements

Single Post Navigation

21 thoughts on “पिताजी का बचपन (1)

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

  2. कहती चलिए पिता जी के बारे में ……..सुन रहा हूँ ! यह जानने की उत्कंठा भी थी की इस योग्य पुत्री के पिता कैसे रहे होंगें ?
    कुछ साम्य तो स्वतः रेखांकित होते चल रहे हैं –
    अपने गिरिजेश भाई भी कृष्ण जन्माष्टमी को और वैसी ही विकट परिस्थितियों को जन्मे थे-बौद्धिक कुशाग्रता में उनकी भी कोई सानी नहीं है .
    और यह क्या महज संयोग है की हम कल ही उन्ही से जनेऊ धारण की वर्तमान निरर्थकता पर विमर्श कर रहे थे ?
    नास्तिक होकर भी वेदों में निष्ठां रखी जा सकती है -यह भला मैं कैसे न समझ जाऊं ?
    इंतजार है अगली कड़ी का ……

  3. सुंदर श्रंखला है। ऐसे चरित्रों का साहित्य में चित्रण आवश्यक है। जहाँ वर्जनाएँ अधिक होती हैं वहीं उन को तोड़ने वाले भी मिलते हैं। हमारा परिवार भी कुछ ऐसा ही था।

  4. संगीता पुरी on said:

    अच्‍छा लगा आपके पिताजी के बारे में पढकर .. मेरे पिताजी के विचार भी इससे मिलते जुलते हैं .. ऐसे लोगों की ही आज के समाज में भी आवश्‍यकता है !!

  5. बहुत महसूस करके लिखा है ..I am really moved by details unfolded here..मेरे पिताजी भी तुम्हारे पिताजी जैसे है ..फर्क इतना है कि religious symbols से बहुत गहरे से जुड़े है पर पोंगापना और अंधविश्वास नहीं है :-)) मै यह भी देखता हू कि मेरे नानाजी भी कई मायनों में या कहू बिलकुल कार्बन कॉपी थे तुम्हारे पिताजी के ..वे जब इस अवस्था में नहीं थे कि कुछ कदम भी चल सके तो मुझसे मिलने कई किलोमीटर चल के आते थे और खून उनके पैरो से रिसता रहता था !!! बहुत अच्छी अंग्रेज़ी लिखते थे ,बोलते थे [अन्ग्रेज्ज़ी के headmaster जो थे :-)) ] इसलिए मै as a child जब उन्हें लम्बी चिट्ठी लिखता था तो वो उन आँखों से पढ़ते थे जिन आँखों से वो देख भी नहीं पाते थे . कांपते हाथो से जवाब prepare करते मेरे लिए ..और फिर उसी चिट्ठी को टाइप करने कुछ किलोमीटर चल के जाते ..वे भी मेरी नज़रो में समय से बहुत आगे थे .बहुत विद्रोही थे ..किसी का इंतज़ार करने के आदि नहीं थे ..रेडियो ,घडी और छाता उनके साथ रहता था हमेशा ..क्योंकि वक्त के पाबन्द और न्यूज़ से बहुत लगाव था .. लोग अब ये कहते है कि उनकी family में मतलब मामा और उनके लडको ने ,मौसी ने किसी ने भी उनके गुणों को आत्मसात नहीं किया ..मै मुस्कुराता हू जब मेरी मम्मी और अन्य लोग कहते है कि मै बिलकुल उनकी कार्बन कॉपी निकल गया :-)) वैसे वे अंग्रेज्ज़ी में सिद्ध थे पर उनके घर में सब ने बहुत पढाई कि संस्कृत और इकोनोमिक्स को लेकर :-)) तो अब मेरे एक मामाजी संस्कृत महाविद्धालय में पढ़ाते है और घोर परम्परावादी है और जाहिर है कि मुझसे हमेशा छतीस का आंकड़ा रहता है उनका ..और एक मौसी है जिन्होंने आचार्य कि पढाई कि और अब गृहणी है.

    इतना काफी है अभी के लिए :-))

    http://indowaves.instablogs.com/

  6. बहुत अच्छा लगा आपके पिताजी के बारें में जान कर ………आगे भी जानने की इचा बरकरार है ….

  7. bahut hi accha laga ye sundar chitran, aage ki kadiyo ka intzar hei

  8. दिलचस्प……अक्सर पिता बचपन के पहले हीरो होते है ….हमारे आदर्श भी ….कुछ बाते हम बाद में समझते है …..

  9. सुबह मोबाइल नेट पर इसे पढ़ा था। अभी पोस्ट खोज के टिप्पणी कर रहा हूं। बहुत सुन्दर पोस्ट! आगे के परिचय का इंतजार है।

  10. आपके पिताजी सच में एक प्रखर पुरुष थे । उनके बारे में जानना अच्छा लगा । अगली कड़ी का इंतजार रहेगा । आभार

  11. पढ़ कर गर्व हो आया…सचमुच, अपने समय से पचास साल आगे की सोच रखते थे…और ऐसे लोगों के बल पर ही दुनिया आगे बढती है…वरना रूढ़ियों को कोई तोड़ने की हिम्मत ना करे तो समाज वैसे ही आँखों पर पट्टी बांधे कोल्हू के बैल की तरह गोल गोल घूमता रहें.
    अनायस ही पिताजी से ये सारे गुण तुम्हे भी मिल ही गए हैं,जो तुम्हारे लेखन से परिलिक्षित होता है.
    पिताजी को मेरा नमन कहना

