आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

गुदगुदाने वाले कुछ किस्से

कुछ ऐसी घटनाएँ होती हैं आपकी ज़िंदगी में, जो अक्सर गुदगुदा जाती हैं हौले से… और शांत बैठे रहने पर भी एक मुस्कान सी तिर जाती है होठों पे… ऐसे ही कुछ किस्से यहाँ लिख रही हूँ… ये किस्से जीवन के उन स्वर्णिम दिनों के हैं, जब उड़ने को सारा आसमान भी कम लगता है… और बिना परों के भी मन जाने कहाँ-कहाँ हो आता है. जब उमंग और जोश अपनी सौ प्रतिशत की सांद्रता के साथ हममें मौजूद होते हैं और बात-बात पर आँसू बनकर छलक पड़ते हैं. जब हँसने को बस एक छोटा सा बहाना चाहिए होता है और खिखिलाती हँसी के आगे सोना भी शर्मा जाता है, फूल अपने में सिमट जाते हैं और तारे फीके लगने लगते हैं… वो हँसी प्राकृतिक झरने की कलकल सी गूंजती है और सीनियर्स की डपट की परवाह नहीं करती…

ए लड़की, टिकट ब्लैक करती है?

हॉस्टल से हम आठ लड़कियाँ रिक्शे में लद-फँदकर मुट्ठीगंज गए टाइटेनिक देखने.. जो लोग इलाहाबाद में रह चुके हैं , वो जानते हैं कि वहाँ एक ही कैम्पस में तीन सिनेमा हाल हैं- गौतम, संगीत और दर्पण. इलाहाबाद के रिक्शे भी अजीब होते हैं. दो लोग मुश्किल से बैठ पाते हैं, पर हम तीन-तीन जन लदकर जाते थे, किराए का पैसा बचाने के लिए. ये अलग बात है कि वहाँ तक जाते-जाते एक पैर सुन्न पड़ जाता था.

संगीत सिनेमा के काउंटर की भीड़ में घुसकर किसी तरह मैंने आठ टिकट खरीदे. वहाँ की भीड़ देखकर हम कह रहे थे कि ‘देखो आजकल ऐसे सामान्य लोग भी अंगरेजी फिल्म देखने लगे हैं’ (टाइटेनिक हिन्दी डब नहीं थी). भीड़ में धक्का-मुक्की करके बाहर निकले, तो देखा उस सिनेमाहाल में तो ‘घरवाली-बाहरवाली’ लगी है, टाइटेनिक तो दर्पण में है. अब जाकर उस जेन्ट्री का राज़ समझ में आया. इत्ती मुश्किल से तो टिकट खरीदे थे… अब वापस काउंटर पर जाकर कैसे वापस करें? मैंने तो हाथ खड़े कर दिए “जिसे जाना हो जाए . मैं ले आयी, यही क्या कम है?” तभी मेरी एक सहेली ने झट से मेरे हाथ से टिकट लिए और बाहर ही लाइन वालों को बेचने लगी. उसे ये करने में ज़रा भी हिचक नहीं लगी. आखिर लेफ्टिनेंट कर्नल की बेटी थी. उसने फटाफट सारे टिकट बेच दिए और हम वहाँ से चल दिए… बाद में उसने कहा कि मुझे यही डर लग रहा था कि कहीं पीछे से हवलदार एक डंडा लगाकर ये न बोले “ए लड़की टिकट ब्लैक करती है”

आपकी आँखें

मेरी उसी सहेली साथ एक मजेदार घटना घटी. वो स्टेशन रिज़र्वेशन कराने गयी थी या कहीं और की बात है, याद नहीं. वो एक काउंटर पर खड़ी थी. थोड़ी दूर पर एक आदमी सनग्लास लगाकर खड़ा था और उसे देखकर रह-रहकर आँख मार रहा था. पर मज़े की बात बगल से आ रही रौशनी में उसकी ये हरकत दिखाई पड़ रही थी. इससे रहा नहीं गया. उस आदमी के पास पहुँची और उसके एकदम सामने जाकर खड़ी हो गयी. आधी जान तो उस आदमी की ऐसे ही सूख गयी… फिर मेरी सहेली ने पूछा, “भैया, आपकी आँख में कुछ प्रॉब्लम है क्या ?” अब सोच सकते हैं कि उस बेचारे का क्या हाल हुआ होगा?

