आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

घर और महानगर

घर

(१.)
शाम ढलते ही
पंछी लौटते हैं अपने नीड़
लोग अपने घरों को,
बसों और ट्रेनों में बढ़ जाती है भीड़
पर वो क्या करें ?
जिनके घर
हर साल ही बसते-उजड़ते हैं,
यमुना की बाढ़ के साथ.

(२.)
चाह है एक छोटे से घर की
जिसकी दीवारें बहुत ऊँची न हो,
ताकि हवाएँ बेरोक-टोक
इधर से उधर आ-जा सकें.

*** *** ***

महानगर

(१.)
मन घबराता है,
समझ में नहीं आता कहाँ जायें ?
महानगर के आकाश में
चाँद भी साफ नहीं दिखता,
जिसे देखकर कोई
कविता लिखी जाये.

(२.)
छोटे शहरों में
छोटी-छोटी बातें भी
बड़ी हो जाती हैं
महानगरों में,
बड़ी बातों पर भी
ध्यान नहीं देता कोई.


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28 thoughts on “घर और महानगर

  1. महानगर के आकाश में
    चाँद भी साफ नहीं दिखता,
    जिसे देखकर कोई
    कविता लिखी जाये.
    क्या खूब उकेरा है दृश्य आपने
    बहुत उम्दा सभी के सभी

  2. आराधना तुम पोएट अच्छी हो ..तुम्हारी कविता पढने में मुझे बहुत रस आता है बजाय इसके की जो तुम क्लिष्ट विषयो पर लिखती रहती हो ..वहा पर भी तुम ठीक ही लिखती हो पर पता नहीं वो मुझे impressive नहीं लगता ..तुम्हारी पोएम्स पढो तो ज्यादा बाते मन में उभरती है बजाय तुम्हारा लेख पढ़ के ..खैर बहुत अच्छी कविता है…सही कह रही हो महानगरो में रहने वाले ज़िन्दगी की कशमकश में ,भागती ,दौड़ती, कांपती और हांफती हुई से ज़िन्दगी में पानी के बुलबले के तरह होते है ..कब फूट कर वो सदा के लिए खो गए कभी पता नहीं चलता ..बचपन में मै लखनऊ में एक बड़ी पोश लोकेलिटी में रहता था ..बड़ा सा घर होता था..बड़ा सा doggie होता था ..बड़ी सी कार होती थी पर लोगो के दिल लेकिन हमेशा छोटा सा ही होता था ..इसलिए उनको अक्सर नहीं मालूम होता था की उनके बगल वाले घर में कोई मर रहा है या जी रहा है ..

    इससे अच्छा तो मेरा गाँव है ..चाँद वहा खुल के मुस्कुराता है ..गाँव के गोरी और भोले बच्चे दिन भर आपको घेरे हमेशा खड़े रहते है और कोई बात न भी हो तो भी हर छोटी से बात पर एक तूफ़ान सा जरूर खड़ा रहता है ..”तू काहे हमे देख के मुस्कियात है ” यह जिस भोलेपन से मुझसे मेरे गाँव की अनजान सी बाला पूछती है वह महानगरो में इस अंदाज़ से कभी कोई नहीं पूछता :-))

    Arvind K.Pandey
    http://indowaves.instablogs.com/

  3. महानगरों में,
    बड़ी बातों पर भी
    ध्यान नहीं देता कोई

    कानपुर छोटे और बड़े के बीच का महानगर है। लेकिन हम आपकी बात पर ध्यान दे रहे हैं।

  4. @ घर
    इश्वर करे सब ऐसा ही घर चाहें ताकि लम्बी दीवारों
    की कसक वातायनों को न चुकानी पड़े !
    @ महानगर,
    …………… @चाँद भी साफ नहीं दिखता,
    जिसे देखकर कोई
    कविता लिखी जाये
    ————- महानगर में कविताओं पर संकट ज्यादा है , सच कहा !
    .
    .
    पर आप क्षणिका से बेहतर है कि थोड़ी लम्बी कवितायेँ लिखें ! आभार !

