आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

ज़िन्दगी का एक खराब दिन

कल रात से मूड बहुत खराब है और ये पोस्ट मैं अपनी फ़्रस्टेशन निकालने के लिये लिख रही हूँ. रात में “रोड, मूवी” नाम की एक फ़िल्म देखी. फ़िल्म अच्छी लगी या बुरी, पता नहीं. पर उसे देखकर मन बड़ा खराब हो गया. जाने क्यों?

तीन दिन से जे.एन.यू. जाना पड़ रहा है, एक सेमिनार में. समस्या यह है कि कली को कहाँ रखूँ? एक दिन तो अपनी बिल्डिंग में ही परोपकारी भाई लोग के यहाँ छोड़ दिया. कली उन लोगों से घुली-मिली है. पर, पढ़ने वाले बच्चों को रोज़ परेशान नहीं किया जा सकता. इसलिये आज कली को एक गरीब भाईसाहब के यहाँ छोड़ा. ये भाईसाहब सब्ज़ी बेचते हैं और मुहल्ले के पीछे झोपड़पट्टी डालकर सपरिवार रहते हैं. फिज़िकली चैलेन्ज्ड हैं, पर उनके काले-काले चेहरे पर सफेद दंतपंक्तियाँ चमकती रहती हैं, मतलब हैप्पीडेंट वाली मुस्कुराहट, रोशनी बिखेरती हुई, सबको रोशन करती रहती है. सुबह-सुबह उनकी गरीबी देखकर मूड खराब हो गया. इसके अलावा और हो भी क्या सकता है?

जे.एन.यू. में एक सज्जन ने पूछा “आप करती क्या हैं” “मैं रिसर्च कर रही हूँ” “हाँ, वो तो ठीक है, पर आप करती क्या हैं?”…कुछ समझ में आया. रिसर्च करना, कुछ न करने के बराबर है. लोग सोचते हैं कि एक तीस साल की औरत को सेटेल हो जाना चाहिये…इसका मतलब या तो उसे गृहस्थी बसा लेनी चाहिये या नौकरी करनी चाहिये. इतनी उम्रदराज़ औरत बिना कुछ किये कैसे रह सकती है?…अब बताओ? अगर मैं न नौकरी करना चाहूँ और न ही गृहस्थिन बनना तो? मुझे आवारगी पसन्द है. पड़े-पड़े किताबें पढ़ना अच्छा लगता है. आपको क्या तकलीफ़ है?

फिर मेट्रो में, डी.एम.आर.सी. ने मुस्टंडे चौकीदार लगा रखे हैं, लोगों को कायदे से चढ़ने-उतरने के लिये. लेकिन लोग हैं कि ट्रेन आते ही भरभराकर गिर पड़ते हैं एक-दूसरे के ऊपर और ठुँस जाते हैं डिब्बे में. इतना कसे रहते हैं कि कभी-कभी दरवाजा बन्द होना मुश्किल हो जाता है और ट्रेन खड़ी…बार-बार वार्निंग बजती है—“कृपया दरवाजे से हटकर खड़े हों…please stand clear of the door”… पर सब यही सोचते हैं कि ये एनाउंसमेंट दूसरों के लिये है…लाइन-वाइन का भी कोई मतलब ही नहीं…मन करता है कि इन लोगों को चलती ट्रेन से धक्का दे दूँ, पर मेट्रो रेल में ये संभव नहीं…(जैसे संभव होता तो धकेल ही देती)

अपने स्टेशन पहुँचकर बाहर निकली तो देखा कि बारिश हो रही है, पर इसमें खुश होने वाली कोई बात नहीं. थोड़ी सी बारिश, ऐसा लगता है जैसे तवे पर पानी पड़कर भाप बनकर उड़ गया हो…और भाप ज्यादा जलाती है क्योंकि उसकी गुप्त ऊष्मा अधिक होती है. इत्ती सी बारिश से मुखर्जीनगर के सीवर नाराज़ होकर सड़क पर निकल पड़ते हैं…और आदमियों के खिलाफ धरना दे देते हैं…शुक्र है हमारे मुहल्ले में स्थिति कुछ बेहतर है.

कली को लेने ‘पगारत पंडित’ भाई (गरीब भाई साहब का नाम) के यहाँ पहुँची तो कली ने मेरा बड़े औपचारिक ढंग से स्वागत किया और फिर पगारत भाई के कुत्ते के साथ खेलने लग गई…मेरे दिल को बड़ी ठेस लगी. कली ने पहले कभी ऐसा नहीं किया. मैं जब उसे पट्टा पकड़कर लाने लगी तो वो अड़ गई…आखिर मुझे उसको उठाकर लाना पड़ा.

