आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

ओढ़े रात ओढ़नी बादल की

मैं अक्सर जो सोचती हूँ, कर डालती हूँ. कुछ समय से दिल्ली से मन ऊबा था. आठ महीनों से कहीं बाहर नहीं निकली थी. गर्मी ने और नाक में दम कर दिया… मन हुआ कहीं दूर बादलों की छाँव में चले जाने का, तो निकल लिए बाहर. दस घंटे का बस का सफर करके नैनीताल पहुँचे. इरादा तो रानीखेत जाने का था, पर नैनीताल में अधिक बारिश होने लगी, तो इरादा बदल दिया. आखिर जान तो प्यारी है ही ना… अपने पास कैमरा नहीं है, तो मोबाइल कैमरे से ही कुछ फोटो खींचे.

एक कविता भी लिख डाली…

…कविता क्या है…? कुछ काव्यमय पंक्तियाँ हैं… या पता नहीं… कुछ उसके जैसा ही …

… … … …

ओढ़े रात ओढ़नी बादल की

करती है अठखेलियाँ

पहाड़ों की चोटी पर,

चाँदनी से करने आँखमिचौली

छिप जाती है पेड़ों के झुरमुट में,

देखती है पलटकर

उसकी मेघ-ओढ़नी

अटक गयी है देवदार की फुनगी पर

और छूटकर  उतर रही है

धीरे-धीरे घाटी में.


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43 thoughts on “ओढ़े रात ओढ़नी बादल की

  1. सुंदर पोस्ट।

    “पॉल बाबा का रहस्य आप भी जानें”:

    http://sudhirraghav.blogspot.com/

  2. अच्छा रहा रात की मेघ-ओढ़नी का जहां – तहां फोटुओं में दिखना-छुपना !

  3. अरे वाह ..बचपन याद दिला दिया तुमने मुक्ति !…रानीखेत भी जाना चाहिए था न ..खैर कोई बात नहीं अगली बार सही.
    बहुत सुन्दर फोटो हैं.

  4. देखती है पलटकर
    उसकी मेघ-ओढ़नी
    अटक गयी है देवदार की फुनगी पर
    और छूटकर उतर रही है
    धीरे-धीरे घाटी में.
    Beautiful poem and pictures.

  5. ओढ़े रात ओढ़नी बादल की
    करती है अठखेलियाँ
    सुन्दर बिम्ब
    और फिर मोबाईल कैमरे के चित्र सुन्दर हैं

  6. आह!! कविता बहुत खूब कही…..और मनभावन तस्वीरें..

  7. रूमानी मौसम की रूमानी कविता …. चित्र के बगल से झाँक रही टहनियाँ तो गज़ब ही हैं ….

  8. मेघ-ओढ़नी
    अटक गयी है देवदार की फुनगी पर
    कविता को मौसम और चित्र सम्पूर्ण बना रहे हैं …!
    सुन्दर पोस्ट !

  9. बहुत अच्छी जगह है…मेरा भी दिल है ऐसी ही कोई जगह जाने की…जहाँ थोड़ा वक्त सुकून से बिता सकूँ
    कविता बहुत अच्छी है🙂

  10. प्रवीण पाण्डेय on said:

    मन की आवारगी को कब तक ड्रॉइंग रूम में सजाईयेगा। फोटो में विस्तृत आकाश की तरह फैला है मन। समेटने का प्रयास छोड़ इसके अन्तर में सिमट जाईये।

  11. अच्छा किया जो आप एकरसता तोड़ आईं ! …

    पर जो फोटोग्राफ्स आपने लगाये हैं उनमें से झील के किनारे वाले को छोड़ भी दूँ तो बाकी के सारे मुझे उदास कर गए इन्हें देखते हुए अन्दर कहीं दुःख / अवसाद / विछोह / एकाकीपन / गहन सन्नाटा सा पसर गया है !

  12. मैं जब किसी पहाड़ी(hill station) पर जाता हूँ, मुझे घंटों कहीं अकेले चुपचाप बैठने का मन करता है.. वहाँ के बाजार या व्यू प्वाइंट से बेहतर मुझे किसी पत्थर पर बैठना लगता है..

  13. Khoobsurat……donon……photos bhi aur kavita bhi

  14. निहत्थे हो गए। ज़बान चुप। होश गुम। घुमक्कड़ी मेरा नैसर्गिक मिज़ाज नहीं है, मगर नैनीताल जाने को मैं कभी भी तैयार रहता हूँ। नैनीताल से ज़्यादा रोमाण्टिक जगह मुझे कोई और नहीं लगी। घूमा हूँ – देश के तो लगभग सारे पर्वतीय पर्यटनस्थल। नैनीताल मुझमें बसा है – या फिर गंगोत्री का मार्ग – उत्तरकाशी से । नैनीताल मुझे अट्ठारह बरस का कर देता है – गुम! आपकी कविता अच्छी है – मगर अभी मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा। हर नैनीताल यात्रा पर अपना दिल वहीं छोड़ आता हूँ – फिर कुछ क़तरे जमा होते हैं ख़ूँ के – कुछ दिल सी शक़्ल अख़्तियार करते हैं – फिर हिम्मत जुटा के चला जाता हूँ। मेरी जान चाहे कहीं भी निकले – रूह जाएगी ज़रूर – कुमाऊँ-नैनीताल। अत्याचार…

  15. मोबाईल से ही सही…लेकिन चित्र तो एकदम बढ़िया है…..।

    देखती है पलटकर
    उसकी मेघ-ओढ़नी
    अटक गयी है देवदार की फुनगी पर

    वाह…शानदार पंक्तियां।

  16. बोट्स वाली फोटो अपने आप में ही एक कविता है..
    और हाँ सोचकर.. कर डालने वाली फिलोसोफी अपनी फिलोसोफी से मेच खाती है

  17. कविता और चित्र दोनो ही बहुत ही सुन्दर्।

  18. ओह!! क्या ख़ूबसूरत तस्वीरें हैं…और शानदार कैप्शंस.

    अभी शिरडी गयी थी….रास्ते में ऐसा ही मौसम बिखरा पड़ा था..मन हो रहा था, कार से उतर कर पैदल चल दूँ…तस्वीरें फिर से बुला रही हैं,जैसे.

    कविता बिलकुल कॉम्प्लीमेंट कर रही है..इन तस्वीरों को और उस मौसम और मूड को भी.

  19. बस एक किरण का इंतज़ार है …तमस दूर हो जायेगा !

  20. muaafi der se pahuchne ke liye (aajkal bas yahi line pahle likh raha hu) 😉

    beautiful…… pics n the all post,kavita bhi….. tasveerein bhale se camera se na ho lekin sundar hai…..
    mai khud bhi mobile se hi tasveerein leta hu har jagah. kabhi mauka mila to in jagaho par khud hi pahuchna chaunga …

  21. Good Morning Aradhana D!
    wakae ye kuch khas tha.

  22. इतने सुन्दर दृश्यों की अभिव्यक्ति यदि कविता में न हो तो ऐसा भ्रमण किस काम का । यह ज़रूरी है ज़िन्दगी के लिये ।

  23. यार ये काम तुमने सही किया.. एक तो घूम आयी और जलाने के लिये इतनी खूबसूरत फ़ोटोस भी लगा दी..😦 बहुत प्यारी फ़ोटोस आयी है…

    हमको भी घूमना है.. पूरा इन्डिया घूमना है एक बाईक से :। .. पता नही कब..

  24. कविता तो बहुत ही अच्छी लिखी है ..चित्र मोबाइल से लिए हैं वैसे ही हैं ..मालूम हो रहा है कि खूब अच्छा मौसम रहा होगा.

    नैनीताल रानीखेत मेरी भी घूमी हुई जगहें हैं..बेहद बेहद खूबसूरत !

  25. अच्छा है घूमना हो गया।मुझे पिछले साल की नैनीताल यात्रा याद आ गई।

  26. शरद जी, हम तो बादलों के बीच भी चले…बड़ी सुरम्य वादियों की सैर भी की…पर कविता में तो कुछ भी अभिव्यक्ति नहीं हुआ…गद्य ही लिख मारे….फिर हमारा भ्रमण किसी काम का नहीं??😦😦

  27. चलिए हम भी इन चित्रों के माध्यम से नैनीताल घूम लिए ….. बहुत सुन्दर चित्र खींचे हैं और काव्यमय प्रकृति वर्णन तो बहुत ही सुंदरता से किया है….गर्मी में ठंडक का एहसास करा दिया …

  28. देखती है पलटकर
    उसकी मेघ-ओढ़नी
    अटक गयी है देवदार की फुनगी पर
    और छूटकर उतर रही है
    धीरे-धीरे घाटी में.
    … Nanitaal do baar gayee thi.. sach mein vihagam drashya hai hai wahan ke.. aapne kavita ke madhaya se aur mobile camare se sundar chitra prastut kiye hai.. …. abhi 2 din pahle hi pahad se lauti hun …aur yaad taajee kar dee aapne …

  29. देखती है पलटकर
    उसकी मेघ-ओढ़नी
    अटक गयी है देवदार की फुनगी पर
    और छूटकर उतर रही है
    धीरे-धीरे घाटी में.

    waah …kitni pyari image hai ye … gulzar sab ki ek nazm me …peela chaand peepal ke patte ki tarah toot kar aangan me utarta hai ..wo nazm yaad ho aayi ….

  30. वाह! मैं सोचती ही सोचती हूँ करती नहीं। कम से कम पहाड़ जाने के मामले में तो! कब से नहीं गई।
    घुघूती बासूती

  31. आराधना जी आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आई हूँ ………..बहुत अच्छा लगा …….आपके ब्लॉग का अनुसरण करना चाहती हूँ पर विजेट नही मिल रहा है

  32. पिंगबैक: 2010 in review | Aradhana-आराधना का ब्लॉग

  33. संजय भास्कर on said:

    बहुत ही सटीक भाव..बहुत सुन्दर प्रस्तुति
    शुक्रिया ..इतना उम्दा लिखने के लिए !!

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