आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

उनकी ज़िंदगी के वो रूमानियत भरे दिन (2.)

हिन्दी सिनेमा का स्वर्णकाल (पचास और साठ के दशक) पिताजी के जीवन का भी स्वर्णकाल था क्योंकि वे उस समय युवा थे और नयी-नयी शादी हुयी थी. अपने खानदान क्या, पूरे गाँव में अपनी पत्नी को अपने साथ शहर लाने वाले पिताजी पहले युवक थे. नहीं तो उस समय पिया लोग कमाने रंगून और कलकतवा चले जाते थे और पियानियाँ (मतलब पत्नियाँ) घर बैठकर विरह में कजरी और बिदेसिया गाती थीं–“चार रे महीना कहि के गइलैं कलकतवा बीति गइलैं बारह बरीस रे बिदेसिया” इससे ये पता चलता है कि पिया लोग बरसों घर नहीं जाते थे और पत्नियाँ सौतन की कल्पना कर-करके जल-जलकर राख होती थीं और “कोयला भई न राख” वाली गति बना लेती थीं. पिताजी ने अम्मा को बिरहगीत गाने का मौका ज्यादा नहीं दिया और शादी के लगभग तीन साल बाद(तीन साल तब भी लगा दिये) अम्मा को लेकर उन्नाव आ गये, जहाँ वे उस समय पोस्टेड थे.

दरअसल अम्मा को साथ ले जाने का एक विशेष कारण था. उन दिनों बिजली आदि से चलने वाली चक्की नहीं होती थी. औरतें घर में ही जांता (हाथ चक्की) चलाकर आटा पीसती थीं और दाल दरती थीं. इसलिये सुबह-सुबह मुँह अँधेरे उठना पड़ता था. अम्मा को ये सब करने में कोई परेशानी नहीं थी. पर भयंकर जाड़े में भी भोर में नहाकर और एक कपड़ा पहनकर ही खाना बनाना पड़ता था (जैसा कि मैं पहले बता चुकी हूँ खाना बनाते और खाते समय दर्जी का सिला कपड़ा पहनने की अनुमति नहीं थी). अम्मा का जब ब्याह हुआ था, तो वो सिर्फ़ 15 साल की थी. बेहद दुबली-पतली बेचारी अम्मा की हड्डियाँ काँप जाती थीं जाड़े में. घर की बड़ी बहू होने के कारण सारे घर की ज़िम्मेदारी भी अम्मा पर ही थी. इतना सारा काम करने के कारण अम्मा बीमार रहने लगीं. उस पर भी कोई उन पर ध्यान नहीं देता था. घर की बहुओं की औकात ही क्या होती है? उन्हीं दिनों हमारी छोटी बुआ का टी.बी. का रोग लगने से देहांत हो गया. उन दिनों ये एक घातक बीमारी थी और इसका कोई इलाज नहीं था. अम्मा ने उनकी बड़ी सेवा की थी. पिताजी को जब अम्मा की बीमारी का पता लगा, तो उन्हें लगा कि कहीं अम्मा को भी ये रोग न लग जाये. तो उन्होंने फिर से घर वालों का विरोध करते हुये अम्मा को साथ ले जाने का फ़ैसला कर लिया. ले गये थे वो अम्मा का इलाज कराने, पर वापस पहुँचाने नहीं गये.

जैसा कि मैंने पहले भी बताया है कि अम्मा-पिताजी की शादी के लगभग ग्यारह साल बाद दीदी का जन्म हुआ था. इस बीच अम्मा रह रहकर बीमार पड़ जाती थीं और उनका इलाज चलता रहता था. अम्मा-पिताजी ने बाल-बच्चे न होने का खूब फ़ायदा उठाया. खूब घूमे-फिरे, फ़िल्में देखीं, बाहर खाना खाया(अम्मा ने नहीं, वो बाहर का नहीं खाती थीं, मरते दम तक नहीं खाया) रेडियो पर खूब गाने सुने( उन दिनों किसी के पास रेडियो होना बड़ी बात थी) और खूब गप्पें हाँकीं. कुल मिलाकर वो दिन उनकी ज़िन्दगी के रूमानियत भरे दिन थे.

वो समय हिन्दी सिनेमा का ही नहीं, भोजपुरी सिनेमा का भी स्वर्णकाल था. भोजपुरी की पहली फ़िल्म थी “गंगा मैया तोहैं पियरी चढ़इबौं.” अम्मा को ये फ़िल्म बहुत पसन्द थी और इसके गाने वो अक्सर गुनगुनाया करती थीं. इसके अलावा “बिदेसिया” और “लागी नहीं छूटे रामा” फ़िल्मों की भी अम्मा बहुत प्रशंसा करती थीं. बिदेसिया का गाना “हंसि-हंसि पनवा खिअउलै बेइमनवा” अम्मा का मनपसंद गाना था. इसके अलावा जो गाना उन्हें अच्छा लगता था–“लाले-लाले ओठवा से बरसै ललइया, हो कि रस चुऐला, जइसै अमवा की डरिया से रसा चुऐला”(ये गाना तलत महमूद और लता जी ने गाया है). सब लोग बताते हैं कि जब मैं छोटी थी, तो अम्मा के गाने दोहराती थी. मेरी तोतली बोली में भोजपुरी गाने सबको बहुत अच्छे लगते थे. मज़े की बात कि मैं भोजपुरी न तब बोल पाती थी और न अब बोल पाती हूँ, पर गाने गा लेती हूँ.

