आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (1.)

अम्मा-…लगभग बीस साल पहले

मैंने जब से होश सँभाला, अपने और अम्मा के बीच एक अजीब सा तनाव पाया. शायद इसका कारण मेरा छोटा भाई रहा हो, जिसकी वजह से मैं “दुधकटही बिटिया” बन गई थी या शायद कुछ और, पता नहीं, पर हम दोनों में कभी पटी नहीं. मैं जब कुछ महीने की थी, तभी मेरा भाई अम्मा के पेट में आ गया था और उसने अम्मा की तबीयत बुरी तरह खराब कर दी थी. इसीलिये मेरी देखभाल पिताजी और दीदी ने की थी. उस समय मैं बहुत सीधी थी. रोना तो जानती ही नहीं थी, पर बाद में जिद्दी होती चली गई.

मैं हमेशा अपने मन का काम करती थी. घर में मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था, तो जब स्कूल की छुट्टी होती थी, मैं सारा दिन बाहर खेलती रहती थी. अम्मा चाहती थीं कि मैं पढ़ने में ध्यान दूँ और घर के काम सीखूँ. अम्मा के सामने बहुत बड़ी चुनौती थी खुद को सिद्ध करने की. वे खानदान की पहली बहू थीं, जो घर से बाहर निकली थीं. आते समय उन्होंने कितने ही ताने सुने थे कि “देखते हैं कैसे पालती है बच्चों को अकेले और कैसे देती है अच्छे संस्कार” अम्मा उन सभी लोगों को आगे कुछ कहने का अवसर नहीं देना चाहती थीं. इसीलिये अच्छे संस्कार देकर मुझे भली लड़की बनाने पर तुली रहती थीं और मैं अपने मन की करने पर. दोनों अपनी ओर तने रहते और छत्तीस का आँकड़ा.

मैं और मेरा भाई एक साल के अन्तर पर पैदा हुये थे, इसीलिये हर बात में बराबरी होती थी. जब अम्मा मुझे घर का काम सीखने के लिये कहतीं, तो मैं झट से कहती भाई क्यों नहीं करता? और तड़ से एक थप्पड़ खाती. अम्मा ने मुझे तरह-तरह की उपाधियाँ दे रखी थीं. बहेतू– क्योंकि मुझे बाहर ज्यादा अच्छा लगता था; ढीठ– मारने पर भी न सुधरने के कारण; आवारा– लड़कों के साथ गुल्ली-डंडा और कंचे खेलने के कारण; बेशरम– डाँट-मार खाने में कोई शर्म न होने के कारण; आग लगावन– अम्मा की मार-पीट की शिकायत बाबूजी से करने के कारण, मुँहफट– जो मन में आये बोल देने की वजह से…वगैरह-वगैरह. पर एक गाली उनकी मेरी समझ में कभी नहीं आई- बिपत नौनो. मुझे याद है कि एक बार अम्मा ने किसी बात पर मेरे गाल पर एक तमाचा जड़ा और बिपत नौनो की उपाधि दे डाली. मैंने गाल सहलाते हुये, रोते-रोते पूछा था कि “बिपत नौनो माने क्या होता है” और अम्मा हँस पड़ी थीं.

