आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

मौत की खामोशी की धुन

अन्तर्जाल की दुनिया… एक आभासी संसार. किसी-किसी के लिये दुनिया से भागने की सबसे अच्छी जगह है ये…पर खुद से भागना हो तो? कोई जगह ही नहीं है, आदमी खुद से भाग ही नहीं सकता, कहीं भी नहीं, कभी भी नहीं. तो करें क्या, जब ये दुनिया बेमानी लगने लगे…कहाँ जायें, जब खुद अपने ही भीतर एक गहरा अकेलापन डराने लगे…??? अपने से डरा हुआ इंसान कितना अकेला होता है… कितना अकेला… हवाओं में भी शोर सुनायी देने लगता है…सन्नाटा लुभाने लगता है…कोई कहता है…
ए हवा, सुन !
उसके पास से धीरे से गुजरना
वो अपने टूटे सपनों को
उम्मीद के धागों से बुन लेना चाहती है
उसे बुनने देना,
ज़िन्दगी के पुराने एलबम में पड़ी
कुछ धुँधली तस्वीरों को
चुनने देना,
तेरी सरसराहट से नहीं सुन पायेगी
वो मौत की खामोशी की धुन
उसे सुनने देना,
उसके पास से धीरे से गुजरना…
… … …
दुख जब हद से गुजर जाता है, तो उसकी आदत पड़ जाती है, उसके बिना अच्छा नहीं लगता… मुझे भी पड़ गयी है… जब कभी वो मुझको अकेला छोड़ जाता है, तो डर जाती हूँ… अकेलेपन से डर लगता है, या दुख के होने से, या ना होने से… कुछ नहीं मालूम… पर अक्सर मैं सबके बीच अकेली पड़ जाती हूँ. दोस्ती, प्यार, स्नेह सब है, पर कुछ भी नहीं… मैं सबका हिस्सा हूँ और नहीं भी… मैं सबके साथ हूँ और नहीं भी… मैं सबके लिये हूँ, पर मेरे लिये??? कोई नहीं.
जब इंसान अंदर से अकेला होता है, तो उसे कोई बाहरी चीज़ बहला नहीं सकती… खुश नहीं कर सकती… कुछ अच्छा नहीं लगता… जो नहीं जानता इस अकेलेपन को, वो समझ भी नहीं सकता और जो महसूस करता है, वो समझा नहीं सकता… मौत की खामोशी की धुन सुनने को दिल करता है… काश कोई दूसरी दुनिया होती… जहाँ कोई भी हमें नहीं जानता… मरने के बाद वापस आया जा सकता, तो एक बार ज़रूर मौत को गले लगा लेती, और तब देखती कि किसी को फ़र्क पड़ता है मेरे होने या ना होने से???
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32 thoughts on “मौत की खामोशी की धुन

  1. ऐसी स्थिति में कुछ दिन के लिए जीवन जीने के तरीके को बदल लेना चाहिए / देश – काल के साथ साथ निकट लोगों से भी कुछ दिनों की दूरी जिंदगी को अच्छे तरीके से जीने में कारगर होती है / कोशिश कीजिये /

  2. अनाटामी आफ लोनेलिनेस ….यह क्या हुआ ?
    जानती हैं किसी कवि की ये पंक्तियाँ सहसा मन में कौंध आयीं –
    रिश्ते नातों से तो अच्छा अपने घर का सूनापन है …
    बहरहाल गहरेसंवेदित करती यह कविता व्यथित सी कर रही है ..
    चीयर अप 🙂 अकेली नहीं हैं आप -कितने लोग तो हैं आपके साथ …और यह नाचीज भी …

  3. पिछले कुछ समय से ऎसा ही कुछ महसूस कर रहा हूँ… तुम्हारा एक एक शब्द जैसे जिया-जिया सा लगा…
    मैं भी प्रयोगों में लगा हूँ.. और ज़िन्दगी ज़िन्दगी कम, प्रयोगशाला ज्यादा बनती जा रही है..

