आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

छुअन के चार पड़ाव

पहला पड़ाव

मेरा जन्मदिन. हम दिन भर घूमे थे. शाम को हॉस्टल के गेट पर खड़े होकर बातें कर रहे थे. मेरा मन नहीं हो रहा था कि तुम्हें छोड़कर अंदर जाऊँ. शाम का धुँधलका, गुलाबी ठण्ड. तभी हल्की हवा का एक झोंका आया और मेरे बालों की एक लट मेरे चेहरे पर बिखर गयी. जाने क्या सोचकर मेरी आँखे भर आयी थीं. तुमने अपने हाथों से मेरे चेहरे से वो लट उठाकर कानों के पीछे अटका दी, इस बात का पूरा ध्यान रखते हुए कि कहीं तुम्हारा हाथ मेरे कान या गर्दन से छू ना जाए, पर वो छू ही गया और मेरा पूरा शरीर सिहर उठा. तुमने कहा, “मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ” तुम्हारी वो छुअन, बातों की और हाथों की, अभी भी मुझे सिहरा देती है.

दूसरा पड़ाव

तुम मुझसे मिलने हॉस्टल आये. हम विजिटिंग हॉल में बैठे. मैं नाराज़ थी किसी बात पर और तुम मनाने की कोशिश कर रहे थे. अचानक तुमने मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए और बोले, “तुम्हारे हाथ तो आम के नवपल्लवों की तरह कोमल हैं.” मुझे तुम्हारी ये हिन्दी सुनकर हँसी आ गयी. मैं आज भी अपने हाथ अपने गालों पर रखकर महसूसने की कोशिश करती हूँ कि वे वाकई नव आम्रपल्लवों जैसे कोमल हैं कि नहीं.

तीसरा पड़ाव

हम बस से घर जा रहे थे. मैं आठ घंटे की यात्रा से बहुत थक गयी थी और बार-बार ऊँघ रही थी. मेरे बगल में बैठे हुए तुमने अपना हाथ पीछे से मेरे कन्धों पर रखा और मेरा सिर अपने कन्धों पर टिका लिया और मैं चुपचाप सोने का नाटक करती रही…

चौथा पड़ाव

तुम मेरे घर आये थे. गर्मियों की रात थी. गाँव में लाईट तो रहती नहीं. सबलोग रात का खाना खाकर बाहर बैठे हुए थे. मैं बारी-बारी से सबके बिस्तर लगा रही थी. मैं पिताजी के लिए  मच्छरदानी लेने कमरे में आयी तो पानी पीने का बहाना करके तुम भी आ गए. मेरा हाथ पकड़कर अपनी ओर खींचा और अचानक रुककर बोले, “डर गयी थी ना?” मैं तड़पकर रह गयी कि बेवकूफ ने इतना अच्छा मौका गँवा दिया… गले क्यों नहीं लगा लिया?

छुअन के इन पड़ावों के साथ ही हमारा नाता गहरा होता जाता है… …

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43 thoughts on “छुअन के चार पड़ाव

  1. क्या बात है आराधना ! आज तो गज़ब की मीठी मीठी छूअन का सा अहसास करा रही है तुम्हारी पोस्ट 🙂

  2. ye chhota chhota chhuna jindgi bhar mhsus hota hai na…

  3. रूमानी एहसास वाली पोस्ट….क्लैप, क्लैप, क्लैप

  4. bahut romantic……. aur main kaafi kuch sochne laga… 🙂 kuch purana sa .. 🙂

  5. चौथा पड़ाव बेहद रूमानी जान पड़ती है मुझे.. तुम्हारा क्या ख्याल है?

  6. Hey,you have unleashed memories dipped in romance of bygone- era..Well, I don’t know why I became too sad after reading it when I should have given way to a big smile…

    Though I feel such revelations should remain private, I still enjoyed reading it. I mean unless they are part of any great literary piece in a very fitting manner the intimate moments shared with someone should not be made public.

    Once again I enjoyed reading it but I don’t know why sadnesss soon followed me once I finished reading !!!

    Arvind K.Pandey
    http://indowaves.instablogs.com/

    • अरविन्द, तुमने कैसे ये सोचा कि ये मेरी व्यक्तिगत यादें हैं?… मैंने तो कहीं भी ये नहीं लिखा… खैर अगर तुमने ये सोचा तो मैं ये सोचकर खुश हूँ कि जो कुछ भी लिखा गया है वह इतना जीवंत है कि वास्तविक सा लग रहा है.

  7. प्रिय आराधना जी
    कितना प्यारा भाव ले आती हैं आप . सच में लगता हैं जैसे ईश्वर ने सारी संवेदना आपमें डाल दी हो , आप जो विरह के ऊपर लिखती हो वो भी बहुत रुला देता हैं . सबसे अच्छा लगता हैं कि आप बिना किसी लाग लपेट के सतत लिखती हैं जो भावनाओ में बहा देता हैं हैं . मैंने आपकी एक पोस्ट पढ़ी थी कभी ” सुनो मुझे तुम्हारी ये बाते अच्छी लगती हैं ”
    !! श्री हरि : !!
    बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

  8. ओह!

    चारों पड़ावों पर एक एक करके चार आह!!

  9. Kuchh Purani Meethi Yaade ……… 🙂

  10. ओ माय माय.. !!

    एक एक पड़ाव जैसे रोमांस में डूबा हुआ है जैसे ब्राउनी हॉट चोकलेट में डूबी हुई हो.. तर ब तर..

    इस ब्लॉग पे मेरी पढ़ी हुई अब तक की सबसे उम्दा पोस्ट..!!!

  11. बज्ज़ पर तो इसे पसंद किया ही था… लेकिन यहाँ भी … बेहतर … आपके बहाने जयशंकर प्रसाद से भी मिलना हुआ

  12. प्रवीण पाण्डेय on said:

    ये चार पड़ाव, प्रेम के चार तीर्थ।

  13. क्या कहूँ जैसे कोई अश्ललिलता बांट रहा हो सबके सामने । मुझे नहीं लगता कि इस तरह के अंतरंग सम्बन्धो को किसी के साथ शेयर करना चाहिए वह इस जैसे प्लेटफार्म पर । मैं आपका मंतव्य नहीं समझ पाया इसे पोस्ट करने का कहीं बज पर हिट रहने की लालसा ये सब पैदा तो नहीं कर रही है खैर जो आपकी इच्छा ।

  14. हा हा ..रूमानियत और तनिक टीजिंग,तनिक सेन्स आफ ह्यूमर से भरी पूरी पोस्ट ….
    यह सवाल ही क्यूं की ये किसके अनुभव हैं -मनुष्य जाति के हैं !

  15. बड़ा अनछुआ,अनकहा सा लिख डाला…पूरी एक कहानी रच डाली…और कुछ समझने लगे ये सब किसी डायरी का पन्ना है…हा हा ….लिखा ही इतना जीवंत है…..रूमानी अहसास से भरपूर

  16. दी…आपका ये एक अलग ही रंग देखा मैंने. बहुत मासूम सा….

  17. बहुत प्यारे एहसास! सुन्दर पोस्ट!

  18. चारों पड़ाव बहुत जीवंत ….यह चार पड़ाव पर ही क्यों खत्म खत्म हो गयी ?

    बहुत खूसूरत शिल्प …अंतिम पड़ाव बहुत खूब ..

  19. पढ़ा था इसे, आज फिर पढ़ा , तब भी जो मन में भाव आये आज फिर वे यही कह रहे हैं की कैसे आप भावों को इतनी सहेजता से शब्दों में उकेर लेती हैं…..
    एक अरसा हुआ रोमांस में डूबा हुआ एक-एक शब्द पढ़े और आपने पढ़ा दिया…..
    आलोचनाओं को मारिये गोली… क्योंकि यही रोमांस में पेज हुए शब्द कोई पुरुष लिखे तो आलोचनाएं कम होंगी लेकिन…..

    बधाई आपको जो आप मन में उठते ख्यालो को इतने अच्छे से शब्दों में पिरो पाती हैं……

  20. देर लगी आने में, मगर आना वसूल हो गया।अच्छा है दिल के पास रहे पासबाने-अक़्ल, लेकिन कभी-कभी उसे तन्हा भी छोड़ दे…-बड़े मियाँ भी इन्हीं ऊँचाइयों पे जा के ये लिख पाए होंगे। सबसे ऊँची प्रेम सगाई – भी ऐसे में ही कहा गया होगा… सन्तन ढिंग बैठि-बैठि, लोक-लाज खोई रे…-मीरा भी ऐसे ही दिवानी हुई होंगी…………
    ये स्त्री-पुरुष कहाँ से आ गए बीच में…सारा अलौकिक प्रेम का मज़ा किरकिरा कर दिया। याद दिलाता चलूँ – पुरुष तो एक ही है सृष्टि भर में – बल्कि उससे ऊपर मेरा कान्हा, और बाक़ी तो हमारे दिलो-दिमाग़ में भरी चीज़ों पर है कि अपनी कल्पना को किस ओर, कितनी दूर तक ले जा पाते हैं हम – गन्दगी में या गंगा में…

    • मैंने तो स्त्री-पुरुष के भेद से ऊपर ही जाकर लिखा था हिमांशु जी. मैं प्रेम को सारे भेदों से ऊपर मानती हूँ, पर बज़ पर भी और यहाँ भी लोगों की कुछ आपत्तियों के चलते ये बात दिमाग में आ गयी… बहुत सी जगहों पर हम औरतें लोकलाज से अपने उद्गार दबा जाती हैं. बज़ पर देखा है मैंने कि पुरुष प्रेम में पगी बातें लिखें तो वाह-वाह होती है और औरतें लिखें तो जाने कौन-कौन सी उपाधियों से नवाज़ दिया जाता है.
      खैर जिसने प्रेम किया वही जानता है कि यह लौकिक-अलौकिक, दैहिक-आध्यात्मिक इन सब से परे होता है… प्रेम में पगी एक-एक बात पवित्र होती है, बशर्ते देखने वाले की नज़र ऐसी हो.
      सही कहा है आपने ” बाक़ी तो हमारे दिलो-दिमाग़ में भरी चीज़ों पर है कि अपनी कल्पना को किस ओर, कितनी दूर तक ले जा पाते हैं हम – गन्दगी में या गंगा में…”

  21. प्रिय आराधना जी ,
    वैसे इस पोस्ट पर मेरा दूसरा कमेन्ट हैं. असल में आपने जितना अच्छा लिखा हैं वो तो सिर्फ इश्वर कि दया से ही संभव होता हैं पर मुझे लगता हैं कि स्त्री होने कि वजह से आप को बार बार सफाई सी देने के लिए विवश सा होना पड़ रहा हैं . मेरे ख्याल से आप अपनी इतनी अच्छी पोस्ट पर विश्वास मत खोये . आपके किसी भी भाव को मत सोचिये कि वो दुर्लभ नहीं हैं . आप एक अच्छी ब्लॉगर ही नहीं एक बहुत लड़की भी हैं लेकिन आपका यु सफाई देते रहना बहुत ख़राब लगता हैं कि आप औरो कि राय से प्रेरित ना हो . आपने जो लिखा वो निसंदेह आत्मा से उठे भाव हैं उन्होंने सिर्फ अध्यात्म , गोपिभाव के प्रेमी या soulmate के भावो को जानने वाले ही आत्मसात करेंगे बाकि तो सब दुनियादारी में बैठे ब्लॉगर बस व्याहारिक टिपण्णी कर रहे हैं उन्हें इतनी गंभीरता से ना ले . शायद आपको ध्यान हो गोपिओ ने उद्धव जी से कहा था
    ये मोहब्बत कि बाते हैं उद्धव बंदगी अपने वश कि नहीं हैं
    यहाँ सर देकर होते हैं सौदे आशिकी इतनी सस्ती नहीं हैं
    प्रेम वालो ने कब किसको पूजा किसको पुजू बता उद्धव
    यहाँ दम दम दम पर होते हैं सिजदे सर उठाने को फुर्सत नहीं हैं .
    सच में आराधना जी जो आपने लिखा हैं वो बहुत गूढ़ हैं फिर क्यों हम जैसे साधारण लोगो कि राय से आप हतोत्साहित सी होकर सफाई देने लग जाती हैं


    !! श्री हरि : !!
    बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

  22. Some time we don’t know why people comment on our thought but its life if people didn’t comment then how we may know when to react or when not needed

  23. बहुत दिनों बाद कुछ दिल से निकला हुआ पढ़ने को मिला है। बधाई आपको..

  24. सारे पड़ाव मन को छू गए ।


  25. यदि यह व्यक्तिगत हों फिर भी प्रतिवाद कैसा,
    हाय.. ओह, ग़ुज़रा हुआ ज़माना आता नहीं दुबारा..
    मैं लाज़ से विभोर क्यों हो रहा हूँ, कोई देख रहा था, क्या ?
    नहीं, तो मैं शरम से लाल क्यों हुआ जा रहा हूँ, धुत्त पागल !

  26. prem jab tak parde me ho umang deta hai,
    per hokar beparda apna namak kho deta hai.
    apno ki aur logo ki nazar se bach kar ….,
    jab bhi mila tujh se ek pyas liye lauta hun me,
    phir tanhai me milane ki aas liye lauta hun me,
    tujh se milna hai ye soch kar aksar….
    sara din bachaini me kaat dete hai rehbar.
    kuch aise hi hota hai pyar jamane main

  27. Bahut hi sundar dhang se aapne saare pyar bhare padhon ko ek saath gunth kar ek pyara ahsas jaga diya …
    bahut hi achha laga…. ek prativib sa ubhar aaya….

  28. सिहर गया क्षण भर के लिये !
    कितने कोमल अहसास ! आम्र-पल्लवों -से ! (पर इनका चित्र कहां गया ?)

    बेहतरीन ! आभार .

  29. देर से आये लेकिन दुरुस्त आयें 🙂
    बहुत ही प्यारी सी पोस्ट लगी मुझे ये

  30. तुम्हें देखते देखते तो बरसों गुजर गए , हाँ आज पहली बार इस तक पहुंची हूँ. ये मेरा नसीब कि इतने दिन वंचित रही. बहुत अच्छा और अहसास को इतना सजीव वर्णन किया है की पढ़ने वाले धोखा खा गए. यही तो कलम की कलाकारी है.
    बहुत शुभकामनाएं !

  31. chuan ka ye ahsaas aapkaa
    mere dil ke bhav jaga geya
    pad kar thathka dil mera
    kuch purane geet suna geya
    pehli baar jab chua tha use
    wo meethi yaad dila geya

  32. प्रिय आराधना जी,
    नमस्कार !!!

    बहुत अच्छा लगा पढ़ कर |
    हिंदी में पढ़ कर लगता है की मात्री भाषा के साथ ही माँ के पास पहुच गए वर्ना आज रोजी रोटी के चक्कर में अंग्रेज बन गए हैं |

  33. मैं वीरेंदर जी के विचार से सहमत हूँ | कलम में लिखने के भाव माँ सरस्वती की कृपा से आते हैं |
    लेखक की परिकल्पना पात्र को व्यक्त करती है ना की उसके निजी जीवन को | और इस लेख में कुछ भी अश्लील नहीं है |

  34. bahut sundar post..aradhana…….mithilesh ke vicharo se hairat hai……isme kya ashleel laga unko??? …tajjub hai….

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