पहले बहुओं को ससुराल में एक नया नाम मिलता था. अम्मा बहुत कड़क मिजाज और अनुशासनप्रिय थीं. इसलिये उन्हें सब “हिटलर” नाम से बुलाते थे. हम तीनों भाई-बहनों ने उनकी बहुत मार खाई थी. फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि बाकी दोनों सुधर गये थे और मैं नहीं. अम्मा को लगता था कि बाउ ने (हम तीनों ही भाई-बहन पिताजी को अलग-अलग सम्बोधित करते थे, मैं बाउ कहती थी) मुझे सिर चढ़ा रखा है और मैं सोचती थी कि अम्मा भाई को मुझसे ज्यादा प्यार करती हैं, दीदी को सभी चाहते हैं और मुझे कोई भी नहीं. मुझे अक्सर लगता था कि मैं अपने माँ-बाप की सगी बेटी नहीं हूँ. वैसे भी मेरा रंग सबसे अधिक साँवला होने के कारण लोग मुझे चिढ़ाते थे कि तुम्हें अस्पताल से उठाकर लाया गया है और मैं सच मान लेती थी (कितनी बेवकूफ़ थी न मैं) पर बड़ी कोशिश करने पर भी मुझे इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला क्योंकि मेरी शक्ल हूबहू बाउ के जैसी थी और रंग अम्मा से मिलता-जुलता. मैं सौतेली भी नहीं हो सकती थी क्योंकि सबसे बड़ी तो थी नहीं, दूसरे नम्बर की थी. कोई सबूत न मिलने पर भी मैं अपने आप को अम्मा की बिटिया नहीं मानती थी, ये बात अलग थी कि अम्मा से दूर एक दिन भी नहीं रह सकती थी. एक बार हम लोग अम्मा को लिये बिना गाँव गये थे और मैंने दूसरे ही दिन से बाउ के नाक में दम कर दिया था अम्मा के पास वापस जाने के लिये. जाने कैसा अजीब सा रिश्ता था ये?

जारी…

Advertisements

Single Post Navigation

40 thoughts on “अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (1.)

  1. काश मार खाके तुम सुधर जाती बहेतू,ढीठ,बेशरम, आग लगावन मुँहफट और बिपत नौनो आराधना :-)) .कम से कम दुनिया कुछ तो बेहतर होती :-))

    मै तो यह सोच रहा हू की तुम्हारी अम्मा की सुधारने की कवायद को कौन मंजिल तक ले जाएगा :-)) तुम्हे सुधारना बहुत जरूरी है :-))

    I hope it’s not too late :-)) Oh Lord!! Fulfil My Wish And I Will Proclaim That Miracle Do Happen :-))

    Arvind K.Pandey
    http://indowaves.instablogs.com/

    • जब इतनी कड़क मिजाज अम्मा मुझे नहीं सुधार पाईं तो और कोई क्या सुधारेगा. मुझे सुधारने वाले खुद ही बिगड़ जाते हैं. मैं जैसी हूँ ठीक हूँ.

  2. संस्मरण की अविराम-यात्रा-सी चल पड़ी है इस ब्लॉग पर ! विस्तार से कुछ कहने आता हूँ बाद में !

  3. आग लगावन–याने ये बचपन की आदत है. हमें लगा कि बज़्ज़ पर आ कर पड़ी है..हा हा!! इत्ता पिटने पर नहीं सुधरी तो अब का उम्मीद लगावें. जैसी हो..वो ही ठीक. 🙂

  4. ‘बिपत नौनौ’ का मतलब निकल आना चाहिए इस ब्लॉग पर अब कमेंट में ! समर्थ अरविन्द द्वय, गिरिजेश जी, अमरेन्द्र … कतार है मतलब निकलवइयों की ! फिर हम तो हैं ही !:)

  5. संस्मरण बड़ अपना सा लगा!! बधाई ले लो!

  6. घर में सबसे छोटा होने के कारण शायद मेरी बचपन की यादें एकदम दूसरी ही हैं।

  7. ओह्हो…तो इतनी शैतान थी तुम 🙂 अभी तुम्हारी दीदी पढ़ेंगी तो कहेंगी..’.थी’?? हा हा …
    बहुत ही अच्छे से लिख रही हो ये संस्मरण यात्रा…बड़ी अपनी सी लगती हैं यादें…

  8. बड़ा अपना सा लगता है, ये संस्मरण. क्या ऐसी ही उपाधियाँ सबकी माएँ दिया करती थीं. इनमें से कुछ तो मेरी भी नजर की गयी हैं. प्रस्तुति बहुत अच्छी लगी.