  4. प्रवीण पाण्डेय on said:

    अकेलापन तब तक स्वीकार नहीं करना चाहिये जब तक उसके लिये जीवन तैयार न हो। यदि हृदय मजबूत न हो तो काट डालता है अकेलापन।

  5. स्वीकार कर लो सबकुछ एक ही पल में, वरना अपनी हीं संवेदनाओं के तीखेपन से कटती चली जाओगी | व्यक्ति और रिश्तों की तरह जिन्दगी सिर्फ उसकी सम्पूर्णता में ही खूबसूरत है, टुकड़े- टुकड़े में बंटते चले जाने में नहीं !

  6. कहते हैं जब गीदड़ की मौत आती है, तो शहर की ओर भागता है…
    इसका मतलब कुछ भी हो…

    आप इसे काम ले सकती हैं…इसमें भागना…मौत…दोनों चीज़ें है….जिनका जिक्र आपने बेसाख़्ता किया है…

    यानि जब ख़ुद से भागना हो….तो आप समाज की ओर भागिए….

  7. aap sayad jindgi or mout ke bich ki jo duri hai,vhi ho aaj kl. jindgi se dur jane pr mout hi milti hai,or vha se vapasi ka koi rasta nhi hai.ye akelapn sachmuch me aap ko andr se todta hai,or ese samjhane ke liye hmare pas sabd nhi hote,en aansuo ki koi vjh v nhi hoti……..es sb ke vabjud v hm apne liye jiye,sirf or sirf apne liye,apni khusi apne aansu,apni hansi,apni udasi,or ha duniya es khalipn ko kvi bhar nhi skti.ese hme hi jhelna or jina hai.jine me visvash kro.

  8. दिल बहलाओ..इतना अकेलापन हाबी हो, यह अच्छा नहीं.

  9. कुछ, काफी कुछ तो अपनी ही बात लग रही है, खैर,

    मेरे कुछ बड़े बुजुर्ग या सीनियर ऐसा कहते आये हैं की जब में मन में ऐसे ख्यालात आये तो समझ जाओ की संगत बदलने की जरुरत आ गई है….. लेकिन सच कहूँ तो न ही अपनी ऐसे विचारों को खुद गंभीरता से लिया ना ही संगत बदलने वाली सलाहों को.
    टेंशन नई लेने का.

  10. इस बात में ही संतुष्टी कर लीजिए कि इस अकेलेपन से जूझने वालों में आप अकेली नहीं हैं। एक पूरा कारवां है जो इस अकेलेपन की सलीब कंधों पर लादे जिन्दगी का सफ़र तय कर रहा है और खुद से भी भागने की नाकाम कौशिश कर रहा है

  11. प्रिय आराधना ,
    मैं ये तो नहीं कह सकता की मेरा दुःख आपसे कितना ज्यादा हैं पर इतना तय हैं की आपको फिर भी कुछ उम्मीद तो होगी यहाँ तो सब रस्ते बंद हैं .कितनी बार उस परम पिता के सामने रो लिया गिडगिडा लिया की अब मेरी झेलने की ताकत नहीं . इतने पोस्ट भी डाले की शायद किसी और के रूप में आकर मदद करे पर कुछ फायदा नहीं हुआ . आपकी इस पोस्ट पर बधाई कहना तो मूर्खता होगी बस ये ही सोच लीजिये की आधी सी जिंदगी तो बीत गयी आधी सी और दुःख में बीत जाएगी . फिर और उदास होना हो तो मेरी कुछ पुरानी पोस्टे पढ़े आपका दुःख कम हो जायेगा
    पहली : जिंदगी में सब इतना ख़राब लगता हैं की जीने का मन नहीं करता
    http://saralkumar.blogspot.com/2010/04/blog-post_03.html
    दूसरी :हरि चरणों में अंतिम प्रार्थना
    http://saralkumar.blogspot.com/2010/03/blog-post_25.html
    तीसरी : मन को लेकर प्रार्थना
    http://saralkumar.blogspot.com/2010/03/blog-post_24.html
    — वैसे तो मेरे ब्लॉग पर दुखी करने वाला सारा मसाला हैं , सारी कविताये आत्महत्या को प्रायोजित सी करती महसूस करती हैं पर आपकी पोस्ट को देखते हुए तात्कालिक तीन पोस्ट ही पढना ठीक रहेगा .
    आपका सहृदय
    वीरेन्द्र
    !! श्री हरि : !!
    बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

  12. डण्डे से पीटिये अकेलेपन को !