अम्मा-पिताजी फ़िल्मों के इतने दीवाने थे कि कभी-कभी एक सिनेमाहाल से निकलते थे फ़िल्म देखकर और दूसरे में घुस जाते थे. लोग कहते हैं कि आजकल समाज पर फ़िल्मों का कुछ ज्यादा ही असर दिख रहा है, तो वो तब भी कम नहीं था. उसी समय देवानंद के सफेद शर्ट और काली पैंट के साथ काली कोट पहनने पर पाबंदी लग गयी थी क्योंकि कुछ लड़कियों ने उन्हें इस पोशाक में देखकर आत्महत्या कर ली थी. मेरे पिताजी भी बहुत ही हैंडसम थे. पाचँ फिट ग्यारह इंच की लम्बाई, गोरा-चिट्टा रंग और छरहरा शरीर. कोई उन्हें देवानंद कहता था, तो कोई सुनील दत्त और मेरी अम्मा पिताजी पर वारी-वारी जाती थीं.


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22 thoughts on “उनकी ज़िंदगी के वो रूमानियत भरे दिन (2.)

  1. बिदेसिया के गाने मुझे भी पसन्द हैं। लोकधुनों और शास्त्रीय संगीत का ग़जब का संगम है श्रीनाथ त्रिपाठी के संगीत में ! राममूर्ति चतुर्वेदी के गीतों में भोजपुरी का सौन्दर्य निखर आया है।

    • अरे बाबा,
      बच्चे पर इसी तरह कृपादृष्टि बनाये रखिये. बिदेसिया का संगीत किसने दिया, ये मुझे नहीं मालूम था. अच्छा हुआ आपने बता दिया. इन फ़िल्मों की कैसेट हैं मेरे पास. एक पुराने से कैसेट प्लेयर पर घरघराती हुई आवाज़ में अब भी सुनती हूँ. सी.डी. बहुत ढूँढ़ी. नहीं मिली. कुछ बताइये कहाँ मिलेगी?

  2. कितनी अच्छी तरह याद किया है माता पिता को आपने । अच्छा लगा ।

  3. Can you get some relevant photographs also in the postings! Or illustrations will be even better. Making a good reading… what a wonderful feeling to fall in nostalgia!

  4. सही कहा..फिल्म का नाम तो याद नहीं मगर हमारे पिता जी ने भी कोई फिल्म एक ही दिन में चारों शो देखी थी..याहे पूरे १२ घंटे. डिवानगी हर युग में रही है और रहेगी!!

  5. सुंदर संस्मरण जिसको आपकी प्रभावी अभिव्यक्ति और प्रवाहपूर्ण शैली और भी अधिक सुखद बना दिया।

  6. Read both the parts –
    A daughter’s recollections of the fond memories of her father told in a bold and beautifull way -A detailed comment would follow in Hindi as soon as I get back to usual chores!

  7. पिताजी फ़िल्मों के इतने दीवाने थे कि कभी-कभी एक सिनेमाहाल से निकलते थे फ़िल्म देखकर और दूसरे में घुस जाते थे. लोग कहते हैं कि आजकल समाज पर फ़िल्मों का कुछ ज्यादा ही असर दिख रहा है, तो वो तब भी कम नहीं था. उसी समय देवानंद के सफेद शर्ट और काली पैंट के साथ काली कोट पहनने पर पाबंदी लग गयी थी क्योंकि कुछ लड़कियों ने उन्हें इस पोशाक में देखकर आत्महत्या कर ली थी. मेरे पिताजी भी बहुत ही हैंडसम थे. पाचँ फिट ग्यारह इंच की लम्बाई, गोरा-चिट्टा रंग और छरहरा शरीर. कोई उन्हें देवानंद कहता था,

    मुक्ति! मुझे लगता है मेरे और तुम्हारे पिताजी जरुर किसी जन्म के भाई रहे होंगे 🙂 बिलकुल ऐसे ही मेरे पापा भी थे और यही किस्सा उनका भी था :)..बहुत .अच्छा लगता है तुम्हारे शब्दों को पढना.