अब बताइये मूड नहीं खराब होगा????


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56 thoughts on “ज़िन्दगी का एक खराब दिन

  1. 🙂
    आराधना जी.. कली कि आदत बिगड रही है.. संभल कर.. 🙂
    कली तो फिर भी इंसान नहीं है, कभी कोई इंसान ऐसा ही कुछ करे तो फिर कितना ठेस पहुँचता है, है ना?

  2. ओह! मूड खराब इस लिए है…तभी किटकिटा रही थी बज पर. 🙂

    वैसे सच में, उसे दिन भर घर में अकेले रहने की आदत डालो. पड़ जायेगी आदत जल्दी.

  3. 🙂 मूड इतनी आसानी से खराब नही करते और करते भी है तो फ़ट से ठीक कर लेने का..

    जैसे कली को प्यार से दो चपत लगानी थी.. 😀 वो लोग जो गेट की ओर खडे थे, उनसे अच्छे से लड लेना था…

    और सज्जन साहब से कहना था कि तुम कवि हो.. अगला सवाल वो खुद नही पूछते.. 🙂

  4. अरे! पर मूड क्यूँ ऑफ है? Be Happy ना…….प्लीज़……

  5. अगर मैं न नौकरी करना चाहूँ और न ही गृहस्थिन बनना तो?

    Kitne hi sajjano aur sajjanio ko khala mein daal rakha hai ekal mahilaon ne. Bravo, dati raho maidan mein. Hum bhi jame hue hein barson se is khel mein…

    Rahi baat mood ki iska kya aitbaar kal yoonhi badal jayega…

  6. @पंकज उपाध्याय, @ Mahfooz Ali, @Swapna Manjusha ‘ada’, आप सब लोग कह रहे हैं तो मैं मूड ठीक कर लेती हूँ. वैसे मेरी आधी फ़्रस्टेशन तो पोस्ट लिखने में ही निकल गयी थी और आधी अब…

  7. ये बात मैने भी नोटिस की है.. लिखने से फ़्रस्टेशन चली जाती है.. 🙂 कोई पढने न आये तो.. बढ भी जाती है 😛

  8. मूड खराब कली के कारण है , पगारात भाईसाहब या उनके पिल्ले के कारण ,या प्रश्नकर्ताओं के कारण ….??
    मेरी एक सहेली ने भी ३५ वर्ष के बाद विवाह किया ..लोग जब उससे या मुझसे उसकी शादी के बारे में पूछते तो हमारा मासूमियत भरा जवाब होता था ” कोई लड़का नहीं मिल रहा , आप ही बता दीजिये ना …” :):)

  9. आराधना जी
    ‘कली’ नाम तो मुझे भा गई. अभी कुछ दिन एक नाम सुना था ‘तितली’, और अब कली. मेरा तो मूड ठीक हो गया (वैसे खराब ही कब था). मूड ठीक करने का एक उपाय है – मूड खराब ही न होने दे.
    धन्यवाद

  10. कली को एक दोस्त मिला, वह उस के साथ खेलना चाहती है आप के साथ वापस आने का मन नहीं उस का। आप उसे उठा लाती हैं। उस के मूड का सोचा? कितना खराब हुआ होगा?

  11. आराधना, कली शैतान होती जा रही है। तुमसे मिलने से ज्‍यादा उसे उसे बदमाश पिल्‍ले के साथ खेलने की खुशी हो रही थी। ये सब प्‍यार-मोहब्‍बत के लक्षण हैं। समझी। लेकिन अभी से ……………. अब तुम उसे एक-दो बार अकेले घर में छोड़कर देखो कि क्‍या होता है। एकदम अकेले रह पाती है या नहीं। मैं कब से एक डॉगी पालने की सोच रही हूं लेकिन लोग मुझे कहते हैं कि चूंकि मैं 10-11 घंटे घर से बाहर रहती हूं, इसलिए घर में डॉगी रखना ठीक नहीं। उन्‍हें इमोशनल प्रॉब्‍लम हो जाती है।
    सोचो तो
    , कितना अजीब है ना। कुत्‍तों तक को इमोशनल प्रॉब्‍लम होती है, तो हम इंसानों का क्‍या ? हमारे में कभी कोई नहीं सोचता।
    वैसे तू खुश रहा कर और मन खराब हो तो पट से मुझे एक मेल लिख दिया कर या फोन कर लिया कर। नहीं तो चैटिया लिया कर। ठीक है ना।

    • अरे नहीं यार, एक-दो बार मैं उसे घर में बन्द करके नीचे कुछ सामान लेने चली गई तो उतनी देर पें पें पें पें करती रही. बिल्डिंग वाले और अड़ोस-पड़ोस वाले सब परेशान हो गये.