  13. इस अकेलेपन को अपनी ताकत बनाओ इससे भागो मत और ना ही इसे खुद पर हावी होने दो………………किसी नव सृजन मे लगाओ फिर देखना यही अकेलापन आपका सबसे बडा दोस्त साबित होगा।

  14. अकेले होना जब तक एकाकीपन में न बदले, तभी तक अच्छा।मगर, यह भी सही है – कि जिसने सही है, वही जाने कि सहना क्या होता है। दोस्ती फ़िल्म का गीत भी अन्तत: है आशावादी ही – कि “राही मनवा दु:ख की चिन्ता क्यूँ सताती है? दु:ख तो अपना साथी है!”

  15. उम्मीद है यह पोस्ट एक लम्हे की उपज होगी…और अब वो लम्हा गुज़र गया होगा…और फिर ना ले अपनी गिरफ्त में..यही कामना है.

    आभासी दुनिया , वास्तविक दुनिया से जरा भी अलग नहीं..बल्कि यह अपने आवरण विहीन रूप में ज्यादा क्रूर है. जो वास्तविक जीवन से भाग कर इसकी पनाह में आते हैं…वे सबसे बड़ी भूल करते हैं और फिर चोट खाते हैं…इसे एक एक्सटेंशन मानना चाहिए.
    और रही अकेलेपन की बात वो अपने मन के भीतर होती है…और उसे कोई भी दूसरा नहीं हटा सकता..so cheer up…get busy…and take life full head on. ..peechhe peechhe ghomegi zindagi….All the Best.

  16. ये सोच अकेलेपण की उपज के अलावा कुछ नहीं.. एक ही कमरे में या एक ही तरह का जीवन जीने से ये सब लगता है.. एक बार बाहर निकालिए.. दुनिया को देखने का नजरिया बदलिए.. दिल्ली से बाहर जाइए कहीं. सब अच्छे नहीं ये ठीक है, पर सब बुरे भी नहीं हैं.. या फिर ज्यादा नहीं तो किसी बाग़ में जाके बुद्ध को पढ़िए, जिद्दू कृष्णमूर्ति को या ओशो को पढ़िए..

  17. आराधना ,

    तुम तो ऐसी न थीं ….कभी कभी होता है की इंसान को अकेलापन खाने लगता है …पर इंसान में वो ताकत है की हर परिस्थिति का सामना कर लेता है …

    ए हवा, सुन !
    उसके पास से धीरे से गुजरना
    वो अपने टूटे सपनों को
    उम्मीद के धागों से बुन लेना चाहती है
    उसे बुनने देना

    यही पंक्तियाँ जीवन में हौसला लाती हैं ….शुभकामनाओं के साथ ..

  18. अधिकाँश पोस्ट पढता हूँ, पर हर बार सन्देश या उदगार नहीं लिखता.
    अक्सर महत्वकांक्षी और स्वाभिमानी व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों से दो-चार होते रहते हैं… मैं भी होता हूँ और बहुत से लोग होते हैं.
    किसी विशेष उद्देश्य के लिए अकेलापन सहायक होता है, इस अपने लाभार्थ सिद्ध भी करना चाहिए. प्यार अपनत्व का नैसर्गिक महत्व है इसलिए रिश्ते का अपना महत्व है.
    “सब कुछ यहीं है और कुछ भी यहाँ नहीं है” ये एक मानसिक स्थिति मात्र है. और इस स्थिति में कायम रहना हमारे सोचने की आवृति पर निर्भर है…. 🙂 🙂

    फिलहाल मैं “बरसात” का मजा लेने की कोशिश कर रहा हूँ ये तब है जब दो महीने बाद की कोई सोलिड योजना नहीं है फिर जिंदगी मुझसे प्रश्न करेगी… तुम कहाँ जाने के लिए निकले थे अभी कहाँ हो? क्या फर्क पड़ता है जब उदासी को दूर फेंकने के उपाय है हाथ में.

    सुलभ

  19. अरे ये क्या हो गया तुम्हें ? हम तो सोच रहे थे कि पढाई में लगी हो ….होता है ऐसा होता है ..ठीक कह रहे हैं सब ..थोडा बाहर निकलो .ऐसा करो यहाँ आ जाओ 🙂 थोडा हवा पानी बदलेगा तो मन भी बदलेगा ..

  20. जिंदगी की लड़ाई/उलझने जटिल हों तो उसे हक्का-बक्का शांति से
    देखते रहें, जहां तक वह रहे…फिर अगर वह ज़्यादा रहे तो आदत में
    तब्दील हों जाए…
    और आसान लड़ाइयां तो आराधना हँसते-खेलते जीत सकती है.

    एक रशियन कहानी बहुत पहले पढ़ी थी,
    शून्य से भी बहुत- नीचे की डिग्री के तापमान वाले रशियन इलाक़े-प्रदेश की…
    वहां के एक पेड़ कि कहानी है. घना विस्तृत खिला-खिला गोल तने वाला पेड़,
    वहां कि जान लेवा बर्फानी ठंड में ऐसे सिकुड़-सिमट जाता है, मानो
    सुफैद बर्फ की छोटी सी पहाड़ी हों…! उस में रची-बसी जीव-श्रृष्टि
    भी अंदर ही अंदर सुकडी-सिमटी सी बेजान पड़ी रहती है…
    पर जब ये वीरान सायँ-सायँ करते अनहद ठंडे दिन और रात खत्म होते
    है, ग्रीष्म के आगमन के साथ…तब ! तब, यह पेड़ अपनी पूरी
    जिजीविषा लिए हरहरा कर खिल उठता है, निखरता उठता है…
    सौम्य प्रकाश में, किटक-पंखियों कि श्रृष्टि और उनके कलशोर में
    पेड़ जीवंत हों उठता है, दमक उठता है…अपना खोया यौवन पता है.
    कहानी के वैसे सुंदर वर्णन का विस्तार अब यहाँ मुश्किल…

    कहने का तात्पर्य यह की, चलता रहता है सबकुछ…
    जीते रहे, ज़िंदा रहे, ज़िदगी जीने के कई रास्ते, दृष्टिकोण भी मिलते ही रहेंगे…
    मुमकिन है, जो हमें रास आ जाए वह दृष्टिकोण, वह रास्ता मोड़ के कुछ
    आगे ही हों…वैसा देखा-जाना भी है.

  21. मृत्यु केवल सजीवों का गुणधर्म नहीं इस अर्थ में
    कि इच्छाओं और सपनों का मर जाना भी मौत है
    डरना चुप रहना कुछ न करना भी इसमें शामिल
    और मान भी लिया जाए यह अपनी सहजता में
    तो अर्थ क्या फिर निर्जीव की मौत का
    दिल बहलाने वाली हैं आत्मा- परमात्मा के जीवन मृत्यु की बातें
    यह श्मशान का वैराग्य है जीवन से भागे मनुष्य के जीवन में

    और जीवन भी कोई गोलगप्पा नहीं
    जिसे आप पुदीने की चटनी मिले जलजीरे में डुबोएँ
    और परम संतृप्ति के भाव में गप से खा जायें
    अपनी अजीब-अजीब परिभाषाओं में जीवित है यह
    जीने की उत्सुकता और संभावनाओं से भरा जीवन
    विश्वास के झुटपुटे में निकलता है टहलने
    खुशी की खोज में भटकते हुए पाता है किसी रोज़
    स्थिर बिम्ब में ठहरे अस्थिर जीवन का एक बिम्ब
    (शरद कोकास की लम्बी कविता “पुरातत्ववेत्ता ” से एक अन्श )

  22. हम नक् कटे तुम्हारे बिना बुलाए तुम्हारे ब्लॉग पर आ ही जाते हैं…
    शर्म आती है मगर…

    तुमने “आह !” भरी – और कितने दोस्त दौड़े चले आए !
    ये सब देख अच्छा लगा…

    तन्हाई और अस्तित्व एक दूसरे में गुंथे रहे,
    यह मजबूरी नहीं, कृतग्न भाव रहे…

    गुलज़ार जी का एक नगमा है :