“कॉमा”

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के सामने की सड़क ‘यू रोड’ के नाम से मशहूर है… मेरी मनपसंद जगहों में से एक. उस सड़क पर आते-जाते लड़कियों को बड़े कमेन्ट सुनने को मिलते थे. एक बार हमारे हॉस्टल की लड़कियों का एक ग्रुप उधर से निकला. उनके दोनों तरफ लड़कों के दो ग्रुप चलने लगे. एक सड़क के इस पार और दूसरा उस पार, लड़कियों का ग्रुप बीच में. लड़कों ने एक हाथ ऊपर उठाकर मुट्ठी बाँध रखी थी और अंगूठा नीचे की ओर था. वे कुछ कह नहीं रहे थे, इसलिए लड़कियाँ भी कुछ बोल नहीं रही थीं, पर समझ में नहीं आ रहा था कि लड़के ऐसा कर क्यों रहे हैं? तभी सामने से कुछ लड़कों ने उनसे पूछा कि ये क्या कर रहे हो? उन लड़कों ने जवाब दिया, ” दिखता नहीं है. इम्पार्टेंट लोग जा रहे हैं, त हमलोग कोमा लगाए हैं”

देवर सा का हॉस्टल

यू रोड पर एक हॉस्टल है एस.एस.एल. जब वहाँ से हम लड़कियाँ निकलते थे तो गेट पर खड़े लड़के भाभी-भाभी कहकर चिढाते थे. बड़ा गुस्सा आता था. हमलोगों ने उस हॉस्टल में रहने वाले अपने बैचमेट से कहा तो वो बोले कि “सीनियर्स हैं यार” फिर हमने अपनी हॉस्टल सीनियर्स से शिकायत की. उनलोगों ने अपने उस हॉस्टल के साथियों के बीच बात उठाई तो वो कहने लगे “जूनियर हैं. उनकी मस्ती के दिन हैं. करने दो.” अब हमलोगों को कुछ नहीं सूझ रहा था. आखिर हम लड़कियों ने उस हॉस्टल का नामे ही “देवर सा लोगों का हॉस्टल” रख दिया. एक दिन मैं घर से आ रही थी. बस स्टेशन से रिक्शा किया. साथ में बैग था. एस.एस.एल. के गेट पर पहुँचते ही कुछ लड़के बोले  ” का हो भौजी, कहाँ से?” मैं बोली “तोहरे भैया के ससुराल से”

गुलमोहर की छाँव

एक बार मैंने अपने दोस्त समर को हॉस्टल बुलाया. हमें स्टडी सर्किल में जाना था- लाल बहादुर वर्मा सर के यहाँ. वो तय समय से बीस मिनट लेट आया. लड़कियाँ खुद चाहे आधा-घंटा लेट हो जाएँ, पर लड़कों के लेट होने पर नाराज़ हो जाती हैं… उसका कारण भी होता है. इलाहाबाद का वूमेन हॉस्टल कैम्पस, जिसे ‘डब्लू.एच.’ के नाम से जाना जाता है, लोगों के आकर्षण का केन्द्र होता है. वहाँ खड़े होकर इंतज़ार करना एक लड़की के लिए साहस का काम होता है. … तो मैं नाराज़ होने का पूरा हक रखती थी. पूरे बीस मिनट बाद जब महाशय पैदल बेफिक्री से टहलते हुए आते दिखे, तो मेरा पारा सातवें आसमान पर था. मुझे धूप में खड़ा करके कोई मुस्कुरा कैसे सकता है… पास आने पर जले पर नमक छिडकते हुए अपनी बेसुरी आवाज़ (सॉरी समर) में एक गाना गुनगुनाना शुरू कर दिया… “साँवली सी एक लड़की, गुलमोहर की छाँव में, आरज़ू के गाँव में… इन्तज़ार करती थी” कुछ गाने किसी सिचुएशन पर कितने फिट बैठते हैं… मैंने अचानक ऊपर देखा — मैं गुलमोहर की छाँव में खड़ी थी.