  9. संस्मरण की अविराम-यात्रा-सी चल पड़ी है इस ब्लॉग पर

  10. चलिए चबौनी ,सप्खई से बच गयीं या शायद भूल गयीं हों -आपकी याददाश्त का लोहा मानना चाहिए की अभी भी आपको इतनी सारी गालियाँ जिह्वाग्र हैं -आगे काम आयेगीं ….नौ नौ विपत्ति को एक साथ लाने वाले को विपत्ति नौनो कहते हैं श्रीमती जी बता रही hain उन्हें धन्यवाद दे दीजिएगा और हिमांशु को मैं ही धन्यवाद दिए देता हूँ जो उन्होंने इतना विश्वास मुझ पर दर्शाया है -आप बचपन से ही वोद्रोही रही हैं -इतना आगे तभी पढ़ /पढ़ पायीं …हाँ अरविन्द प्रथम की कोई बात मानने के पहले दोस्ती के ही नाते मुझसे पूछ जरूर लीजियेव्गा !आगे इंतज़ार है ..

  11. हमें भी दिया गया एक नाम याद आ रहा है ( कई नामों से ) —
    ‘हरामुद्देहर’ ! यकायक याद आया आपको पढ़ते हुए ..
    .
    ‘हिटलर’ नाम रखाने की बड़ी समृद्ध परम्परा है , अपने गाँव में ..
    हिटलर के तो बेटा हुआ नहीं पर गाँव में मेरा एक दोस्त है जिसे
    सब ‘हिटलरवा कै पूत’ बोलते थे ..
    .
    भला क्यों बतातीं अम्मा ‘विपत्ति नौनौ’ का मतलब , आपकी तार्कित-अनुवादी
    एक नई विपत्ति पैदा कर देती ! हंस दी यही बढियां था !
    विपत्ति नौनौ = अरविन्द जी द्वारा बताया अर्थ ( नूतनार्थ में )
    और ,,, तरह तरह की विपत्तियों के रूप में ( नानार्थ में )
    और ,,, विपत्तियाँ तो हैं पर लाने का माध्यम बने कोई , जैसे यहाँ संस्मरणकार ..
    यानी , ‘आनयति’ भाव में .. ( माध्यमार्थ में )
    .
    सरस है , चलता रहना चाहिए …

  12. एक सांस में पढ़ गया…जीना इसी का नाम है. अच्छा लगा… ! सही में बहुत ढीठ लड़की है लेकिन उससे ज्यादा प्यारी है. रोचक संस्मरण!!

  13. Kumbh ke mele mein bichhadi hui meri judwan bahan lagati ho. Mujhe meri ma Beh mata kaha karti theen kyonki har baat pe behas karna mera param dharam jo thehra.

    Kitane maje ki baat hai jis pitr satta ki wajah se malihaien oppressed hein use kayam rakhane ki jimmedari bhi unhin ke kandhon par hai.

    Desi Girl

  14. मां और बच्चे (बेटा/बेटी ) का यह रिश्ता बड़ा अद्भुत है …
    एक कहावत है …
    ” काना काना बन नहीं
    काना बिना सरे नहीं ”
    यानी आपस में निभती नहीं और एक दूसरे के बिना रह भी नहीं सकते …बड़े होने पर यही भाव बहुत से आत्मीय रिश्तों के साथ जुड़ जाते हैं …अपने जिद्दीपन को स्वीकार करना अपने आप में बहुत साहस का काम है …माताएं अपने संस्कारों के कारण ही बेटा और बेटी में भेद करती आई हैं …मगर इससे उनके वात्सल्य पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता …लगभग प्रत्येक लड़की बचपन में इसी तरह लडती भिड़ती रही है इन संस्कारों से ….
    रोचक शैली में लिखा गया संस्मरण …!!

  15. @ “माताएं अपने संस्कारों के कारण ही बेटा और बेटी में भेद करती आई हैं …मगर इससे उनके वात्सल्य पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता …”

    वाणी जी ने कही एक ही पंक्ति में सारी बात ! खूबसूरत !

    अमरेन्द्र का कौन-सा अर्थ जमा आपको बिपत नौनौ का ?

  16. बहुत सुन्दर! आत्मीय संस्मरण!

