आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

उनकी ज़िन्दगी के वो रूमानियत भरे दिन (3.)

मेरी अम्मा अधिक पढ़ी-लिखी नहीं थी. सिर्फ़ पाँचवाँ पास थीं. पहले लोग अपनी लड़कियों को अक्षरज्ञान करा देते थे, जिससे कि वे चिट्ठी लिख सकें. अम्मा को भी चिट्ठी लिखने भर की शिक्षा मिली थी. पिताजी जब उन्हें साथ लेकर आये तो पढ़ाना शुरू कर दिया. अम्मा का जी नहीं लगता था पढ़ने में, तो पहले उन्हें मनोरमा, गृहशोभा जैसी किताबें लाकर दीं. जब धीरे-धीरे उनका मन लगने लगा तो पिताजी ने किताबों का स्तर थोड़ा बढ़ा दिया. अब वे उन्हें सरिता और कादम्बिनी पढ़ाने लगे. उन्नाव स्टेशन पर एक जो सबसे पुराना बुकस्टाल है, उसे हमारे एक चाचा चलाते थे (हमलोग पिताजी के दोस्तों को चाचा ही कहते थे, अंकल नहीं) पिताजी उन्हीं से अपनी पसन्द की किताबें मँगा लिया करते थे. मेरी अम्मा को पढ़ने का उन्होंने जो चस्का लगाया कि वे अखबार भी पढ़ने लगीं, जो कि आमतौर पर तब औरतें पढ़ना नहीं पसन्द करती थीं. फिर तो माया, धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी किताबें अम्मा की पहली पसन्द बन गयीं. अम्मा ने ही हमलोगों को बताया था कि किस प्रकार पिताजी ने उनकी रुचि परिष्कृत की. नहीं तो गाँव-देहात में पली-बढ़ी अम्मा बेचारी क्या जानती थी इन किताबों के बारे में.

उस ज़माने में टी.वी. तो होती नहीं थी. टेप रिकार्डर बहुत ऊँची चीज़ थी. ले देकर एक रेडियो था, जिस पर विविध भारती से निश्चित समय पर प्रोग्राम आते थे. इसलिये पिताजी जब ड्यूटी पर होते थे तो अम्मा इन्हीं किताबों के सहारे अपना समय बिताती थीं. इन सबका अम्मा के व्यक्तित्त्व पर बड़ा ही सकारात्मक प्रभाव पड़ा. हमने होश सँभाला तो हमें मालूम था कि अम्मा अधिक पढ़ी-लिखी नहीं हैं, पर बाहर वाला कोई भी इस बात पर विश्वास नहीं करता था. इसका कारण यह था कि वो धड़ल्ले से किसी भी विषय में बहस कर लेती थीं. हमलोगों को हिन्दी और अन्य विषय वही पढ़ाती थीं, बस अंग्रेजी उन्हें नहीं आती थी और उन्होंने कभी कोशिश भी नहीं की सीखने की.

अम्मा को सिलाई सीखने का शौक था, तो पिताजी ने उस ज़माने में उन्हें उस सिलाई स्कूल में भर्ती करवाया, जहाँ पुरुष टीचर सिखाते थे. घरवालों ने इस बात का बुरा भी माना, पर पिताजी ने किसी की एक न सुनी. ये बात अलग थी कि अम्मा माथा ढककर ही जाती थीं स्कूल.

हमलोग जब छोटे थे, तो अम्मा अपने हाथ से सिलकर कपड़े पहनाती थीं हमें. रंग-बिरंगे, छींटदार, फूल वाले हर तरह के कपड़े, खुद ही खरीदकर लाती थीं और बड़े मन से सिलती थीं. अगर सादे कपड़े होते थे, तो उस पर फूल काढ़ती थीं. अम्मा स्वेटर बुनने में इतनी पारंगत थी कि तीन दिन में एक स्वेटर तैयार कर देती थी. हमारे स्कूल के लिये रात रात भर जागकर चार दिन में भाई-बहन दोनों के स्वेटर तैयार कर दिये थे.

अम्मा काश-बल्ले( एक प्रकार के घास जिससे औरतें पहले टोकरी वगैरह बनाती थीं) से खूब तरह-तरह की टोकरियाँ बनाती थीं. सिकहुली, कुरुई, पिटारी आदि कुछ नाम मुझे याद हैं. अफ़सोस की अम्मा के देहांत के समय मैं सिर्फ़ 13 की थी, नहीं तो कुछ सीख लेती. ये हुनर उन्हीं के साथ चला गया. अब भी गाँव की कुछ भाभियाँ ये हुनर जानती हैं, पर थोड़ा-बहुत. पर, अम्मा तो माहिर थीं ऐसे कामों में.