  12. वैसे इसमें मूड खराब करने जैसी कोई बात नहीं !

  13. क्‍या बात है? कली को भँवरा मिल गया होगा। वैसे आपने सच कहा है कि पढ़ने-लिखने वाले काम को लोग काम ही नहीं मानते। सहजता से आपने कई बिन्‍दुओं को छू लिया है। बधाई।

  14. बिलकुल मूड खराब होगा…ठीक उसी तरहा जिस तरहा कल शाम को दफ्तर में काम काम करते अचानक किसी ने आकर कहां बाहर बारिश हो रही ….. बारिश सुनते ही बरसात का ख्याल मन में आता है और बरसात का मतलब बंसत…..यानि खुशियां….

    कुछ ही देर में सारे निपटा कर सोचा गया चलो मौसम का मजा यानी बंसत मतलब खुशियों का मजा दुगना किया जाए….लेकिन यहां तो लगा जैसे किसी ने लुहार की भट्टी को पानी की छिंटे देकर ठंडा करने की कोशिश की हो…..

  15. मैं इसी कारन पशु-पक्षियों से दूर रहती हूँ .. घर पर कोई नही रहता कौन देखेगा उन्हें..

  16. परेशानी की बात कुछ और थी कही न कही अंतरमन में कुछ न कुछ कुलबुलाहट चल रही थी , नही तो फिल्म उसके बाद मेट्रो में सफर और शाम को बारिश की बुंदो से सामना ,क्या कहने , जब किसी को कोई भी चीज अच्छी न लगे और उसमें मीनमेख निकालने लगे तो समझों की परेशानी कही न कही हमारे अंदर ही छुपी हुई है जल्द से जल्द इसका हल ढुंढना चाहिए औऱ परेशानी को चलता करना चाहिए और हमेशा सकारात्म सोचते हुए जीवन का आनंद लेना चाहिए

  17. @ Mukti ji-

    Great post !

    Mera mood pure hafte ke liye theek ho gaya !

    @ Kali–

    “Mujhe tumse ye ummeed nahi thee”…sudhar jao…abhi vaqt hai…

    Smiles !

  18. कभी कभी मूड खराब होता है तो अच्छा होता है और होना भी चाहिए ,महिने में दो-चार बार तो मूड ऑफ रखना चाहिए.

  19. वैसे इसमें मूड खराब करने जैसी कोई बात नहीं !

  20. वर्डप्रेस का आपका ये ब्लॉग ब्लोग्वानी पर रजिस्टर्ड नहीं है क्या ? फिर दिखता क्यों नहीं है मुझे …
    लेकिन देर से आने के अपने फायदे हैं -बकौल आपके ही ….विचार सरणियों में गोते लगा रहा हूँ …
    मैंने पहली ही कहा था न ?
    पालना था तो आपको ही- डागी पालनी थी …शी नहीं -महानगरों की उन्मुक्तता आधी दुनिया को कुछ ज्यादा ही बिगाड़ रही है ..
    भला ये कोई उम्र हुयी ….
    और हाँ उसे इधर उधर छोड़ आप इधर उधर जा रही हैं -उस पर जो बीत रही है उसने इसका आहसास करा दिया आपको …
    शुक्र है यह ही डागी न हुआ नहीं तो आंच हम तक भी आ जाती ….
    बाकी वो सज्जन सही कह रहे थी सारी जिन्दगी रिसर्च के लिए थोड़े ही है …पढायी के साथ लिखाई जरूरी है …सिद्धांत के साथ व्यवहार भी ….
    मगर यह भी सही है की अप अपवाद है और अपवादों पर सामान्य नियम लागू नहीं होते ….
    मूड ओर मोड संभाले रखा करें -मानव और पशु तक आपके सहारे पर हैं ….

  21. ताज्जुब है!
    अगर ख़राब दिन ऐसा था तो अच्छा दिन कितना अच्छा होता होगा?
    और कली का क्या – इतने सारे लोग हैं उसके बारे में सोचने – कहने – लिखने वाले।
    और पोस्ट तो हमेशा फ़्रस्ट्रेशन निकालने या ख़ुशी बाँटने को ही लिखी जाती है ना!
    कली बिल्कुल नहीं बिगड़ी – कम से कम अभी तक ‘अनुराधा’ तो नहीं बुलाती न!