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37 thoughts on “गुदगुदाने वाले कुछ किस्से

  1. आजकल आप व्यस्त बहुत हैँ, ये आपकी पिछली पोस्टोँ से पता चलता है। कुछ राहत मिली है हाल ही मेँ, यह भी पता चलता है।
    एकदम हल्के मूड मेँ ला देती है ये पोस्ट।
    भौजी और गुलमोहर के किस्से तो जैसे गूँजते हैँ यादोँ मेँ…

  2. वाह क्या मेमायर हैं ?
    हा हा हां -बहुत खूब …हम भी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़े हैं थोडा यादों की गली अब सकरी और मुंह बंद सा दिख रहा है ..मगर आपके इन संस्मरणों ने कुछ ऐसा कचोट लिया कि जारा ये भी झेल लीजिये …
    गौतम, संगीत और दर्पण की उसी फ़िल्मी त्रिवेणी में हम भी कही बार नहाए थे …एक बार हाहाकारी मसखरे दोस्तों के साथ गौतम में हम फिल्म देख रहे थे …अरे वही दिल के अरमा आंसुओं में बह गए वाली …सामने एक लेफ्टीनेंट मेजर की आकर्षक पत्नी पूरे टिप टाप से मौजूद ..अब भाई लोग कैसे चुप रहें ….छीटाकशी चलती रही ….इंटरवल हुआ …रोशनी होते ही लेफ्टिनेंट उठ खड़ा हुआ ….इनकी जिस सुन्दरता पर आप लोग लट्टू हैं उस पर हर महीने मैं दस हजार खर्च करता हूँ ..जिस साले की ***** में जूस हो इतनी रकम मुझे दे महीने महीने दे जाय मैं इन्हें हवाले कर दूं उसके …कौन दे रहा है यह महीना ….अब क्या बताएं आराधना जी सालों ने अपनी हरकत के चलते मेरी भी घिघ्घी बंधवा दी .आज भी उस घटना को याद कर रोयें खड़े हो जाते हैं …वह तो फिल्म शुरू हो गयी और बात आयी गयी हो गयी नहीं तो मुझे लग रहा था किर और साले सब भाग जायेगें मैं शराफत का बोझ उठाये वही जड़ बना रहूँगा …और कहीं वह मुझे मैडम को जबरदस्ती थमा न दे …फिल्म पूरी होने के दस मिनट पहले ही मैं वहां से धीरे से निकल चुका था …
    और हाँ एक बस में कहीं सेसभी लडकिया आती जाती थीं हम लोगों ने उसका नाम पुष्पक विमान रख छोड़ा था ..
    और यह तो विजयनगरम हाल है जिसमें मैंने कई कार्यक्रम किये …

  3. आपके किस्से पढ़ कर मुझे अपने कॉलेज के दिन याद आ गए….मेरठ भी इन सब बातों में कुछ कम नहीं…वैसे चाहे शहर छोटा हो या बड़ा किस्से हर जगह होते हैं….टिकट बेचना….अभी तक हंसी आ रही है….ऐसे ही मैंने हरे राम हरे कृष्ण के टिकट लिए थे भीड़ में घुस कर ….और किसी ने पॉकेट मार ली थी …:)🙂

  4. @ मुक्ति जी,
    अच्छे खूबसूरत संस्मरण , बस जरा गुलमोहर के नीचे वाले इंतज़ार को दुरुस्त किया जाये 🙂
    सीनियर लडके जूनियर लडकियों को भाभी कहें ये अच्छी बात नहीं है हमनें उनके लडकपन पर प्रश्न चिन्ह लगा लिया है🙂