    अपनी तन्हाई का औरों से न शिकवा करना
    तुम अकेले ही नहीं और भी अकेले हैं.
    ये अकेला सफ़र नहीं गुज़रा…
    (अकेला सफ़र न था, काफी राज़दां साथ थे)

    ‘मित्र Deepak ‘मशाल जी’ के suggestion क़ाबिले
    acceptable है,,,

  23. मुझे आपका लिंक गूगल पर सर्च करते हुए मिला ।
    मैने आपका ब्लोग पढा. अच्छ लगा. लिखते रहिये. एक शेर कहना है

    इस दौरे तरक्की के अंदाज निराले हैं
    जहनों में अन्धेरे हैं, सड़कों पे उजाले हैं

    उस दिन का इन्तजार है, जब सभी भारतवासी हिन्दी को इज्जत देना शुरु करेंगे.
    Thanks for Promoting our belovd National Language by writing a blog in it.

    Jyotsna Verma
    Liver Transplant Consultant

    http://www.indialivertransplant.com

  24. इतने लोगों से हिम्मत बढाया, अब तो दौड़ रही होंगी आप ?

  25. अकेलेपन को समझ नहीं सका मैं !

  26. अरे क्यों दुखी हैं। क्या हो गया। यह उम्र तो मौज मस्ती की है।

  27. मुक्ति जी! आज आपका यह पोस्ट पढ़कर जरुर दुःख हो रहा है … कभी कभी लगा की जैसे आपने मेरे मनोभाव को भी उकेरा है … सच में जब दुःख की इन्तहा हो जाती है कुछ भी नहीं भाता है … लेकिन कहते है की जब गहन अन्धकार हो तब निश्चित ही समझ लेना चाहिए की निकट ही प्रकाश भी है….. यही तो जीवन है …….
    जब भी मन बेहद दुखी हो तो हमें उन लोगों के बारे में सोचना चाहिए जो की सड़क पर पड़े-पड़े न जाने कब दुनिया को छोड़ लेते है.. जिनकी परवाह किसी भी नहीं रहती ….. ऐसे लोगों को देख भगवान को धन्यवाद देना चाहिए की हे भगवान तुमने कम से कम हमको इतना कुछ दिया है….. और भी न जाने क्या क्या मन में आ रहा है लेकिन मैं तो यही कहूँगी की ‘यदि जीवन में संघर्ष नहीं तो फिर जीवन का क्या अर्थ” … हर तुच्छ से तुच्छ समझे जाने वाले प्राणी भी तो जीवन संघर्ष में जुटे रहते है.. फिर हम तो इंसान है …

  28. हम तो विवेक की बात से सहमत हैं।

    हम तो मानते हैं कि सब कुछ लुट जाने के बाद भी भविष्य बचा रहा रहता है।

    मौत की खामोशी को जिजीविषा के हल्ले से छिन्न-भिन्न किया जाये।

  29. मृत्यु का भय अपने आप में कोई उलझन नहीं हैं। मृत्यु जीवन का ही दूसरा तट है। जो प्रथम तट को समझता है, उसकेे लिए मृत्यु का भय स्वतःइ समाप्त हो जाता है। प्रतिबद्धता पुर्ण जीवन, इच्छाओं एवं आकुलता भरा जीवन असली समस्या हैं। सजगता द्वारा जो अपने तन-मन-धन में उठती प्रत्येक तरंग, कम्पन एवं विचार को तटस्थता में जान लेता है, वह वर्तमान में जीता हुआ अपनी समस्त उलझनों को मिटा देता है। अतीत और भविष्य, काल और क्षेत्र से ऊपर उठ जाता है; यानी सहज ज्ञाता-दृष्टा बन जाता है।
    इस प्रकार के अवलोकन से मन में उठते विकल्प स्वतः षान्त हो जाते हैं। समस्याएँ विसर्जित हो जाती है। तनाव लुप्त हो जाते हैं। भय स्वतः मिट जाते हैं। चूँकि सीमित मन असीम का अनुभव कर लेता है। तब ज्ञात मन स्वतः ही ‘अज्ञात’ को जानने लगता है। व्यक्ति असमय एवं अनन्त हो जाता है। ऐसे में मौत का सामना करने की समस्या लुप्त हो जाती है। पाने की इच्छा के विसर्जन के साथ ही खोने का प्रश्न मिट जाता है, अर्थात् प्रमाद जीवन की समस्या है। और सजगता उसका समाधान।