  22. ही ही ही…मुक्ति ये तो कली है…मेरा बेटा नहीं आता था,अपने दोस्त के घर से…कली को तो तुम जबरदस्ती उठा लाई…मेरा दो साल का बेटा…रोना , धोना,चिल्लाना..सारे अस्त्र आजमा लेता था…सहेली भी समझाती थी,….’अब हमे बाहर जाना है…तुम अपने घर जाओ ‘..सोचो कितनी embarrassing situation हो जाती होगी मेरी….ये सब तो झेलना ही पड़ता है..उनका इत्ता सारा प्यार क्या मुफ्त में मिल जायेगा ? ..:)

    • सही कह रही हैं…अपनी माँ के पास से तो आ जाती है तुरन्त मेरे पास…पर ये दोस्त लगता है कुछ ज्यादा ही प्यारा लग गया कली को.

  23. आराधना जी आप का आत्मकथ्य पङकर
    बहुत हँसी आयी और उस पर तखल्लुस
    मुक्ति ” वास्तव मैं आप इसे मजाक न
    समझें . मैं आपको वो तरीका बता दूंगा
    जिससे कि आप अपनी भूली हुयी आइडेंटिटी
    को पा लेंगी . अगर आपको ये सिरफ़िरी बातें
    लग रहीं हैं तो पूर्व में आप मेरा ब्लाग देख
    सकती हैं जो सिर्फ़ और सिर्फ़ आध्यात्मिक ही
    है.दर असल वो आदमी हो या औरत सभी को
    इस की तलाश है कि उसे ऐसा क्यों लगता
    है कि वो कोई खोये हुये वजूद की तरह है..
    लेकिन अधिक विस्तार न करते हुये आप
    पहले ब्लाग देखे..फ़िर आपको जो भी प्रश्न
    परेशां करे आप मुझसे बात कर लेना .आपको
    उत्तर मिल जायेगा..लेकिन वो प्रश्न आपके
    आत्मकथ्य से रिलेटिड मैटर पर ही हो यदि
    आप चाहें तो आप अपनी पहचान भी जान सकेंगी
    आत्मग्यान से..
    satguru-satykikhoj.blogspot.com

  24. हम तौ पिल्ला-पिल्ली से सुरुवै से बहुत दूर रहे ..

  25. लो उधर कली मुझसे मिली तो वो उलटा कह रही थी कि झाजी क्या बताऊं इस लडकी ने मेरा मूड खराब कर रखा है । जाने किन किन रिसर्च के चक्कर में मुझ कली को ….चंपकली बकरी की तरह कहीं भी धूप पटक करके लिकल लेती है । ऊपर से सुना है जिस मेट्रो में जाती है , उससे अक्सर कुछ लोगों के पटरी पर गिरने की खबरें आ रही हैं । और तो और सारा दोष मेरे मत्थे मढ देती है । आप तो मेरा ब्लोग बना दो एक झटपट से
    नाम रख देना
    कली की कुट्कुट ….
    अब मैं क्या कहता …सोचा पहले आप से पूछ लूं

  26. और हां आपका टीप बक्सा कहता है

    ई मेल आवश्यक है , मगर प्रकाशित नहीं होगा

    हमने कहा अबे जब प्रकाशित ही नहीं होगा तो क्यों इतनी मेहनत करा रहा है बे ….इससे कहिए न आप जानती हैं मुझे …अगली बार से सीधे सीधे टीपने दे

    • झा जी, वर्डप्रेस पर ये ई मेल वाली समस्या तो है. मेल प्रकाशित नहीं होता, लेकिन ब्लॉग मालिक को पता चल जाता है…वैसे आपके पास अगर खुद का क्म्प्यूटर है तो वो एक बार के बाद मेल नोट कर लेगा. मेरा टीप बक्सा मेरा कहना नहीं मानता.

