आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

मैं प्यासी

जब घुमड़ घिरी घनघोर घटा

रह-रहके दामिनी चमक उठी,
उपवन में नाच उठे मयूर
सौंधी मिट्टी की महक बिखरी,
बूँदें बरसीं रिमझिम-रिमझिम
सूखी धरती की प्यास बुझी,
पर मैं बिरहन प्यासी ही रही…
… … …
ये प्रकृति का भरा-पूरा प्याला
हर समय छलकता रहता है,
ऋतुओं के आने-जाने का
क्रम निशदिन चलता रहता है,
सारे के सारे तृप्त हुए
प्याले के अमृतरस को पी,
मैं प्यासी थी, प्यासी ही रही…
… … …
वो मिलन अधूरा मिलन रहा
वो रात अधूरी रात रही,
कुछ भी ना, कहा कुछ भी ना सुना
वो बात अधूरी बात रही,
वो मुझसे कुछ कहते शायद
मैं तो सुध-बुध थी खो बैठी,
मैं प्यासी थी, प्यासी ही रही…
… … …
ये कैसी ठंडी आग है जो
तन-मन में जलती रहती है,
ना मुझे समझ में आती है
ना किसी से कहते बनती है,
जब-जब भी बुझाना चाहा है
ये और बढ़ी,मैं और जली,
मैं प्यासी थी, प्यासी ही रही…
… … …
रातों में बंद पलकों से
ये यूँ ही रिसते रहते हैं,
मैं जानना चाहती हूँ लेकिन
जाने आँसू क्या कहते हैं,
इनके यूँ बहते रहने से
मौसम भीगा, मैं भी भीगी,
मैं प्यासी थी, प्यासी ही रही…
… … …
जलने की चाह रहे यूँ ही
ये प्यास, प्यास ही बनी रहे,
उनसे मिलकर ना मिलने की
ये आस, आस ही बनी रहे,
अपने अंतस की पीड़ा को
मन ही मन में, मैं सहती रहूँ,
मैं तो बस यही चाहती हूँ
मैं प्यासी थी, प्यासी ही रहूँ… …

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34 thoughts on “मैं प्यासी

  1. मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति आराधना ..बहुत सुन्दर लिखा है.

  2. बहुत सुन्दर व भाव पूर्ण रचना है बधाई स्वीकारें।

  3. It confirms my view that you are a good poet.

    The accompanying pic has increased the depth of poem.

    The poem also reminds me of the popular song sung by Ashaji from movie Ijaazat ” “Katra Katra Milti Hai Katra Katra Jeene Do, Zindagi Hai Zindagi Hai Behne Do Behne Do, Pyaasi Hoon Main Pyaasi Rehne Do, Rehne Do Na”.

    Lastly, the rigidity that you have depicted in the last verse in my eyes has done more harm than good to you. Plz try to be more polite towards one’s being.That’s my humble suggestion.Don’t take it otherwise.

    Arvind K.Pandey

    http://indowaves.instablogs.com/

  4. अश्रु लिखित कविता, धन्‍यवाद.

  5. ऊपर की कुछ पंक्तियाँ तो बचपन में पढी श्याम नारायण पाण्डेय की वह ओज कविता स्मरण करा गयीं
    सावन का हरित प्रभात रहा
    मन हरती थी बन मोर छटा
    घहरा कर पंख थिरकते थे …
    ………………………….. ऊँ ऊँ भूल गया..
    कविता की भाव भूमि से तादात्म्य हुआ ….ऐसा ही होता है …
    जहां प्यास खत्म हुयी ..जीवन ख़त्म हुआ …मोक्ष भले मिल जाय किन्तु यहाँ कवयित्री के लिए मोक्ष अभिलषित नहीं है ,वह प्रत्येक मिलन को ही मोक्ष मानती है -सुन्दर अभिव्यक्ति -शिल्प पर मेहनत कम हुयी है -प्राचार्य जन बताएँगे ही …

    • आचार्य जनों ने तो मेरे इस ब्लॉग पर आना ही छोड़ दिया है, लगता है कि समझ गए कि इस पर मेहनत करना बेकार है. 🙂

    • खूबसूरत कविता !
      मैंने अक्सर कहा है कि आराधना जी अनायास, अहेतुक – अभिव्यक्ति से विवश होकर जब अभिव्यक्त होती हैं, तो प्रभावी रचनाएं उपस्थित होती हैं ! कुछ सोचकर, बनाकर प्रस्तुत कर दी गई कविताओं में कई झोल मिलते रहे हैं मुझे…यद्यपि उनकी प्रस्तुति (बनावट-बुनावट) पर श्रम किया गया होता है…पर तनिक जबरदस्ती दिख ही जाती है कविता के साथ !

      यहाँ प्रवाह है…प्रशंसा योग्य लय भी…बनावट में तनिक बेरुखी भी चलेगी !
      सुन्दर प्रविष्टि का आभार !

  6. महेश सिन्हा on said:

    आचार्यों का नाम घोषित किया जाए

  7. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण कविता लिखी है।
    घुघूती बासूती

  8. कुछ दिन पहले कुछ पीने को ढूंढ रही थी जिसमे अल्कोहल ना हो, वह ठंडा ना हो, उसमे निम्बू ना हो, और भी जाने क्या-क्या ना हो.. लगता है अभी तक मिला नहीं है.. 🙂

    अभी बस शीर्षक पढ़े जा रहे हैं, रात में आते हैं फिर से.. कविता समझने और पढ़ने..

  9. अहा यहां तो आचार्य जी की खिंचाई चल रही है !
    मेहनत से जी चुराने वाले आचार्य जी 🙂

    बडी सुन्दर और भावपूर्ण अभिव्यक्ति है !

  10. [रातों में बंद पलकों से
    ये यूँ ही रिसते रहते हैं,
    मैं जानना चाहती हूँ लेकिन
    जाने आँसू क्या कहते हैं,
    इनके यूँ बहते रहने से
    मौसम भीगा, मैं भी भीगी,
    मैं प्यासी थी, प्यासी ही रही…]

    अपने आप में एक पूर्ण कविता बना देती हैं उपरोक्त्त पंक्त्तियाँ

  11. ये क्या बात हुई…
    जब-जब दिन की बात की गई…
    तब-तब रात हुई…ये क्या बात हुई…

    पता नहीं…क्यूं ये पंक्तियां याद हो आई….

  12. ओह हो, तो ये बात है तभी मै समझूं कि आजकल गायब कहां है आप । कविता के बारे में क्या कहूँ, शायद विरह की वेदना है । दिल तक ुतर गयी आपकी ये रचना सच। बहुत अच्छा लिखा है आपने, आप ऐसा भी लिखती हैं मुझे तो आज पता चला ।

  13. beautiful….

    aisa lekhan aur aisi kavita, aapke dwara likhi hui, pahli baar padhaa, vakai….

    shubhkamnayein…

  14. … … …
    रातों में बंद पलकों से
    ये यूँ ही रिसते रहते हैं,
    मैं जानना चाहती हूँ लेकिन
    जाने आँसू क्या कहते हैं,
    इनके यूँ बहते रहने से
    मौसम भीगा, मैं भी भीगी,
    मैं प्यासी थी, प्यासी ही रही…

    सुंदर रचना ………

  15. प्रवीण पाण्डेय on said:

    कल इस पर टिप्पणी दी थी, पता नहीं क्यों नहीं आयी।
    कविता की लय अप्रतिम है, भाव गहराई की थाह लिये हुये। बहुत दिनों बाद इतनी सुन्दर कविता पढ़ी है।
    बस इतना बता दीजिये कि कविता पहले की लिखी कि अभी की बजात्मक प्रतिक्रिया है?

    • प्रवीण जी, ये कविता सात-आठ साल पुरानी है. बस ऐसे ही एक पुरानी डायरी पर नज़र पड़ी, तो लगा कि पोस्ट कर दूँ, बस. ये कोई प्रतिक्रिया नहीं है सच्ची 🙂

  16. हमेशा की तरह …….. बेहतरीन रचना….

  17. बहुत ही सुन्दर कविता है..
    शब्दों का ताल मेल बड़ा ही सुन्दर.लय अच्छी बनी है.

    मेरे विचार में …..कुछ आस,कुछ प्यास,कुछ पीड़ा ,कुछ कसक बची रहनी चाहिये तभी खुद के होने का अहसास बना रहता है..

  18. मुक्ति का नया अंदाज …कुछ कुछ मुक्ति सा ….
    अच्छी लगी कविता …!

  19. bahut he khubsurat

  20. जलने की चाह रहे यूँ ही
    ये प्यास, प्यास ही बनी रहे,
    उनसे मिलकर ना मिलने की
    ये आस, आस ही बनी रहे,
    अपने अंतस की पीड़ा को
    मन ही मन में, मैं सहती रहूँ,
    मैं तो बस यही चाहती हूँ
    मैं प्यासी थी, प्यासी ही रहूँ… …

    बहुत अच्छी रचना है …. भाव, शिल्प, और शब्द चयन तीनो दृष्टि से …. फिसड्डी आने का एक सुख तो है कि बेहतरीन रचना के साथ टिप्पणियों का रस भी मिल जाता है …. फिलहाल मै तो तृप्त हुआ …. बधाई

  21. सुन्दर है। अच्छा है।

  22. wah kya baat hai ………hridaysparshi kavita

  23. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति. आभार.

  24. रातों में बंद पलकों से
    ये यूँ ही रिसते रहते हैं,
    मैं जानना चाहती हूँ लेकिन
    जाने आँसू क्या कहते हैं,
    इनके यूँ बहते रहने से
    मौसम भीगा, मैं भी भीगी,
    मैं प्यासी थी, प्यासी ही रही…
    …बेहतरीन अभिव्यक्ति

  25. बहुत सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति है !

  26. जलने की राह रहे यूँ ही
    यह प्यास प्यास ही बनी रहे
    …..वाह ! क्या बात है !

  27. बहुत ही सुन्दर लिखा है आप्ने ………………पध्कर बहुत ही अच्छ लगा………बधाई

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