  12. मेरी भी विचारधारा कुछ आपके पिता जी जैसी है … किन्तु न किसी विचार का अंधा अनुकरण करता हूँ और न ही पूर्वाग्रह से ग्रसित हो कर उसे बलात् त्यागता हूँ … जैसे आपने लिखा (अर्थात्‌ ब्राह्मण को कहाँ-कहाँ मूत्रत्याग नहीं करना चाहिये- न भस्म पर, न गोशाला में, न जोते हुये खेत में, न भट्ठे पर या आवां में, न पहाड़ पर, न पुराने मन्दिर में, न जीवयुक्त बिल में, न चलते हुये, न नदी के किनारे, न पहाड़ की चोटी पर वगैरह वगैरह…) ध्यान से पढ़िए इसे फिर से शायद आपको लगे कि हाँ कुछ स्थान हैं ऐसे जहाँ मूत्र विसर्जन करने से कुछ हानियाँ हैं अथवा उचित नहीं लगता. विद्रोही ज़रूर होना चाहिए किन्तु विवेकपूर्ण ढंग से… जो ग्राह्य है उसे जबरन त्यागना भी उसी श्रेणी में आता है जिस में निरर्थक बातों को ग्रहण करना… जीवन का हर अनुभव प्रयोग कर के सीखना संभव नहीं हो सकता …. कभी कभी दूसरों को गिरते देख खुद का सम्हल जाना भी श्रेयस्कर होता है … मुझे भी किसी भूत प्रेत से कभी डर नहीं लगा और अनावश्यक(या वर्तमान में अप्रासंगिक) कर्मकांडों में विश्वास नहीं है…
    बहुत धन्यवाद आपको

    • पिताजी चालीस के दशक में पैदा हुये थे. उन दिनों इतने अधिक नियम-विनियम थे कि उनका अत्यधिक विद्रोही होना स्वाभाविक था. जहाँ तक मनुस्मृति के उस श्लोक की बात है, तो पिताजी का अन्धानुकरण के विरोधी थे और जो बातें उन्हें तार्किक नहीं लगती थीं उन्हें नहीं मानते थे. पिताजी कट्टर विद्रोही थे. कुछ मामलों में मेरी उनसे असहमति रहती थी. उनका कट्टर होना तत्कालीन परिस्थितियों का परिणाम था. हमारे लिये उन्होंने रास्ता इतना आसान कर दिया था कि विद्रोह करने को कुछ बचा ही नहीं.

  13. बहुत अच्छा लग रहा है आपकी लेखनी के द्वारा आपके पिताजी को जानना …आगे परिचय का इंतज़ार है

  14. isi liye aap aisi haiN. Aisi hi bani raheN.

  15. मैंने अब पढ़ना शुरु किया है आपकी इस श्रृंखला को ! सहेजकर रख छोड़ा था रीडर में फुर्सत के लिए !

    कृष्ण जन्माष्टमी के दिन जन्म…फिर विद्रोह की स्वाभाविकता…होना ही था !
    कृष्ण जाने अनजाने अन्तश्चेतना में समा गए थे !
    भय उत्पन्न करने वाली वस्तु या भ्रम से सहज साक्षात्कार, डर का साहस में परावर्तन कर देता है..कृष्ण के जीवन में अनगिन बार घटा ऐसा !

    एक जीवन्त अन्तःप्रज्ञा, आत्मबल था आपके पिता जी के अन्दर, जिसने यह सारी क्रियाएं, प्रतिक्रियाएं उनसे करायीं !
    प्रवृत्त हो चला हूँ इस संस्मरण अवगाहन के लिए ! … आभार ।

  16. Bahut achcha laga, aapke pitaji ke bare me jaankar. Waise mere pitaji thode alag hai. Wey, ishwar me vishwas karte hain magar vedon me nahi. He believes in the philosophy – “Pathar Puje Hari Mile To Mein Pujun Pahar.”

  17. विकासशील चेतना के मालिक थे तुम्हारे पिता…
    फिर भ्रमणाओं में क्यों जीते…! घेटोवाद में क्यों
    शम्मिलित होते…जो चलती को गाड़ी कहे वैसों की
    जमात में… ऐसे व्यक्ति समाज में बहुत तन्हा व
    अकेले होते हैं…पर अपने भीतर से जीवंत, जागे
    हुए…जीवन और जीव प्रेमी…प्रकृति प्रेमी…और
    आनंद की उनकी अपनी समझ स्पष्ट होती है,
    आस्था-सी …
    .

    और जो इस तरह जिए, उसे लोक परलोक की ज्यादा
    चिंता नहीं होती.. और आराधना तुम उनकी गुणग्राही
    बनी यह भी उनके लिए संतोषप्रद रहा होगा…

  18. विद्रोही लोगों ने ही समाज को एक नयी दिशा दी है…

  19. कुछ लोग अपने वक्त से बहुत आगे होते हैं… वो समाज के अनुसार नहीं ढलते बल्कि समाज को अपने अनुसार ढालते हैं.. अच्छा लगा पिताजी के बारे में जानना….

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: