आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

उलझन-उलझन ज़िंदगी …

उलझन-उलझन ज़िंदगी… सुलझती ही नहीं… सुलझाने के चक्कर में हम और भी उलझते जाते हैं…एक धागा सुलझाते हैं कि कोई दूसरा उलझ जाता है. कभी हांफते, कभी थक जाते … हम सभी अपनी उलझनों को सुलझा लेना चाहते हैं, पर ये नहीं सोचना चाहते कि ये उलझन पैदा कहाँ से हुई… सिरा ही तो नहीं मिलता…

कभी-कभी लगता है कि मैं सबसे अधिक परेशान हूँ, तो कभी दूसरों की मुश्किलें खुद से ज्यादा बड़ी लगती हैं. मैं सोचती हूँ कि मुझे अफ़सोस नहीं होना चाहिए  क्योंकि इस उलझन को मैंने खुद चुना था… ‘उलटी धारा में तैरेंगे, फिर चाहे तो बह जाएँ या डूब जाएँ’, ये जिद अपनी ही थी…पर क्या सच में?…ये हमारी पसंद थी या मजबूरी?  अगर विकल्प होते तो क्या हम वही चुनते, या कुछ और?

हमारी ज़िंदगी के फैसले लेने में विकल्पों की कमी क्या सिर्फ मुझे ही सालती है या और लोगों को भी? क्या मेरे पास सारे संसाधन होते तो मैं वही करती, जो अभी कर रही हूँ? या कुछ और करती. बहुत कोशिश करने पर भी समझ में नहीं आता, पर, अब समझ में आकर भी क्या करेगा? जब समझ में आना चाहिए था, तब पहली बात तो विकल्प ही नहीं थे, और जो थोड़े विकल्प थे भी, उनमें से क्या चुनें, इसकी समझ नहीं थी.

हम सभी की ज़िंदगी में एक समय ऐसा आता है, जब रूककर खुद को, अपनी ज़िंदगी को, समझने की ज़रूरत महसूस होती है. ऐसा तब होता है, जब हम अपने बहुत करीब होते हैं… हममें से सभी खुद से बातें करते होंगे, खुद को समझने की कोशिश करते होंगे, पर समझ में कभी नहीं आता. कोई भी अतीत के बारे में परिकल्पना का सहारा लेकर किसी परिणाम पर नहीं पहुँच सकता कि यूँ होता तो क्या होता, वैसा होता तो क्या होता…हम आज जो हैं जैसे हैं, वैसे होते या कुछ और? बहुत सी बातों पर हम पछताते हैं, बहुत सी बातों पर राहत की साँस लेते हैं, पर, हम उसे बदल नहीं सकते और ना ही ये जान सकते हैं कि अगर वैसा ना होता जैसा कि हुआ है, तो कैसा होता? संभाविता की ये बातें आदमी को हमेशा तंग करती रही हैं और करती रहेंगी…

हम कभी ये नहीं जान सकते कि अमुक समय पर अगर हम वो निर्णय ना लेते, तो परिणाम क्या होता…? हम बस अपनी उलझनों में उलझे रहेंगे …इन उलझनों को हम सुलझा पायें या नहीं, पर कोशिश करते ही रहेंगे… हो सकता है कि हम आने वाली पीढ़ी को कुछ बेहतर विकल्प दे पायें या कोई अनचाहा निर्णय लेने से रोक पायें.

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25 thoughts on “उलझन-उलझन ज़िंदगी …

  1. संभावनाओं की बातें तो हमेशा तंग करते रहती हैं, कितनी बार महसूस किया है मैंने भी..हाल फ़िलहाल में जो चल रहा है थोड़ा बहुत दिमाग में, कुछ कुछ उसी की बातें है इसमें.

  2. इसी उलझन का नाम जिंदगी है …इसे सुलझाते हुए ही सबका जीवन कटता है …बस अपनी कोशिश करते रहो ….

  3. ye ualjhi hai tbhi es ko jine me mja hai,nhi boring ho jati kuch hi salo me.vese v koi v nirnay apne samay ki best soch ka prinam hote hai,es liye us ko us samay ke sath hi parakhna chahiye,nhi to yu hi fijul me preshan hote rhege.

  4. बस, यही तो जीवन है:

    उलझन उलझन उलझ रहा हूँ
    कैसे मैं सुलझाता उनको
    जीवन भी तो समझौता है
    कैसे यह बतलाता उनको.

  5. प्रवीण पाण्डेय on said:

    उलझन सोचने से बढ़ेगी। विचारों को अन्यत्र लगा दें तुरन्त। काल सदैव दुख नहीं देता है। हार्दिक शुभेच्छायें।

  6. असल में होता क्या है कि ….हम खुद को सफलता से जोड़कर देखते हैं….ज़ाहिर है उसमें आर्थिक सम्पन्नता और कैरियर प्रमुख होता है….
    बस वहीँ से शुरू होता है उलझन का दौर ….शायद हताशा, निराशा इसी दौर में आकर घेरती है…..

  7. कुछ ऐसी गलतियाँ मैंने की हैं जिसे काश कि मैं बदल पाता.. काश जिंदगी में रिवाइंड बटन होते..

  8. मेरी जबरदस्त उलझन तो अभी अभी लेख को देखने के बाद उत्पन हुई है :-)) …तुम्हारी फोटू को निहारु या या उलझन से भरी पोस्ट के बारे में कुछ कहू !!!! कैसी उलझन है ये !!!!

    चलता हू यहाँ इस पोस्ट से वरना क्या पता तस्वीर में से निकल कर मुझे धमकाने लग जाए और पूछ बैठे क्या देखते हो ?मेरी तो उस वक्त बोलती बंद हो जायेगी ..अब फिरोज़ खान साहब की तरह मै थोड़ी न कह पाऊंगा की “सूरत तुम्हारी ” :-))

    वैसे उलझन भरी पोस्ट के बारे में मै मै सोचता हू यह गीत तुम्हारे लेख का प्रतिबिम्ब है…आशाजी ने इसे धुंध में गाया है..बेहतरीन गीत है…

    उलझन सुलझे ना…

    Arvind K.Pandey

    http://indowaves.instablogs.com/

  9. aap ka ye lekh mujhe kuchh salo pahle likhe apne ek gadyansh ki yaad dila gaya
    http://apurn.blogspot.com/2007/12/blog-post.html

  10. पिछली दो पोस्ट एक थके हारे हुए इंसान सी …शोभा नहीं देतीं ! निर्णय किसके गलत नहीं होते ? विकल्प किसे कम नहीं पड़ते ? उलझने किसे नहीं होतीं ? भीषण हालात में जी रही एक बड़ी आबादी को गौर से देखिये ! हौसला रखिये !

  11. कई बार गुजरते हैं हम ऐसी ही भावनाओं से …
    मगर सही तरीका है जीवन जीने का …
    जो हुआ सो हुआ …
    बीती ताहि बिसार दे …
    पिछली दोनों प्रविष्टियाँ बहुत उदास सी हैं …
    अब कुछ मुस्कुराता लिख दो ..जल्दी से …!

  12. कई बार गुजरते हैं हम ऐसी ही उलझनों से …
    मगर जीवन जीने की कला तो यही है
    बीती ताहि बिसार दे …अब आगे की सोच …
    पिछली दोनों प्रविष्टियाँ उदास सी हैं …अब जल्दी से कुछ मुस्कुराता लिख दो ..!

  13. नाहक परीशान हैं -आपके या किसी के भी वश में कुछ नहीं होता -जो जैसा है वैसा है -इसीमें मस्त रहिये –
    उलझनों को उलझनों के रूप में लेना सबसे बड़ी उलझन है -अपने मन की बात सुनिए बस !

  14. ब्रेक .!!!!…हमारे यहाँ कहते है ……ये रिचार्ज कूपन का काम करता है …कभी कभी मुश्किलों की गुथ्थिया वक़्त की सुई खोल देती है ……

  15. किसी का भी जीवन सम्पूर्णता से लबरेज नहीं होता है /
    आप तो बीडी या सिगरेट भी नहीं पीते हो कि मै कहू कि , हर फिक्र को धुएं में उड़ा दो /
    मैंने अपने जीवन से जो सीखा है , सफलता, असफलता , इज्जत और जलालत के बाद वह केवल यह है – चलो चले बनाएं अपनी राहें, फिर देखेंगे कहा ले जाती है / इस धरती पर कोई भी घटना दोहराई नहीं जाती हर घटना एक नयी घटना होती है , हर सुबह एक नयी सुबह और रात एक नयी रात किसी भी तरह की कोई समानता नहीं होती है / इसलिए खुद को किसी ढाँचे में बिठाने की कोशिश बेकार है /
    …………………………………………………………………………………………………………………………………./ its life.