  30. एक जरुरी लेख लिखने जा रहा था और साथ ही उस लेख से जुड़े अन्य लेख को पढ़ रहा था की मेरी नज़र तभी तुम्हारी “उलझन ” से भरी एक लेख पर पढ़ी..उसको पढ़ा और पढने के बाद “रहा न जाए जी ललचाये ” की तर्ज़ पर उस पर कुछ कहने का मन बना ही रहा था की तभी इस लेख पर भी नजर पड़ गयी ..अब अपना लेख बाद में लिखूंगा पहले यही थोडा सा कुछ कह लू ..दोनों लेख पढने के बाद यही लगा की आराधना नाम के रेडियो ने कौन सा स्टेशन पकड़ लिया है जहाँ से “उलझन ” और “तन्हाई ” की बात हो रही है..वैसे ये स्टेशन मेरे अन्दर भी रोज ऐसी बाते प्रसारित करता रहता है इसीलिए मुझे ये बात बहुत सुनी सुनी से लगी.

    …मै अभी अपने गाँव में था ” अन्तर्जाल की दुनिया… एक आभासी संसार. ” से बहुत दूर ..इस तरह के रेडियो ने दशको पहले ही अपना प्रसारण शुरू कर दिया था मेरे भीतर और तुम समझ सकती हो की इस तरह के जो विचार जो तुम्हारे अंदर कबड्डी खेल रहे है इन्ही विचारो का सबसे परिष्कृत रूप या कहू की क्या होता है इन विचारो से गुजरने के बाद वाली स्थिति है मेरी अब…कहने का मतलब यह है की जो मेरा रेडियो प्रोग्राम प्रस्तुत कर रहा था बहुत साल पहले तुम्हारा रेडियो अब कर रहा है..मै कह रहा था की मै गाँव में था और कुछ कुछ तुम्हारे सिग्नल्स मेरा टावर भी पकड़ रहा था क्योकि वहा एक ऊँचे टीले पर बैठ कर बढ़ी हुई गंगा में उठती हुई लहरों को देखते हुए मै ज़िन्दगी के मतलब का पोस्टमार्टम कर था .एक तरफ गाँव में व्याप्त घनघोर शान्ति थी तो दूसरी तरफ पीछे छुट आया शहर का शोर था …मन किसको सच माने शोर को या शांति को ? ..एक तरफ मुन्नी बदनाम हो रही थी ,टकसाल ,सिनेमा हाल ,थिअटर और अमिया से आम हो रही थी और एक तरफ खामोशी ख़ामोशी सी हो रही थी बारिश से भीगी ठंडी हवाओ के बीच ..इन दोनों में से किसे अपनाऊ मुन्नी को या ख़ामोशी को ?

    वापस आ गया आभासी दुनिया में और देख रहा हू की आराधना नाम के रेडियो से “तन्हाई ” और “उलझन” का प्रसारण चालु हो गया है …सोच रहा तुम पर copyright का मुकदमा कायम कर दू मेरे “तन्हाई” और “उलझन” जैसे प्रिय विषय पर एक जैसे बाते लिखने के लिए..पर दोस्ती का लिहाज करते हुए मुकदमे का ख्याल दिल से निकाल दिया है…लगता है की बहुत कुछ कह दिया अब मेरे रेडियो का प्रसारण बंद होने का टाइम आ गया है…क्यों न एक चलते चलते एक गीत हो जाए :माई री मै कासे कहू पीर अपने जिया की !!!! गीत का लिंक facebook पर है..सुन लेना मदन मोहन की आवाज मे.

    Arvind K.Pandey
    http://indowaves.instablogs.com/

  31. बहुत सी महत्वपूर्ण प्रविष्टियां छूट रहीं थीं . इसे छोडना पछताने जैसा होता !
    कहना कुछ शेष ही नहीं ! बहुत कुछ कह दिया गया है यहां !
    आभार !

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