  5. कविता समय चक्र के तेज़ घूमते पहिए का चित्रण है। कविता की पंक्तियां बेहद सारगर्भित हैं।

  6. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

  7. बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए…. खूबसूरत रचना……

  8. सुहाना कितना है पूनम का ये चांद
    शहर से बाहर जाएगा
    जानेगा

  9. छोटा-बड़ा हर शहर ऐसा ही है आराधना। समय जो ऐसा विचित्र है। सब खेल ये है कि दुनिया कैसी बनाई हमने। छोटे शहर पहले अपनी तरह बर्बाद थे, अब बड़े शहर होकर अपनी तरह के बर्बाद होते जा रहे हैं। छोटे शहरो का अपना एक रूमान तो है, लेकिन जरा सोचो कि क्‍या मेरे-तुम्‍हारे जैसी लडकियां उन छोटे शहरों में जाकर जिंदगी बसर कर सकती हैं? क्‍या हम दोनों ही अब इलाहाबाद लौटकर इतना ही discreet और dignified जीवन जी सकते हैं? बिलकुल अकेले?

    • सच कह रही हो मनीषा…फिर वही बात कहकर दिल को बहलाना पड़ता है कि कुछ पाने के लिये कुछ खोना पड़ता है.

    • @मनीषा

      और यह भी तो देखो की छोटे शहर आखिर किस सोच को लेकर बड़े हो रहे है..यह सब गेम
      “प्रोग्रेस” नाम के मृग मरीचिका के कारण हो रहा है ..समाज प्रोग्रेस कर रहा है ,लड़के प्रोग्रेस कर रहे है, लड़किया प्रोग्रेस कर रही है , गाँव प्रोग्रेस कर रहा ,शहर प्रोग्रेस कर रहा है और देश प्रोग्रेस कर रहा है..जिसे देखो वोही प्रोग्रेस कर रहा है (मुझे छोड़कर ) …उसका नतीजा यह हुआ की आज पृथ्वी का अस्तित्व ही संकट में आ गया है !!! खैर ,प्रोग्रेस चालू रहे :-))

      Arvind K.Pandey

      http://indowaves.instablogs.com

  10. महानगरों की बड़ी-बड़ी बातें छोटेपन से शुरू होती हैं और उनका अंत और भी छोटेपन पर होता है, जाने कितनों का छोटापन दिखाते हुए।

    आपकी रचनाएँ मेल में ही मिल जाने से इधर आना कम होता है। अच्छा होता अगर केवल लिंक की मेल मिलती और हम पढ़ने इधर आते, तो शायद पुरानी रचनाएँ भी इसी बहाने पढ़ी जातीं।

    अच्छी रचनाएँ, आपके पिताजी वाले संस्मरण भी अच्छे लगे, पर व्यक्त आज ही कर पाया हूँ। जारी रहिए।

  11. महानगरीय संवेदनाओ को बहुत सही उकेरा है..

    यमुना वाली बात बहुत उम्दा है..

  12. तुम्हारी दूसरी कविता से जावेद अख्तर का एक शेर याद आया ……..

    “ऊँची इमारतों से मेरा मकां घिर गया
    कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज खा गये “

  13. चाह है एक छोटे से घर की
    जिसकी दीवारें बहुत ऊँची न हो,
    ताकि हवाएँ बेरोक-टोक
    इधर से उधर आ-जा सकें.

    बेहद ख़ूबसूरत भाव ….

    महानगरों की तो अच्छी कही…वो पूनम का चाँद,वो शीतल बयार…बस किताबों का हिस्सा बन कर रह गए हैं…
    सारी क्षणिकाएं बहुत सुन्दर हैं

  14. छोटे शहरों में
    छोटी-छोटी बातें भी
    बड़ी हो जाती हैं
    महानगरों में,
    बड़ी बातों पर भी
    ध्यान नहीं देता कोई.