  8. @खाना बनाते और खाते समय दर्जी का सिला कपड़ा पहनने की अनुमति नहीं थी….
    दादी के राज में माँ और चाचियाँ सुबह -सुबह एक विशेष प्रकार का कपडा लपेटकर खाना बने थी ….पूरा खाना बना कर भगवान् को भोग लगाने के बाद ही उन्हें पूरे वस्त्र पहनने की अनुमति मिलती थी …बड़ा तरस आता था इन लोगो को देख कर….

    @ एक के बाद एक ३ फ़िल्में देखना का रिकॉर्ड पिताजी भी बना चुके थे बस ये है कि उनके साथ माँ नहीं उनके कार्यालय सहयोगी थे …
    बहुत मधुर स्मृतियाँ आपके साथ हमें भी बहा ले गयी ….

    आपकी यादों के कारवां के साथ रहेंगे अगली कड़ियों तक …!!

    • वाणी जी, शिखा जी और समीर जी,
      आपकी बातों को सुनकर लगता है कि उन दिनों फ़िल्मों की दीवानगी चरम पर रही होगी. नहीं तो एक दिन में तीन शो देखने की हमलोगों की हिम्मत नहीं हो सकती और न समय है. घर पर डी.वी.डी. पर ज़रूर देख लेते हैं. वैसे एक दिन में दो शो देखने का रिकार्ड मैंने भी बनाया है.

  9. बहुत बहुत सुन्दर लिखा है मुक्ति..पर १५ साल की दुबली पतली काया और इतना काम…सोच नहीं पा रही हूँ. पर चलो पिताजी के साथ आने के बाद उनके दिन बहुत अच्छे गुजरे.और वो गाने तो मेरा मन हो रहा है फिर से सुनने का…सच

    बहुत ही सुन्दर चल रही है यह स्मृति यात्रा..

    (और एक बैठक में मेरा उपन्यास पढने और इतनी ख़ूबसूरत प्रतिक्रियाएँ लिखने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया…सब संजो कर रखने लायक हैं )

    • रश्मि जी,
      अम्मा को तभी तो ऐसा रोग लगा जिसने उन्हें जीवन भर परेशान किया और अन्त में ले ही गया. हमारे यहाँ तब औरतें अपने स्वास्थ्य का बिल्कुल ध्यान नहीं रखती थीं और दूसरे क्यों रखने लगे भला ?? अम्मा लोगों को लगता था कि बच्चों के रहते फल-मिठाई खाना उनके लिये अपराध है.

  10. वो जहा भी होगे बहुत खुश होगे तुम्हारे ये भाव देखकर… और देवानन्द वाली बात शायद सच है.. मैने भी सुना है.. बाकि ५ फ़ीट ११ इन्च..वाकई काबिले तारीफ़…

  11. बिदेशिया और इसके गीतों को याद दिलाने का शुक्रिया। बहुत सुंदर संस्मरण है।

  12. मैं बचपन में इन गानों को जब भी सुना उन लोगों से सुना जिन्हें तथाकथित सामाजिक श्रेष्ठता प्राप्त नहीं थी -संभ्रांत परिवार के अपने कई पूर्वग्रह होते थे -और मेरे ये पूर्वग्रह लम्बे समय तक बने रह गये जब तक की शिक्षा जनित आग्रहों ने उन्हें ढहा नही दिया .आज ये लोक धुनें और गीत सहजता सरलता और निश्छलता के कितने निकट लगते हैं -आप इस संस्मरण के बहाने सुकोमल अनुभूतियों के संसार को विस्तृत क़र रही हैं -आभार !

  13. यह है प्रवाह की स्वतंत्रता ! सजीव-प्राण जीवन प्रवाह की इस स्वतंत्रता को सदैव अक्षुण्ण रखता है !

    पिता जी की ज़िन्दगी जिन्दादिली से जीने के लिए बनी ही थी ! उन्होंने भरपूर जिया इसे !
    रूमानियत के क्षणों को सिरजता था सिनेमा उन दिनों ! बड़ा आकर्षण था इसमें ! संवेदना को छूती हुई बातें, घटनाएं, रोमांच इकट्ठे सिनेमा से मिल जाती थीं ! स्वाभाविक है कि स्वलक्षणशील मन अपनी चपल गति में सजीवता भरने के लिए इन माध्यमों का प्रयोग करे !

    कुछ चित्रों की जरूरत थी ! जरूरी नहीं कि माँ-पिता जी के उन दिनों के चित्र ही तलाशे, लगाए जाँय ! कुछ उसी संवेदना को छूते दूसरे चित्रों का संयोग, प्रविष्टि को और सुन्दर और कमनीय बना देता !

    गिरिजेश जी से कहिए कि इतने ज्ञान-सम्पन्न हैं इन गीतों के मामले में, पर बिदेसिया के इन गीतों पर उनकी प्रविष्टि की बाट हम सदा ही जोहते रहे हैं ! प्रवृत्त हों ! आपके आग्रह में मेरा भी आग्रह शामिल होगा !

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