  17. गंधैले, मलिच्छ, कुल गोडना, और कलूटा जैसी भी कुछ और उपाधियां है जो बचपन में मिलती हैं …. वैसे ये मेरा निजी अनुभव हो सकता है कि बचपन में जो बच्चे बहुत शरारती होते हैं, अगर उम्र के साथ भटकाव से बच जाते हैं तो बहुत प्रखर बुद्धि के होते हैं ….
    वैसे एक बात और …. फोटो देख कर तो लगता है आप हू ब हू अम्मा पर गयी हैं…
    …… उम्मीद है सुधार जारी रहेगा 🙂

    • ऐं ! ये पक्का लड़कों की उपाधियाँ होंगी, मुझे तो नहीं मिली. लेकिन, मुझे पता चल गया कि आप भी पक्का मेरी कैटगरी के थे बचपन में.

  18. kuchh khas nahi hai kahni me
    fir bhi bahut mithas hai ,
    apnapan hai
    Nice one

  19. क्या खूब आप…
    और क्या खूब अम्मा जी…

    जैसे सब होते हैं…सबकी होती हैं…..

  20. आगे के एपिसोड के बाद कुछ कहूंगा
    अभी सिर्फ़ नाईस

  21. Apnon ka gahara pyar hi to hai jo hamen baar-baar yaad aata hai …Samay ke saath-saath bade hote chale jaane par aur phir ghar-grahsti mein ulaghne ke baad bhi sacha pyar-dular kahan koi bhulta hai…
    Sundar sachhi manobhavon ki abhivyakti….

  22. mujhe bhi hamesha laga ki manjhla hone ka khmiyaja bhugatna padta hai…par ab jab sabse door hoon to lagta hai…kitna kuch peeche chhoot gaya….

    http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

  23. बहुत दिन से सोचा था की मुझे अपना interpretaion देना है पर वक्त ही नहीं मिला ..अब थोडा सा वक़्त मिला तो सोचा अपना वर्ज़न भी बताता चलू “विपत्ति नौनो”..यह मानना पड़ेगा की इनकी अम्मा सूक्ष्म बुद्धि की थी जिन्होंने यह ताड़ लिया था की यह लड़की शैतान की खाला है ..इसलिए विपत्ति तो हिंदी का शब्द है पर नौनो यह तो अंग्रेज्ज़ी का NO +NO है हिंदी में .तो इसका मतलब क्या हुआ ? ..इनकी अम्मा ने हिंदी और अंग्रेज्ज़ी का fusion kar दिया ..अब इसका अर्थ क्या निकलेगा ..इसका अर्थ यह है की आराधना शैतान है ..नहीं नहीं (No+No = नौनो ) ..आराधना शैतान वरिष्ठम है ..शैतानी बुद्धि की पराकाष्ठा है ..इसिलए इसको सिर्फ शैतान समझने की भूल न करे ..यह कहना था उनका ..इसलिए देखिये की उन्होंने आग लगावन की भी संज्ञा दी है ..इतिहास उठा के देखे की क्या विश्व में जितने भी बड़े युद्ध हुए है वे आराधना जैसे आग लगावन स्त्रियों की वजह से नहीं हुए है ? .

    रामायण में क्या हुआ ..सूपर्णखा ने जाके अपने भाई के सामने जो आग लगाई की बेचारा रावण सीताजी को ही चुरा लाया ..उसके पहले मंथरा ने जो चाल चली की दसरथ जी क्लीन बोल्ड हो गए…खैर यही हाल है आराधना का भी ..इनकी पोएम तो खैर चलिए ठीक ठाक है पर इनके लेख में आग लगावन के भरपूर तत्व है.. किसी की नज़र पड़े न पड़े पर मेरी नज़र इनके लिखे बहुत सरल लेख में कहा कहा खुराफात छुपी है मै समझ जाता हू ..तो इनकी अम्मा ने इनको ठीक पहचाना ..ऊपर से शांत ,सरल लगने वाली आराधना अन्दर से उस जवालामुखी की तरह है जो बाहर से सुशुप्त होने का एहसास देता है पर जिसके अन्दर गरम लावा बह रहा है ..जहा इनको मौका मिला की टॉम एंड जेर्री के टॉम के तरह खुराफाती योजनाये चालु हो जाती है और एक ज्वालामुखी फटने वाले मोड में आ जाता है.खैर जो होना हुआ सो हुआ ..