    @ अरविन्द जी
    ओहो …मेंटिनेंस के बारे में आप बहुत पहले से जानते है🙂

  5. आपके ये संस्मरण पढ कर ढेर सारी मुस्कुराहट आ गई होंठों पर।

  6. पोस्ट की शुरूआती पंक्तियाँ तो अपने आप में एक कविता है…”खिखिलाती हँसी के आगे सोना भी शर्मा जाता है, फूल अपने में सिमट जाते हैं और तारे फीके लगने लगते हैं… वो हँसी प्राकृतिक झरने की कलकल सी गूंजती है “…बरबस ही एक वाह निकल आता है,मुख से

    और किस्से तो सारे एक से बढ़कर एक…तुम्हारा जबाब भी कम जानदार नहीं था…”“तोहरे भैया के ससुराल से” हा हा हा

  7. hey sorry aradhna wo mere bete ki id hai (kinjalk verma) usne word press par log in kiya hoga iske pahle aur maine dhyaan hi nahin diya…so sorry..

  8. पोस्ट की शुरूआती पंक्तियाँ तो अपने आप में एक कविता है…”खिखिलाती हँसी के आगे सोना भी शर्मा जाता है, फूल अपने में सिमट जाते हैं और तारे फीके लगने लगते हैं… वो हँसी प्राकृतिक झरने की कलकल सी गूंजती है “…बरबस ही एक वाह निकल आता है,मुख से

    और किस्से तो सारे एक से बढ़कर एक…तुम्हारा जबाब भी कम जानदार नहीं था…”“तोहरे भैया के ससुराल से” हा हा हा

  9. आपका संस्मरण, मुझे अपने एक साल के PCB छात्रावास निवास की याद दिला गया. वो भी क्या दिन थे. मुझे एक किस्सा याद आया, मैंने जिस साल इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया, उसके कुछ दिनों बाद छात्र संघ चुनाव शुरू हो गए . एक छात्र नेता जो कभी लडकियों से वोट नहीं मांगते थे (शर्म के मारे की लडकियों से कैसे बात किया जाय) ,अपने कुछ मित्रो के कहने पर उन्होंने पहली बार लडकियों के हॉस्टल की कदम उठाये वोट मांगने के लिए , लडकिया खुश हो गयी और उनको लडकियों के ढेर सारे वोट मिले और उनकी विजय हुई.

  10. सांवली सी इक लड़की…
    आरजू के गांव में…
    गुलमोहर की छांव में….

    ये शायद २००१ की बात है ना…. शुक्रिया साहिब… ये पोस्ट पढ़ के एक सेकंड नहीं लगा हांगकांग से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के डब्लू एच के गेट वापास आने में…

    वाह यार… तुम तो लड़की ही नहीं हो मतलब… जादूगरनी हो.

  11. पूरी दुनिया के कोलेजो में दो ही चीज़े उसकी जान होती है.केन्टीन…..ओर लडकिया….

  12. प्रवीण पाण्डेय on said:

    जीवन में इस हल्केपन की जगह बनाये रखी जाये । चिन्तायें और ऐंठन तो भूल जाती है, यही फुहार बार बार याद आती है ।

  13. बेफिक्री और शरारतों के इन दिनों की यादें हमेशा साथ चलती हैं …कॉलेज और होस्टल के कई संस्मरण याद आ गए (रिक्शे में ठंस कर फिल्म देखने जानाआदि )और कई बार गुदगुदाते हुए होठों पर मुस्कराहट ले आती है …हम तो इस उम्र में भी शरारत से बाज नहीं आते …:):)…और बेटिओं के साथ मिलकर हंसने मुस्कारने के बहाने ढूंढ लाते हैं ….

    @खिखिलाती हँसी के आगे सोना भी शर्मा जाता है, फूल अपने में सिमट जाते हैं और तारे फीके लगने लगते हैं… वो हँसी प्राकृतिक झरने की कलकल सी गूंजती है “…बरबस ही एक वाह निकल आता है,मुख से

    लेख की शुरआत बहुत ही जानदार तरीके से की है ….गद्य में भी पद्य का आभास दिलाती ….
    लड़कियों के हॉस्टल में यदि किसी लड़की का भाई मिलने आ जाये तो उसकी दुर्गति होकर रहती है …
    ”“तोहरे भैया के ससुराल से” ने बहुत हंसाया …

    रोचक मनमोहक पोस्ट …!!

  14. खूब संस्मरण है…..मजेदार…

  15. किस्से बहुत अच्छे हैं।

  16. @ अली जी,
    मैंने सोचा कि इंसान को दुरुस्त करने की बात कर रहे हैं.🙂 वैसे अब ठीक कर लिया है.

  17. Mazedaar haiN. Aapko padhar man ho aaya ki maiN bhi apne qisse likhuN. likhuNga kabhi.

  18. आराधनाजी
    मजेदार किस्से हैं।
    शीर्षक को सुधार लें “गुदगुदाने वाले कुछ किस्से के आगे बस -1 जोड़ लें। यानि यह उन किस्सों की पहली किस्त हुई।
    अगली किस्तों का इंतजार है।

  19. हा हा मस्त !! क्या मजेदार बातें हैं आराधना जी😉 मजा ही आ गया…ए लड़की, टिकट ब्लैक करती है….आँख में कुछ प्रॉब्लम है क्या ?😛😛

    और सही है, मैं भी ये महसूस करता हूँ की ऐसी बातें याद करने पे एक मुस्कान सी आ जाती है चेहरे पे🙂

  20. अच्छा लगा सारी बातें और किस्से पढकर …और भी आने दो इस तरह के किस्से🙂

  21. पिछले एक साल यहां पर न आना पाना बहुत खल रहा है, आपकी पोस्‍ट बहुत उम्‍दा है और लिखने के शैली भी, जो प्रारम्‍भ से अंत तक बांधे रहती है।

    आपकी पोस्‍ट पर इलाहाबाद की कुतुम्‍बमीनार न दिखती तो शायद ही यहाँ आना होगा, पता न था कि आपने इलाहाबाद मे समय बिताया है।

  22. हा हा हा
    बेहद ही मजेदार संस्मरण है गुड्डू दीदी.
    “तोहरे भैया के ससुराल से” और सांवली सी एक लड़की अब कुछ दिन तक दिलो-दिमाग पर छाये रहेंगे.
    सच में आपने ठहाका लगवा ही दिया.
    नाहर जी की बात सही है -१ लगा ही दीजिये.
    हम सब की यही चाह है.

  23. किस्सों में तो मज़ा आया ही लेकिन अंत में लालबहादुर वर्मा सर का ज़िक्र आने पर मन प्रसन्न हो गया । मैं इलाहाबाद में पढ़ा तो नहीं हूँ लेकिन वर्मा सर का फैन हूँ । कभी उनसे मुलाकात हो तो कहें ..

    • शरद जी,
      वर्मा सर की तो मैं भी जबरदस्त फैन हूँ. खुशकिस्मत मानती हूँ खुद को कि उनके साथ बैठकर बातें की हैं… कभी हम उनके यहाँ स्टडी सर्किल में जाते थे. अब तो बहुत भूलने लगे हैं वो तो मुझे भी भूल गए होंगे… करीब आठ साल से उनसे मुलाक़ात नहीं हुई.

  24. बहुत खूब ….. मज़ा आ गया … जैसे इलाहाबाद मेरे सामने रखा हो … इलाहाबाद के रिक्शे… मुझे हमेशा आपत्ति रही उनमे साइड मे लगी लकड़ी की मछलियों से … गौतम संगीत दर्पण… बहुत सारी फ़िल्में देखी हैं उनमें….एक बार तो मेरे साथ भी ये हुआ कि बाहर का पोस्टर देख कर टिकट ले कर घुस गया … अंदर फिल्म चली तो कोई जवानी शावानी कर के फिल्म शुरू हो गयी … इतनी बेहूदा फिल्म थी कि हमें आधे घंटे मे ही निकल भागना पड़ा … ए यू मे मेरा एक विषय साइको भी था, सो लड़कियाँ भी साथ पढ़ती थीं … और एक से एक किस्से हास्टल के शेयर करती थीं … और साइको के सामने का पार्क जो गर्ल्स होस्टल के गेट के बिलकुल पास है मनचलों की ऐशगाह होती … एक बार किसी लड़के ने डियो की खुशबू से महकती लड़की पर कमेन्ट किया … फिनिट छिड़क कर कोलेज आई हैं … लड़कियों का जवाब था … फिर भी मच्छर पीछा नहीं छोड़ते …जाने कहां से जवाब सूझता है इन्हें🙂 युनिवर्सिटी का “बन-मक्खन और चाय” हमारी फेवरिट डिश होती थी …. या फिर सविल लाइन के मालवीया के डोसे ….

