आराधना का ब्लॉग

'अहमस्मि'- अपनी खोज में

Archive for the day “दिसम्बर 2, 2010”

चाकू (एक कहानी )

किसी शहर में एक लड़की अपने पिता के साथ रहती थी. लड़की का पिता था तो किसी फैक्ट्री में चौकीदार, पर उसे लोहारगिरी का शौक था.  वो तरह-तरह के औजार और हथियार बनाता रहता. कुल्हाड़ी, फावड़े, छेनी, हथौड़ी, आरी और तरह-तरह के चाकू.  कुछ छोटे, कुछ बड़े, कुछ लकड़ी के बेंट वाले, कुछ लोहे के, कुछ सीधे, तो कुछ मुड़ने वाले चाकू. लोग कहते थे कि किसी ज़माने में वो जाना-माना चाकूबाज था और पहलवानी भी करता था, इसीलिये उसे आसानी से चौकीदार की पक्की नौकरी मिल गयी थी. लड़की अपने पिता के बनाए चाकुओं को देखकर ललचाती रहती थी. खासकर उसे एक लकड़ी के बेंट वाला मुड़ने वाला (फोल्डिंग) चाकू बेहद पसंद था. वो सोचती थी कि उसके पिता उसे चाकू दें, तो अपनी सहेलियों को दिखायेगी कि वो कितने अच्छे कारीगर हैं. पर जब भी वो माँगती उसका पिता उसे टाल देता. वो चाहता था कि उसकी इकलौती बेटी पढ़ने में मन लगाए.

एक दिन लड़की बिल्कुल ‘चंद खिलौना लैहों’ वाले अंदाज़ में जिद कर बैठी,   “बप्पा, हमें वो मुड़ने वाला चाकू दे दो ना” “पर बिट्टो, तू उसका करेगी क्या?” पिता ने पूछा तो बोली, “बदमाशों को मारूँगी” पिता बड़ी देर तक हँसता रहा, फिर पूछा, “और बदमाश ने तुम्हारी चाकू छीनकर तुम्हें ही मार दिया तो?” लड़की कोई जवाब नहीं दे पायी. उसके पिता ने कहा, “बेटा, हथियार से ज्यादा अपने हौसले पर, अपनी हिम्मत पर भरोसा करना चाहिए. अगर तेरे पास हिम्मत है, तो तू दुश्मन का हथियार छीनकर उसे मार देगी और हिम्मत नहीं है, तो वही तेरा हथियार छीन लेगा.” लड़की को कुछ समझ में नहीं आया. उसने सोचा चाकू तो दिखता है. ये हौसला और हिम्मत कहाँ रहते हैं? जब दिखते ही नहीं तो इन पर कैसे भरोसा करें? उसे लगा उसके पिता फिर उसे टाल रहे हैं, पर पिता ने उसे चाकू दे दिया. लड़की खुश हो गयी.

लड़की हमेशा उस चाकू को अपने पास रखती. यहाँ तक कि चुपके से बस्ते में डालकर स्कूल भी ले जाती थी. पर डाँट पड़ने के डर से अपनी एक-दो सहेलियों के अलावा और किसी को नहीं बताती थी. उसे उस चाकू से बड़ा लगाव था. उसे वो अपना रक्षक समझने लगी थी.

ऊँचे क्लास में पहुंचने के साथ ही लड़की को ट्यूशन भी करना पड़ा. उसे वहाँ से लौटने में देर होती, तो उसका पिता चिंतित हो जाता. इस पर लड़की पिता को बच्चों की तरह बहलाने की कोशिश करती कि अगर कोई बदमाश उस पर हमला करेगा तो उसे चाकू मार देगी. उसका पिता उसके इस भोलेपन पर हँसकर रह जाता. पर लड़की का यही भोलापन  और बचपना उसके पिता की चिंता बढ़ा देता था.

एक दिन ट्यूशन से लौटते हुए लड़की को देर हो गयी. सर्दियों की शाम थी. सारी गलियाँ अँधेरे में डूब गयीं. लड़की ने घर जल्दी पहुँचने के लिए एक छोटा संकरा रास्ता पकड़ा, जो कि काफी सुनसान रहता था. वहीं दो शोहदों ने लड़की को घेर लिया और गंदे-गंदे फिकरे कसने लगे. लड़की बुरी तरह से डर गयी. उसके हाथ-पाँव सुन्न पड़ गए. मारे डर के उसके गले में चीख भी अटक गयी.  अचानक उसे चाकू का ध्यान आया. पर ज्यों ही उसने चाकू निकालने के लिए बैग में हाथ डाला, एक शोहदे ने उससे बैग छीनकर फ़ेंक दिया और दूसरे ने धक्का देकर उसे गिरा दिया. लड़की का सर ज़मीन से टकराया तो एक पल के लिए आँखों के सामने अँधेरा छा गया. उसी अँधेरे में उसे अपने पिता का चेहरा दिखा और उनके शब्द कानों में गूँज गए, “बेटा, हथियार से ज्यादा अपने हौसले पर, अपनी हिम्मत पर भरोसा रखना चाहिए.” लड़की ने तुरंत आँखें खोलीं और एक बदमाश को अपने ऊपर झुका पाया. अचानक लड़की ने अपनी पूरी ताकत लगाकर उस बदमाश की नाक पर घूँसा मारा. वो बदमाश तड़पकर पीछे हट गया. लड़की ने पास ही खड़े दूसरे बदमाश के पेट के निचले हिस्से पर घूँसा जड़ दिया. एक पल के लिए वो दर्द से झुक गया. फिर लड़की उतनी ही फुर्ती से उठी और अपना बैग उठाकर मुख्य सड़क की ओर दौड़ पड़ी. कुछ दूर आकर ही उसके मुँह से चीख निकली, तो उधर से कुछ लोग सहायता के लिए दौड़ पड़े.

बदमाश पकड़े गए. पुलिस, पड़ोसी और जान-पहचान के लोग सभी लड़की की तारीफ़ कर रहे थे. लड़की का पिता अपनी बेटी की बहादुरी पर आश्चर्यचकित था. लड़की को कुछ चोटें आयीं थीं. पिता ने उससे आराम करने को कहा, पर वो नहीं मानी और दूसरे दिन एकदम समय से स्कूल के लिए निकली. उसका चेहरा आत्मविश्वास से चमक रहा था, चाल बदल गयी थी. पिता ने देखा लड़की का मनपसंद चाकू उसकी पढ़ने वाली मेज पर रखा हुआ था. अब उसे इसकी ज़रूरत नहीं थी.

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