    अब वर्तमान में आये ..पूछना पड़ेगा :बिल्ली के गले में घन्टी कौन बांधेगा ?

    अरविन्द द्वितीय (अरविन्द मिश्राजी ) को कमेन्ट की एक प्रतिलिपि सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्यवाही हेतु प्रेषित हो :-))

    Arvind K.Pandey (Arvind First)

    http://indowaves.instablogs.com/

    • आपको सूर्पणखा दिखी, जिसके कारण सीता जी का अपहरण हुआ (वो भी बेचारी एक स्त्री ही थी) और पुराणों के महा आगलगावन नारद मुनि नहीं दिखे. बड़े आये…मेरे लेखों को आग लगाने वाला बताने वाले. खुद तो जैसे बड़े सीधे लेख लिखते हो.” भारत में नारीवाद की क्या आवश्यकता है” “औरतों को राजनीति में क्यों आना है” वगैरह वगैरह. मैं अपने लेखों में पुरुषों को भला-बुरा नहीं कहती. मैं सामाजिक व्यवस्था को दोष देती हूँ, जिसके कारण औरतों और कहीं-कहीं पुरुषों को भी जाने क्या-क्या झेलना पड़ता है. मेरा ब्लॉग पूरा पढ़ डालो और बताओ कि कहीं जो मैंने सीधे-सीधे पुरुषों पर इल्जाम लगाया हो.

  24. बिपत नौनो. मुझे याद है कि एक बार अम्मा ने किसी बात पर मेरे गाल पर एक तमाचा जड़ा और बिपत नौनो की उपाधि दे डाली. मैंने गाल सहलाते हुये, रोते-रोते पूछा था कि “बिपत नौनो माने क्या होता है” और अम्मा हँस पड़ी थीं.

    हा हा..

    समीर जी की टिप्प्णी के लिये सिर्फ़ एक स्माईल 🙂

  25. बिपत नौनो का जवाब नहीं –वे गालियाँ जिसे देने वाला भी न समझे और पाने वाला भी न समझे—प्रेम रस में डूबी गालियाँ।
    –अच्छा संस्मरण।

  26. कई बार ऐसा भी होता है कि किसी के मुख से गालियां सुनना भी बहुत अच्छा लगता है। हमारी अम्माजी कभी कभार गुस्से में पीट जरूर देती थी पर उनके मुंह गालियां सुनने की तो मन में ही रह गई। अब तो गुस्सा भी नहीं करती।
    सही कहूं तो अराधना जी मुझे आप से इर्ष्या हो रही है। कितनी किस्मत वाली हैं जो एक तो बडी हैं ( मैं तो घर में सबसे छोटा हूँ) और दूसरे अम्माजी की गालियां भी सुनी है।
    आपके ब्लॉग पर पहली ही बार आया हूं पर बहुत बढ़िया लगा। टिप्पणी पूरी टाइप करने के बाद पुराने लेख भी देखूंगा।

  27. aw…. that’s so sweet !
    🙂
    god bless all mom !

    karna kya hai sudhar wudhar ke… kinna maza aata hai jab meri mumma kehti hain “itni badi ghodi ho gayi hai aur akal dhele ki bhi nhai hai ! :p'”

  28. aur ye bhi.. “sirf padhne hi padhne se aur badi badi baate karne se ghar nahi chalta !”

  29. बेटे अरविंद कुमार पांडेय, मैं अरविंद तृतीय बोल रहा हूं। जैसा कि तुमने सही महसूस किया है-

    “ऊपर से शांत ,सरल लगने वाली आराधना अन्दर से उस जवालामुखी की तरह है जो बाहर से सुशुप्त होने का एहसास देता है पर जिसके अन्दर गरम लावा बह रहा है…।”

    तो अगर इसे महसूस करते हुए तुम्हें इस बात का भी एहसास होना चाहिए कि बाहर से सीधी-सरल दिखने वाली यह “मुक्ति” सचमुच ज्वालामुखी का ही असर लिए है, जो अपनी ताकत के साथ उभर गई तो तुम्हारे जैसे जड़-व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करने वाले धूर्तों को धूल-धूल करके उड़ाके रख देगी। बात समझ में नहीं आती है तो क्यों अपनी नाक रगड़ने चले आते हो।

