आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

उनकी ज़िन्दगी के वो रूमानियत भरे दिन (1.)

पिताजी ने पढ़ाई पूरी करते ही घर छोड़ दिया था. वे वहाँ से बाहर निकलकर कुछ करना चाहते थे और अपनी ज़िन्दगी अपने ढंग से जीना चाहते थे. गाँव की कुरीतियों और अन्धविश्वासों से उनका मन भी ऊबा  था. फिर तब खेती में बहुत श्रम करने पर भी कम आय होती थी और सिर्फ़ लोगों का पेट भर पाता था.

पिताजी जब अपनी युवावस्था के दिनों के बारे में बताते थे तो हमें लगता था कि हम कोई पुरानी रोमैंटिक हिन्दी फ़िल्म देख रहे हों. पिताजी की शादी उस ज़माने के और लोगों की ही तरह माता-पिता की इच्छा से हुयी थी. फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि उन दिनों शादी के पहले जब लड़की-लड़का एक-दूसरे को देखने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे, पिताजी ने अम्मा को देखकर शादी की थी. और उसकी भी एक मज़ेदार कहानी थी.

पिताजी उन दिनों रेलवे में शंटमैन थे. यद्यपि उनकी शिक्षा के हिसाब से वो नौकरी नहीं थी, पर गाँव से बाहर निकले, अपने दम पर अपनी जगह बनाने वाले लोगों को संघर्ष तो करना ही पड़ता है. उन दिनों लोग रेलवे में कच्चे में काम करने लगते थे और कुछ दिन काम करने के बाद उन्हें परमानेंट कर दिया जाता था. तो पिताजी कच्चे में लगे थे. उनकी शिक्षा और स्वभाव के कारण लोग उनका बहुत सम्मान करते थे. वे मालीपुर नाम के एक स्टेशन पर पोस्टेड थे. कच्चे कर्मचारियों को रेलवे का घर तो मिलता नहीं था. इसलिये एक जन के यहाँ किराये पर रहते थे. आस-पड़ोस के लोग उन साहब से कहने लगे कि वो अपनी लड़की का ब्याह चौबे से करा दें. अब क्या था ? पिताजी के मित्रगण उनको चिढ़ाने लगे. वो लड़की भी पिताजी से अपनी शादी के सपने सजाने लगी. पर वो लोग कान्यकुब्ज़ ब्राह्मण थे और हम सरयूपारीण. हमारे समाज में आज भी दोनों कैटेगरी के ब्राह्मण अपने आपको स्वघोषित रूप से श्रेष्ठ मानते हैं और एक-दूसरे के यहाँ शादी नहीं करते हैं, तो उस ज़माने में तो सवाल ही नहीं उठता था.

पिताजी के ममेरे भाई वहीं रहते थे. जब उन्हें पता चला तो भड़क गये. उन्हीं दिनों घर पर अम्मा का रिश्ता आया पिताजी के लिये. पिताजी के ममेरे भाई उन्हें धोखे से अम्मा के गाँव ले गये और उन्हें अम्मा के दर्शन करा दिये. तब अगर कोई लड़का, लड़की को शादी के लिये देख लेता था, तो ना नहीं कर सकता था. पिताजी को तो मालूम भी नहीं था और उनके ममेरे भाई ने ये बात फैला दी कि कृष्णदेव ने लड़की देखकर पसंद कर ली है. तो इस तरह उनको अम्मा से शादी करनी पड़ी.

पिताजी बताते थे कि उन्हें पहली नज़र में अम्मा अच्छी नहीं लगी थीं. उनकी नज़र में तो गोरी-चिट्टी मालीपुर वाली बसी थीं और अम्मा थी साँवली. पर जब पिताजी ने अम्मा को देखा था, तो नानी उनके बालों में तेल लगा रही थीं और पिताजी की नज़र उनके काले-घने और लम्बे बालों में अटक गयी थी. पिताजी अक्सर बाद में अम्मा को छेड़ते थे कि “मेरी शादी मालीपुर वाली से होती तो मेरे बच्चे गोरे-चिट्टे होते” और मैं अम्मा का बचाव करते हुये तपाक से कहती कि “इतने बुद्धिमान न होते” फिर दीदी कहती और “इतने लम्बे भी नहीं.” पिताजी कहते कि “वो सीधी-सादी थी, तुम्हारी अम्मा की तरह झगड़ालू नहीं” और हम कहते “भोदू रही होगी, इतनी तेज-तर्रार नहीं” अम्मा मुस्कुराकर रह जाती थीं.


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16 thoughts on “उनकी ज़िन्दगी के वो रूमानियत भरे दिन (1.)

  1. Achchha sansmaran.. brahmanon ki sabse badi kamiyon me se ek hai ye jatigat shreshthata ki takraar.

  2. बहुत खूब।
    अच्‍छी पहल है, एक पीढ़ी के अनुभव दूसरी पीढी के सामने रखना कुछ सीखा ही जाता है।

    आभार

  3. बहुत अच्छा लगा …..पढ़ कर …..और आपके पिता जी कि शादी का किस्सा भी ……..

  4. अच्छा लगा संस्मरण पढ़कर!

    हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

    लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

    अनेक शुभकामनाएँ.

  5. सुन्दर संस्मरण
    लेखन प्रभावशाली

  6. शायद ब्लॉग्गिंग का यह एक श्रेष्ट उदाहरण है. ऐसे अनुभव, कच्चे अनुभव, अच्छे अनुभव… पढ़ने से सकुन मिलता है. आज सुबह सुबह ही इस पोस्ट का अलर्ट मिला. तुरंत पढ़ा. सुन्दर लगा.

  7. पहले विवाह ऐसे ही हुआ करते थे। हम ने भी बिना देखे ही विवाह किया था।

  8. 🙂.बहुत रोचक संस्मरण…लिखती रहिये.

  9. बहुत ही दिलचस्प तरीके से लिख रही है, ये संस्मरण….और वो पिताजी का अम्मा को चिढाना और आपका और दीदी का उनका बचाव करना…बहुत ही रोचक अंदाज़ था.

  10. अरे अरे मुक्ति मैं तुम्हे बधाई देना तो भूल ही गयी…हिंदी वर्डप्रेस पर तुम्हारा ब्लॉग दो दिन से टॉप पर है…और १२५ से ज्यादा लोग पढ़ रहें हैं. woww thats a great news..congrats again

    अब तो पक्का तुम हिंदी ब्लॉग जताग कि जूली हो (जूली एन जूलिया फिल्म वाली )🙂

  11. bahoot achha likha hai …..padhte hue mere pitaji ke sangharsh bhare din yaad ho aaye .mere pita bhi railway me the .

  12. Bhahut achcha likha hai maja aa gaya padker

  13. पिता के संस्मरण पुत्री के की बोर्ड से -फर्स्ट हैण्ड और प्रमाणिक !
    एक बेटी ही अपने पिता के बारे में इतनी सहजता स्नेहिलता से लिख सकती है
    मन में कई सवाल हैं मगर आप आगे तो लिख ही रही हैं !

  14. पढ़ तो उसी दिन लिया था जिस दिन पोस्ट किया गया था। अम्मा-बाबूजी के नोक-झोंक के किस्से दुबारा पढ़ने के लिये और यह लिखना भी था- बहुत सुन्दर, शानदार संस्मरण!🙂

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