आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (2.)

मेरे और अम्मा के अघोषित युद्ध में अक्सर दीदी शान्ति-स्थापना का असफल प्रयास किया करती थीं. वो एक ओर मुझे समझाती कि अम्मा तुम्हें बहुत प्यार करती हैं, बस दिखाती नहीं हैं, दूसरी तरफ अम्मा से कहती कि ज्यादा मार-पीट से गुड्डू और ढीठ होती जायेगी. न मुझे दीदी की बात समझ में आती और न अम्मा मार-पीट से बाज आतीं. मुझे समझ में आती भी कैसे दीदी की बात, प्यार कोई तीसरा थोड़े ही महसूस करवा सकता है. वो तो अपने आप से महसूस होता है. खैर, दीदी बेचारी और कुछ नहीं तो मुझे अम्मा की मार से ज़रूर बचा लेती थी कभी-कभी.

कई बार मुझे दीदी की बात सच भी लगती थी. पर अम्मा अपना प्यार दिखाती क्यों नहीं हैं, ये नहीं समझ में आता. मुझे लगता कि वो हमेशा मुझसे नाराज़ रहती हैं. पता नहीं क्यों? असल में हमारे देश में हम अपनों से ज्यादा दूसरों की चिन्ता करते हैं. शायद अम्मा को ये लगता हो कि उनके प्यार जताने से मैं और बिगड़ जाउँगी और फिर लोग क्या कहेंगे? मामला बेटियों का हो तो माँएँ कुछ अधिक ही सतर्क रहती हैं.

पर अम्मा के प्यार की गर्मी मुझे महसूस होती थी. मैं देखती थी कि उन्हें मेरे खाने-पीने की ज्यादा ही चिन्ता रहती है क्योंकि मैं भूख बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर पाती थी और मुझे तुरन्त कुछ न कुछ खाने के लिये चाहिये होता था. दोनों भाई-बहन इस मामले में थोड़े नकनकहे थे, पर मैं नहीं. भूख लगने पर कुछ भी खा लेती थी. इसीलिये जब स्कूल की तरफ से पहली बार मंडलीय प्रतियोगिता में भाग लेने लखनऊ जाना हुआ, तो हमेशा की तरह पहले तो अम्मा ने विरोध किया और जब तैयार भी हुईं, तो दुनिया भर के शकरपारे, पुए, नमकीन आदि बाँध दिये मेरे साथ. मानो मैं खेलने नहीं पिकनिक मनाने जा रही थी. और तो और मेरे जाने के बाद, जब तक मैं लौटकर नहीं आ जाती थी, ठीक से खाना भी नहीं खाती थीं, ये सोच-सोचकर कि पता नहीं गुड्डू को खाना मिला होगा या नहीं. बाउ उनको चिढ़ाते थे कि “हाँ, तुम्हारी बिटिया को टीचर लोग भूखा मारने के लिये ही तो ले गई हैं.” वो तीन दिन मुझे इतना याद करती थीं कि मुझे बात-बात पर रोना आता था. रात को सारी लड़कियाँ घर से बाहर होने के मज़े लूटती थीं. देर रात तक बातें करती थीं और अन्ताक्षरी खेलती थीं और मैं चादर से मुँह ढककर रोती रहती थी. सब सोचते थे कि मैं बड़ी अच्छी बच्ची हूँ, जल्दी सो जाती हूँ.

एक घटना है, जिसने अम्मा के प्रति मेरे व्यवहार को काफी कुछ बदल दिया. हमलोग तब मगरवारा में थे और वहाँ से उन्नाव डेली पैसेन्जरी करते थे पढ़ने के लिये. मगरवारा उन्नाव जिले का एक छोटा सा स्टेशन है, जहाँ इक्का-दुक्का गाड़ियाँ ही रुकती थीं. स्कूल के एक फ़ंक्शन की वजह से मेरी शाम पाँच बजे वाली ट्रेन मिस हो गई और दूसरी गाड़ी नौ बजे रात में थी. भाई उस दिन स्कूल गया नहीं था और बाकी साथी पाँच बजे वाली गाड़ी से घर पहुँच गये. तब फोन की सुविधा तो होती नहीं थी. मेरी कोई खबर घर पर न पहुँचने पर अम्मा चिन्ता से परेशान हो गईं. बाउ ड्यूटी पर थे. अम्मा की तबीयत खराब थी, पर फिर भी वो तैयार होकर उन्नाव जाने के लिये स्टेशन पर आ गईं. संयोग से उसी समय मेरी नौ बजे वाली गाड़ी पहुँच गई. एक पोर्टर ने मुझे गाड़ी से उतरते देखा और दौड़कर अम्मा को खबर किया. जब मैं अम्मा के सामने पहुँची, तो उन्होंने गुस्से से घूरकर मुझे देखा और दनदनाते हुये वापस चली गईं. मैं डरते-डरते उनके पीछे घर पहुँची.