    अनुरोध है इस श्रृंखला को जारी रखिये …सुंदर प्रयास है बधाई

  25. वाह जी… बस सोने जा रहे थे.. और तुम एकदम मूड फ़्रेश कर दी… सुना है वहा के लडके ’ऎ रानी, चलोगी?’ भी बहुत करते है.. मेरी एक दोस्त को एक साईकिल पर बैठे चम्पू लडके ने यही कमेन्ट मारा… वो न जाकर साईकिल पर बैठ गयी और बोली ’चलो, राजा… आज ले ही चलो’🙂 फ़िर उसकी साईकिल उठाकर एक नाले मे फ़ेक दी🙂 उसके बाद तो बेचारा अपनी बीवी को भी ’रानी’ बोलने से डरता होगा🙂

    सारे किस्से बडे मजेदार थे.. ’कोमा’ को पढकर उन लड्को की क्रियेटिविटी का आईडिया मिला…🙂 वाह जी वाह… सामूहिक क्रियेटिविटी…🙂

    पब्लिक डिमान्ड पर ’समर ’ से एक गेस्ट पोस्ट लिखवायी जाय.. उनकी नज़र से तुम्हे देखना भी मज़ेदार होगा… आखिर तुम्ही उनकी खिचाई करोगी या उसे भी डिफ़ेन्स का मौका मिले.. तो क्या बोलते हो माई लार्ड..?😛

    • तुम्हारा सन्देश समर तक पहुँचा दिया जायेगा. वहाँ के लड़के ऐसे ही होते हैं… दूर-दूर से कमेन्ट करते हैं और ज़रा सा पास जाकर खड़े हो जाओ तो घिघ्घी बंध जाती है… सब ऐसे नहीं होते…🙂 आखिर पद्म जी भी तो वहीं के पढ़े हैं.🙂
      और हाँ, मुझे भी वो कॉमा वाली घटना सबसे मजेदार लगती है… कभी-कभी लड़के ऐसी ही सामूहिक क्रिएटिविटी दिखाते हैं.

  26. मजा आ गया। बहुत सुंदर। खुद तो कभी हॉस्टल में रहने का मौका नहीं मिला लेकिन हां, हॉस्टल मेंरहने वालों से खूब पटती रही। किस्से कभी लिखेंगे।

    जैसे ही शुरु में पढ़ा कि इलाहाबादी रिक्शे में आठ-आठ लड़कियां लद के जाती थीं, मन में चौंका कि ऐसे कैसे संभव है जहां दो मुश्किल से बैठे, वहां आठ, आगे पढ़ा तो साफ हुआ कि एक में तीन। लेकिन सच कहुं तो इलाहाबाद से भी खतरनाक रिक्शे बनारस में देखे। अपने शहर में रिक्शों को देखता हूं तो कसमसा के चार आदमी बैठ ही जाते हैं। स्कूली बच्चे तो 12 से ज्यादा। सब जुगाड़ का कमाल है।

    आपको यादों के समंदर में डूबकी लगाते देखकर खुशी हुई।

  27. katghar se sangam tak …5 mint ka rasta hai ..kai picture udhar dekhe hain hum … han lekin ticket kabhi black nahi kiye…heheh….aur wo comma wala kissa to sabse mazedar tha… main to kisi kahani me churaunga ye thought …hehehe… halki fulki post padh kar maza aa gaya..

  28. प्रमोद यादव on said:

    एसएसएल का गेट और यूनिवर्सिटी रोड पर चाय दोनों याद आ गये… इस जिंदगी की भागमभाग में से चैन के दो पल छीन कर देने के लिये आपका धन्यवाद… अच्छे दिन थे ..

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