  16. क्या हो गया, क्यों परेशान हैं।

    मैं भी परेशान हो गया कि आप क्यों परेशान हैं।

  17. और मैं सोचता था कि मैं अकेला हूँ..

  18. आराधना,
    इतनी उलझन भी ठीक नहीं….तुमने लिखा है…”हम सभी की ज़िंदगी में एक समय ऐसा आता है, जब रूककर खुद को, अपनी ज़िंदगी को, समझने की ज़रूरत महसूस होती है. ”

    सोचो तुम्हारी बिरादरी की ८०% लड़कियों को यह मौका मिलता है??…उनकी ज़िन्दगी के फैसले कोई और लिए जाता है और वे बस, ज़िन्दगी ढोती रहती है…पूरी ज़िन्दगी गुज़र जाने के बाद ,पता चलता है..अपने मन का तो कभी कुछ किया ही नही…तुम लकी समझो खुद को…कि अपनी ज़िन्दगी के फैसले खुद ले सकी…आगे कुछ बोलूं तो उपदेश लगेगा…पर बस छोटे छोटे गोल रखो…मुकाम पर पहुँच कर आगे बढ़ जाओ…असीम शुभकामनाएं.

  19. आपने लिखा
    बहुत सी बातों पर हम पछताते हैं, बहुत सी बातों पर राहत की साँस लेते हैं, पर, हम उसे बदल नहीं सकते और ना ही ये जान सकते हैं कि अगर वैसा ना होता जैसा कि हुआ है, तो कैसा होता? संभाविता की ये बातें आदमी को हमेशा तंग करती रही हैं और करती रहेंगी…
    हाँ ऐसा अक्सर होता है जब हम सही समय किन्हीं खास निर्णयों को जानबूझ कर टालते रहते हैं, सोचते हैं इसके लिए अभी समय नहीं आया; लेकिन बाद में पछताते हैं काश उस समय….
    कई बार हम अपने बड़ों की बातों को नहीं मान कर भी पछताते हैं और फिर एक वक्त ऐसा आता है जब कोई बड़ा भी नहीं होता हमारे पास..
    खैर कई बाते हैं, फिर कभी सही!

  20. इन उलझनों से जूझने से ही राह निकलती हैं…
    जूझिये…और जूझिये…
    और ख़ुदबखुद रास्ते सूझते जाएंगे….

  21. हा हा हा…
    तो आप हियाँ उलझी हुई हैं ?
    इसी को जीने का सबब बना न लीजिये, बबुनी ।
    यह खुद ही आप से अपने आपै शरमाने लगेगा ।
    समझाइश चाहिये, तऽ वहू लीजिये

    मन काहे घबराये
    रे तू मन काहे घबराये
    धरती पर उजियारा फिर क्यों मन में छाय अँधियारा
    चँदा उधार माँगे रोशनी, झिलमिल तारों को भटकाये,
    उसे कोई फिर क्योंकर राह दिखाये

    मन काहे घबराये
    रे तू मन काहे घबराये
    ग़म की रात भी कट ही जायेगी हिम्मत छोड़ न देना
    यूँ प्यास से न घबराओ कि जीवन-प्याला ही न तोड़ देना
    धीर धरे जो राही मनवा काहे को पछताये

    मन काहे घबराये
    रे तू मन काहे घबराये

    And… So on
    Keep adding your own lines
    Smile.. and go on !

  22. life is all about to get break through in different situation.
    aayine(mirror) badlne se surten badlti dekhi humne ,
    ek bar koshish to kar jor laga jinadgi badalti dekhi humne,
    are , soch jivan me jine ke andaz kai dekhe humne,
    ye bas ek baar mila hai mitti sa bah raha hai,
    kanhi sochte sochte hi na bit jaye ye safer,
    badha kadam himmat to kar,
    apno ke liye itna hi sahi ab jeeke dikha gairon ke liye,
    janha maan bhi ho samman bhi ho ,
    ho apni jami apna aasman bhi ho….
    samjh raha hun main teri ye uljhan…
    gar sahi hun to mere naam ye paigam bhi ho.

  23. आत्मालाप पुराण हा हा

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