  27. कली वाली पोस्ट पर मैने जो परसों टिप्पणी की थी.. अरे भई वही उसके ब्याह वाली.. को आपने कली के सामने तो नहीं पढ़ा था ना?
    कहीं कली ने उसे आपके साथ साथ पढ़ लिया हो और आपको लड़का ढूंढने की दौड़भाग से बचाने के लिये खुद ही तैयारी शुरु कर दी हो।

    वैसे इतनी कम उमर में ये लच्छन वाकई अच्छे नहीं दिख रहे।

  28. पशुओं का लगाव बहुत विशेष होता है शायद इसलिये क्योंकि वे अपने भावों को शब्दों से व्यक्त नहीं करते है ।

  29. sachchi…itna sb ho to kyu na mud kharab ho.ab aap ke pas time to hai nhi to bechari kali kisi se to dil bhalayegi na.us pr use dant or rhi hai….”kali tum sanghrsh kro hm tumahare sath hai”

  30. “गुनगुना रहे हैं भंवरे, खिल रही है कली-कली…” आया कुछ समझ में आराधना जी? ज़माना बड़ा खराब है. संभाल के रखिये कली को. थोड़ा डांटना भी पड़े तो चलेगा.

  31. hahahahaha…main bhi bekar mood me hi idhar udhar bhatak raha tha..par ye post padh kar to badhiya ho gaya…

  32. हमारा मूड भी है सेम टू सेम। टिलिर पिलिर बातों पर खराब होता रहता है। और उससे सिर झटकें तो स्पॉण्डिलाईटिस का दर्द बढ़ जाता है! 🙂

  33. अब बताओ? अगर मैं न नौकरी करना चाहूँ और न ही गृहस्थिन बनना तो? मुझे आवारगी पसन्द है…..

    लगता है फिर तो आपने फालतू ही एक बंधन बांध लिया है…अपनी आवारगी को लगाम लगाने के लिए…..

  34. वाह! रोचक पोस्ट! पढ़ तो पहले ही लिया था। सोचा कि टिपियायेंगे तब जब आपका मूड ठीक हो जायेगा। अब आगे कुछ लिखा जाये। बहुत दिन हुये मूड सही हुये।

  35. अंत मे समझ आया कि कली एक मूक पशु का नाम है । खैर ज़िन्दगी मे ऐसे फ्रुस्ट्रेशन होते रहते है .. यही है ज़िन्दगी ।

  36. मजेदार टिप्पणियों ने इस पोस्ट में जान डाल दिया है।

  37. hi aradhana di…..jab apse pehli baar sir (sharma sir) k room me mili thi tabi muje laga tha k aapse touch me rehna chahiye..per aapne bhav nai diya tha..:-)ab akhir maine apko khoj nikala….aap to kamal ki blooging kerti hain…itni taareef…i-next se apka blog adress pata chala….muje to kuch pata nai hai blog wagera k bare me…bt ap kamal likhti hain…ab roz padhne ki koshish karungi…

    • dear poornima,
      मुझे तुम्हारी याद नहीं है क्योंकि मैं बहुत से जूनियर्स से मिली हूँ. लेकिन भाव ना देने जैसी कोई बात नहीं. मैं परिचय करने में थोड़ी संकोची हूँ. डिपार्टमेंट में भी अपने बैच के अलावा बहुत कमलोगों से मिलती-जुलती थी. यहाँ तक कि जब मेरा जे.आर.एफ. में नाम आया तो बहुत से लड़के मुझे जानते ही नहीं थे, हाँ टीचर्स जानते थे. मैं तुम्हारे ई-मेल आई डी पर मेल कर रही हूँ. जवाब देना. और अगर ऑरकुट या फेसबुक पर हो तो लिंक दे दूँगी.

  38. Main blogging se dur hi rehta hun lekin accidently apke blog ko padhne ka mauka mila – mere ek dost k yahaan.
    Tab se pata nahi kyun apke blog se connected rehna accha lagta hai.
    As a result mujhme bhi thodi bahut creativity jaagi hai.
    Openly naa sahi par apne personal diary me kuch na kuch likhne ki aadat si pad gayi hai.
    After all aap likhti bahut accha ho…..
    …….
    I’ll b very thankful to u agar mujhe apne facebook account par mujhe invite karen.
    my ID : saketkrishna@hotmail.com

    Thank u

  39. maine bhi ravish ji ke likhe huye lekh me aapke bare me padha aradhana…..sachchi gajab ka likhti ho bhaiiiiii…..maza aagaya…..ab main tumhari sari posts padh rahi hoon…..aaur aage bhi prateeksha rahegi…….main abhi blog ki duniya me nai hoon…..yu samajh lo bas abhi seekh hi rahi hoon…..kabhi vaqt mile to mera blog bhi dekhna…..shesh phir….

  40. sorry mera naam galti se smita rewari chhap gaya hai….ise smita tewari padhna…..

  41. abhi neeche paper ki cutting me padha kali k bare me……kya ho gaya tha kali ko?????………………bahut bura laga sun ke …..he bhagvaan !!!!!!!!!!!!

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