    YE BILKUL SAHI HE

    HAM IS KE ANUBHAVI HE

    http://kavyawani.blogspot.com/

    SHEKHAR KUMAWAT

  15. Correction:

    बड़ी सी कार होती थी पर लोगो का दिल हमेशा छोटा सा ही होता था !

  16. वाह, क्या खूब उकेरा है नगरो को और महानगरो को..

    हम तो नगर से महानगर मे आये और फ़ाईट मारते रह गये.. लडते रह गये इस ज़िन्दगी से.. अब धीरे धीरे महानगर जीतता जा रहा है.. अब यही धुधला चाँद ही अपने करीब नज़र आता है.. नगर मे वापस जाने पर यही लगता है कि टाईम मशीन से काफ़ी साल पीछे भेज दिये गये है.. 🙂

  17. बहुत सुन्दर और मार्मिक अभिव्यक्ति -अफ़सोस देर से आ पा रहा हूँ -क्षमा !
    नीड का निर्माण फिर फिर ….
    हाँ दीवारों के कान भी तो होते हैं ,,न रहे बांस न बजे बासुरी और फिर दीवारें न होगीं तो मन उन्मिक्त तो रहेगा –
    आ नो भद्र क्रतवो यन्तु विश्वतः ..
    जी छोटे शहर samverdnaaon से smvedit हैं aaj भी
    oh bijjlee गयी !

  18. महानगर की स्थिति सच में ऐसी हो गयी है । बहुत याद आता है गाँव का चाँद ।

  19. पहली रचना में आपने बरबस ही हमारे क्षेत्र की बर्बादी और पलायन का दृश्य उकेरा है.

    “चाँद भी साफ नहीं दिखता,
    जिसे देखकर कोई कविता लिखी जाये.”
    मतलब एक भयानक सी बेचैनी है शहर में. आपकी पंक्तियों से जाहिर हो रहा है.

    शहर/महानगर पर एक शेर अर्ज है…
    शहर में देखता हूँ मैं सूरज को रात भर दौड़ते हुए
    कैसी दुनिया है दोस्त दिन में तारे नज़र आते हैं

    – सुलभ

  20. चाह है एक छोटे से घर की
    जिसकी दीवारें बहुत ऊँची न हो,
    ताकि हवाएँ बेरोक-टोक
    इधर से उधर आ-जा सकें.
    —वाह क्या बात है।
    गालिब ने लिखा है-
    बे दरो दिवार का एक घर बनाना चाहिए.

  21. छोटे शहरों में
    छोटी-छोटी बातें भी
    बड़ी हो जाती हैं
    महानगरों में,
    बड़ी बातों पर भी
    ध्यान नहीं देता कोई

    -वाह! बहुत जबरदस्त बात कही!!

  22. vyatha mahanagar me pravasiyon ki…………

    sunder abhivyakti.

    apna kuch yaad aa gaya
    ” tha logon se suna ye
    hai sahar bada dill
    khanabadosh the hum
    aana hi pada dilli.

    greets……..

    satya a vagarant

  23. पिंगबैक: अजय कुमार झा - चर्चा रविवार की : हमने फ़िर तैयार की

  24. सबको अपनी अपनी पडी है…
    फिर चाहे छोटा हो या बडा
    अमीर हो या गरीब
    धार्मिक हो या अधार्मिक
    सत्ता धारी हो या वोटर…
    यमुना वाले उजड़ते रहे..उससे
    हमें क्या…!
    उजड़ ने का दर्द तो वही जाने
    जो अपनी ज़मीन से, अपनी रोज़मर्रा से उजडा हो …

    इस धरती पर एक अच्छे से घर का
    ख़्वाब ज़रुर देखना चाहिए…
    और देखा है तो पूरा होना भी है, एक दिन …
    एक हवादार घर …

    बडे शहरों में फेसिलिटिस मुहैया
    हो जाती है,
    छोटे शहरों में सब यूं ही बेतरतीब सा
    बिखरा पड़ा रहता है…

    मन की गती पर निर्भर सबकुछ …
    मन खुश तो शहर भी चमकीला
    मन है अगर परेशां और उदास
    तो शहर भी बदरंग… पराया…

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