घर पहुँचकर देखा कि अम्मा सर नीचा किये हुये वो खाना खा रही थीं, जिसे आधा छोड़कर वो ट्रेन पकड़ने चल दी थीं. उनकी आँखों से लगातार आँसू बहकर खाने में गिर रहे थे, और वो गुस्से में जल्दी-जल्दी एक के बाद एक कौर मुँह में डाले जा रही थीं. घर में अजीब सा माहौल हो गया था. सब चुप थे. उस समय मेरी क्या हालत हुई, उसे मैं शब्दों में नहीं बता सकती. लेकिन मुझे पता चला कि इस कठोर मुखौटे के पीछे एक नर्म सा दिल है- माँ का दिल, जो अपने बच्चों के लिये अपार प्रेम से भरा होता है और जिसकी तुलना दुनिया में किसी चीज़ से नहीं की जा सकती.


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23 thoughts on “अम्मा और मैं- एक अनोखा रिश्ता (2.)

  1. माँ तो ऐसी ही होती है..माँ का दिल भला कब कठोर हुआ है.

    मार-पीट से गुड्डू और ढीठ होती जायेगी–हो ही गई न!! बहन ने सही जान लिया था..हा हा!!

    नकनकहे शब्द बड़े दिन बाद सुना…मजा आ गया संस्मरण सुन कर. सुनाती चलो!!

  2. क्या उकेरा है भावनाओं के तूफ़ान को, और अगर माँ प्यार न दिखाये तो भी प्रेम बहुत ही ज्यादा होता है, अमूल्य होता है, अंतहीन होता है, माँ का ह्रदय या कहें ममता बहुत कोमल होती है फ़िर वो पिता ही क्यों न हो ..।

  3. “रात को सारी लड़कियाँ घर से बाहर होने के मज़े लूटती थीं. देर रात तक बातें करती थीं और अन्ताक्षरी खेलती थीं और मैं चादर से मुँह ढककर रोती रहती थी. सब सोचते थे कि मैं बड़ी अच्छी बच्ची हूँ, जल्दी सो जाती हूँ.”

    अच्छा है

    माँ का दिल बहुत विशाल होता है उसे सिर्फ १ माँ ही समझ सकती है

  4. बहुत अच्छा लगा पढ़ना। किन्तु मुझे यह प्यार न दिखाने का फंडा कभी समझ नहीं आया। है तो दिखाना ही चाहिए।
    घुघूती बासूती

  5. पिछली पीढ़ी का तो यही रवैया था.प्यार की गठरी दिलमे छुपा उसपे कई गांठे लगा देते थे…कभी कभी ही गठरी खुलती थी,वो भी दूसरों के सामने 🙂
    बड़ा अच्छा लिखा है,संस्मरण…हमेशा की तरह..

  6. माँ का दिल कठोर नहीं होता …एक दो राक्षसी कलयुगी माओं को नजदीक से देखने के बाद भी मेरा सकारात्मक दिल यही कहता है…
    चादर ढककर रोने जैसा कार्य तो खूब करती हैं लड़कियां …बेटियों और उनके पापा के साथ अन्ताक्षरी खेलते , बच्चों से लाड़ जताते हुए कई बार बचपन याद आता है … हमारे माता पिता इस तरह अपना स्नेह प्रदर्शन नहीं कर पाते थे …बल्कि बुजुर्गों के सामने इसे असभ्यता ही माना जाता था ..

  7. अक्सर पिता ऐसे होते है .अपनी गठरी को एक उम्र में जाकर खोलते है….मां तो दस साल की उम्र होने के बाद हुडकी भी खाने लगी थी……ओर मनपसंद लंच टिफिन में न मिलने पर स्कूल से वापसी में लड़ाई का शिकार भी….वैसे एक सम्मिलित परिवार का एक अलग सुख होता है …..तब कितने बच्चे होते थे न एक ही परिवार में .अब तो एक दो ….बस….