    शूर्पनखा (तुम तो जानते भी नहीं होगे कि उसका नाम दरअसल सुरूपनखा था) का आग लगाना दिखता है तुम्हें, अपने तथाकथित भगवानों का छिछोरापन नहीं दिखता कि महज प्रेम-निवेदन की बात पर उसके साथ कैसे-कैसे खेलता रहा और फिर उसकी “नाक” काट ली। तुम्हें अपने ही हिंदू समाज में प्रचलित मुहावरा “नाक कटने” का अर्थ मालूम है…? इसका अर्थ “इज्जत लुट जाना” होता है मूर्ख पांड़े। और अब अंदाजा लगाओ कि तुम्हारे भगवानों ने सुरूपनखा के साथ क्या किया होगा और उसके बाद सुरूपनखा के भाइयों ने जो किया उसकी भी व्याख्या करो। अगर कर सको तो… (वैसे लगता यही है कि तुम सत्यनारायण “भगवान” की कथा बांचने से अधिक कुछ नहीं कर पाते होगे…)

    मैंने गलत तुम्हें मूर्ख पांड़े कहा। आराधना को शैतान बताने वाले दरअसल तुम जैसे ही लोग इस समाज के असली शैतान है।

    और अगर आराधना शैतान है तो इस समाज की सभी स्त्रियों को शैतान हो जाना चाहिए।

    रही बात “बिल्ली के गले में घंटी बांधने की…” तो तुम जैसे लोगों के हाय-हाय करने के बावजूद आराधना अब “मुक्ति” हो चुकी है। और “मुक्ति” का यह सफर तुम जैसों की हाय-हाय से रुकने वाला भी नहीं है। “मुक्ति” तो अब एक ऐसी बिल्ली हो चुकी है जो पहले ही सभी तरह की घंटियों से पार पा चुकी है। खैर, तुमने तो इतना स्वीकार कर ही लिया है कि इस बिल्ली को घंटी बांधेगा कौन… यानी तुम्हारे जैसे लोगों के भीतर इसकी हिम्मत बची नहीं। (वैसे भी अपने पाखंड का पर्दा खुलते देख तुम जैसे लोगों की हिम्मत नहीं होगी और “मुक्ति” दरअसल इसी पर्दे को उघाड़ कर रख देने की कोशिश में हैं।)

    आराधना ने सहजता से कहा है कि मेरा ब्लॉग पढ़ो। लेकिन मैं कहता हूं कि तुम कुछ “सैंस्कृटाइज” ब्लॉग पढ़ो जिन पर रामचरितमानस टाइप की चीजें पढ़ कर तुम्हें सुख मिल सके। जाओ अपने सुख की खोज में बढ़ो वत्स…

    शुभआशीष…

  30. बहेतू, ढीठ, आवारा, बेशरम, आग लगावन, मुँहफट, बिपत नौनो….

    स्त्री के संदर्भ में इन सबका सम्मिलित अर्थ होता है- “वीर-बहादुर…” जो इस व्यवस्था के सामने एक चुनौती होती है और व्यवस्था उसे “सुधरने” के लिए तमाम कवायदें करती है…

    जो “सुधर” गए, समझिए उनकी “मुक्ति” तक का सफर संभव नहीं…

  31. वाह आराधना, तुम जैसी बेटी पर किसी भी माँ को गर्व होना चाहिए।
    घुघूती बासूती

  32. इस पोस्ट को और इस पर आयी टिप्पणियों को पढ़ कर मेरे अपने मन पर पड़ा एक बहुत बड़ा बोझ हट रहा है। धन्यवाद

  33. aaradhna main to apni maa se bahut jyada judi hoon….samajh nahi aata hoon kahoon ya thi….kyu ki ab ve sa shareer hamare saath nahi hain….par aaj bhi unka sirf naam lene se meri aankhe bhar aati hain……main kuchh bhi likhne chaloo….usme mummy ka jikar aahi jata hai….

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: