आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

मर रहा है गरीब आदमी…

मन व्यथित है…व्याकुल है…परेशान है…जब भी कोई ऐसी घटना होती है, तो परेशान कर जाती है…चाहे वो उड़ीसा या बुन्देलखंड में भूख से मरने वालों की खबर हो या कल की खबर…सुबह तो फिर भी कुछ ठीक था मन…पर शाम आते-आते…पता नहीं शामें इतनी खाली क्यों होती हैं?…कुछ सूझा नहीं जो लिख लेती, पर बहुत सी जगह पर टिप्पणियाँ कीं. दो टिप्पणियाँ पोस्ट कर रही हूँ. इसमें पहली टिप्पणी चिट्ठाचर्चा पर अनूप जी के लेख पर की और दूसरी टिप्पणी फ़ेसबुक पर शीबा के स्टेटस अपडेट पर…

(१.)”ये बहुत ही दर्दनाक स्थिति है. एक देश के नौजवान अपने ही कुछ भटके हुये देशवासियों के विरुद्ध लड़ने जाते हैं और उन्हीं के द्वारा घेरकर मार दिये जाते हैं. ये एक-दूसरे को जानते भी नहीं…ये दोस्त भी नहीं और दुश्मन भी नहीं. न ही कोई जातिगत दुश्मनी, न प्रजातीय दुश्मनी…फिर भी लड़ते हैं एक-दूसरे से और मारे जाते हैं…दूर बैठकर हमारे देश के कर्णधार पहले उन्हें लड़वाते हैं, फिर खुद ही कहते हैं कि भूल हो गई और हम…? …क्या हम सिर्फ़ अफ़सोस जाहिर कर सकते हैं?

जिन एक हज़ार लोगों ने नक्सलपंथ की रूमानियत के फेर में पड़कर गरीब नौजवानों को मारा है, किसके कहने पर किया ये सब?…कैसे बुद्धिजीवी हैं वो…जो मासूमों की लाश पर अपनी क्रान्ति करना चाहते हैं? क्यों नहीं देश के सांसदों पर हमला करके इन्हीं को खत्म कर देते?

इन लोगों ने मिलकर जिन सौ लोगों को मारा है, वे सभी निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के लाड़ले थे, बड़े घरों और यहाँ तक कि मध्यमवर्गीय परिवारों के भी लड़के सी.आर.पी.एफ़. में भर्ती होने नहीं जाते…वे लोग जाते हैं, जिन्हें मेहनत करने से डर नहीं लगता और जिनके माँ-बाप उन्हें डॉक्टरी और इन्जीनियरी नहीं पढ़ा सकते…वे रोटी के लिये जाते हैं लड़कर मरने…शहीद होने…पता नहीं इन लोगों को मारकर कैसा समाज बनाना चाहते हैं नक्सली…?

उधर नक्सलियों को कोई और बहका रहा है…इधर नौजवानों को देश के नीति-निर्माता बलि का बकरा बनाये हुये हैं…मर रहा है गरीब आदमी…चाहे वो सी.आर.पी.एफ़. का जवान हो या नक्सली…”

(२.) “जाने क्या हो रहा है अपने देश में?…एक गरीब को दूसरे गरीब के विरुद्ध लड़ा रहे हैं हमारे नीति-निर्माता…गरीब लड़ रहा है…मर रहा है…रोटी के लिये…समानता के लिये…जो लोग उन्हें लड़वाते हैं, वो किताबों में इस समस्या का हल ढूँढ़ रहे हैं…बीच-बीच में कह देते हैं—नहीं इन्हें ऐसे मरना चाहिये…वैसे मरना चाहिये…नहीं…यहाँ नहीं, वहाँ मरना चाहिये…गोली से नहीं बम से मरना चाहिये…पर मरना तो ज़रूर चाहिये…चाहे सी.आर.पी.एफ़. के गरीब मरे चाहे नक्सलपंथी गरीब…”


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10 thoughts on “मर रहा है गरीब आदमी…

  1. I have always maintained the stand that in India our politicians and bureaucracy suffer from a strange disease of being trapped in state of indecision.They let the situation go out of control and once it moves beyond the realm of all possible solutions the men in power get panicked and think of taking proper actions.They then become hyperactive with a hope that they will control the situation within few days.

    I hope they get the wisdom that if you do not act in time,the solutions then become a distant reality.

    **************************…
    A conversation in this regard is already taking place on my page.Have a look at it.

    http://indowaves.instablogs.com/entry/india-in-the-grip-of-naxal-menace/

  2. बारहा पूछना चाहा कभी हिम्मत न हुई

    दोस्तो रास तुम्हें आई यह दुनिया कैसे।

    ज़िन्दगी में कभी एक पल ही सही ग़ौर करो

    ख़त्म हो जाता है जीने का तमाशा कैसे।

    -शहरयार

  3. बहुत ही . गहरे भाव.

  4. जाने क्या हो रहा है अपने देश में?

  5. ज़िन्दगी की कीमत अब बस इतनी ही रह गयी है.. आज के इस दौर में क्रीम से गोरा होने की तो गारंटी है पर शाम को घर लौटने की कोई गारंटी नहीं..
    जब भगवान ने सबको आदमी ही बनाया है तो क्यों उनका आचरण इंसानों जैसा नहीं.. इंसानियत क्या डायनोसोर प्रजाति है जो अब विलुप्त हो चुकी है.. क्यू हम इतने संवेदनशील हो रहे है..

  6. सच, मन बहुत क्षुब्ध है…सबकी सोच इतनी सीमित हो गयी है…अपने दायरे के आगे कुछ दिखता ही नहीं… देश का एक बड़ा वर्ग दिग्भ्रमित है…पर सिर्फ बातें की जाएँगी… ए.सी.की ठंढी हवा में बड़े बड़े प्लान बनाए जाएंगे…बहसें की जाएँगी..किताबें लिखी जाएँगी…और ये गरीब यूँ हीं बेमौत मारे जाते रहेंगे अपनी दुखिय बीवी और बच्चों को यूँ निस्सहाय छोड़कर

  7. सबसे बड़ी बात यही है और सबसे ज्यादा आहत करने वाली भी..कि –
    “मर रहा है गरीब आदमी…चाहे वो सी.आर.पी.एफ़. का जवान हो या नक्सली…”

    अजीब हो गया है मन इस घटना के बाद..

  8. मर रहा है एक गरीब आदमी दूसरे गरीब आदमी की गोली से …और चांदी काटने वालों की कट रही है …
    समस्या की जड़ पर प्रहार कौन करना चाहता है ….!!

  9. आपने बहुत सटीक लिखा है, मुक्ति जी.
    मुझे लग रहा है कि नक्सलपंथियों के मन में यह बात शायद घर कर गयी है कि इस प्रकार ‘सशस्त्र रक्तरंजित क्रांति’ करके वे भारत गणराज्य से अलग अपना यूटोपिया बना लेंगे. दुःख है कि कुछ चिन्तक हर बात में उनकी मजबूरी बयान करते रहते हैं.

  10. जब ये सब हुआ तो मन बहुत व्यथित था.. काफ़ी लोगो को पढा लेकिन कुछ लिखने का मन नही हुआ.. क्यूकि हमारे लिखने से क्या होगा? हम दो दिन चिल्लायेगे.. लिखेगे.. बड्बडायेगे.. फ़िर जाकर कविताओ और किताबो मे खो जायेगे..

    और गरीब आज भी मर रहा है, तब भी मरेगा… किस कलम ने उसे बचाया है आजतलक…

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