  8. आपके संस्मरण होते तो आपके हैं लेकिन पढने वाले को खुद की आपबीती लगते हैं -मैंने तो बचपन में माँ से इतनी मार खाई है कि दुनिया की कोई भी माँ क्या अपने बच्चे की इतनी पिटाई की होगी -आपकी माँ तो बहुत अच्छी लग रही हैं -उन्हें श्रद्धा सुमन !
    आपकी ढिठाई के पीछे की कोमलता का अहसास कर पा रहा हूँ –

  9. और हाँ ये क्षण क्षण पर भकोसते रहने की आदत क्या अभी भी है -माँ तो मुझे इसलिए भी मारने को दौडाती थीं की मैं घर के कमरों के कोने अतरों में से कुछ न कुछ खाने को ढूंढ ही लेता था कितना ही वह छुपा कर रखा गया हो -और इसलिए हर वक्त का मेरा घर में भड़छना माँ को फूटी आंख भी नहीं सुहाता था ….

    • हे…अब तो मैं एक-दो टाइम का खाना ही गोल कर देती हूँ. बचपन में अम्मा मुझे और मेरे भाई को गजानन-खड़ानन कहती थीं. हमलोग अक्सर चोरी करके नमकीन, शकरपारा और पेठा खा जाते थे और खाना बनना शुरू होने पर पहली रोटी के लिये लड़ाई करते थे. अम्मा आधी-आधी रोटी देकर समस्या का समाधान करती थीं.

  10. बहुत आत्मीय संस्मरण! आखिरी पंक्तियां पढ़ते हुये रोना भी गया! 🙂

    प्यार या फ़िर कोई भी मनोभाव व्यक्त करने के हरेक के अपने अपने अन्दाज होते हैं। कोई कह कर व्यक्त कर देता है! कोई चुप रहकर!

  11. bahut sunder likha hai apne. maa se badhkar koi nahi. umda prastuti ke liye badhai

  12. “Der aaye durust aaye ”

    Kam se kam aapko apni mataji ka pyar to mehsoos hua !

    Ab ‘didi’ ko Guddu ke liye kam jaddo-jehad karni padegi.

  13. Well,I am speechless…It’s a great feeling to read something that provides one an opportunity to have a glimpse into another’s emotional being.I hope the mothers in coming days shall exhibit the same traits.

    I hope the hearts of parents remain above the plastic gestures that have hit the globe !!! Lastly, one thing more the posts of Aradhana ,if read very consciously,also tell lot about the elements that have gone into the making of writer’s persona.

    Arvind K.Pandey
    http://indowaves.instablogs.com/

  14. अंतिम दो अनुच्छेद सजल कर गए …

  15. मेरी टिप्प्णी पर आपके प्रत्युत्तर ने आपके मन के दर्द का आभास करवा ही दिया था। अम्मा कथा के इस दूसरे भाग ने आँखें नम करदी।

    लगता है इसके अगले अंको में आप जो कुछ लिखेंगी पाठकों को अवश्य भावुक कर देगा या रुलायेगा। मैं अगली कड़ी का बेसब्री से इंतजार करूंगा।

    धन्यवाद आराधनाजी।

  16. अम्मा डाँटती हैं…सबकी अम्मा डाँटती हैं !
    अम्मा की डाँट में एक छन्द है..रस-संपृक्ति है !
    अम्मा की डाँट हमारी सम्पदा है ! हम इस अनोखे रस से वंचित रह गये .. तो कैसे बढ़ेंगे, कैसे जियेंगे !
    अम्मा की डाँट संग-तराशी है ! नक्काशी है !

    माँ का प्यार हमारी अभिव्यक्ति के पार है ! जयकृष्ण राय तुषार की एक कविता याद आ रही है..
    “माँ तुम गंगाजल होती हो !
    मेरी यादों में खोई अक्सर तुम पागल होती हो ।

    सबका अभिनन्दन करती हो, लेकर अक्षत चन्दन रोली
    मन में सौ पीड़ाएं लेकर, सदा बाँटती हँसी-ठिठोली ,
    जब-जब हम लयगति से भटकें, तब-तब तुम मादल होती हो ।

    जीवन भर दुख के पहाड़ पर, तुम पीती आँसू के सागर
    फिर भी महकाती फूलों सा मन का सूना सा सम्वत्सर
    मन के दरवाजे पर दस्तक देती तुम सांकल होती है ।