कहते हैं कि इन्सान जब जाता है तो अपने साथ कुछ नहीं ले जाता, पर अम्मा गईं तो अपने साथ सब कुछ ले गईं. वो अपनापन, जो हमारी फ़्राक पर काढ़ा करती थीं; वो सपने, जो वो कुरुई, पिटारी के साथ बुना करती थीं; वो प्यार की गर्मी, जो स्वेटर में डाल देती थीं; वो रिश्तों के ताने-बाने जो क्रोशिया के धागों से सजावट की झालरों में पिरो देती थीं, सब ले गईं अपने साथ और साथ ले गई वो हुनर, जो लोकसंस्कृति को संजोने के लिये एक पीढ़ी से दूसरी सीखती जाती है. लोकसंस्कृति ऐसे ही टुकड़ों-टुकड़ों में तिरोहित होती जा रही है, परलोक जाने वाली माँओं के साथ.

एक कविता उनकी याद में…


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19 thoughts on “उनकी ज़िन्दगी के वो रूमानियत भरे दिन (3.)

  1. बहुत करीने से याद किया है अम्मा को.

    मेरी अम्मा जब गई, तो साथ मेरे घर की छत ही ले गईं…अब धूप सीधे बदन को झुलसाती है!!

  2. माँ पर लिखना बहुत कठिन है. रुलाता है.

    कह नहीं सकता तुम्हें रोना आया या नहीं. पढ़ कर मैं तो रो पड़ा.

    पिछले साल मेरी माँ जब सेवा-निवृत हुईं तो मैनें उनपर अपने ब्लॉग में पोस्ट लिखा. उसे आज भी जब पढता हूँ तो रोता हूँ.

    उस पोस्ट की चंद पंक्तियाँ शेयर करना चाहूँगा:

    Every child considers his mom as the best. But for me, my mother has been a very very special person.

    In all the world, there is no other to take the place of my dear mother.

    We’ve laughed together, cried together. … I want the world to know how much I love her. She is my heroine.

    Maa tujhe salaam…

    और आराधना, तुमने फिल्म ‘तारे जमीन पर’ का ‘माँ’ गाना सुना है. उफ़…

    • माँ के बारे में सोचते, लिखते, पढ़ते हर बात पर रोना आ जाता है. माँ को गुजरे 17-18 साल हो गये, पर उसकी याद उतनी ही ताज़ा है, उसकी कमी दिन पर दिन और खलती है.

      • काश ! तुम्हारी माँ आज यह पोस्ट पढ़ सकती ! काश !

        उन्हे इस तरह बखूबी याद कर तुमनें उन्हें अपने काफी करीब तो बुला ही लिया है.

  3. माँ तो वैसे ही गुणों की खान होती हैं। आप की माता जी को तो अनेक कलाएँ आती थीं। आप ने संक्षेप में ही सही उन्हें खूब याद किया है।

  4. मां की यादें और उनके हुनर से आपने परिचय कराया, आभार -कभी बनारस /जौनपुर आईये तो अपनी मां से मिलवाते हैं – परलोक में नहीं इहलोक में ही और देखिये उनकी चमत्कृत करती स्वेटर बुनने की गति, कुरुयी,सिकहुली और क्रोशिये ,पन्खी -बेने बनाने की गति -उनकी कोई सानी नहीं है -जाड़े में चाय के गिलास का कवर उन्होंने ऐसा बनया की देखकर मंत्रमुग्ध रह गया मैं -हम उसे इस्तेमाल करते हैं -ये लोक कलाएं सचमुच संकट की दौर से गुजर रही हैं मगर उनका पुनरुद्धार हो सकता है और ये एक्सपोर्ट आईटम भी बन सकती हैं -केवल इस सेक्टर को संगठित किया जाना है -आप लोगों में से कौन आएगा आगे ?

    • अरे !! पता है, मेरी अम्मा भी जौनपुर की थीं. मतलब मेरा ननिहाल है वहाँ…लोककलाओं की बात पर तब मुझे बहुत अधिक छटपटाहट सी हुई थी, जब मैंने दो साल पहले प्रगति मैदान में लगे अन्तरराष्ट्रीय व्यापार मेले में दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के स्टॉल्स पर हाथ से बनी ऐसी ही चीज़ों को दादा के मोल बिकते देखा था. थाईलैंड के स्टॉल पर तो सब टूटे पड़ रहे थे. यही भारतीय, जो अपनी अम्मा, दादी, नानी के हाथ की बनी चीज़ों को गँवईं कहकर ठुकरा देते हैं, उस देश की बनी छोटी-छोटी डलिया, पंखे, कढ़ाई किये हुये मेजपोश, कोस्टर वगैरह खूब पैसे लगाकर खरीद रहे थे. मुझे वो चीज़ें बड़ी प्यारी लग रही थीं. हस्तकला से बनी चीज़ें मेरी कमज़ोरी हैं, पर हमें अपने देश की कलाओं को तो सम्मान देना ही चाहिये.
      आपकी अम्मा अगर ये चीज़ें बना लेती हैं, तो आप भी सीख लीजिये, मेरे पिताजी भी बहुत सुन्दर बेनी और पंखे बना लेते थे.

  5. अरे मेरे बाबा बनाते रहते थे -ऐसे ही कितने सामान -मेरी लर्निंग बहुत खराब है -आप आईये माता जी आपको बड़े लाड प्यार से सिखायेगी ! मेरी सिफारिश जो रहेगी !आपकी मां जौनपुर में कहाँ की /से थीं ! नॉट किडिंग !

  6. bahut sundar

    shekhar kumawat

    kavyawani.blogspot.com/

  7. आप ने अपनी माँ को याद किया………..अच्छा संस्मरण…….. बधाई……

  8. हमेशा की तरह बहुत क्यूट और बहुत श्रद्धाभाव से लिखी हुई पोस्ट..

  9. बड़े अच्छे तरीके से सिलसिलेवार यादें लिख रही हो….ये तो सच है जाने वाला ना जाने कितने हुनर…कितना प्यार,अपनापन…ले जाता है अपने साथ…और हमारे पास रह जाती हैं बस उनकी यादें .

    मेरी भी दादी बुना करती थीं वे रंग बिरंगी छोटी छोटी टोकरियाँ, उनके साथ ही चली गयी ,वो कला .सच आज के इस मशीनी युग में विलुप्त हो रही हैं ये लोक कलाएं और साथ ही लुप्त हो रहा है…रेशे रेशे में समाया वह प्यार और अपनापन.

  10. मुक्ति जी ,
    बीच बीच में आया करता हूँ आपके ब्लॉग को पढने ..
    ह्रदय की इस सहजावस्था को निहारता ही रहा जाता हूँ ..
    ”मीन-मेख निकालने ” की कोई जरूरत ही नहीं समझता ..
    सहज जो खटके उसी को लिखा जाय वही बेहतर है , सायास खटका
    कर क्या लिखना !
    यहाँ ह्रदय की इस ‘मुक्तावस्था’ में कुछ खटक नहीं रहा है ..
    अब तक की प्रविष्टियाँ आपके नए रचनात्मक आयाम को प्रस्तुत कर रहीं हैं ..
    गद्य का सुघड़ – सधाव निखर रहा है .. ऐसी मुझे उम्मीद भी थी .. फुरसत में फिर
    पढूंगा दुबारा … फिर एक आद्यंत मूल्यांकन करना चाहूँगा … तब चीजों को रखने में
    ज्यादा आसानी होगी … जारी रखें .. शुभकामनाएं ,,,

  11. खूब है…. स्मृति के झरोखों से झांकना…

    सब ले गईं अपने साथ और साथ ले गई वो हुनर, जो लोकसंस्कृति को संजोने के लिये एक पीढ़ी से दूसरी सीखती जाती है..

    आपको नहीं चूकना चाहिए था…शायद हमारी पीढी इसके लिए ज्यादा उत्तरदायी है…..

  12. कल इसे पढ़ा था सुबह ही। पढ़ते हुये अनायास आंसू आ गया। दूसरी जगह चला गया। आज भी हाल वैसा ही है।

    बहुत आत्मीय, संवेदनशील लेख है। ब्लॉग के जरिये आम लोगों की अभिव्यक्तियां सामने आ रही हैं। बहुत सुन्दर!

  13. माँ-पिता जी के चरित्र-सम्मोहन से ही बाहर नहीं निकल पा रहा कि कुछ लिखूँ आपकी लिखावट पर !
    आज अमरेन्द्र भाई की टिप्पणी पढ़ी तो लगा कि कहना तो मैं भी यही चाहता हूँ –
    “अब तक की प्रविष्टियाँ आपके नए रचनात्मक आयाम को प्रस्तुत कर रहीं हैं ..
    गद्य का सुघड़ – सधाव निखर रहा है “

    और उत्कंठा बढ़ गयी है जब अमरेन्द्र का यह आश्वासन पा रहा हूँ …
    “फुरसत में फिर पढूंगा दुबारा … फिर एक आद्यंत मूल्यांकन करना चाहूँगा … “
    आत्मीय-भाव की सहजावस्था में लिखी इन प्रविष्टियों का आभार ।

  14. आपने कविता का लिंक देकर अच्छा किया ! वंचित रह गया था पढ़ने से !

  15. सारी किश्तें आज ही पढ़ीं क्योंकि पहले यहाँ तक पहुंची ही नहीं थी. बहुत अच्छे लगे ये संस्मरण. एक चलचित्र सा दृष्टव्य हुआ. इस विधा के लिए बधाई.

  16. bahut khubsurti se yaad kia hai tumne ma ko ….par vo gai kahan hai? yahin hai tumhare hi aaz pass har kshan nihaar rahi hai tumhen.

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