    व्रत, उत्सव, मेले की गणना, कभीं न तुम भूला करती हो
    सम्बंधों की डोर पकड़कर आजीवन झूला करती हो ,
    तुम कार्तिक की धुली चांदनी से ज्यादा निर्मल होती है ।

    पल-पल जगती सी आंखों में मेरी खातिर स्वप्न सजाती
    अपनी उमर हमें देने को मंदिर में घंटियां बजाती,
    जब-जब ये आंखे धुंधलातीं तब-तब तुम काजल होती हो ।

    हम तो नहीं भगीरथ जैसे कैसे सिर से कर्ज उतारें
    तुम तो खुद ही गंगाजल हो तुमको हम किस जल से तारें,
    तुम पर फूल चढ़ायें कैसे तुम तो स्वयं कमल होती हो ।

  17. लीजिये एक और कविता.. यह सुधांशु उपध्यय की है और मैने कभी अपने ब्लॉग पर इसे पोस्ट की थी।
    “अम्मा (एक कथा गीत )”
    थोड़ी-थोड़ी सी धूप निकलती थोड़ी बदली छाई है
    बहुत दिनों पर आज अचानक अम्मा छत पर आई है!
    शॉल सरक कर कांधों से उजले पावों तक आया है
    यादों के आकाश का टुकड़ा फ़टी दरी पर छाया है
    पहले उसको फ़ुर्सत कब थी छत के उपर आने की
    उसकी पहली चिंता थी घर को जोड़ बनाने की
    बहुत दिनों पर धूप का दर्पण देख रही परछाई है
    बहुत दिनों पर आज अचानक अम्मा छत पर आई है!
    सिकुड़ी सिमटी उस लड़की को दुनियां की काली कथा मिली
    पापा के हिस्से का कर्ज़ मिला सबके हिस्से की व्यथा मिली
    बिखरे घर को जोड़ रही थी काल-चक्र को मोड़ रही थी
    लालटेन सी जलती बुझती गहन अंधेरे तोड़ रही थी
    सन्नाटे में गुंज रही वह धीमी शहनाई है!
    बहुत दिनों पर आज अचानक अम्मा छत पर आई है!
    दूर गांव से आई थी वह दादा कहते बच्ची है
    चाचा कहते भाभी मेरी फ़ुलों से भी अच्छी है
    दादी को वह हंसती-गाती अनगढ़-सी गुड़िया लगती थी
    छोटा में था- मुझको तो वह आमों की बगिया लगती थी
    जीवन की इस कड़ी धूप में अब भी वह अमराई है!
    बहुत दिनों पर आज अचानक अम्मा छत पर आई है!
    नींद नहीं थी लेकिन थोड़े छोटे छोटे सपने थे
    हरे किनारे वाली साड़ी गोटे गोटे सपने थे
    रात रात भर चिड़िया जगती पत्ता पत्ता सेती थी
    कभी कभी आंचल का कोना आँखों पर धर लेती थी
    धुंध और कोहरे में डुबी अम्मा एक तराई है!
    बहुत दिनों पर आज अचानक अम्मा छत पर आई है!
    हंसती थी तो घर में घी के दीए जलते थे
    फ़ूल साथ में दामन उसका थामे चलते थे
    धीरे-धीरे घने बाल वे जाते हुए लगे
    दोनो आँखो के नीचे दो काले चाँद उगे
    आज चलन से बाहर जैसे अम्मा आना पाई है!
    पापा को दरवाजे तक वह छोड़ लौटती थी
    आंखो में कुछ काले बादल जोड़ वह लौटती थी
    गहराती उन रातों में वह जलती रहती थी
    पूरे घर में किरन सरीखी चलती रहती थी
    जीवन में जो नहीं मिला उन सब की मां भरपाई है!
    बहुत दिनों पर आज अचानक अम्मा छत पर आई है!
    बड़े भागते वह तीखे दिन वह धीमी शांत बहा करती थी
    शायद उसके भीतर दुनिया कोइ और रहा करती थी
    खूब जतन से सींचा उसने फ़सल फ़सल को खेत खेत को
    उसकी आंखे पढ़ लेती थी नदी-नदी को रेत रेत को
    अम्मा कोई नाव डुबती बार बार उतराई है!
    बहुत दिनों पर आज अचानक अम्मा छत पर आई है!

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